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ईरान संघर्ष और अंतरराष्ट्रीय कानून

क्या ‘तटस्थता’ का सिद्धांत फिर से प्रासंगिक हो रहा है?

ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच हालिया सैन्य संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय कानून के विशेषज्ञों के बीच एक नई बहस को जन्म दे दिया है। अब तक इस पूरे घटनाक्रम को केवल संयुक्त राष्ट्र (UN) चार्टर और ‘आत्मरक्षा के अधिकार’ (Self-defence) के सीमित दायरे में देखा जा रहा था। लेकिन स्विट्जरलैंड और श्रीलंका जैसे देशों द्वारा उठाए गए हालिया कदमों ने एक पुराने मगर बेहद महत्वपूर्ण कानूनी हथियार की ओर दुनिया का ध्यान खींचा है—जिसे ‘तटस्थता का कानून’ (Law of Neutrality) कहा जाता है।

चार्टर बनाम तटस्थता: एक पुरानी बहस

1945 में संयुक्त राष्ट्र चार्टर के लागू होने के बाद, कई विशेषज्ञों का मानना था कि ‘तटस्थता’ जैसा शब्द अब बेमानी हो चुका है। तर्क यह था कि चार्टर के तहत सभी सदस्य देश सामूहिक सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं, इसलिए किसी संघर्ष में ‘तटस्थ’ रहना संभव नहीं है। हालांकि, मौजूदा ईरान संघर्ष ने साबित कर दिया है कि चार्टर और तटस्थता के नियम एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।

स्विट्जरलैंड और श्रीलंका: नीतिगत मिसाल

इस संघर्ष में दो देशों के फैसले मील का पत्थर साबित हुए हैं। आमतौर पर अंतरराष्ट्रीय संघर्षों को ‘युद्ध’ घोषित करने से बचा जाता है, लेकिन स्विट्जरलैंड और श्रीलंका ने स्वतंत्र रूप से यह निष्कर्ष निकाला कि ईरान और अमेरिका/इजरायल के बीच की शत्रुता अब तकनीकी और भौतिक रूप से ‘युद्ध’ (War) की श्रेणी में आ चुकी है।

स्विट्जरलैंड का निर्णय: तटस्थता की परंपरा का पालन करते हुए, स्विट्जरलैंड ने संघर्ष के दूसरे सप्ताह में इसे आधिकारिक रूप से ‘युद्ध’ माना। इसका सीधा असर यह हुआ कि हेग कन्वेंशन (Hague Convention) के कड़े नियम लागू हो गए। स्विट्जरलैंड ने अमेरिकी सैन्य विमानों को अपने हवाई क्षेत्र के इस्तेमाल की अनुमति देने से इनकार कर दिया। साथ ही, उसने अमेरिका को युद्ध सामग्री के निर्यात के लाइसेंस देना भी बंद कर दिया है। यह कदम दर्शाता है कि एक तटस्थ देश युद्धरत शक्तियों की सैन्य मदद करने से कानूनी तौर पर इनकार कर सकता है।

श्रीलंका और समुद्री तटस्थता: श्रीलंका ने हिंद महासागर में अपनी तटस्थता को कड़ाई से लागू किया। जब अमेरिकी पनडुब्बी ‘यूएसएस चार्लोट’ ने ईरानी युद्धपोत ‘आईआरआईएस देना’ (IRIS Dena) को श्रीलंका के विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) में डुबो दिया, तो श्रीलंका ने अंतरराष्ट्रीय नियमों का कड़ाई से पालन किया। श्रीलंका ने ईरानी जहाज ‘आईआरआईएस बुशहर’ और उसके चालक दल को अपने यहाँ शरण तो दी, लेकिन तटस्थता के नियमों के तहत उन्हें युद्ध समाप्त होने तक हिरासत (Internment) में ले लिया। यह अंतरराष्ट्रीय कानून की एक अनूठी व्याख्या थी जहाँ मानवीय मदद और कानूनी प्रतिबंध का संतुलन बनाया गया।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का प्रस्ताव 2817

ईरान ने आत्मरक्षा के नाम पर होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को बंद करने और क्षेत्रीय अमेरिकी ठिकानों पर हमला करने की धमकी दी थी। इसके जवाब में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव 2817 पारित किया। यह प्रस्ताव बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें उन देशों के ‘नौवहन अधिकारों’ (Navigational Rights) की रक्षा करने पर जोर दिया गया जो इस युद्ध का हिस्सा नहीं हैं।

प्रस्ताव में इस्तेमाल की गई शब्दावली—”वे राज्य जो शत्रुता का हिस्सा नहीं हैं”—यह पुष्ट करती है कि चार्टर के दौर में भी ‘तटस्थ राज्यों’ के अधिकारों को कम नहीं किया जा सकता। यह स्पष्ट करता है कि समुद्रों और अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों में व्यापार की स्वतंत्रता किसी भी सैन्य संघर्ष से ऊपर है।

क्या तटस्थता अब भी संभव है?

कानूनी जगत में ‘क्वालिफाइड न्यूट्रलिटी’ (Qualified Neutrality) और ‘नॉन-बेलिजरेंसी’ (Non-belligerency) जैसे नए शब्दों पर भी चर्चा हो रही है। कुछ विशेषज्ञों का तर्क है कि कोई देश किसी पीड़ित राष्ट्र की मदद करते हुए भी तटस्थ रह सकता है, जबकि अन्य इसे विरोधाभास मानते हैं। हालांकि, ईरान संघर्ष ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जो देश ‘पूर्ण तटस्थता’ (Strict Neutrality) का पालन करते हैं, उन पर हमला करना या उनके व्यापार को बाधित करना संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(4) का सीधा उल्लंघन है, जो बल प्रयोग को रोकता है।

निष्कर्ष

ईरान के इस संकट ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को याद दिलाया है कि ‘हेग कन्वेंशन’ के पुराने नियम आज भी उतने ही प्रभावी हैं। स्विट्जरलैंड और श्रीलंका के आचरण ने यह साबित किया है कि तटस्थता केवल एक नीति नहीं, बल्कि एक सुरक्षा कवच है जो युद्धरत देशों की मनमानी को रोकता है। अंततः, यह स्पष्ट है कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर के रहते हुए भी ‘तटस्थता का कानून’ अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का एक अनिवार्य हिस्सा बना रहेगा, जो संघर्षों के बीच शांति और व्यापार के द्वीपों को सुरक्षित रखता है।


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