1993 से ही कई विद्वान और विचारक जातीय बहुसंख्यकवाद (majoritarianism) पर चर्चा कर रहे हैं। इसी समय बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और समाजवादी पार्टी (सपा) ने मिलकर उत्तर प्रदेश में सरकार बनाई थी।
कांशीराम के विचार
• बसपा के संस्थापक कांशीराम का मानना था कि भारत के लगभग सभी राजनीतिक दलों पर ऊँची जातियों, खासकर ब्राह्मणों का नियंत्रण है। ये दल अपने फायदे के लिए सत्ता चलाते हैं और बहुजन समाज (नीची जातियों और पिछड़ों) को बाहर रखते हैं।
बहुजन की विचारधारा के अनुसार समाज की रचना इस प्रकार है
• दलित: 15%, पिछड़ी जातियाँ (OBC): 52%, अनुसूचित जनजाति (ST): 7.5%, अल्पसंख्यक (मुस्लिम आदि): 10.5%
इस तरह कुल मिलाकर बहुजन समाज लगभग 85% है। दूसरी ओर, ऊँची जातियाँ
• ब्राह्मण: 3.5% क्षत्रिय: 5.5% वैश्य: 6% मिलाकर केवल 15% हैं।
• कांशीराम का कहना था कि यही 15% लोग सत्ता पर कब्जा जमाए हुए हैं और 85% बहुजनों का शोषण करते हैं। उनका मानना था कि जब तक बहुजन समाज राजनीतिक सत्ता पर नियंत्रण नहीं करेगा, तब तक उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति नहीं सुधरेगी। वे यह भी कहते थे कि मुसलमानों की समस्या भी राजनीतिक है, और धार्मिक नेताओं की सत्ता पर सवाल उठाकर ही उससे बाहर निकला जा सकता है। राजनीतिक रूप से वंचित रहने के कारण ही आर्थिक और सामाजिक पिछड़ापन बना हुआ है। अगर बहुजन समाज राजनीति में सत्ता हासिल कर ले, तो उनकी हालत बदल सकती है।
• 1932 के पूना पैक्ट (Poona Pact) का विरोध करते थे, क्योंकि उनके अनुसार इस समझौते ने दलितों के लिए अलग से आरक्षण सीटें तो दीं, लेकिन असल में इसने एक “चमचा युग” (चापलूसों का दौर) शुरू कर दिया वे आरक्षण नीति का मज़ाक उड़ाते थे, लेकिन साथ ही यह भी कहते थे कि जब तक जाति व्यवस्था पूरी तरह खत्म नहीं होती, तब तक आरक्षण जारी रहना चाहिए। उनका तर्क था कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब ऊँची जातियाँ खुद अपने लिए आरक्षण की मांग करेंगी, क्योंकि समाज में बराबरी तभी आएगी जब सबके अवसर समान हों।
• कांशीराम बार-बार इस बात पर ज़ोर देते थे कि देश की जनसंख्या में ओबीसी (पिछड़ी जातियाँ) लगभग 52% हैं, लेकिन संसद में उनका प्रतिनिधित्व सिर्फ 8% है। दूसरी ओर, ब्राह्मण और ठाकुर मिलाकर केवल 8% हैं, लेकिन संसद में इनकी हिस्सेदारी 52%तक है। यह असमानता दिखाती है कि सत्ता अब भी ऊँची जातियों के हाथों में केंद्रित है।
बसपा कि भूमिका क्या थी?
