केंद्रीय अंतरण (Central Transfers) का क्या अर्थ है?
केंद्रीय अंतरण से तात्पर्य उन वित्तीय संसाधनों से है, जो भारत में केंद्र सरकार द्वारा राज्य सरकारों को दिए जाते हैं, ताकि राजकोषीय असंतुलन को दूर किया जा सके और सार्वजनिक व्यय को समर्थन मिल सके।
ये अंतरण मुख्यतः करों के बँटवारे (tax devolution) और वित्त आयोग (Finance Commission) द्वारा अनुशंसित अनुदानों (grants) के माध्यम से किए जाते हैं। इनका उद्देश्य विभिन्न राज्यों की अलग–अलग राजस्व क्षमताओं के बावजूद संसाधनों का न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित करना है। वित्त आयोग यह निर्धारित करता है कि राज्यों को कुल कितनी हिस्सेदारी मिलेगी तथा करों के बँटवारे का सूत्र क्या होगा।
इन अंतरणों के दो प्रमुख कारण होते हैं—
- ऊर्ध्वाधर समानता (Vertical Equity):यह सुनिश्चित करना कि राज्यों के पास संविधान द्वारा सौंपे गए दायित्वों का निर्वहन करने के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध हो।
- क्षैतिज समानता (Horizontal Equity):समृद्ध और पिछड़े राज्यों के बीच के अंतर को कम करना। उदाहरण के लिए, जिस राज्य में औद्योगिक गतिविधियाँ कम हैं, उसे शिक्षा या अवसंरचना जैसी सेवाएँ उसी स्तर पर उपलब्ध कराने के लिए अतिरिक्त सहायता की आवश्यकता होती है, जैसा कि किसी समृद्ध राज्य में होता है।
केंद्र से राज्यों को हस्तांतरण के प्रकार:
- कर हस्तांतरण (tax devolution):केंद्र सरकार द्वारा वसूल किए गए कुल करों का एक निश्चित प्रतिशत राज्यों के साथ साझा किया जाता है। वर्तमान में यह लगभग 41% है।उदाहरण: gst या corporation tax का बंटवारा।
- अनुदान सहायता (grants-in-aid):राज्यों को दी जाने वाली विशिष्ट धनराशि। ये दो प्रकार की हो सकती हैं- (a) अबंधित (untied): जिसे किसी भी उद्देश्य पर खर्च किया जा सकता है। (b) बंधित (tied): जिसे केवल किसी विशेष परियोजना या उद्देश्य के लिए ही उपयोग किया जा सकता है।उदाहरण: आपदा राहत कोष या राजस्व घाटा अनुदान।
- केंद्रीय प्रायोजित योजनाएँ (centrally sponsored schemes – css):राष्ट्रीय प्राथमिकताओं से जुड़ी योजनाओं के लिए दी जाने वाली निधि, जिनमें केंद्र और राज्य दोनों लागत साझा करते हैं।उदाहरण: राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन या प्रधानमंत्री आवास योजना।

केंद्रीय अंतरण (Central Transfers) का महत्व क्या है?
1. ऊर्ध्व असंतुलन का सुधार (Correcting Vertical Imbalance):
- संविधान के तहत केंद्र सरकार को आयकर और सीमा शुल्क जैसे अधिक “उछालदार” (तेज़ी से बढ़ने वाले) कर लगाने की शक्तियाँ दी गई हैं, जबकि राज्यों के जिम्मे स्वास्थ्य, शिक्षा और पुलिस जैसे अधिक व्यय वाले क्षेत्र हैं।
- यदि केंद्रीय अंतरण न हों, तो राज्य लगातार कर्ज़ में डूबे रहते या बुनियादी सार्वजनिक सेवाओं के लिए धन जुटाने में असमर्थ होते। केंद्रीय अंतरण यह सुनिश्चित करते हैं कि राज्यों के पास प्रभावी ढंग से कार्य करने के लिए पर्याप्त तरलता (liquidity) हो।
2. क्षैतिज समानता को बढ़ावा देना (क्षेत्रीय असमानताओं को कम करना):
- सभी राज्यों की आर्थिक क्षमता समान नहीं होती। महाराष्ट्र जैसे अत्यधिक औद्योगीकृत राज्य बिहार या हिमाचल प्रदेश जैसे स्थलरुद्ध या पर्वतीय राज्यों की तुलना में अधिक राजस्व उत्पन्न कर सकते हैं।
- अंतरण “समानीकरण” (Equalization) सिद्धांत पर आधारित होते हैं। गरीब या भौगोलिक रूप से पिछड़े राज्यों को अधिक धन देकर यह सुनिश्चित किया जाता है कि कम आय वाले राज्य का नागरिक भी स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सेवाओं तक पहुँच प्राप्त कर सके।
3. राजकोषीय स्थिरता और बीमा की भूमिका (Maintaining Fiscal Stability & Insurance):
- केंद्र सरकार व्यक्तिगत राज्यों की तुलना में बेहतर शर्तों पर उधार ले सकती है और उसके पास आर्थिक झटकों से निपटने के लिए बड़ा “रिज़र्व” होता है।
