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क्लासिकी उदारवाद (Classical liberalism)

Laissez faire, laissez aller, le mond va du lui-meme यह नारा प्रसिद्ध था जिसका अर्थ था कि वस्तुओं तथ्यों को उनके हाल पर छोड़ दो क्योंकि विश्व स्वयं से संचालित होती है। उदारवाद को कई अलग-अलग नामों से जाना जाता है, जैसे क्लासिकी उदारवाद, व्यक्तिवादी उदारवाद, अहस्तक्षेप उदारवाद, स्वतंत्र बाजार उदारवाद, एकीकृत उदारवाद आदि।

क्लासिकी उदारवाद का उदय

पश्चिम में आधुनिक युग की शुरुआत 16वीं शताब्दी से मानी जाती है। इस समय समाज और राजनीति में बड़े बदलाव होने लगे। मध्यकालीन सामाजिक-आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक व्यवस्था कमजोर पड़ने लगी। पुनर्जागरण और धर्म सुधार आंदोलनों के कारण सोच में बदलाव आया।

वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति के कारण एक नया आर्थिक वर्ग उभरा, जिसे पूँजीपति वर्ग कहा गया। यह वर्ग राजनीति में भी अपनी भूमिका चाहता था। इसी कारण राजनीति में सम्मति (Consent) पर आधारित राज्य की धारणा सामने आई। राष्ट्र-राज्य का उदय हुआ और समाज तथा राज्य की व्यवस्था के हर क्षेत्र में परिवर्तन होने लगा। इस नए विचारधारा को क्लासिकी उदारवाद कहा गया।

विचारधारा की मान्यता

इस विचारधारा में व्यक्ति को सबसे महत्वपूर्ण माना गया। व्यक्ति की स्वतंत्रता, अधिकार और समानता पर ज़ोर दिया गया। थॉमस हॉब्स, जॉन लॉक, एडम स्मिथ आदि विचारकों ने इस विचारधारा को आगे बढ़ाया।उदारवाद का विश्वास था कि परिवर्तन, गति, विकास, प्रगति, प्रतिस्पर्धा और प्रयोग समाज के लिए ज़रूरी हैं। यह विचारधारा व्यक्ति की स्वतंत्रता और उसकी स्वायत्तता पर ज़ोर देती है।

इसका मानना था कि मनुष्य स्वभाव से स्वतंत्र है। वह किसी के अधीन नहीं होता। उदारवाद व्यक्ति को एक विवेकपूर्ण और समझदार प्राणी मानता है। व्यक्ति अपने निर्णय खुद ले सकता है।
उदारवाद व्यक्ति के अधिकारों, स्वतंत्रता और समानता में विश्वास करता है। इसका मानना था कि यदि व्यक्ति को अपनी पसंद से काम करने की आज़ादी दी जाए, तो उसकी रचनात्मक शक्ति बढ़ेगी और समाज का विकास होगा।
इस विचारधारा के अनुसार व्यक्ति ही सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्थाओं का आधार है। व्यक्ति ही सभी गतिविधियों का केंद्र है। व्यक्ति को अपनी मेहनत और योग्यता के आधार पर आगे बढ़ने का अवसर मिलना चाहिए। क्लासिकी उदारवाद समाज को स्वाभाविक नहीं मानता था, बल्कि उसे एक कृत्रिम व्यवस्था मानता था। इसका मतलब यह था कि समाज अपने आप नहीं बनता, बल्कि लोगों द्वारा बनाया जाता है।
यह समाज अलग-अलग व्यक्तियों से मिलकर बना होता है। हर व्यक्ति की अपनी-अपनी इच्छाएँ और हित होते हैं। समाज को एक बड़ी कृत्रिम संस्था की तरह देखा गया, जिसका उद्देश्य लोगों की ज़रूरतों को पूरा करना था। समाज व्यक्तियों का एक समूह है, न कि कोई एक जीवित इकाई। समाज में हर व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए काम करता है। इसी स्वार्थ के कारण समाज आगे बढ़ता है।

