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उत्तर-पूर्वी राज्यों की राजनीति

भारत का उत्तर-पूर्वी क्षेत्र—असम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर, मिज़ोरम, त्रिपुरा, मेघालय और सिक्किम—देश की राजनीतिक संरचना में एक विशिष्ट स्थान रखता है। भौगोलिक रूप से मुख्यभूमि से अपेक्षाकृत अलग, सांस्कृतिक रूप से अत्यंत विविध और सामरिक दृष्टि से अत्यधिक महत्त्वपूर्ण यह क्षेत्र लंबे समय से पहचान, स्वायत्तता, विकास और सुरक्षा जैसे मुद्दों के बीच संतुलन साधने का प्रयास करता रहा है। उत्तर-पूर्व की राजनीति को समझना भारत के संघवाद, लोकतांत्रिक समावेशन और राष्ट्र-निर्माण की जटिलताओं को समझने के लिए आवश्यक है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और राजनीतिक विकास

उत्तर-पूर्व की राजनीति की जड़ें औपनिवेशिक काल में निहित हैं। ब्रिटिश शासन के दौरान इस क्षेत्र को ‘फ्रंटियर’ के रूप में देखा गया, जहाँ सीमित प्रशासनिक हस्तक्षेप और पृथक नीतियाँ अपनाई गईं। स्वतंत्रता के बाद भारत के समक्ष चुनौती थी—इस विविधतापूर्ण क्षेत्र का राजनीतिक एकीकरण और स्थानीय आकांक्षाओं का सम्मान।

1950–70 के दशक में राज्यों के पुनर्गठन और नई इकाइयों के गठन ने क्षेत्रीय पहचान को संवैधानिक मान्यता दी। नागालैंड (1963), मेघालय (1972), मणिपुर और त्रिपुरा (पूर्ण राज्य का दर्जा 1972), तथा बाद में अरुणाचल प्रदेश और मिज़ोरम (1987) का गठन इस प्रक्रिया के प्रमुख पड़ाव रहे। यह पुनर्गठन दर्शाता है कि भारतीय संघवाद ने विविधता के भीतर एकता बनाए रखने के लिए लचीलापन अपनाया।

पहचान और जातीय राजनीति

उत्तर-पूर्व की राजनीति का सबसे केंद्रीय तत्व है—पहचान। यहाँ अनेक जनजातीय और गैर-जनजातीय समुदाय अपनी भाषा, संस्कृति, परंपराओं और भूमि-अधिकारों को संरक्षित रखने के लिए राजनीतिक रूप से सक्रिय रहे हैं।

  • जातीय अस्मिता: कई आंदोलनों का आधार स्थानीय पहचान और सांस्कृतिक संरक्षण रहा।
  • भूमि और संसाधन: पारंपरिक अधिकारों की रक्षा और बाहरी हस्तक्षेप के विरोध ने राजनीति को प्रभावित किया।
  • भाषाई प्रश्न: भाषा यहाँ केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्तित्व का प्रतीक है।

यह पहचान-आधारित राजनीति कई बार सकारात्मक लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति बनी, तो कभी सामाजिक तनाव और संघर्ष का कारण भी बनी।

उग्रवाद और सुरक्षा की राजनीति

उत्तर-पूर्वी राज्यों में उग्रवाद एक दीर्घकालिक चुनौती रहा है। अलगाववाद, स्वायत्तता की मांग, आर्थिक उपेक्षा और सांस्कृतिक असंतोष ने कई सशस्त्र आंदोलनों को जन्म दिया।

  • नागालैंड में नगा राष्ट्रवाद
  • असम में ULFA जैसे संगठन
  • मणिपुर में बहु-संगठनीय उग्रवाद

इन परिस्थितियों में AFSPA (Armed Forces Special Powers Act) जैसे कानून लागू किए गए, जिन पर मानवाधिकार और नागरिक स्वतंत्रताओं के संदर्भ में व्यापक बहस हुई। हाल के वर्षों में कई शांति समझौतों, वार्ताओं और विकास पहलों के कारण उग्रवाद में कमी के संकेत मिले हैं, जो मुख्यधारा राजनीति की ओर झुकाव को दर्शाते हैं।

केंद्र–राज्य संबंध और संघवाद

उत्तर-पूर्व की राजनीति में केंद्र–राज्य संबंध अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। संविधान के अनुच्छेद 371 के विभिन्न उपबंध तथा छठी अनुसूची के अंतर्गत स्वायत्त परिषदों ने विशेष व्यवस्थाएँ प्रदान कीं।

सकारात्मक पहलू:

  • सांस्कृतिक और प्रशासनिक स्वायत्तता
  • स्थानीय शासन को प्रोत्साहन

चुनौतियाँ:

  • वित्तीय निर्भरता
  • नीति-निर्माण में केंद्र का प्रभाव
  • संसाधन नियंत्रण पर मतभेद

