केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा केरल राज्य का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने के प्रस्ताव को स्वीकृति प्रदान करना भारतीय संघीय ढाँचे में सांस्कृतिक-भाषायी पहचान और प्रतीकात्मक राजनीति के अंतर्संबंध को रेखांकित करता है। प्रस्तावित केरल (नाम परिवर्तन) विधेयक, 2026 को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 3 के अंतर्गत संसद में पारित किया जाएगा। यह पहल 2024 में राज्य विधानसभा द्वारा केंद्र सरकार से औपचारिक अनुरोध किए जाने के पश्चात आगे बढ़ाई गई है।
यह नाम परिवर्तन केवल प्रशासनिक प्रक्रिया न होकर पहचान, भाषा और राजनीतिक विमर्श के व्यापक संदर्भ में समझा जाना चाहिए, जो भारतीय राज्यों के नामकरण से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों और क्षेत्रीय आकांक्षाओं के बीच संतुलन को दर्शाता है।
किसी राज्य का नाम परिवर्त की संवैधानिक प्रक्रिया
भारतीय संघीय व्यवस्था में किसी राज्य का नाम परिवर्तन एक सुव्यवस्थित संवैधानिक एवं विधिक प्रक्रिया के अंतर्गत संपन्न होता है, जिसका मूल आधार भारतीय संविधान का अनुच्छेद 3 है।
यह प्रावधान संसद को राज्यों के गठन, सीमाओं, क्षेत्रों तथा नाम में परिवर्तन करने का विधिक अधिकार प्रदान करता है।
इस प्रक्रिया को निम्न चरणों में समझा जा सकता है:
- संसदीय अधिकार: अनुच्छेद 3 के अनुसार संसद को किसी राज्य के नाम में परिवर्तन करने का एकमात्र विधायी अधिकार प्राप्त है, जिससे संघीय ढाँचे के भीतर परिवर्तन को वैधानिक वैधता मिलती है।
- राज्य प्रस्ताव:प्रक्रिया सामान्यतः तब आरंभ होती है जब संबंधित राज्य की विधानसभा नाम परिवर्तन के पक्ष में प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजती है, जो राज्य की लोकतांत्रिक इच्छा का औपचारिक प्रकटीकरण होता है।
- प्रशासनिक परीक्षण एवं एनओसी: केंद्र का गृह मंत्रालय प्रस्ताव की विस्तृत समीक्षा करता है तथा विभिन्न संस्थाओं जैसे रेलवे, खुफिया एजेंसियाँ, डाक विभाग, सर्वेक्षण प्राधिकरण और महापंजीयक से अनापत्ति प्रमाण-पत्र (NOC) प्राप्त करता है, ताकि प्रशासनिक, भौगोलिक और सुरक्षा संबंधी अभिलेखों में किसी प्रकार का विरोधाभास उत्पन्न न हो। संबंधित प्रस्ताव पर विधि एवं न्याय मंत्रालय के विभागों की सहमति भी ली जाती है।
- राष्ट्रपति की पूर्व अनुशंसा: गृह मंत्रालय की स्वीकृति के पश्चात विधेयक को संसद में प्रस्तुत करने से पहले राष्ट्रपति की पूर्व अनुशंसा आवश्यक होती है, जो संवैधानिक प्रक्रिया की अनिवार्य शर्त है।
- राज्य विधानसभा से परामर्श: यदि प्रस्ताव राज्य के नाम या सीमाओं को प्रभावित करता है, तो राष्ट्रपति विधेयक का मसौदा संबंधित राज्य विधानसभा को विचारार्थ भेजते हैं और निर्धारित अवधि के भीतर उसके विचार आमंत्रित करते हैं। यद्यपि संसद इन विचारों को स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं होती, परंतु यह संघीय परामर्श की भावना को दर्शाता है।
- साधारण बहुमत से पारित: विधेयक संसद के दोनों सदनों में साधारण बहुमत से पारित किया जाता है और इसे संविधान संशोधन (अनुच्छेद 368) नहीं माना जाता।
