20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में राजनीतिक दर्शन का एक प्रमुख विवाद उदारवाद बनाम सामुदायिकता (Liberalism vs. Communitarianism) का रहा है। उदारवाद व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समानता और स्वायत्तता पर आधारित है, जबकि सामुदायिकता यह मानती है कि व्यक्ति केवल समुदाय के भीतर अर्थ और पहचान पाता है।
माइकल वाल्ज़र (Michael Walzer) अपने प्रसिद्ध निबंध “The Communitarian Critique of Liberalism” में इस विवाद के दार्शनिक और नैतिक पहलुओं का विश्लेषण करते हैं। वे दिखाते हैं कि उदारवाद को चुनौती देने वाली सामुदायिक आलोचना अपने आप में विरोधाभासी है क्योंकि वह उसी उदारवादी ढाँचे के भीतर अर्थ ग्रहण करती है जिसे वह अस्वीकार करती है।
उदारवाद की मूल धारणा
उदारवाद (Liberalism) आधुनिक पश्चिमी राजनीतिक दर्शन का मूल ढांचा है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं:
- व्यक्ति की प्राथमिकता (Primacy of the Individual): समाज व्यक्ति के लिए है, व्यक्ति समाज के लिए नहीं।
- स्वतंत्रता (Liberty): प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेने का अधिकार है।
- न्याय और समानता (Justice and Equality): सामाजिक व्यवस्था को ऐसे संस्थानों पर आधारित होना चाहिए जो निष्पक्ष हों।
- नैतिक निरपेक्षता (Moral Neutrality): राज्य को किसी विशेष जीवनशैली या नैतिक मत का पक्ष नहीं लेना चाहिए।
जॉन रॉल्स (John Rawls), रॉबर्ट नोज़िक (Robert Nozick) और जॉन लॉक (John Locke) जैसे दार्शनिकों ने उदारवाद की नींव रखी।
सामुदायिक आलोचना की उत्पत्ति
1970–80 के दशक में जॉन रॉल्स की पुस्तक “A Theory of Justice” (1971) के बाद कई दार्शनिकों जैसे चार्ल्स टेलर (Charles Taylor), माइकल सैंडल (Michael Sandel), अलस्डेयर मैकिन्टायर (Alasdair MacIntyre) और माइकल वाल्ज़र लेकिन स्वयं माइकल वाल्ज़र ने उदारवाद की आलोचना की।
सामुदायिक चिंतकों का तर्क था कि:
- उदारवाद व्यक्ति को समाज और नैतिक परंपराओं से काट देता है।
- “स्वतंत्र आत्म” (unencumbered self) का विचार काल्पनिक है।
- मनुष्य अपने समुदाय, इतिहास और संस्कृति से परिभाषित होता है, न कि एक निरपेक्ष स्वतंत्र प्राणी के रूप में।
वाल्ज़र लिखते हैं कि सामुदायिक आलोचना “एक नैतिक स्मरणपत्र” है, जो हमें यह याद दिलाती है कि व्यक्ति सामाजिक संबंधों का उत्पाद है।
वाल्ज़र का तर्क: आलोचना के भीतर उदारवाद
माइकल वाल्ज़र इस बहस में एक मध्यस्थ की तरह खड़े होते हैं। वे मानते हैं कि उदारवाद और सामुदायिकता एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं।
उनका मुख्य तर्क यह है कि सामुदायिक आलोचना भी उदारवादी परंपरा के भीतर से ही उभरती है।
“The communitarian critics are themselves liberals, they appeal to values of belonging and participation that are made possible by liberal freedoms.”
वाल्ज़र बताते हैं कि सामुदायिक विचारधारा किसी भी समाज में तभी फल-फूल सकती है जब उदारवादी अधिकार (जैसे विचार की स्वतंत्रता, संगठन की स्वतंत्रता) सुनिश्चित हों।
उदाहरण के लिए, अगर किसी व्यक्ति को अपने समुदाय से असहमति व्यक्त करने या उसे छोड़ने की स्वतंत्रता नहीं है, तो वह समुदाय “नैतिक” नहीं रह जाता, वह “दमनकारी” बन जाता है।
समुदाय की भूमिका: पहचान का स्रोत
वाल्ज़र स्वीकार करते हैं कि व्यक्ति की पहचान सामाजिक होती है। हम भाषा, संस्कृति, परंपरा और ऐतिहासिक अनुभवों से आकार लेते हैं।
समुदाय हमें:
- नैतिक दिशा देता है,
- सामाजिक पहचान प्रदान करता है,
- और हमारे निर्णयों को अर्थ देता है।
परंतु वे यह भी चेतावनी देते हैं कि समुदाय व्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित कर सकता है। इसलिए नैतिक समुदाय (moral community) और राजनीतिक स्वतंत्रता (political freedom) के बीच संतुलन आवश्यक है।
उदारवाद की सीमाएँ
वाल्ज़र मानते हैं कि शुद्ध उदारवाद व्यक्ति को अत्यधिक अमूर्त बना देता है।
रॉल्स के “veil of ignorance” वाले विचार में व्यक्ति की कोई सामाजिक पहचान नहीं होती। वह केवल एक ‘नागरिक इकाई’ है।
वाल्ज़र लिखते हैं कि इस तरह का व्यक्ति वास्तविक नहीं है। “We are not unencumbered selves; we are situated selves, embedded in history and culture.”
