अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव तथा बल प्रयोग की धमकियों ने एक बार फिर अंतर्राष्ट्रीय कानून की उपयोगिता पर बहस छेड़ दी है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों के कुछ विद्वान अंतर्राष्ट्रीय कानून के अंत की भविष्यवाणी कर रहे हैं और तर्क दे रहे हैं कि हमें एक नियमहीन दुनिया के लिए तैयार रहना चाहिए।
- यह बहस यूक्रेन पर रूस के 2022 के आक्रमण से तेज हुई, जिसके बाद गाज़ा और पश्चिम एशिया में इज़रायल की सैन्य कार्रवाइयाँ हुईं।
- डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने, वेनेजुएला में कथित अवैध अमेरिकी कार्रवाइयों, कई अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से अमेरिका की वापसी तथा कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी द्वारा वैश्विक व्यवस्था में ‘विच्छेद’ की टिप्पणी ने इस विचार को और बल दिया है।
- हालाँकि यह सच है कि अंतर्राष्ट्रीय कानून अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है, लेकिन इसकी मृत्यु की घोषणा करना न केवल बौद्धिक रूप से आलसी है बल्कि भ्रामक भी है।
- इन बढ़ती चुनौतियों के बावजूद, अंतरराष्ट्रीय कानून राज्य व्यवहार और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को आकार देने वाला एक अनिवार्य मानक ढाँचा बना हुआ है।
बल प्रयोग पर प्रतिबंध: संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(4)
संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(4) में अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में बल प्रयोग या उसकी धमकी पर प्रतिबंध लगाया गया है। यह आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय कानून का एक मूलभूत सिद्धांत है।
- निस्संदेह, हाल के वर्षों में इस सिद्धांत का कई बार उल्लंघन हुआ है। परंतु यह पहली बार नहीं है। 1970 में अंतरराष्ट्रीय विधिवेत्ता थॉमस फ्रैंक ने तर्क दिया था कि शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ की प्रतिद्वंद्विता ने अनुच्छेद 2(4) की प्रभावशीलता को कमजोर कर दिया था।
- पिछले चार दशकों में सोवियत-अफगान युद्ध (1979–89), फ़ॉकलैंड युद्ध (1982), खाड़ी युद्ध (1990–91), तथा बोस्निया, कोसोवो, अफगानिस्तान (2001), इराक (2003), सीरिया और लीबिया के संघर्षों ने इस सिद्धांत को चुनौती दी।
- फिर भी, ये युद्ध इसे समाप्त नहीं कर सके। अनुच्छेद 2(4) आज भी वही मानक ढाँचा है जिसके आधार पर राज्यों के आचरण का मूल्यांकन किया जाता है।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कानूनी तर्क
- अंतर्राष्ट्रीय कानून की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि वह राज्यों को अपने कार्यों का औचित्य प्रस्तुत करने के लिए बाध्य करता है।
- ऐतिहासिक रूप से, शक्तिशाली देशों ने भी सैन्य हस्तक्षेपों को ‘आत्मरक्षा’ के सिद्धांत के अंतर्गत उचित ठहराने की कोशिश की है। इसका अर्थ है कि वे कानून को पूरी तरह अस्वीकार नहीं करते, बल्कि उसकी व्याख्या अपने पक्ष में करने का प्रयास करते हैं।
- यह प्रक्रिया महत्वपूर्ण है, क्योंकि कानूनी तर्क-वितर्क बहस और जवाबदेही की गुंजाइश बनाए रखते हैं। ऐसी प्रवृत्तियाँ कानूनी औचित्य की स्थायी शक्ति को दर्शाती हैं।
वर्तमान समय में गुणात्मक परिवर्तन