- राष्ट्रपति की स्वीकृति और अनुसूची संशोधन: संसद से पारित होने के बाद विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त करता है, जिसके साथ ही नाम परिवर्तन प्रभावी हो जाता है और संविधान की प्रथम अनुसूची में आवश्यक संशोधन किया जाता है, जहाँ राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों का विवरण निहित है।
- भाषायी एवं प्रशासनिक समायोजन: कुछ मामलों में, जैसे केरल द्वारा ‘केरलम’ नाम प्रस्तावित करने के संदर्भ में, यह अनुरोध किया जा सकता है कि परिवर्तन को संविधान की आठवीं अनुसूची में मान्यता प्राप्त भाषाओं में भी परिलक्षित किया जाए, जिससे भाषायी एकरूपता सुनिश्चित हो।
- ऐतिहासिक उदाहरण: पूर्व में उत्तराखंड (पूर्व नाम उत्तरांचल) तथा ओडिशा (पूर्व नाम उड़ीसा) जैसे नाम परिवर्तनों ने इस प्रक्रिया के व्यावहारिक अनुप्रयोग को स्पष्ट किया है।
इस प्रकार राज्य के नाम परिवर्तन की प्रक्रिया संवैधानिक प्रावधानों, संघीय परामर्श और विधायी औपचारिकताओं के संतुलन पर आधारित है, जो प्रशासनिक स्पष्टता तथा क्षेत्रीय पहचान दोनों को समुचित महत्व प्रदान करती है।
केरल की उत्पत्ति एवं विकास
केरल की ऐतिहासिक उत्पत्ति और विकास बहुस्तरीय सांस्कृतिक, भाषायी तथा राजनीतिक प्रक्रियाओं का परिणाम है, जिसका प्रमाण प्राचीन अभिलेखों से लेकर आधुनिक राज्य निर्माण तक मिलता है।
- इस क्षेत्र का सबसे प्रारंभिक उल्लेख सम्राट अशोक के शिलालेख II (लगभग 257 ईसा पूर्व) में मिलता है, जहाँ इसे ‘केरलपुत्र’ कहा गया है, जिसे सामान्यतः चेर राजवंश से जोड़ा जाता है।
- इससे संकेत मिलता है कि प्राचीन काल में यह क्षेत्र एक विशिष्ट राजनीतिक-सांस्कृतिक इकाई के रूप में विद्यमान था।
नाम की व्युत्पत्ति: जर्मन विद्वान हरमन गुंडर्ट के अनुसार ‘केरलम’ शब्द ‘चेरम’ या ‘चेरलम’ से विकसित हुआ है; जहाँ ‘चेर’ का अर्थ ‘जुड़ना’ और ‘अलम’ का अर्थ ‘भूमि’ या ‘प्रदेश’ है। इस प्रकार यह शब्द गोकर्णम से कन्याकुमारी तक फैली जुड़ी हुई भूमि को इंगित करता है।
औपनिवेशिक काल और भाषायी चेतना
- ब्रिटिश शासन के दौरान प्रशासनिक सीमाएँ भाषायी आधार पर निर्धारित नहीं थीं। मद्रास प्रेसीडेंसी के अंतर्गत विभिन्न भाषायी समुदायों के बीच अलग राज्य की मांग धीरे-धीरे उभरने लगी।
- 1920 के दशक में ‘ऐक्य केरल आंदोलन’ ने मलयालम-भाषी क्षेत्रों मालाबार, त्रावणकोर और कोच्चि को एकीकृत करने की मांग को गति दी, जो राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के समानांतर विकसित हुआ।
- स्वतंत्रता के पश्चात 1 जुलाई 1949 को त्रावणकोर और कोचीन रियासतों को मिलाकर त्रावणकोर-कोचीन राज्य का गठन किया गया, जिसने भविष्य के एकीकृत राज्य की आधारशिला रखी।
राज्य पुनर्गठन और आधुनिक राज्य का गठन
- राज्य पुनर्गठन आयोग, जिसकी अध्यक्षता सैयद फज़ल अली ने की, ने भाषायी आधार पर राज्य गठन की सिफारिश की। इसके परिणामस्वरूप 1 नवंबर 1956 को मालाबार जिला और कासरगोड को शामिल करते हुए तथा त्रावणकोर के कुछ दक्षिणी क्षेत्रों को अलग कर आधुनिक केरल राज्य का गठन हुआ।
