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अतिरिक्त विशेष अदालतें

भारतीय न्यायपालिका विश्व की सबसे बड़ी और प्रभावशाली न्यायिक प्रणालियों में से एक है, लेकिन ‘न्याय में देरी’ इसकी सबसे बड़ी और दीर्घकालिक चुनौती बनी हुई है। “न्याय में देरी, न्याय का हनन है” (Justice delayed is justice denied) की उक्ति भारतीय संदर्भ में एक कड़वी सच्चाई है। इस समस्या के समाधान के रूप में हाल के वर्षों में ‘विशेष अदालतों’ और ‘अतिरिक्त विशेष अदालतों’ की अवधारणा ने जोर पकड़ा है। जनवरी 2026 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस दिशा में की गई एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरदर्शी टिप्पणी ने न्यायिक सुधारों की एक नई बहस छेड़ दी है। न्यायालय का मानना है कि अतिरिक्त विशेष अदालतों की स्थापना न केवल मुकदमों के बोझ को कम करेगी, बल्कि आम नागरिक के लिए न्याय को सुलभ, त्वरित और सुदृढ़ भी बनाएगी।

सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी और उसका संदर्भ

जनवरी 2026 में, भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) से संबंधित एक मामले की सुनवाई के दौरान एक ऐतिहासिक टिप्पणी की। पीठ ने स्पष्ट किया कि ‘अतिरिक्त विशेष ट्रायल कोर्ट’ न्यायिक व्यवस्था को और अधिक ‘मजबूत’ (Robust) बनाएंगे। न्यायालय ने यह विचार तब व्यक्त किया जब एक अभियुक्त ने त्वरित सुनवाई न होने के आधार पर जमानत की गुहार लगाई थी।

सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य तर्क यह था कि यदि जमीनी स्तर पर या ट्रायल स्टेज पर ही पर्याप्त संख्या में विशेष अदालतें उपलब्ध होंगी, तो आरोपियों या पक्षकारों को जमानत या त्वरित सुनवाई जैसे छोटे-छोटे राहतों के लिए बार-बार शीर्ष अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाना पड़ेगा। न्यायालय ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि गंभीर अपराधों में, विशेष रूप से आतंकवाद या यूएपीए (UAPA) जैसे अधिनियमों के तहत, अगर मुकदमों में अत्यधिक देरी होती है, तो यह आरोपी के संवैधानिक मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। किसी भी व्यक्ति को बिना दोषसिद्धि के केवल ट्रायल में देरी के कारण अनिश्चितकाल तक जेल में नहीं रखा जा सकता।

विशेष अदालतों से अभिप्राय और उनकी भूमिका

विशेष अदालतें वे न्यायिक निकाय हैं जो सामान्य दीवानी या फौजदारी अदालतों से इतर, केवल विशिष्ट प्रकार के अपराधों या कानूनों के तहत दर्ज मामलों की सुनवाई के लिए गठित की जाती हैं। इनका मुख्य उद्देश्य न्याय वितरण प्रक्रिया को गति देना और विशिष्ट कानूनी विषयों में विशेषज्ञता के साथ न्याय करना है। वर्तमान में भारत में निम्नलिखित श्रेणियों के लिए विशेष अदालतें कार्य कर रही हैं:

  1. पॉक्सो (POCSO) कोर्ट: बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों की त्वरित सुनवाई के लिए।
  2. एनआईए (NIA) कोर्ट: आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मामलों के लिए।
  3. सीबीआई (CBI) कोर्ट: भ्रष्टाचार और गंभीर आर्थिक अपराधों की जांच के बाद सुनवाई के लिए।
  4. विशेष एमपी/एमएलए कोर्ट: निर्वाचित प्रतिनिधियों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों के त्वरित निपटारे के लिए।
  5. एनडीपीएस (NDPS) कोर्ट: नशीले पदार्थों के व्यापार से संबंधित मामलों के लिए।

अतिरिक्त विशेष अदालतों की आवश्यकता तब पड़ती है जब मौजूदा विशेष अदालतों पर भी काम का बोझ इतना बढ़ जाता है कि वे ‘त्वरित न्याय’ के अपने मूल उद्देश्य को पूरा करने में अक्षम होने लगती हैं।

