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आदर्शवाद (Idealism)

राजनीति विज्ञान में आदर्शवाद एक ऐसी दार्शनिक एवं मानकवादी (Normative) विचारधारा है, जो यह मानती है कि राजनीतिक जीवन की वास्तविकता को केवल शक्ति, स्वार्थ और भौतिक परिस्थितियों के आधार पर नहीं समझा जा सकता, बल्कि विचार, मूल्य, नैतिकता और चेतना राजनीति के मूल निर्धारक तत्व हैं। आदर्शवाद का केंद्रीय विश्वास यह है कि मनुष्य मूलतः विवेकशील और नैतिक प्राणी है तथा राज्य और राजनीति का उद्देश्य केवल व्यवस्था बनाए रखना या शक्ति-संतुलन साधना नहीं, बल्कि नैतिक जीवन और मानव कल्याण की प्राप्ति कराना है। इसी कारण आदर्शवाद राजनीति को ‘जैसी है’ नहीं बल्कि ‘जैसी होनी चाहिए’ के दृष्टिकोण से देखता है।

आदर्शवाद की अवधारणा और अर्थ

आदर्शवाद का शाब्दिक अर्थ है—आदर्शों की प्रधानता। राजनीति विज्ञान में इसका आशय उस दृष्टिकोण से है, जो यह मानता है कि विचार भौतिक परिस्थितियों से पहले आते हैं। राज्य, कानून, अधिकार, स्वतंत्रता और न्याय जैसी राजनीतिक अवधारणाएँ केवल संस्थागत व्यवस्थाएँ नहीं हैं, बल्कि वे नैतिक विचारों की अभिव्यक्ति हैं। आदर्शवाद के अनुसार राज्य एक नैतिक संस्था (Moral Institution) है, जो व्यक्ति को उसके सर्वोत्तम नैतिक विकास की परिस्थितियाँ प्रदान करता है।

आदर्शवाद के दार्शनिक आधार

आदर्शवाद की जड़ें प्राचीन यूनानी दर्शन से लेकर आधुनिक यूरोपीय दर्शन तक फैली हुई हैं।

प्लेटो ने ‘आदर्श राज्य’ की कल्पना करते हुए न्याय को राज्य का सर्वोच्च लक्ष्य माना। अरस्तू ने राज्य को नैतिक जीवन की पूर्णता की संस्था कहा। आधुनिक काल में कांट, हेगेल और टी.एच. ग्रीन ने आदर्शवाद को सुदृढ़ दार्शनिक आधार प्रदान किया।

इन सभी विचारकों में एक समान तत्व यह है कि राजनीति को नैतिकता से अलग नहीं किया जा सकता।

आदर्शवाद की प्रमुख मान्यताएँ

  1. विचारों की प्रधानता
    आदर्शवाद के अनुसार राजनीतिक यथार्थ विचारों से निर्मित होता है। राज्य, संप्रभुता और कानून जैसी संस्थाएँ मानव चेतना और नैतिक मूल्यों का परिणाम हैं।
  2. मानव प्रकृति के प्रति आशावादी दृष्टिकोण
    मनुष्य को मूलतः स्वार्थी और हिंसक न मानकर विवेकशील, नैतिक और सहयोगी माना जाता है। इसलिए संघर्ष अपरिहार्य नहीं है।
  3. राज्य का नैतिक स्वरूप
    राज्य केवल बल-प्रयोग की संस्था नहीं, बल्कि समाज के नैतिक उद्देश्यों की अभिव्यक्ति है। हेगेल के अनुसार राज्य ‘नैतिक विचार की साकार अभिव्यक्ति’ है।
  4. सकारात्मक स्वतंत्रता की अवधारणा
    आदर्शवाद नकारात्मक स्वतंत्रता (बाधाओं से मुक्ति) के बजाय सकारात्मक स्वतंत्रता पर बल देता है, जिसका अर्थ है—व्यक्ति की क्षमताओं का विकास।
  5. सामूहिक हित की प्राथमिकता
    व्यक्तिगत हितों को पूर्णतः नकारे बिना, उन्हें सामूहिक और नैतिक हितों के अधीन माना जाता है।

