भारत ने 27 फरवरी 2026 को महान स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आज़ाद की 95वीं शहादत दिवस मनाया गया। चंद्रशेखर आज़ाद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी चरण (1920–1931) के केंद्रीय व्यक्तित्व थे। विद्वान उन्हें केवल एक साहसी योद्धा नहीं, बल्कि संगठनकर्ता, रणनीतिकार और भूमिगत क्रांतिकारी नेटवर्क के संरक्षक के रूप में देखते हैं। असहयोग आंदोलन की वापसी के बाद युवाओं में उत्पन्न असंतोष ने जिस उग्र राष्ट्रवाद को जन्म दिया, आज़ाद उसके प्रमुख प्रतिनिधि बने।
उनकी भूमिका विशेष रूप से निम्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण मानी जाती है:
- काकोरी कांड (1925)
- हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) का पुनर्गठन
- हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) की स्थापना (1928)
- जॉन सॉन्डर्स की हत्या
- अल्फ्रेड पार्क (1931) में अंतिम संघर्ष
चंद्रशेखर आज़ाद : एक अदम्य क्रांतिकारी
- चंद्रशेखर आज़ाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के भाबरा (अलीराजपुर रियासत) में चंद्रशेखर तिवारी के रूप में हुआ। वे बचपन से ही तेजस्वी और साहसी थे। किशोरावस्था में वे वाराणसी के एक संस्कृत विद्यालय में पढ़ने गए।
- 1919 के जलियांवाला बाग हत्याकांड ने उनके मन में अंग्रेजी शासन के प्रति गहरा आक्रोश उत्पन्न किया। 1921 में वे महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में शामिल हुए।
- गिरफ्तारी के समय उन्होंने मजिस्ट्रेट से कहा “मेरा नाम आज़ाद, पिता का नाम स्वतंत्रता और पता जेल है।” तभी से वे ‘आज़ाद’ कहलाए और उन्होंने प्रण लिया कि वे कभी जीवित पकड़े नहीं जाएंगे।
असहयोग से क्रांतिकारी मार्ग की ओर
1922 में चौरी-चौरा की घटना के बाद गांधीजी द्वारा असहयोग आंदोलन वापस लेने से आज़ाद निराश हुए। उन्होंने यह मान लिया कि सशस्त्र क्रांति ही स्वतंत्रता का मार्ग है।
वे रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व वाली हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) से जुड़ गए।
काकोरी कांड (1925): 9 अगस्त 1925 को काकोरी ट्रेन से सरकारी धन लूटने की योजना में आज़ाद की महत्वपूर्ण भूमिका रही। यह धन क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए था। अधिकांश क्रांतिकारी पकड़े गए, किंतु आज़ाद पुलिस से बच निकले।
- झांसी में उन्होंने “हरिशंकर” नाम से रहकर संगठन को पुनर्गठित किया। वे भेष बदलने में निपुण थे और ‘बलराज’ जैसे छद्म नामों का प्रयोग करते थे।
HSRA और समाजवादी विचारधारा: 1928 में भगत सिंह के साथ मिलकर उन्होंने संगठन को नया रूप दिया। हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA)।
- इस संगठन ने स्पष्ट रूप से समाजवादी विचारधारा अपनाई। भगत सिंह वैचारिक नेता थे, जबकि आज़ाद सैन्य प्रमुख और रणनीतिकार थे।
सॉन्डर्स की हत्या (1928): लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के लिए जॉन सॉन्डर्स की हत्या की योजना बनाई गई।
- भगत सिंह और राजगुरु ने गोली चलाई, जबकि आज़ाद ने पीछा करने वाले सिपाही को मारकर साथियों को बचाया। यह घटना ब्रिटिश शासन के लिए खुली चुनौती थी।
केंद्रीय विधानसभा बम प्रकरण (1929): दिल्ली की केंद्रीय विधानसभा में बम फेंकने की घटना के बाद अधिकांश नेता गिरफ्तार कर लिए गए। आज़ाद भूमिगत रहे और संगठन को जीवित रखा।
अंतिम संघर्ष (27 फरवरी 1931): इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क (अब आज़ाद पार्क) में पुलिस ने उन्हें घेर लिया। उन्होंने अपने साथी सुखदेव राज को बचाकर भेज दिया और अंत तक लड़ते रहे।
- अंतिम गोली से उन्होंने स्वयं को मार लिया, अपने वचन के अनुरूप कि वे कभी जीवित नहीं पकड़े जाएंगे। उस समय उनकी आयु मात्र 24 वर्ष थी।
व्यक्तित्व और विरासत
- वे मानसिक और शारीरिक चपलता के कारण “क्विक सिल्वर” कहलाते थे।
- उनकी मूंछों को ताव देते हुए तस्वीर क्रांतिकारी साहस का प्रतीक बन गई।
- अनेक फिल्मों और धारावाहिकों में उनके जीवन को चित्रित किया गया।
- आज़ाद भारतीय युवाओं के लिए साहस, त्याग और स्वाभिमान के प्रतीक हैं।
निष्कर्ष
चंद्रशेखर आज़ाद केवल एक क्रांतिकारी नहीं थे, बल्कि वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उस दौर के प्रतीक थे जब युवा शक्ति ने अन्याय के विरुद्ध हथियार उठाने का निर्णय लिया। उनका जीवन साहस, त्याग और अडिग संकल्प की अमर गाथा है। आज भी उनका नाम लेते ही आत्मसम्मान, राष्ट्रभक्ति और वीरता की भावना जागृत हो उठती है।
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