संवैधानिक और कानूनी अधिकार क्षेत्र

विशेष अदालतों की स्थापना का वैधानिक आधार भारतीय संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों और विशिष्ट कानूनों में निहित है। संविधान का अनुच्छेद 21 ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ के अधिकार के अंतर्गत ‘त्वरित सुनवाई’ (Speedy Trial) को एक मौलिक अधिकार मानता है। इसके अतिरिक्त, अनुच्छेद 247 संसद को यह शक्ति प्रदान करता है कि वह संघ सूची के विषयों पर बनाए गए कानूनों के बेहतर प्रशासन के लिए ‘अतिरिक्त अदालतों’ की स्थापना कर सकती है।

कानूनी रूप से, दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 11 और 14 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के नए प्रावधानों के तहत) राज्य सरकारों को उच्च न्यायालयों के परामर्श से विशेष अदालतों के गठन की अनुमति देती है। समय-समय पर सर्वोच्च न्यायालय ने भी ‘इन रे: स्पेशल कोर्ट्स बिल, 1978’ जैसे मामलों में इन अदालतों की वैधता को सही ठहराया है, बशर्ते वे संवैधानिक मानदंडों और प्राकृतिक न्याय की प्रक्रिया का पालन करें।

लंबित मामलों की वर्तमान स्थिति और तथ्यात्मक आधार

भारतीय अदालतों में मुकदमों की पेंडेंसी (Pendency) के आंकड़े चौंकाने वाले और चिंताजनक हैं। नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (NJDG) और सुप्रीम कोर्ट ऑब्जर्वर के अनुसार, जनवरी 2026 तक देश की विभिन्न अदालतों में लंबित मामलों की कुल संख्या 5.4 करोड़ (54 मिलियन) को पार कर गई है।

  • निचली अदालतें: कुल लंबित मामलों का लगभग 85% से अधिक (करीब 4.7 करोड़ मामले) जिला और अधीनस्थ अदालतों में हैं।
  • उच्च न्यायालय: यहाँ लगभग 62 लाख मामले लंबित हैं।
  • सर्वोच्च न्यायालय: शीर्ष अदालत में भी पेंडेंसी का आंकड़ा 88,000 के स्तर को छू रहा है।

तथ्यात्मक रूप से देखा जाए तो विशेष कानूनों के तहत आने वाले मामलों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है। उदाहरण के लिए, एनआईए (NIA) द्वारा जांचे जा रहे कई मामलों में 100 से अधिक गवाह होते हैं, जिनकी गवाही में सामान्य अदालती प्रक्रिया में वर्षों लग जाते हैं। यही कारण है कि ‘अतिरिक्त विशेष अदालतों’ की मांग अब एक प्रशासनिक जरूरत के बजाय एक संवैधानिक मजबूरी बन गई है।

राज्यवार तुलना और क्षेत्रीय असंतुलन

विशेष अदालतों की उपलब्धता और मामलों के निपटारे में भारत के विभिन्न राज्यों के बीच भारी असमानता देखी गई है। उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल जैसे बड़े राज्यों में मामलों की संख्या के अनुपात में विशेष अदालतों की संख्या अभी भी अपर्याप्त है।

  • उत्तर प्रदेश और बिहार: यहाँ आपराधिक मामलों की पेंडेंसी सबसे अधिक है, जिससे इन राज्यों में अतिरिक्त पॉक्सो और एनडीपीएस कोर्ट की भारी आवश्यकता बनी रहती है।
  • दक्षिण भारतीय राज्य: केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों ने ‘फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट्स’ के प्रबंधन में बेहतर प्रदर्शन किया है, लेकिन यहाँ भी आर्थिक अपराधों से जुड़ी विशेष अदालतों की कमी महसूस की जा रही है।
  • दिल्ली: राजधानी होने के कारण यहाँ एनआईए और सीबीआई के मामलों का दबाव बहुत अधिक है, जिसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में दिल्ली सरकार को ‘डे-टू-डे ट्रायल’ (दिन-प्रतिदिन की सुनवाई) के लिए विशिष्ट अदालतें गठित करने का निर्देश दिया है।