आदर्शवाद और राज्य की भूमिका

आदर्शवादी विचारक राज्य को व्यक्ति के नैतिक विकास का साधन मानते हैं। टी.एच. ग्रीन के अनुसार राज्य का उद्देश्य ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करना है, जिनमें व्यक्ति अपने नैतिक और सामाजिक दायित्वों का निर्वहन कर सके। इस दृष्टि से आदर्शवाद कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को वैचारिक आधार प्रदान करता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक न्याय और समान अवसर राज्य के नैतिक दायित्व माने जाते हैं।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में आदर्शवाद

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में आदर्शवाद विशेष रूप से प्रथम विश्व युद्ध के बाद उभरकर सामने आया। युद्ध की विभीषिका ने यह स्पष्ट कर दिया कि शक्ति-संतुलन और सैन्यवाद स्थायी शांति नहीं दे सकते।

आदर्शवादियों का मानना था कि यदि अंतरराष्ट्रीय संबंधों को नैतिक सिद्धांतों, कानून और संस्थाओं द्वारा संचालित किया जाए तो युद्ध रोका जा सकता है।

प्रमुख मान्यताएँ

  • युद्ध अपरिहार्य नहीं है
  • लोकतंत्र शांति को बढ़ावा देता है
  • अंतरराष्ट्रीय कानून और संगठन राज्यों के व्यवहार को नियंत्रित कर सकते हैं
  • सामूहिक सुरक्षा, शक्ति-संतुलन से श्रेष्ठ है

वुड्रो विल्सन के ‘चौदह सूत्र’, राष्ट्रसंघ और बाद में संयुक्त राष्ट्र संघ आदर्शवादी सोच के व्यावहारिक उदाहरण हैं।

प्रमुख आदर्शवादी विचारक और उनके विचार

प्लेटो

प्लेटो ने न्याय को राज्य का केंद्रीय सिद्धांत माना। उनका आदर्श राज्य नैतिक शिक्षा और दार्शनिक शासकों पर आधारित था।

अरस्तू

अरस्तू ने कहा कि राज्य का उद्देश्य केवल जीवन नहीं, बल्कि ‘अच्छा जीवन’ सुनिश्चित करना है।

इमैनुएल कांट

कांट ने ‘शाश्वत शांति’ की अवधारणा दी और नैतिक नियमों को अंतरराष्ट्रीय राजनीति का आधार बनाने की वकालत की।

हेगेल

हेगेल ने राज्य को नैतिक विचार की सर्वोच्च अभिव्यक्ति माना और व्यक्ति की स्वतंत्रता को राज्य के माध्यम से साकार होते देखा।

टी.एच. ग्रीन

ग्रीन ने सकारात्मक स्वतंत्रता और कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को विकसित किया।

आदर्शवाद का महत्व

आदर्शवाद राजनीति को नैतिक दिशा प्रदान करता है। यह लोकतंत्र, मानवाधिकार, सामाजिक न्याय और अंतरराष्ट्रीय सहयोग जैसी अवधारणाओं को वैचारिक आधार देता है। आधुनिक संवैधानिक राज्य, मौलिक अधिकारों और सामाजिक कल्याण की नीतियों में आदर्शवादी चिंतन की स्पष्ट छाप दिखाई देती है।

आदर्शवाद की आलोचना

यद्यपि आदर्शवाद का नैतिक महत्व है, फिर भी इसकी कई आलोचनाएँ की गई हैं।

यथार्थवादी विचारकों के अनुसार आदर्शवाद राजनीति की कठोर वास्तविकताओं—जैसे शक्ति, संघर्ष और राष्ट्रीय हित—की उपेक्षा करता है। राष्ट्रसंघ की विफलता को आदर्शवाद की अव्यावहारिकता का उदाहरण माना गया। इसके अतिरिक्त यह भी कहा जाता है कि आदर्शवाद अत्यधिक नैतिकतावादी है और सत्ता-संबंधों को कम करके आंकता है।

आदर्शवाद और यथार्थवाद : संक्षिप्त तुलना

जहाँ आदर्शवाद नैतिकता, सहयोग और शांति पर बल देता है, वहीं यथार्थवाद शक्ति, स्वार्थ और संघर्ष को राजनीति का मूल तत्व मानता है। दोनों के बीच यह अंतर राजनीति विज्ञान में मानकवादी और अनुभववादी दृष्टिकोण के टकराव को दर्शाता है।