बसपा का मुख्य लक्ष्य इसी असमानता को खत्म करना था जिसमे समाज के 85% बहुजनों को सत्ता और प्रतिनिधित्व में बराबर का हिस्सा दिलाना शामिल था ।
• बसपा का गठन 1984 में डॉ. बाबासाहेब आम्बेडकर की जयंती के दिन हुआ था। बसपा ने धीरे-धीरे उत्तर प्रदेश, पंजाब, मध्य प्रदेश और हरियाणा में अपनी शक्ति में वृद्धि की है। पार्टी इन राज्यों की राजनीति में एक महत्त्वपूर्ण शक्ति बन चुकी है। विशेष रूप से उत्तर प्रदेश में इसकी शक्ति काफ़ी बढ़ी है। इसके पीछे दलितों को गोलबंद करने के इसके प्रयासों तथा 1960 के दशक में पिछड़ी जातियों के संगठनों द्वारा तैयार किये गये आधार ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की।
बहुजन समजावादी पार्टी और समाजपार्टी का गठबंधन
• 1993 में जब बसपा ने सपा (समाजवादी पार्टी) के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश में सरकार बनाई, तो यह गठबंधन दो अलग सामाजिक-राजनीतिक धाराओं का संगम था। सपा, मुलायम सिंह यादव की पार्टी, जो राम मनोहर लोहिया की पिछड़ी जाति आधारित समाजवादी राजनीति की परंपरा से निकली थी।
• जाति के आधार पर संगठित बहुसंख्यकवाद (majoritarianism) का विचार 1950 के दशक में ही आकार लेने लगा था। इसी दौर मेंडॉ. राम मनोहर लोहिया, जो समाजवादी पार्टी के प्रमुख विचारक थे, जिन्होंने पिछड़ा जाति आयोग (1955) की सिफारिशों का समर्थन किया, जिसमें पिछड़ी जातियों को आरक्षण देने की बात कही गई थी। यह वह समय था जब उत्तर प्रदेश और बिहार में पिछड़ी जातियों का एक शिक्षित वर्ग उभर रहा था, जो अपने सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों को लेकर सजग होने लगा था।
राम मनोहर लोहिया
• लोहिया का मानना था कि भारत के भौतिक (आर्थिक) औरआध्यात्मिक (सांस्कृतिक) पतन का मूल कारण जाति व्यवस्था है। उनका तर्क था कि जाति व्यवस्था को खत्म करने के लिए पिछड़ी जातियों को विशेष अवसर और प्राथमिकता (आरक्षण) देना ज़रूरी है।
लोहिया के अनुसार, भारत के शासक वर्ग की तीन मुख्य पहचानें होती हैं —
• ऊँची जाति से होना,
• अंग्रेज़ी शिक्षा प्राप्त होना,
• धनवान होना (संपत्ति होना)।
• उनका कहना था कि अगर किसी व्यक्ति में इन तीन में से दो गुण भी हों, तो वह आसानी से सत्ता के ढांचे में शामिल हो सकता है।लोहिया का अनुमान था कि पिछड़ी जातियाँ, दलित, पिछड़े मुसलमान और ईसाई, आदिवासी और महिलाएँ मिलाकर देश कीलगभग 85% आबादी हैं। फिर भी, इनका प्रतिनिधित्व राजनीति, सेना, व्यापार और उच्च सरकारी सेवाओं जैसे चार प्रमुख क्षेत्रों में केवल लगभग 10% ही है। इस असमानता को दूर करने के लिए लोहिया ने सुझाव दिया कि इन वर्गों को 60% आरक्षण दिया जाना चाहिए। इसका एक उदाहरण कर्पूरी ठाकुर हैं वे लोहिया के अनुयायी और बिहार के एक पिछड़ी जाति के नेता थे। उन्होंने 1967 के चुनावों में यह नारा दिया —“सोशलिस्टों ने बाँधी गाँठ, पिछड़ा पावें सौ में साठ।” (अर्थात, समाजवादियों ने ठान लिया है कि पिछड़ी जातियों को 100 में से 60 हिस्से मिलेंगे।)यह नारा उस समय पिछड़ी जातियों की राजनीतिक चेतना और उनके सशक्तिकरण का प्रतीक बन गया।
उत्तर प्रदेश में चरण चौधरी सिंह
• एक प्रभावशाली नेता के रूप में उभरे। उन्होंने पंडित नेहरू के विकास मॉडल का विरोध किया, क्योंकि उनके अनुसार यह मॉडल कृषि क्षेत्र (खेतिहर वर्ग) के खिलाफ था और उद्योगों तथा शहरों के हितों को ज़्यादा प्राथमिकता देता था।
• चरण सिंह का मानना था कि भारत की असली ताकत गाँवों और किसानों में है, इसलिए नीतियों का केंद्र कृषि और ग्रामीण विकासहोना चाहिए। उन्होंने यह भी ज़ोर दिया कि विकेंद्रीकरण ज़रूरी है, ताकि गाँवों को भी निर्णय लेने की शक्ति मिल सके। उन्होंने मध्य और पिछड़ी जातियों को अमीर किसानों के साथ जोड़ने की कोशिश की
• अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत में ही उन्होंने यह मांग रखी थी कि सरकारी नौकरियों में किसानों के बेटों को 60% आरक्षण दिया जाए, ताकि ग्रामीण युवाओं को भी अवसर मिल सके। हालांकि चरण सिंह स्वयं ओबीसी (अन्य पिछड़ी जाति) से नहीं थे, बल्कि वेजाट जाति से थे जो एक मध्यवर्ती किसान जाति मानी जाती है लेकिन उन्होंने पिछड़ी जातियों और किसानों के हितों के लिए लगातार संघर्ष किया। उनकी राजनीति ने उत्तर भारत में किसान वर्ग और पिछड़ी जातियों को एकजुट करने की दिशा में एक मजबूत आधार तैयार किया, जिससे बाद में सामाजिक न्याय की राजनीतिको और बल मिला।
1967 का चुनाव भारतीय राजनीति ने जाति कि राजनीति को कैसे प्रभावित किया?