- समकालीन चुनौती केवल बार-बार उल्लंघन नहीं है, बल्कि उन्हें उचित ठहराने के प्रयास में कमी है।
- उभरता हुआ जनवादी-आधिकारिकवाद (पॉपुलिस्ट-ऑथोरिटेरियनिज़्म) एक प्रकार की निर्लज्जता लेकर आया है, जहाँ कभी-कभी कानूनी तर्क को दरकिनार कर दिया जाता है।
- विचार-विमर्श की इस संस्कृति का क्षरण अनुपालन की परंपरा को कमजोर करता है और इस अपेक्षा को खतरे में डालता है कि शक्ति को कानून के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए।
- फिर भी यह परिवर्तन प्रणाली को समाप्त नहीं करता। यह मानकों के लोप के बजाय व्याख्या और अधिकार को लेकर संघर्ष का संकेत है।
अंतरराष्ट्रीय कानून का विस्तारित दायरा
- पिछले आठ दशकों में अंतर्राष्ट्रीय कानून ने व्यापार, निवेश, विमानन, समुद्री संसाधन, बाह्य अंतरिक्ष, मानवाधिकार, जलवायु परिवर्तन, तथा रासायनिक और जैविक हथियारों के नियंत्रण जैसे क्षेत्रों में व्यापक विस्तार किया है।
- हाई सीज़ संधि और महामारी समझौता जैसे नए समझौते यह दर्शाते हैं कि बहुपक्षीय सहयोग अभी भी जीवित है।
- कानूनी ढाँचे आर्थिक विनिमय, पर्यावरण संरक्षण और तकनीकी सहयोग का आधार प्रदान करते हैं।
- प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के बीच व्यापार वार्ताएँ भी संरचित कानूनी प्रतिबद्धताओं पर निर्भरता को दर्शाती हैं।
- अंतरराष्ट्रीय कानून की जीवंतता केवल संकट प्रबंधन में ही नहीं, बल्कि जटिल वैश्विक प्रणालियों के नियमित समन्वय में भी स्पष्ट होती है।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों का न्यायिकरण
- अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) और अफ्रीकी मानव एवं जन अधिकार न्यायालय जैसे संस्थान अंतरराष्ट्रीय न्यायिक संरचना के विस्तार का उदाहरण हैं।
- ये संस्थाएँ विवाद निवारण और व्यक्तिगत जवाबदेही के लिए संरचित तंत्र प्रदान कर अंतरराष्ट्रीय संबंधों के न्यायिकरण को मूर्त रूप देती हैं।
- यद्यपि अनुपालन असमान है, फिर भी इनका अस्तित्व शांतिपूर्ण विवाद समाधान के सिद्धांत को सुदृढ़ करता है और वैश्विक शासन की संस्थागत संरचना को मजबूत बनाता है।
अंतर्राष्ट्रीय कानून का मौन और दृढ संचालन
- अंतर्राष्ट्रीय कानून सीमाओं के पार व्यापार, नागरिक उड्डयन मार्गों, समुद्री यातायात और संचार प्रणालियों को सुचारू रूप से संचालित करने में मदद करता है।
- यह दैनिक जीवन और आर्थिक स्थिरता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसकी सफलता अक्सर इसलिए अदृश्य रहती है क्योंकि यह बिना शोर-शराबे के काम करता है।
निष्कर्ष
अंतर्राष्ट्रीय कानून अपने सबसे चुनौतीपूर्ण दौर में अवश्य है, विशेषकर बल प्रयोग के संदर्भ में। परंतु अनुच्छेद 2(4) की दृढ़ता, कानूनी औचित्य की परंपरा, व्यापक वैश्विक कानूनी व्यवस्थाएँ और न्यायिक संस्थानों का विस्तार इसकी जीवंतता को सिद्ध करते हैं।
अंतर्राष्ट्रीय कानून पूर्णतः निर्दोष नहीं है, लेकिन यह वैश्विक स्थिरता की एक आवश्यक आधारशिला बना हुआ है। इसकी मृत्यु की घोषणा करना केवल उन शक्तियों को प्रोत्साहित करेगा जो नियम-आधारित व्यवस्था को कमजोर करना चाहती हैं।
कानून का यह मौन संचालन दैनिक जीवन और आर्थिक स्थिरता को बनाए रखता है। अपेक्षाओं को संरचित कर और अनिश्चितता को कम कर, अंतरराष्ट्रीय कानून खंडित भू-राजनीतिक वातावरण में स्थिरता प्रदान करता है।
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