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अमेरिका–बांग्लादेश ‘कपास समझौता: भारत के वस्त्र एवं कपास क्षेत्र के लिए चुनौतियाँ

कपास समझौता

वैश्विक व्यापार व्यवस्था निरंतर पुनर्संरचना के दौर से गुजर रही है, जहाँ द्विपक्षीय एवं क्षेत्रीय व्यापार समझौते (FTAs/RTAs) देशों की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति को सीधे प्रभावित करते हैं। हालिया अमेरिकाबांग्लादेश पारस्परिक व्यापार समझौता, जिसे अनौपचारिक रूप से ‘कपास के बदले शून्य-शुल्क (Cotton for Zero-Tariff)’ कहा जा रहा है, दक्षिण एशिया के वस्त्र-व्यापार परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण भू-आर्थिक घटना के रूप में उभरा है। यह समझौता न केवल बांग्लादेश की निर्यात क्षमता को सुदृढ़ करता है, बल्कि भारत के वस्त्र उद्योग, कपास निर्यात और कृषि-आधारित आजीविकाओं के लिए बहुआयामी चुनौतियाँ भी प्रस्तुत करता है।

समझौते का भूआर्थिक संदर्भ

  • अमेरिका विश्व का सबसे बड़ा परिधान आयातक बाज़ार है, जबकि बांग्लादेश वैश्विक स्तर पर शीर्ष परिधान निर्यातकों में शामिल है। वस्त्र-व्यापार में शुल्क (tariffs), मूल-नियम (rules of origin) और इनपुट-सोर्सिंग नीतियाँ निर्णायक भूमिका निभाती हैं।
  • इस समझौते का मूल तत्व कोटाआधारित शून्यशुल्क तंत्र है, जिसके अंतर्गत बांग्लादेशी परिधान उत्पादों को अमेरिकी बाज़ार में शुल्क-मुक्त प्रवेश मिलेगा। बशर्ते वे अमेरिकी-उत्पादित कपास एवं मानव-निर्मित रेशा (MMF) इनपुट्स का उपयोग करें।
  • यह प्रावधान एक प्रकार से व्यापारसहऔद्योगिक नीति (trade-industrial linkage) का उदाहरण है, जहाँ अमेरिका अपने कृषि-उत्पादों (विशेषकर कपास) की मांग सुनिश्चित करता है, जबकि बांग्लादेश को निर्यात-लाभ मिलता है।

भारत के लिए उत्पन्न द्विआयामी चुनौती

भारतीय वस्त्र उद्योग के लिए यह समझौता मुख्यतः दो स्तरों पर दबाव उत्पन्न करता है:

  1. शुल्कलाभ का क्षरण (Tariff Advantage Erosion)
  • पूर्ववर्ती परिदृश्य में भारत को अमेरिका में तुलनात्मक शुल्क-लाभ प्राप्त था। भारत के परिधान उत्पादों पर लगभग 18% शुल्क लागू था, जबकि बांग्लादेश 20% शुल्क का सामना कर रहा था। नया समझौता बांग्लादेश के लिए सामान्य शुल्क को 19% तक कम करता है, जिससे भारत का लाभ-अंतर नगण्य रह जाता है।
  • परंतु वास्तविक संरचनात्मक परिवर्तन शून्य-शुल्क कोटा से उत्पन्न होता है। इस व्यवस्था में बांग्लादेशी उत्पाद सीधे 0% शुल्क पर अमेरिकी बाज़ार में प्रवेश करेंगे, जबकि भारतीय निर्यातकों पर यथावत शुल्क लागू रहेगा। परिणामस्वरूप भारत को प्रभावी रूप से 18% प्रतिस्पर्धात्मक नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।

औद्योगिक प्रभाव

  • भारतीय वस्त्र-क्लस्टर जैसे तिरुप्पुर (निर्यात-उन्मुख निटवेयर), सूरत (सिंथेटिक/मैनमेड फैब्रिक्स), लुधियाना (निट्स एवं ऊनी वस्त्र) अत्यंत कम लाभांश पर कार्य करते हैं। बड़े पैमाने पर ऑर्डर पुनर्विन्यास (order diversion) से उत्पादन, रोजगार और विदेशी मुद्रा आय प्रभावित हो सकती है।
  • वैश्विक ब्रांड एवं खुदरा कंपनियाँ लागत-लाभ के आधार पर सोर्सिंग रणनीति बदल सकती हैं, जिससे भारत की बाज़ार-हिस्सेदारी घटने की आशंका है।

भारतीय कपास निर्यात पर प्रभाव

बांग्लादेश भारत के कपास एवं कपास-यार्न निर्यात का प्रमुख गंतव्य रहा है। यदि बांग्लादेशी निर्माता शून्य-शुल्क लाभ प्राप्त करने हेतु अमेरिकी कपास का उपयोग अनिवार्य रूप से बढ़ाते हैं, तो भारत से आयात घट सकता है।