• यह एक ऐतिहासिक मोड़ (मील का पत्थर) साबित हुआ। इसी चुनाव में पहली बार पिछड़ी जातियों की राजनीतिक ताक़त खुलकर सामने आई। इन जातियों और विपक्षी दलों ने मिलकर कांग्रेस पार्टी कोआठ राज्यों में पराजित कर दिया था। उस समय तक कांग्रेस को लोग ऊँची जातियों की सत्ता का प्रतीक मानने लगे थे। इसके विरोध में राम मनोहर लोहिया के नेतृत्व में “गैर-कांग्रेसवाद” का नारा दिया गया। इस नारे ने पिछड़ी जातियों और विपक्षी दलों को एक साझा मंच पर ला दिया।
• हालाँकि, इस सफलता के बावजूद ये दल और जातीय समूह सत्ता को स्थायी रूप से नहीं संभाल पाए। उनमें आपसी मतभेद और संगठन की कमी के कारण यह गठबंधन ज्यादा समय तक नहीं टिक सका। 1971-72 तक कांग्रेस ने फिर से अपनी राजनीतिक ताकत हासिल कर ली और केंद्र में मज़बूत होकर लौटी। इस तरह, 1967 का चुनाव भले ही अस्थायी जीत रहा हो, लेकिन उसने भारत में सामाजिक न्याय की राजनीति और पिछड़ी जातियों के राजनीतिक जागरण की नींव मज़बूती से रख दी।
• लोहिया और चरण सिंह के विचारों में बहुत सारी समानताएँ थीं। दोनों पिछड़ी जातियों और गैर-कांग्रेसवाद की राजनीति तथा विकेंद्रीकरण पर ज़ोर देते थे। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं है कि 1974 में लोहियावादी समाजवादियों और चरण सिंह के भारतीय क्रांति दल (1969) ने कुछ अन्य छोटे दलों के साथ मिलकर भारतीय लोक दल की स्थापना की।
आपातकाल (1975) और जनता पार्टी का गठन
• भारतीय राजनीति में एक बहुत बड़ा मोड़ साबित हुआ। इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए इस आपातकाल ने पूरे देश में लोकतंत्र, अभिव्यक्ति और नागरिक अधिकारों को सीमित कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस के विरोध में सभी विपक्षी दल एकजुट हो गए।आपातकाल समाप्त होने के बाद, जनता पार्टी का गठन हुआ यह विभिन्न विपक्षी दलों का गठबंधन था। जनता पार्टी की जीत और केंद्र में उसका सत्ता में आना उत्तर भारत की पिछड़ी जातियों द्वारा सत्ता पर नियंत्रण पाने की एक नई कोशिश थी। इस बार उनका उद्देश्य सिर्फ़ राज्य स्तर पर नहीं, बल्कि केंद्र की सत्ता पर भी अधिकार जमाना था।
• पिछड़ी जातियों के नेताओं और कार्यकर्ताओं के दबाव के कारण ही जनता पार्टी सरकार ने मंडल आयोग (Mandal Commission) का गठन किया। इस आयोग का काम था यह जांचना कि कौन-से सामाजिक समूह “पिछड़े वर्ग” में आते हैं, और उन्हें सरकारी नौकरियों व शिक्षा में आरक्षण (Reservation) की कितनी आवश्यकता है।
मंडल आयोग
• अपनी रिपोर्ट में ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) के लिए 27% आरक्षणकी सिफ़ारिश की।