यह क्षेत्र संघीय संतुलन की परीक्षा का स्थल रहा है—जहाँ राष्ट्रीय एकता और स्थानीय स्वायत्तता के बीच निरंतर संवाद आवश्यक है।

सीमा, प्रवासन और नागरिकता के मुद्दे

उत्तर-पूर्व की अंतरराष्ट्रीय सीमाएँ (चीन, म्यांमार, बांग्लादेश, भूटान) इसे भू-राजनीतिक दृष्टि से संवेदनशील बनाती हैं। अवैध प्रवासन, जनसांख्यिकीय परिवर्तन और नागरिकता संबंधी प्रश्नों ने स्थानीय राजनीति को गहराई से प्रभावित किया।

  • असम में NRC और नागरिकता पर बहस
  • स्थानीय पहचान बनाम बाहरी आबादी का प्रश्न
  • सुरक्षा और मानवीय दृष्टिकोण के बीच संतुलन

ये मुद्दे अक्सर चुनावी राजनीति और सामाजिक आंदोलनों के केंद्र में रहते हैं।

क्षेत्रीय दलों और गठबंधन राजनीति की भूमिका

उत्तर-पूर्व में क्षेत्रीय दलों का प्रभाव पारंपरिक रूप से मजबूत रहा है। स्थानीय मुद्दों—पहचान, स्वायत्तता, विकास—को लेकर क्षेत्रीय दलों ने जनता से सीधा जुड़ाव बनाया।

  • गठबंधन सरकारों की प्रवृत्ति
  • राष्ट्रीय दलों के साथ रणनीतिक साझेदारी
  • स्थानीय एजेंडा की प्रधानता

हाल के वर्षों में राष्ट्रीय दलों की उपस्थिति और प्रभाव बढ़ा है, जिससे राजनीति में नए समीकरण बने हैं।

विकास, अवसंरचना और राजनीतिक विमर्श

विकास उत्तर-पूर्व की राजनीति का निर्णायक मुद्दा बनता जा रहा है। लंबे समय तक कनेक्टिविटी, औद्योगिक निवेश, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी ने क्षेत्रीय असंतोष को बढ़ाया।

हालिया प्रवृत्तियाँ:

  • सड़क, रेल और वायु कनेक्टिविटी में सुधार
  • पर्यटन और सेवा क्षेत्र का विस्तार
  • ‘एक्ट ईस्ट नीति’ के माध्यम से व्यापारिक अवसर

फिर भी, विकास के लाभों का समान वितरण, पर्यावरणीय संतुलन और स्थानीय सहभागिता सुनिश्चित करना चुनौती बना हुआ है।

सामाजिक परिवर्तन और नई राजनीतिक चेतना

उत्तर-पूर्व में युवा आबादी, शिक्षा का प्रसार, शहरीकरण और डिजिटल मीडिया के प्रभाव ने राजनीतिक चेतना को नई दिशा दी है।

  • युवाओं की बढ़ती राजनीतिक भागीदारी
  • महिलाओं की सशक्त उपस्थिति
  • नागरिक समाज और मीडिया की सक्रियता

यह परिवर्तन राजनीति को अधिक उत्तरदायी, पारदर्शी और विकासोन्मुख बनाने की संभावना पैदा करता है।

समकालीन चुनौतियाँ

  1. पहचान और एकीकरण के बीच संतुलन
  2. स्थायी शांति और उग्रवाद का पूर्ण समाधान
  3. आर्थिक विकास बनाम पर्यावरण संरक्षण
  4. प्रवासन और नागरिकता का संवेदनशील प्रबंधन
  5. प्रशासनिक दक्षता और भ्रष्टाचार नियंत्रण

समाधान की दिशा

  • समावेशी विकास: स्थानीय आवश्यकताओं और सांस्कृतिक संदर्भों के अनुरूप नीतियाँ
  • संवाद और विश्वास निर्माण: केंद्र, राज्य और समुदायों के बीच निरंतर वार्ता
  • राजनीतिक सशक्तिकरण: स्वायत्त संस्थाओं को प्रभावी बनाना
  • शिक्षा और कौशल विकास
  • डिजिटल और भौतिक कनेक्टिविटी
  • मानवाधिकार-संवेदनशील सुरक्षा नीति

निष्कर्ष

उत्तर-पूर्वी राज्यों की राजनीति भारत के लोकतंत्र की जटिलताओं और संभावनाओं का प्रतिबिंब है। यहाँ विविधता केवल चुनौती नहीं, बल्कि शक्ति भी है। यदि पहचान का सम्मान, विकास का संतुलन, और शासन में संवेदनशीलता सुनिश्चित की जाए, तो उत्तर-पूर्व भारत के आर्थिक, सांस्कृतिक और सामरिक उत्कर्ष का प्रमुख केंद्र बन सकता है। स्थायी शांति और विश्वास-आधारित शासन ही इस क्षेत्र की राजनीतिक स्थिरता और राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ कर सकते हैं।


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