न्यायिक सुदृढ़ीकरण की दिशा में चुनौतियां

विशेष अदालतें स्थापित करना जितना आवश्यक है, उन्हें सफलतापूर्वक संचालित करना उतना ही चुनौतीपूर्ण है। मुख्य बाधाएँ निम्नलिखित हैं:

  • न्यायाधीशों की कमी (Judicial Vacancies): भारत में प्रति दस लाख जनसंख्या पर न्यायाधीशों की संख्या वैश्विक मानकों से बहुत कम है (लगभग 21 न्यायाधीश प्रति मिलियन)। उच्च न्यायालयों में भी स्वीकृत पदों के करीब 30% पद रिक्त रहते हैं।
  • बुनियादी ढांचे का अभाव (Infrastructure Deficiencies): कई जिला मुख्यालयों में विशेष अदालतों के लिए अलग कक्ष, पर्याप्त सपोर्ट स्टाफ और आधुनिक तकनीक (जैसे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग) की भारी कमी है।
  • बजटीय सीमाएं: न्यायपालिका पर होने वाला खर्च जीडीपी के 1% से भी कम है। अतिरिक्त अदालतों के गठन के लिए भारी वित्तीय निवेश की आवश्यकता होती है जो राज्यों के बजट पर दबाव डालता है।
  • प्रक्रियात्मक देरी: वकील अक्सर स्थगन (Adjournment) मांगते हैं, जिससे ‘फास्ट ट्रैक’ की अवधारणा केवल कागजों तक सीमित रह जाती है।

सफलता की अनिवार्यता: क्यों है यह जरूरी?

इन अदालतों की सफलता केवल एक प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य है।

नागरिकों का विश्वास: यदि न्याय मिलने में दशकों बीत जाते हैं, तो आम आदमी का न्यायपालिका से विश्वास उठने लगता है। त्वरित न्याय जनता के विश्वास को पुनर्जीवित करता है।

ऊपरी अदालतों पर बोझ कम करना: जब निचली विशेष अदालतें समय पर फैसले देंगी और जमानत जैसे मामलों का त्वरित निपटारा करेंगी, तो सर्वोच्च न्यायालय को केवल संवैधानिक महत्व के गंभीर विषयों पर ध्यान केंद्रित करने का अवसर मिलेगा।

अपराध पर नियंत्रण: त्वरित दोषसिद्धि (Conviction) समाज में कानून का डर पैदा करती है और अपराध दर को कम करने में सहायक होती है। विशेष रूप से आतंकवाद और बच्चों के खिलाफ अपराधों में यह अत्यंत आवश्यक है।

आर्थिक प्रभाव: व्यापारिक और भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों का जल्दी निपटारा होने से देश के ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ (Ease of Doing Business) सूचकांक में सुधार होता है और विदेशी निवेश बढ़ता है।

निष्कर्ष

अतिरिक्त विशेष अदालतें स्थापित करना भारतीय न्यायिक ढांचे को आधुनिक और उत्तरदायी बनाने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है। सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियाँ इस बात का प्रमाण हैं कि अब न्यायपालिका केवल ‘न्याय’ ही नहीं, बल्कि ‘त्वरित और सुलभ न्याय’ पर बल दे रही है। हालांकि, केवल अदालतों की संख्या बढ़ा देना ही काफी नहीं होगा; इसके साथ-साथ न्यायाधीशों की रिक्तियों को भरना, आधुनिक फॉरेंसिक तकनीक का उपयोग और प्रक्रियाओं को सरल बनाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

यदि इन अतिरिक्त विशेष अदालतों को पूर्ण संसाधन और स्वायत्तता प्रदान की जाती है, तो निःसंदेह यह ‘सबके लिए न्याय’ के संवैधानिक संकल्प को सिद्ध करने में मील का पत्थर साबित होंगी। यह कदम भारत की न्यायिक प्रणाली को न केवल ‘रोबस्ट’ बनाएगा, बल्कि इसे विश्व के समक्ष एक प्रभावी और संवेदनशील न्याय वितरण मॉडल के रूप में भी प्रस्तुत करेगा।


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