हालाँकि जनता पार्टी सरकार ज़्यादा दिन नहीं टिक पाई लगभग तीन साल बाद ही (1980) वह गिर गई, और कांग्रेस पार्टी फिर से सत्ता में लौट आई। कांग्रेस की इस वापसी के पीछे उसके चुनावी नारे और प्रचार रणनीति भी अहम रहे, जैसे —“ना जात पर, ना पात पर, इंदिरा जी की बात पर, मोहर लगेगी हाथ पर।” “ब्राह्मण-हरिजन भाई-भाई, ये पिछड़ी जाति कहाँ से आयी।”इन नारों से साफ़ दिखता है कि कांग्रेस खुद को जाति से ऊपर बताकर प्रचार कर रही थी, जबकि जनता पार्टी और समाजवादी धारा जाति-आधारित असमानता के ख़िलाफ़ लड़ रही थी। इससे दोनों की सामाजिक सोच और राजनीतिक आधार में अंतर साफ़ झलकता था।
• इसी तरह, 1988 में एक राजपूत नेता वी. पी. सिंह ने भी कांग्रेस छोड़ दी। उन्होंने बोफ़ोर्स घोटाले के ख़िलाफ़ इस्तीफ़ा देकर जनता दल (1988) का गठन किया, जिसमें जनता पार्टी और समाजवादी धारा के कई पुराने घटक एक साथ आए। वी. पी. सिंह ने घोषणा की कि उनकी पार्टी 60% टिकट दलितों, पिछड़ी जातियों और आदिवासियोंको देगी। उन्होंने जातीय गठजोड़ का एक नया फ़ॉर्मूला पेश किया “अजगर” गठबंधन — यानी अहीर (यादव), जाट, गुर्जर और राजपूत
• जो उत्तर भारत की प्रभावशाली जातियों का समूह था। इस ओबीसी–राजपूत गठबंधन ने चुनाव में बड़ी सफलता पाई। सत्ता में आने के बाद, 1990 में वी. पी. सिंह की सरकार ने मंडल आयोग की सिफ़ारिशें लागू कर दीं, जिसके तहत सरकारी नौकरियों में ओबीसी को 27% आरक्षण दिया गया।
• मंडल आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करने के बाद भारतीय राजनीति में एक बड़ा बदलाव आया। 1980 के दशक के अंत और 1990 के दशक की शुरुआत में जनता दल और उसके विभिन्न रूपों (जैसे — जनता दल (सेक्युलर), जनता दल (यूनाइटेड) आदि) ने कई राज्यों में सत्ता हासिल की।
• इनमें खास तौर पर उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, उड़ीसा और कर्नाटक शामिल थे। यह दौर क्षेत्रीय दलों और पिछड़ी जातियों की राजनीति के उभार का समय था, जिसने कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी की सत्ता को चुनौती दी।
1990 के बाद
• 1996 के लोकसभा चुनावों में जनता दल को 45 सीटों पर जीत मिली। भले ही यह संख्या ज़्यादा नहीं थी, लेकिन जनता दल ने 13 अन्य दलों के साथ मिलकर संयुक्त मोर्चा (United Front) नाम से एक गठबंधन सरकार बनाई। इस सरकार को कांग्रेस ने बाहर से समर्थन दिया था, ताकि भाजपा को सत्ता में आने से रोका जा सके।हालाँकि, यह सरकार भी ज़्यादा समय तक नहीं टिक सकी। जैसे वी. पी. सिंह की राष्ट्रीय मोर्चा (National Front) सरकार (1989–1990) अल्पकालिक रही थी, वैसे ही संयुक्त मोर्चा की सरकार भीकुछ ही वर्षों में गिर गई।
• 1998 में फिर से आम चुनाव कराए गए, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि भारत में गठबंधन राजनीति (coalition politics) का दौर शुरू हो चुका है जहाँ सत्ता अब केवल एक पार्टी के हाथ में नहीं, बल्किविभिन्न सामाजिक वर्गों और क्षेत्रीय हितों के मेल से तय होने लगी थी।
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