समकालीन प्रासंगिकता

आज के वैश्विक परिदृश्य में पूर्ण आदर्शवाद संभव नहीं है, परंतु इसकी प्रासंगिकता समाप्त भी नहीं हुई है। मानवाधिकार, जलवायु परिवर्तन, वैश्विक शासन और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका जैसे विषयों में आदर्शवादी चिंतन आज भी मार्गदर्शक सिद्ध होता है।

निष्कर्ष

राजनीति विज्ञान में आदर्शवाद राजनीति को नैतिकता, मूल्यों और मानवीय गरिमा से जोड़ने का प्रयास करता है। यद्यपि यह दृष्टिकोण व्यवहारिक राजनीति की सभी जटिलताओं को स्पष्ट नहीं कर पाता, फिर भी यह राजनीति को दिशा और उद्देश्य प्रदान करता है। वस्तुतः आदर्शवाद और यथार्थवाद के संतुलन के बिना न तो नैतिक राजनीति संभव है और न ही प्रभावी शासन। इसी संतुलन में आधुनिक राजनीतिक चिंतन की सार्थकता निहित है।

For factual information

1. प्लेटोनिक आदर्शवाद (Platonic Idealism)

प्रमुख विचारक: प्लेटो

  • प्लेटो के अनुसार वास्तविकता का आधार विचार (Ideas/Forms) हैं, न कि भौतिक वस्तुएँ।
  • उनका आदर्श राज्य न्याय पर आधारित है।
  • राज्य का उद्देश्य नागरिकों का नैतिक और बौद्धिक विकास करना है।
  • दार्शनिक राजा को शासन करना चाहिए क्योंकि वही सत्य और न्याय को समझ सकता है।

👉 महत्त्व: राजनीति को नैतिक शिक्षा और आदर्श मूल्यों से जोड़ता है।

2. अरस्तू का नैतिक आदर्शवाद (Ethical Idealism of Aristotle)

प्रमुख विचारक: अरस्तू

  • अरस्तू ने राज्य को नैतिक जीवन की सर्वोच्च संस्था माना।
  • राज्य का लक्ष्य केवल जीवन नहीं, बल्कि “अच्छा जीवन” (Good Life) है।
  • राजनीति को नैतिकता से अलग नहीं किया जा सकता।

👉 विशेषता: व्यावहारिक आदर्शवाद, जो नैतिकता और यथार्थ का संतुलन करता है।

3. कांटीय आदर्शवाद (Kantian Idealism)

प्रमुख विचारक: इमैनुएल कांट

  • कांट का आदर्शवाद नैतिक नियम (Categorical Imperative) पर आधारित है।
  • उन्होंने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शाश्वत शांति (Perpetual Peace) की अवधारणा दी।
  • लोकतांत्रिक राज्य, अंतरराष्ट्रीय कानून और संगठन शांति के साधन हैं।

👉 महत्त्व: अंतरराष्ट्रीय आदर्शवाद की नींव।

4. हेगेलियन आदर्शवाद (Hegelian Idealism)

प्रमुख विचारक: जी.डब्ल्यू.एफ. हेगेल

  • हेगेल के अनुसार राज्य नैतिक विचार की साकार अभिव्यक्ति है।
  • व्यक्ति की वास्तविक स्वतंत्रता राज्य के भीतर ही संभव है।
  • राज्य को सर्वोच्च नैतिक संस्था माना गया।

👉 विशेषता: राज्य-केंद्रित आदर्शवाद।

5. ब्रिटिश आदर्शवाद (British Idealism)

प्रमुख विचारक:

टी.एच. ग्रीन, बोसान्क्वेट, ब्रैडली

  • इस धारा ने सकारात्मक स्वतंत्रता पर बल दिया।
  • राज्य का उद्देश्य व्यक्ति के नैतिक विकास के लिए परिस्थितियाँ बनाना है।
  • कल्याणकारी राज्य की अवधारणा का वैचारिक आधार।

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