20वीं शताब्दी के मध्य तक व्यवहारवाद (Behaviouralism) राजनीतिक विज्ञान पर प्रमुख प्रभाव रखता था। इसने राजनीति विज्ञान को वैज्ञानिक, अनुभवजन्य और मात्रात्मक दिशा प्रदान की, जिसने अध्ययन में objectivity, verifiability और statistical rigour लाई। किंतु 1960 के दशक तक यह स्पष्ट हो गया कि Behaviouralism की अपनी सीमाएँ थीं—यह अत्यधिक वैज्ञानिकवाद, मूल्य-निरपेक्षता और तकनीक-केंद्रितता में उलझ गया था तथा वास्तविक सामाजिक समस्याओं से कट गया था। इसी पृष्ठभूमि में 1969 के APSA (American Political Science Association) सम्मेलन में David Easton ने एक नया आंदोलन प्रस्तुत किया—Post-Behaviouralism, जो राजनीति विज्ञान को “प्रासंगिक, मानव-केंद्रित, नैतिक और कार्यशील” बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण मोड़ था।
Post-Behaviouralism, Behaviouralism का खंडन नहीं बल्कि उसका सुधारात्मक विस्तार था। यह वैज्ञानिकता को नकारता नहीं, बल्कि उसे मानव मूल्यों, सामाजिक न्याय और नीति-उन्मुखता से जोड़ता है। इस प्रकार, यह राजनीतिक विज्ञान को “lab-based science” से “life-based science” की ओर ले जाता है।
उत्पत्ति का सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ
1960 का दशक विश्व राजनीति में उथल-पुथल से भरा था:
1. सामाजिक आंदोलनों का विस्फोट
- अमेरिका में Civil Rights Movement
- वियतनाम युद्ध के खिलाफ वैश्विक विरोध
- लैटिन अमेरिका, अफ्रीका में स्वतंत्रता आंदोलन
- फ्रांस व यूरोप में Student Revolts
इन घटनाओं ने राजनीतिक विज्ञान से यह अपेक्षा बढ़ाई कि वह वास्तविक समस्याओं पर विचार करे, न कि केवल आंकड़ों व तकनीकों में उलझा रहे।
2. Behaviouralism की सीमाएँ प्रकट होना
Behaviouralism मुख्यतः निम्न समस्याओं से ग्रस्त था—
- अत्यधिक quantification
- मानकात्मक प्रश्नों की उपेक्षा
- value-neutrality की अव्यवहारिक अवधारणा
- नीति-निर्माण से दूरी
- सामाजिक संघर्षों और असमानता पर अध्ययन का अभाव
इससे राजनीतिक विज्ञान समाज से कटता हुआ महसूस होने लगा।
3. Political Scientists से नई अपेक्षाएँ
राजनीति वैज्ञानिकों से उम्मीद की गई कि वे—
- समाज की तात्कालिक समस्याओं पर कार्य करें
- नीति समाधान सुझाएँ
- नैतिक व मानवीय दृष्टिकोण अपनाएँ
- लोकतंत्र, समानता, न्याय, शांति जैसे लक्ष्यों को महत्व दें
इसी संदर्भ में Post-Behaviouralism का जन्म हुआ।
David Easton और Post-Behavioural Revolution
Easton ने Post-Behaviouralism को “New Revolution” कहा।
उनके दो ऐतिहासिक कथन इसे पूरी तरह परिभाषित करते हैं:
1. “Relevance is more important than technique.”
(सार्थकता तकनीक से अधिक महत्वपूर्ण है।)
2. “Political Science must be both relevant and action-oriented.”
(राजनीति विज्ञान को प्रासंगिक और कार्य-उन्मुख होना चाहिए।)
Easton का तर्क था कि राजनीतिक विज्ञान को केवल data-driven नहीं, बल्कि human-driven बनना चाहिए।
Post-Behaviouralism की मुख्य विशेषताएँ
Post-Behaviouralism, Behaviouralism का ‘मूल्य-संवेदनशील’ और ‘सामाजिक-उन्मुख’ रूप है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्न हैं—
1. Relevance (सार्थकता)
राजनीति विज्ञान समाज की वास्तविक समस्याओं—
- गरीबी
- असमानता
- दमन
- युद्ध
- नस्लवाद
- लोकतांत्रिक संकट
—से सीधे जुड़ा होना चाहिए।
सिर्फ सैद्धांतिक या सांख्यिकीय शोध समाज को लाभ नहीं देता।
2. Action-oriented Political Science
Post-Behaviouralism केवल अध्ययन तक सीमित नहीं है; यह सामाजिक परिवर्तन पर केंद्रित है।
राजनीति वैज्ञानिकों को—
- नीति निर्माण
- प्रशासनिक सुधार
- सामाजिक आंदोलनों
- मानव अधिकारों की रक्षा
—में सक्रिय योगदान देना चाहिए।
3. Value-loaded research
Behaviouralism का Value-neutrality सिद्धांत अव्यावहारिक पाया गया।
Post-Behaviouralism मानता है कि—
- राजनीति मूल्य-निरपेक्ष हो ही नहीं सकती।
- शोध में नैतिकता और मानवीय मूल्यों की भूमिका अनिवार्य है।
- सामाजिक न्याय, समानता, स्वतंत्रता जैसे मूल्यों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
4. Normative + Empirical Integration
Post-Behaviouralism ने normativity और empiricism का मेल कराया।
यह कहता है—
“Political Science must tell what is and what ought to be.”