संभावित परिणाम

  • भारतीय कपास की मांग में गिरावट
  • घरेलू बाज़ार में अधिशेष आपूर्ति
  • कीमतों पर दबाव
  • किसानों की आय पर प्रतिकूल प्रभाव

कपास-आधारित आजीविका वाले राज्यों गुजरात, महाराष्ट्र, तेलंगाना में यह प्रभाव अधिक स्पष्ट हो सकता है।

भारत की संरचनात्मक कमजोरी: MMF असंतुलन

  • वैश्विक वस्त्र-व्यापार का लगभग 70% हिस्सा MMF-आधारित है, जबकि भारत का निर्यात-बास्केट अभी भी कपास-प्रधान है।
  • ऐतिहासिक कर-संरचनाओं, कच्चे माल पर कर-भार और निवेश-असंतुलन ने भारत की MMF प्रतिस्पर्धात्मकता को सीमित किया है।
  • इस समझौते के पश्चात यह कमजोरी अधिक स्पष्ट हो जाती है, क्योंकि बांग्लादेश MMF-आधारित उत्पादन के माध्यम से लागत-लाभ अर्जित कर सकता है।

भारत के लिए नीतिगत प्रतिक्रिया: बहुस्तरीय रणनीति

भारत के लिए आवश्यक है कि वह तात्कालिक प्रतिक्रिया के बजाय दीर्घकालिक संरचनात्मक रणनीति अपनाए।

  1. व्यापारकूटनीतिक पहल (Trade Negotiation Strategy): भारत को अमेरिका के साथ सक्रिय वार्ताओं के माध्यम से कपास समानता (Cotton Parity) या विशेष प्रावधानों की मांग करनी चाहिए। द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) को तेज़ करना तथा गैर-शुल्क बाधाओं को कम करना प्राथमिकता होनी चाहिए।
  2. ESG-आधारित प्रतिस्पर्धा (Ethical Branding): विकसित बाज़ारों में पर्यावरणीय एवं सामाजिक शासन (ESG) मानक निर्णायक होते जा रहे हैं। भारत अपने तुलनात्मक लाभ, बेहतर श्रम अनुपालन, सामाजिक सुरक्षा, ट्रेसबिलिटी को रणनीतिक रूप से प्रस्तुत कर सकता है।
  3. MMF करसुधार: GST तर्कसंगतता, कच्चे माल पर कर-भार में कमी, तथा सिंथेटिक फाइबर उद्योग हेतु प्रोत्साहन भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता को पुनर्संतुलित कर सकते हैं।
  4. कस्तूरी कॉटन भारत पहल का विस्तार: ब्लॉकचेन-आधारित ट्रेसबिलिटी, गुणवत्ता आश्वासन एवं नैतिक उत्पादन भारत को प्रीमियम बाज़ार-स्थिति प्रदान कर सकते हैं, जिससे शुल्क-नुकसान आंशिक रूप से संतुलित हो सकता है।
  5. तकनीकी वस्त्रों की ओर संक्रमण: उच्च-मूल्य, नवाचार-आधारित वस्त्र मेडिटेक, मोबिलटेक, जियोटेक भारत को मूल्य-आधारित प्रतिस्पर्धा की दिशा में अग्रसर कर सकते हैं।
  6. बाज़ार विविधीकरण: भारत को अमेरिकी निर्भरता कम कर UAE, EU, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों में निर्यात अवसरों का विस्तार करना चाहिए।

व्यापक निहितार्थ: व्यापार समझौते और रणनीतिक अर्थशास्त्र

यह प्रकरण दर्शाता है कि आधुनिक व्यापार समझौते केवल शुल्क-घटाव तक सीमित नहीं होते; वे आपूर्ति-श्रृंखलाओं, औद्योगिक नीति और भू-राजनीतिक संरेखण को भी प्रभावित करते हैं। भारत के लिए यह एक चेतावनी है कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिके रहने हेतु संरचनात्मक सुधार, नीतिगत लचीलापन और रणनीतिक व्यापार कूटनीति अनिवार्य हैं।

निष्कर्ष

अमेरिका–बांग्लादेश ‘कपास के बदले शून्य-शुल्क’ समझौता भारत के वस्त्र-क्षेत्र के लिए चुनौती के साथ-साथ सुधार का अवसर भी प्रस्तुत करता है। यदि भारत त्वरित, समन्वित एवं दूरदर्शी नीति-प्रतिक्रिया अपनाता है, तो वह न केवल संभावित नुकसान को सीमित कर सकता है, बल्कि उच्च-मूल्य वस्त्र, MMF और नैतिक ब्रांडिंग के माध्यम से अपनी वैश्विक स्थिति को सुदृढ़ भी कर सकता है।

 


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