- बाढ़ या महामारी जैसी आपदाओं के दौरान केंद्र राज्यों को आपातकालीन अनुदान देता है, जिससे उनके स्थानीय बजट ध्वस्त होने से बचते हैं।
- यदि किसी क्षेत्र की अर्थव्यवस्था धीमी पड़ती है, तो अंतरण “अंतर-क्षेत्रीय बीमा” की तरह काम करते हैं, जिससे स्थानीय कर संग्रह घटने के बावजूद प्रशासन सुचारु रूप से चलता रहता है।
4. राष्ट्रीय प्राथमिकताओं का क्रियान्वयन (Implementing National Priorities):
- केंद्र सरकार अक्सर “सबके लिए बिजली” या “सार्वभौमिक टीकाकरण” जैसे राष्ट्रव्यापी लक्ष्यों को हासिल करना चाहती है।
- केंद्र प्रायोजित योजनाओं (Centrally Sponsored Schemes – CSS) के माध्यम से केंद्र “बाध्य” (tied) धनराशि देता है, जो राज्यों को राष्ट्रीय विकास रोडमैप के अनुरूप कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करती है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि राज्यों की स्वायत्तता बनी रहे, लेकिन देश समान विकास लक्ष्यों की ओर अग्रसर हो।
केंद्र से राज्यों को होने वाले हस्तांतरण (central transfers) के विरुद्ध क्या आलोचनाएँ हैं?
- “उत्तर–दक्षिण” विभाजन: कर्नाटक, तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे राज्य तर्क देते हैं कि वे केंद्रीय कर राजस्व में असमानुपातिक रूप से अधिक योगदान देते हैं, लेकिन कर-वितरण (tax devolution) के माध्यम से उन्हें अपेक्षाकृत कम हिस्सा मिलता है। दक्षिणी राज्य जनसंख्या को मानक बनाए जाने की आलोचना करते हैं। उनका कहना है कि जनसंख्या नियंत्रण और आर्थिक वृद्धि को सफलतापूर्वक लागू करने के कारण उन्हें “दंडित” किया जा रहा है, जबकि “असफल” राज्यों को अधिक धन मिल रहा है।
- “शर्तबद्धता” और बंधित अनुदान: कई हस्तांतरण “शर्तबद्ध अनुदानों” के रूप में होते हैं (जैसे केंद्रीय प्रायोजित योजनाएँ)। इससे राज्यों को स्थानीय आवश्यकताओं के बजाय केंद्र की प्राथमिकताओं पर खर्च करना पड़ता है और राज्य मात्र केंद्र के “प्रशासनिक अंग” बनकर रह जाते हैं।
- एक-सा-सबके-लिए दृष्टिकोण: केंद्रीकृत योजनाएँ अक्सर क्षेत्रीय विविधता को ध्यान में नहीं रखतीं। पहाड़ी क्षेत्र के लिए बनाई गई योजना तटीय राज्य के लिए अप्रासंगिक या अलाभकारी हो सकती है, फिर भी धन प्राप्त करने के लिए राज्य को उसे लागू करना पड़ता है।
- राजनीतिक पक्षपात: विवेकाधीन अनुदानों (जो किसी सूत्र से अनिवार्य नहीं होते) की आलोचना इस आधार पर होती है कि उनका उपयोग “मित्रवत” राज्य सरकारों को पुरस्कृत करने या विपक्ष-शासित राज्यों को दंडित करने के राजनीतिक औज़ार के रूप में किया जाता है।
- ढीला कर-प्रयास: यदि राज्यों को यह विश्वास हो कि उन्हें केंद्र से सुनिश्चित हस्तांतरण मिलेगा, तो वे अपने स्थानीय कर आधार का विस्तार करने या करों का कुशलतापूर्वक संग्रह करने के प्रति कम प्रेरित हो सकते हैं। इसे अक्सर “विकृत प्रोत्साहन” (perverse incentive) कहा जाता है।
- घाटा-पूर्ति दृष्टिकोण: जब हस्तांतरण राज्यों के घाटे को भरने के लिए डिज़ाइन किए जाते हैं, तो इससे राज्यों को अधिक खर्च करने का प्रोत्साहन मिलता है, क्योंकि वे जानते हैं कि राष्ट्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए अंततः केंद्र सरकार उन्हें “बेलआउट” कर देगी।
- निर्भरता का जाल: समय के साथ राज्य “हस्तांतरण-निर्भर” हो सकते हैं, जहाँ उनका पूरा बजट नियोजन स्थानीय सतत विकास के बजाय केंद्रीय हस्तांतरण की अनिश्चितता पर टिका रहता है।
- अकुशलता का हस्तांतरण: उच्च प्रदर्शन करने वाले औद्योगिक राज्यों से धन लेकर कम प्रदर्शन वाले राज्यों को देने से कभी-कभी “अकुशलता का हस्तांतरण” होता है, जहाँ पूँजी उच्च प्रतिफल वाले क्षेत्रों से कम उत्पादक क्षेत्रों की ओर चली जाती है।
- “विभाज्य पूल” में पारदर्शिता: केंद्र सरकारों पर अक्सर यह आरोप लगता है कि वे “सेस और अधिभार” (जो राज्यों के साथ साझा नहीं किए जाते) का उपयोग कर कर-राजस्व का बड़ा हिस्सा अपने पास रखती हैं, जिससे हस्तांतरण के लिए उपलब्ध वास्तविक धनराशि कम हो जाती है।
आगे की राह क्या होनी चाहिए?
