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ईरान-अमेरिका-इजरायल टकराव

भारत के लिए ‘हॉर्मुज संकट’

आज की घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पश्चिम एशिया में ‘छद्म युद्ध’ का दौर समाप्त हो चुका है और अब प्रत्यक्ष सैन्य मुठभेड का युग शुरू हो गया है। अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान की मुख्य भूमि पर किए गए हमलों ने तेहरान की संप्रभुता को सीधी चुनौती दी है। इसके प्रतिप्रतिशोध में ईरान द्वारा कतर, यूएई और बहरीन जैसे खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी अड्डों पर हमला करना यह दर्शाता है कि ईरान अब इस युद्ध को केवल अपनी सीमाओं तक सीमित नहीं रखेगा। यह एक ‘टोटल वॉर’ की स्थिति है, जहाँ युद्ध का भूगोल अब लेबनान और गाजा से निकलकर सीधे तेहरान और वाशिंगटन के रणनीतिक हितों तक फैल गया है। अमेरिका का इस युद्ध में प्रत्यक्ष रूप से उतरना यह संकेत देता है कि कूटनीति के सभी दरवाजे फिलहाल बंद हो चुके हैं और अब केवल सैन्य शक्ति ही भविष्य का फैसला करेगी।

रणनीतिक मायने: वर्चस्व और अस्तित्व की जंग

  • इजरायल और अमेरिका के इस संयुक्त हमले के पीछे केवल तात्कालिक उकसावा नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक रणनीतिक लक्ष्य है।
  • इजरायल के लिए ईरान का परमाणु ढांचा हमेशा से एक अस्तित्वगत खतरा रहा है। आज की कार्रवाई का प्राथमिक उद्देश्य संभवतः ईरान के परमाणु केंद्रों और उसकी मिसाइल क्षमता को इस हद तक पंगु बनाना है कि आने वाले दशकों के लिए उसकी क्षेत्रीय शक्ति समाप्त हो जाए।
  • वहीं, अमेरिका के लिए यह हमला अपनी वैश्विक साख को बचाने की एक मजबूरी भी बन गया था। हालांकि, ईरान ने अमेरिकी अड्डों पर हमला करके यह संदेश दिया है कि यदि उस पर प्रहार होगा, तो वह पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर देगा।
  • ईरान की यह रणनीति ‘म्युचुअली एश्योर्ड डिस्ट्रक्शन’ के सिद्धांत पर आधारित है, जहाँ वह अमेरिका को यह जता रहा है कि खाड़ी में उसका एक भी सैनिक या संपत्ति सुरक्षित नहीं है।

भारत पर प्रभाव: ऊर्जा सुरक्षा

  • भारत के लिए आज की यह घटना किसी रणनीतिक सुनामी से कम नहीं है। इस संघर्ष का सबसे भयावह पहलू हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) का संभावित बंद होना है। विश्व के कुल समुद्री तेल व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा इसी संकरे मार्ग से गुजरता है।
  • भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 80% आयात करता है और इसका एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से होकर आता है।
  • यदि ईरान अपनी धमकी के अनुरूप हॉर्मुज को अवरुद्ध करता है, तो भारत की ऊर्जा जीवनरेखा पूरी तरह कट जाएगी। इसके परिणामस्वरूप न केवल पेट्रोल-डीजल की कीमतें अनियंत्रित होंगी, बल्कि देश की पूरी औद्योगिक सप्लाई चेन ठप पड़ सकती है।

  • यह स्थिति भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी दबाव डालेगी और रुपये के मूल्य में ऐतिहासिक गिरावट ला सकती है। भारत के लिए हॉर्मुज का बंद होना केवल एक आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय सुरक्षा संकट है।

प्रवासियों का संकट और आर्थिक प्रेषण

ऊर्जा संकट के अलावा, भारत के सामने एक मानवीय चुनौती भी खड़ी हो गई है। खाड़ी देशों में लगभग 90 लाख भारतीय प्रवासी निवास करते हैं, जो प्रतिवर्ष अरबों डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार भारत भेजते हैं। ईरान द्वारा खाड़ी के अमेरिकी अड्डों पर हमले के बाद, ये प्रवासी अब सीधे युद्ध क्षेत्र के बीच में हैं। यदि युद्ध व्यापक होता है, तो भारत को ‘ऑपरेशन गंगा’ या ‘वंदे भारत’ से भी बड़े स्तर पर निकासी अभियान चलाना पड़ सकता है, जो एक लॉजिस्टिक दुःस्वप्न होगा। साथ ही, इन प्रवासियों द्वारा भेजे जाने वाले धन में कमी आने से भारत के ‘चालू खाता घाटे’ (CAD) को संभालना लगभग नामुमकिन हो जाएगा।

कनेक्टिविटी परियोजनाओं का भविष्य और कूटनीतिक चुनौती

रणनीतिक दृष्टि से देखें तो भारत का ईरान में स्थित चाबहार बंदरगाह और महत्वाकांक्षी ‘भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा’ (IMEC) अब पूरी तरह अनिश्चितता के भंवर में हैं। चाबहार भारत के लिए मध्य एशिया का प्रवेश द्वार था, लेकिन युद्ध की स्थिति में इस बंदरगाह का विकास रुकना तय है। इसी तरह, IMEC परियोजना जिसे वैश्विक व्यापार का भविष्य माना जा रहा था, अब युद्ध की भेंट चढ़ती दिख रही है। भारत ने पिछले दशक में इजरायल, अमेरिका और अरब देशों के साथ अपने संबंधों को जिस बारीकी से संतुलित किया था, वह संतुलन अब चरमरा सकता है। भारत के लिए अपनी ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ को बनाए रखते हुए पक्ष चुनना या तटस्थ रहना अब तक की सबसे कठिन कूटनीतिक परीक्षा होगी।

निष्कर्ष:

आज की घटनाओं ने विश्व को एक ऐसी स्थिति में धकेल दिया है जहाँ से वापसी का रास्ता बहुत धुंधला है। अमेरिका-इजरायल का हमला और ईरान का पलटवार कूटनीति की पूर्ण विफलता का प्रमाण है। यह संघर्ष अब केवल सीमाओं का विवाद नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था के नए ध्रुवों का निर्धारण करने वाला मोड़ बन चुका है। भारत जैसे उभरते हुए वैश्विक खिलाड़ी के लिए यह समय अत्यंत सतर्क रहने और अपने राष्ट्रीय हितों, विशेषकर हॉर्मुज मार्ग की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने का है। यदि युद्ध की यह चिंगारी जल्द नहीं बुझाई गई, तो इसकी लपटें न केवल पश्चिम एशिया को, बल्कि भारत की विकास गाथा को भी झुलसा देंगी।


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