5. Responsibility of Political Scientist
Political Scientist की भूमिका केवल विश्लेषक की नहीं बल्कि—
- समाज सुधारक
- लोकतंत्र के संरक्षक
- नीति सलाहकार
- नैतिक मार्गदर्शक
—की भी होती है।
6. Interdisciplinary yet humane
अन्य सामाजिक विज्ञानों का उपयोग जारी रहा, लेकिन मानवता, नैतिकता और प्रासंगिकता इसके केंद्र में रहे।
7. Policy-orientation
Post-Behaviouralism का प्रमुख लक्ष्य लोकनीति (public policy) में योगदान है।
अनुसंधान सरकार, नागरिक समाज और संस्थाओं के लिए उपयोगी होना चाहिए।
Post-Behaviouralism का राजनीतिक विज्ञान पर प्रभाव
1. Political Science का मानवीकरण
यह राजनीतिक विज्ञान को सामाजिक संवेदना और नैतिक मूल्यों से जोड़ता है।
2. Policy Studies का विकास
Public policy, development studies, welfare studies आदि का विस्तार हुआ।
3. Comparative Politics का पुनरुत्थान
राजनीति विज्ञान अब वास्तविक मुद्दों—
राजनीतिक संस्कृति, विकास, हिंसा, शासन संकट—
—पर केंद्रित होने लगा।
4. Political Theory का पुनर्जीवन
मानकात्मक सिद्धांतों पर फिर से जोर—
- न्याय
- समानता
- अधिकार
- स्वतंत्रता
5. Governance और Development के अध्ययन का विस्तार
राज्य की भूमिका, कल्याण, मानव विकास, लोकतांत्रिक भागीदारी जैसी समस्याएँ केंद्र में आईं।
6. लोकतांत्रिक राजनीति को मजबूती
Post-Behaviouralism ने राजनीतिक विज्ञान को
लोकतंत्र, समानता, अधिकारों और नागरिकता के पक्ष में मजबूत आधार दिया।
विकासशील देशों एवं भारत में Post-Behaviouralism का महत्व
भारत जैसे समाज में यह दृष्टिकोण अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुआ:
1. सामाजिक-आर्थिक समस्याओं पर शोध
- जाति आधारित भेदभाव
- ग्रामीण-शहरी असमानता
- राजनीतिक सहभागिता
- पहचान की राजनीति
- गरीबी, बेरोज़गारी
2. Public Policy और Welfare State में योगदान
Post-Behaviouralism ने—
- योजना आयोग
- नीति आयोग
- जन कल्याणकारी योजनाओं
- साक्ष्य आधारित नीति निर्माण
—की दिशा में अनुसंधान को प्रेरित किया।
3. विकास अध्ययन का विस्तार
Amartya Sen और Jean Dreze जैसे विद्वानों ने ‘मानव विकास’ और ‘क्षमता दृष्टिकोण’ को महत्व दिया जो Post-Behaviouralist दृष्टि से मेल खाते हैं।
4. लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों पर केंद्रित अध्ययन
- चुनाव सुधार
- लोकपाल
- RTI
- नागरिक अधिकार आंदोलनों
का गहन अध्ययन हुआ।
5. Political Mobilisation और Participation का विश्लेषण
Post-Behaviouralism ने राजनीतिक व्यवहार को सामाजिक संरचना से जोड़कर देखा।
आलोचनाएँ (Criticisms of Post-Behaviouralism)
1. अत्यधिक मानकात्मकता
कुछ विद्वानों ने कहा कि यह राजनीतिक विज्ञान को activism में बदल देता है।
2. वैज्ञानिक कठोरता में कमी
Techniques और quantification को कम महत्व देने की प्रवृत्ति दिखी।
3. व्यावहारिक सीमाएँ
नीति-निर्माण में शोध का उपयोग सीमित रहा, कई बार राजनीतिक हित शोध को प्रभावित करते हैं।
4. अत्यधिक व्यापकता
यह इतना व्यापक है कि इसे एक संगठित ‘पद्धति’ कहना कठिन है।
समग्र मूल्यांकन
Post-Behaviouralism राजनीतिक विज्ञान के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इसने Behaviouralism की कमियों को दूर करते हुए एक अधिक नैतिक, जिम्मेदार और सामाजिक-उन्मुख दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।
यह विज्ञान को नकारता नहीं, बल्कि उसे मानवता, नैतिकता और सामाजिक न्याय से जोड़ता है।
इसने राजनीतिक विज्ञान को—
- अधिक प्रासंगिक
- अधिक संवेदनशील
- अधिक मानवीय
- और अधिक व्यावहारिक
बनाया।
आज governance, development, policy studies, political theory, comparative politics, public opinion research—सभी क्षेत्रों में Post-Behaviouralism का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
निष्कर्ष
Post-Behaviouralism राजनीतिक विज्ञान का वह चरण है जिसने इसे समाज के वास्तविक उद्देश्यों—न्याय, समानता, लोकतंत्र, मानवाधिकार, शांति—से पुनः जोड़ा। यह केवल Behaviouralism की प्रतिक्रिया नहीं बल्कि उसका “मानवीकरण” है।
यह हमें याद दिलाता है कि राजनीति विज्ञान का उद्देश्य केवल ज्ञान खोजना नहीं बल्कि मानव जीवन को बेहतर बनाना भी है।
इस प्रकार, Post-Behaviouralism राजनीतिक विज्ञान को एक संवेदनशील, मानवीय और परिवर्तनशील अनुशासन बनाता है—जहाँ तकनीक से अधिक महत्व सार्थकता और न्याय का है।
Discover more from Politics by RK: Ultimate Polity Guide for UPSC and Civil Services
Subscribe to get the latest posts sent to your email.