विचारको के अनुसार

हॉब्स ने समाज को एक तरह का अनाज का ढेर कहा था। इसका अर्थ यह है कि जैसे अनाज के ढेर में हर दाना अलग-अलग होता है, वैसे ही समाज में भी हर व्यक्ति अलग होता है, फिर भी सब मिलकर एक समाज बनाते हैं।
उदारवादियों के अनुसार राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था को प्राकृतिक नियमों के अनुसार चलना चाहिए। उनका मानना था कि यदि व्यवस्था प्रकृति के नियमों के अनुसार चलेगी, तो समाज अपने-आप ठीक ढंग से काम करेगा। उदारवाद में स्वतंत्र बाजार व्यवस्था को बहुत महत्व दिया गया।
एडम स्मिथ, माल्थस और जेम्स मिल जैसे विचारकों ने इस विचार को आगे बढ़ाया। उनका कहना था कि यदि व्यक्तियों को अपने स्वार्थ के अनुसार काम करने की पूरी आज़ादी दी जाए, तो इसका परिणाम पूरे समाज के लिए लाभकारी होगा। उदारवादियों का मत था कि व्यक्ति जब अपने निजी लाभ के लिए काम करता है, तब अनजाने में वह समाज का भी भला करता है। इसलिए राज्य को आर्थिक मामलों में बहुत कम दखल देना चाहिए।
एडम स्मिथ के अनुसार प्राकृतिक आर्थिक शक्तियाँ केवल बुरी नहीं होतीं, बल्कि वे उपयोगी भी होती हैं। व्यक्ति अपने हित को ध्यान में रखकर काम करता है, लेकिन उसी प्रक्रिया में समाज को भी लाभ पहुँचता है।

राज्य सरकार का विचार

राज्य व्यक्ति द्वारा बनाई गई एक संस्था है। इसलिए राज्य को एक आवश्यक बुराई माना गया। राज्य आवश्यक इसलिए है क्योंकि वही कानून-व्यवस्था बनाए रख सकता है और व्यक्ति के जीवन व संपत्ति की रक्षा कर सकता है। लेकिन राज्य को बुराई इसलिए कहा गया क्योंकि उसकी शक्ति व्यक्ति की स्वतंत्रता को कम कर सकती है।
उदारवाद का मानना था कि मानव स्वतंत्रता का सबसे बड़ा शत्रु राज्य हो सकता है। इसलिए राज्य के कामों को सीमित रखना ज़रूरी है। राज्य को ऐसी संस्था माना गया जिसका काम केवल व्यक्ति को सुरक्षित रखना हो, न कि उसके जीवन में अनावश्यक दखल देना।
उदारवादी विचारकों के अनुसार सरकार की भूमिका बहुत सीमित होनी चाहिए। उनका नारा था “वह सरकार सबसे अच्छी है, जो कम से कम शासन करती है।”इस विचार के अनुसार राज्य के मुख्य कार्य ये होने चाहिए समाज को बाहरी आक्रमण से सुरक्षित रखना।समाज के प्रत्येक व्यक्ति को अन्याय और दूसरों के अत्याचार से बचाना।
कुछ आवश्यक सार्वजनिक कार्य करना और कुछ संस्थाएँ बनाना, जिनमें व्यक्ति स्वयं रुचि न लें, क्योंकि वे उनके लिए लाभकारी नहीं होतीं। हर्बर्ट स्पेंसर का भी मानना था कि राज्य एक आवश्यक बुराई है और उसे “योग्यता के जीवित रहने” के सिद्धांत का समर्थन करना चाहिए। उनका विचार था कि सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में राज्य की भूमिका न्यूनतम होनी चाहिए।
इस प्रकार, क्लासिकी उदारवाद में राज्य को एक सीमित, नियंत्रित और आवश्यक संस्था माना गया, जिसका मुख्य उद्देश्य व्यक्ति की स्वतंत्रता, जीवन और संपत्ति की रक्षा करना है।


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