- राज्य जीडीपी-आधारित सूत्र:केंद्रीय कर हस्तांतरण के सूत्र में राज्य जीडीपी हिस्सेदारी को अधिक वज़न देने से केंद्रीय कर राजस्व के वास्तविक अर्जन को बेहतर रूप से प्रतिबिंबित किया जा सकेगा, राष्ट्रीय आय में राज्यों के योगदान को मान्यता मिलेगी, तथा भारत की अंतर-सरकारी राजकोषीय हस्तांतरण प्रणाली की निष्पक्षता और विश्वसनीयता में सुधार होगा।
- विभाज्य कोष (divisible pool) का विस्तार:एक प्रमुख मांग यह है कि उपकर (cesses) और अधिभार (surcharges) को भी राज्यों के साथ साझा किए जाने वाले करों के कोष में शामिल किया जाए। वर्तमान में ये पूरी तरह केंद्र के पास रहते हैं और सकल कर राजस्व के 10% से अधिक हो चुके हैं, जिससे राज्यों का वास्तविक हिस्सा अनुशंसित 41% से भी कम हो जाता है।
- उच्चतर विकेंद्रीकरण लक्ष्य:कुछ विशेषज्ञ और राज्य यह मांग कर रहे हैं कि ऊर्ध्वाधर हिस्सेदारी (vertical share) को 41% से बढ़ाकर 50% किया जाए, ताकि सामाजिक क्षेत्र के खर्च (स्वास्थ्य, शिक्षा और जलवायु अनुकूलन) में राज्यों पर बढ़े बोझ को समायोजित किया जा सके।
- प्रदर्शन को प्रोत्साहन:केवल “जनसंख्या” और “आय दूरी” से आगे बढ़ते हुए, 16वां वित्त आयोग कर प्रयास (tax effort) और जनसांख्यिकीय प्रदर्शन (demographic performance) को अधिक वज़न देने की अपेक्षा है। इससे उन राज्यों को प्रोत्साहन मिलेगा जिन्होंने जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण किया है और अपने कर संग्रह में सुधार किया है।
- समानता बनाम दक्षता:जहाँ “आय दूरी” (गरीब राज्यों को अधिक देना) राष्ट्रीय स्थिरता के लिए आवश्यक बनी रहती है, वहीं सूत्र को कम “रेखीय” बनाने की मांग भी है। इससे विकसित राज्यों को आगे की वृद्धि से हतोत्साहित होने से बचाया जा सकेगा।
- स्थानीय निकायों को सशक्त बनाना:सिफारिशें शहरी और ग्रामीण स्थानीय निकायों को अंतर-सरकारी हस्तांतरण (igt) को दोगुना करने की बात करती हैं, क्योंकि शहरों को “विकास के इंजन” के रूप में मान्यता देते हुए उनके लिए बड़े पैमाने पर अवसंरचना वित्तपोषण की आवश्यकता है।
- केंद्र प्रायोजित योजनाओं का सरलीकरण:केंद्र प्रायोजित योजनाएँ (जैसे मनरेगा या आयुष्मान भारत) अक्सर “एक-आकार-सभी-के-लिए” मानी जाती हैं। राज्यों को इन योजनाओं को स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप ढालने के लिए अधिक लचीलापन दिया जाना चाहिए, बजाय कठोर 60:40 या 50:50 वित्तपोषण अनुपात थोपने के।
- “ऋण परिषद” का संस्थानीकरण:केंद्र और राज्यों—दोनों के उच्च ऋण स्तर को प्रबंधित करने के लिए एक स्थायी निकाय बनाया जा सकता है, जो राजकोषीय घाटे के लक्ष्यों की निगरानी करे और वर्तमान अस्थायी सीमाओं का स्थान ले।
- प्रौद्योगिकी का एकीकरण: एआई और डेटा एनालिटिक्स का उपयोग कर “कर अर्जन” बनाम “कर संग्रह” को ट्रैक किया जाए। इससे यह पहचानने में मदद मिलेगी कि आर्थिक मूल्य वास्तव में कहाँ सृजित हो रहा है (जैसे विनिर्माण केंद्र) और कर दाखिल कहाँ किए जा रहे हैं (जैसे मुंबई में मुख्यालय)।
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