- यह दिन ‘केरल पिरवी दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। हालाँकि, संविधान में देशज ‘केरलम’ के स्थान पर अंग्रेजीकृत रूप ‘केरल’ दर्ज किया गया, जो औपनिवेशिक प्रशासनिक परंपरा का प्रभाव दर्शाता है।
आधुनिक केरल का इतिहास मूलतः भाषायी पहचान के आंदोलन से जुड़ा है, जिसका उद्देश्य मलयालम-भाषी समाज की सांस्कृतिक एकता को राजनीतिक रूप देना था। इस आंदोलन ने क्षेत्रीय पहचान, प्रशासनिक दक्षता और लोकतांत्रिक आकांक्षाओं को समेकित किया।
केरल को ‘केरलम’ करने की वजह
केरल का नाम ‘केरलम’ करने का प्रस्ताव ऐतिहासिक निरंतरता, भाषायी पहचान तथा संवैधानिक मानकीकरण की व्यापक प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। इसे निम्न बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:
- ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक आधार: ‘केरल’ शब्द मूलतः मलयालम के ‘केरलम’ का अंग्रेजीकृत रूप माना जाता है। इस क्षेत्र का प्राचीन उल्लेख सम्राट अशोक के शिलालेखों (लगभग 257 ईसा पूर्व) में ‘केरलपुत्र’ के रूप में मिलता है, जो चेर वंशीय परंपरा और क्षेत्र की ऐतिहासिक पहचान को दर्शाता है। अतः ‘केरलम’ नाम अपनाने को ऐतिहासिक मूल स्वरूप की पुनर्स्थापना के रूप में देखा जा रहा है।
- भाषायी पहचान और उच्चारण का प्रश्न: नाम परिवर्तन का एक प्रमुख कारण भाषायी अस्मिता है। मलयालम भाषा में राज्य को ‘केरलम’ कहा जाता है, जबकि ‘केरल’ अंग्रेजी उच्चारण से प्रभावित रूप है। इसलिए प्रस्तावित परिवर्तन को स्थानीय भाषा और सांस्कृतिक आत्मपहचान के अनुरूप आधिकारिक नाम स्थापित करने का प्रयास माना जाता है।
- संवैधानिक अभिलेखों में समरूपता: जून 2024 में राज्य विधानसभा द्वारा पारित प्रस्ताव में यह तर्क दिया गया कि राज्य की जनता अपनी मातृभाषा में ‘केरलम’ का प्रयोग करती है;
- अतः भारतीय संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत आवश्यक विधायी प्रक्रिया अपनाकर आधिकारिक दस्तावेजों, कानूनी अभिलेखों तथा अंतरराष्ट्रीय संदर्भों में नाम को ‘केरलम’ किया जाना चाहिए। इसका उद्देश्य प्रशासनिक और भाषायी एकरूपता सुनिश्चित करना है।
आगे की राह
- संसद में विधेयक पारित कर आवश्यक संवैधानिक औपचारिकताओं को शीघ्र पूरा करना आवश्यक होगा, ताकि प्रशासनिक अस्पष्टता से बचा जा सके।
- नाम परिवर्तन को केवल औपचारिक प्रक्रिया न मानकर स्थानीय भाषा और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण से जोड़ा जाना चाहिए, जिससे जनता की सहभागिता और स्वीकृति बढ़े।
निष्कर्ष
‘केरल’ से ‘केरलम’ नाम परिवर्तन का प्रस्ताव भारतीय संघवाद में पहचान, भाषा और इतिहास के महत्व को रेखांकित करता है। यह पहल दर्शाती है कि राज्यों के नाम केवल प्रशासनिक प्रतीक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्मृति और सामाजिक आत्मबोध के वाहक भी होते हैं। यदि इस प्रक्रिया को पारदर्शी, समावेशी और सुव्यवस्थित तरीके से लागू किया जाता है, तो यह न केवल संवैधानिक व्यवस्था को सुदृढ़ करेगा बल्कि क्षेत्रीय अस्मिता और राष्ट्रीय एकता के बीच संतुलन का भी उदाहरण प्रस्तुत करेगा।
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