इसलिए न्याय और समानता का कोई भी सिद्धांत तब तक अपूर्ण है जब तक वह सामाजिक संदर्भों को नहीं समझता।
नैतिकता और परंपरा
सामुदायिक चिंतकों के अनुसार, नैतिकता कोई सार्वभौमिक तर्क का विषय नहीं बल्कि परंपराओं का परिणाम है।
उदाहरण: एक हिंदू, मुस्लिम या यहूदी की नैतिक संवेदना उनकी सामुदायिक परंपराओं से आती है, न कि किसी सार्वभौमिक उदार मूल्य से।
वाल्ज़र इसे “थिक मॉरलिटी” (Thick Morality) कहते हैं अर्थात ऐसी नैतिकता जो विशेष संदर्भ, भाषा और इतिहास से जुड़ी हो।
इसके विपरीत, उदारवाद “थिन मॉरलिटी” (Thin Morality) को प्राथमिकता देता है यानी सामान्य न्याय और समानता के नियम जो सब पर लागू हों।
उनके अनुसार दोनों की ज़रूरत है:
- “थिन” नैतिकता से हम सह-अस्तित्व बना सकते हैं।
- “थिक” नैतिकता से हम गहराई और अर्थ प्राप्त करते हैं।
सामुदायिक आलोचना की सीमाएँ
वाल्ज़र यह भी बताते हैं कि सामुदायिकता की अपनी कमजोरियाँ हैं:
- सांस्कृतिक सापेक्षता (Cultural Relativism): यदि हर समुदाय अपने नियमों को नैतिक माने, तो सार्वभौमिक मानवाधिकार कैसे स्थापित होंगे?
- दमन की संभावना: परंपरा के नाम पर महिलाओं, अल्पसंख्यकों या असहमति रखने वालों का दमन हो सकता है।
- सुधार की सीमा: यदि नैतिकता पूरी तरह परंपरा से तय हो, तो सामाजिक सुधार कैसे होंगे?
इसलिए वे कहते हैं- “Communities need liberal principles to critique themselves.”
राजनीति में अनुप्रयोग
राजनीतिक रूप से, वाल्ज़र के विचार “pluralist democracy” की ओर इशारा करते हैं, जहाँ विभिन्न समुदाय अपनी पहचान और मूल्य संरक्षित रख सकते हैं, लेकिन समान नागरिक अधिकारों के अधीन रहें।
इस ढांचे में:
- राज्य उदार (liberal) होगा यानी सभी को समान स्वतंत्रता देगा,
- पर समाज विविध (communitarian) रहेगा, यानी लोग अपनी परंपराओं से अर्थ लेंगे।
इसे हम “उदार-सामुदायिक संतुलन” कह सकते हैं।
आलोचना और समन्वय
वाल्ज़र की स्थिति को “moderate communitarianism” कहा जाता है। वे न तो उदारवाद को पूरी तरह अस्वीकार करते हैं और न ही सामुदायिकता को पूर्ण सत्य मानते हैं।
उनके अनुसार- “Liberalism without community is empty, and community without liberalism is oppressive.”
इस वाक्य में उनके दर्शन का सार निहित है, स्वतंत्रता और सामाजिक बंधन दोनों एक-दूसरे को परिभाषित करते हैं।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में महत्व
भारत में भी यह बहस प्रासंगिक है;
- संविधान उदार लोकतांत्रिक है,
- लेकिन समाज सामुदायिक और विविध है।
समान नागरिक संहिता, आरक्षण नीति, धार्मिक स्वतंत्रता जैसे मुद्दे इसी उदार-सामुदायिक तनाव को दर्शाते हैं।
वाल्ज़र के विचार बताते हैं कि भारत को एक “plural liberal state” के रूप में विकसित होना चाहिए, जो विविधता का सम्मान करते हुए समानता सुनिश्चित करे।
निष्कर्ष
माइकल वाल्ज़र का “The Communitarian Critique of Liberalism” आधुनिक राजनीतिक दर्शन में संतुलन का संदेश देता है।
वे यह स्वीकार करते हैं कि व्यक्ति समुदाय से अलग नहीं हो सकता, पर यह भी कि समुदाय की नैतिकता तभी सार्थक है जब व्यक्ति स्वतंत्र हो।
इसलिए उनकी दृष्टि एक संवादात्मक नैतिकता (dialogical morality) की है जहाँ व्यक्ति और समाज, स्वतंत्रता और परंपरा, उदारता और सामुदायिकता निरंतर संवाद में रहें।
वाल्ज़र की यह चेतावनी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है “जब समाज व्यक्ति को भूल जाता है, तब अत्याचार जन्म लेता है; और जब व्यक्ति समाज को भूल जाता है, तब अर्थ खो जाता है।”
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