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गणतंत्र: एक विस्तृत विश्लेषण

भारत के इतिहास में ‘गणतंत्र’ शब्द का अर्थ केवल 26 जनवरी की परेड या ध्वजारोहण तक सीमित नहीं है। यह उस दार्शनिक चेतना का प्रतीक है जिसने व्यक्ति को सत्ता की दासता से मुक्त कर उसे राष्ट्र का निर्माता बनाया। गणतंत्र एक ऐसी जीवन पद्धति है जिसमें सर्वोच्च शक्ति किसी सिंहासन में नहीं, बल्कि जनमानस के मत में निहित होती है। यह लेख गणतंत्र के अर्थ, इसके ऐतिहासिक विकास, अन्य प्रणालियों से इसकी भिन्नता और भारतीय संदर्भ में इसके भविष्य की चुनौतियों का एक ऐसा विश्लेषण प्रस्तुत करता है जो इसकी गहराई और महत्ता को स्पष्ट करेगा।

गणतंत्र का अभिप्राय:

गणतंत्र शब्द संस्कृत के ‘गण’ और ‘तंत्र’ से मिलकर बना है। ‘गण’ का अर्थ है—समान अधिकार वाले व्यक्तियों का समूह, और ‘तंत्र’ का अर्थ है—प्रणाली। अतः गणतंत्र का मौलिक अर्थ है—समूह का शासन। पश्चिमी दर्शन में इसे ‘रिपब्लिक’ कहा गया, जो लैटिन के ‘रेस पब्लिका’ से व्युत्पन्न है। इसका अर्थ होता है ‘सार्वजनिक विषय’। इन दोनों परिभाषाओं का सार एक ही है: राज्य की सत्ता किसी की निजी संपत्ति नहीं है, बल्कि यह एक सार्वजनिक ट्रस्ट है जिसे जनता के हित के लिए संचालित किया जाना चाहिए।

गणतंत्र का असली अर्थ केवल चुनाव प्रक्रिया में नहीं छिपा है, बल्कि यह ‘संवैधानिक नैतिकता’ और ‘कानून की सर्वोच्चता’ में निहित है। एक सच्चे गणराज्य में, कानून का शासन (Rule of Law) व्यक्ति की इच्छा से ऊपर होता है। यहाँ तक कि निर्वाचित सरकार भी अपनी मर्जी से नागरिकों के उन अधिकारों को नहीं छीन सकती जो उसे प्रकृति और संविधान ने दिए हैं। गणतंत्र की आत्मा इस विचार में बसती है कि राजा भी कानून के अधीन है, न कि कानून राजा के अधीन। यह व्यवस्था व्यक्ति की गरिमा और समानता के सिद्धांत पर टिकी है।

सत्ता के विविध स्वरूप: गणतंत्र बनाम अन्य राज्य प्रणालियाँ

इतिहास के लंबे कालखंड में मानव समाज ने शासन के कई प्रयोग किए हैं। इन प्रणालियों को समझे बिना गणतंत्र की श्रेष्ठता को नहीं समझा जा सकता। प्राचीन काल से ही ‘राजतंत्र’ (Monarchy) सबसे प्रबल व्यवस्था रही। राजतंत्र का आधार ‘दैवीय अधिकार’ था, जहाँ राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था और सत्ता का हस्तांतरण केवल रक्त संबंधों (वंशवाद) के आधार पर होता था। गणतंत्र ने इस धारणा को ध्वस्त किया कि शासन करने की योग्यता केवल एक विशेष परिवार में जन्म लेने से आती है।

एक अन्य व्यवस्था ‘अभिजाततंत्र’ (Aristocracy) रही है, जिसमें माना जाता था कि समाज के कुछ ‘सर्वश्रेष्ठ’ या ‘शिक्षित’ लोग ही शासन के योग्य हैं। इसके विपरीत, गणतंत्र ‘योग्यता’ और ‘लोकप्रियता’ के मेल पर आधारित है। ‘तानाशाही’ (Dictatorship) और ‘अधिनायकवाद’ (Totalitarianism) जैसी व्यवस्थाएँ भय और बल के प्रयोग से चलती हैं, जहाँ नागरिक केवल आदेशों के पालक होते हैं। गणतंत्र में नागरिक आदेशपालक नहीं, बल्कि आदेश देने वाले होते हैं। साम्यवादी प्रणालियों में भी सत्ता का केंद्रीकरण एक पार्टी के हाथ में होता है, जबकि गणतंत्र में शक्तियों का वितरण (Distribution of Power) अनिवार्य शर्त है। यह विविधता ही गणतंत्र को सबसे मानवीय और न्यायपूर्ण प्रणाली बनाती है।

गणतंत्र की मुख्य विशेषताएँ:

  • एक आदर्श गणतंत्र कुछ बुनियादी स्तंभों पर खड़ा होता है।
  • पहली और सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है:’वंशानुगत शासन का अभाव’। राज्य का प्रमुख चाहे वह राष्ट्रपति हो या प्रधानमंत्री, वह जनता द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से चुना जाता है।
  • दूसरी विशेषता ‘सार्वजनिक पदों की सुलभता’ है। गणतंत्र यह सुनिश्चित करता है कि देश का कोई भी नागरिक, चाहे वह किसी भी पृष्ठभूमि का हो, अपनी योग्यता के बल पर सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुँच सके।
  • तीसरी विशेषता ‘शक्तियों का पृथक्करण’ (Separation of Powers) है। मोंटेस्क्यू द्वारा प्रतिपादित यह सिद्धांत भारतीय गणतंत्र का मूल आधार है। इसमें विधायिका कानून बनाती है, कार्यपालिका उन्हें लागू करती है और न्यायपालिका उनकी व्याख्या करती है। ये तीनों अंग एक-दूसरे पर अंकुश रखते हैं ताकि कोई भी निरंकुश न हो सके।
  • चौथी विशेषता ‘लिखित संविधान’ है। गणतंत्र मौखिक आदेशों से नहीं चलता; इसके पास नियमों की एक ऐसी संहिता होती है जो शासक और शासित दोनों के लिए समान रूप से बाध्यकारी होती है।
  • अंतिम विशेषता है ‘स्वतंत्र न्यायपालिका’, जो नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए राज्य के विरुद्ध भी निर्णय देने का साहस रखती है।

भारतीय गणतंत्र का ऐतिहासिक गौरव: प्राचीन काल से आधुनिकता तक

अक्सर यह भ्रम फैलाया जाता है कि गणतंत्र एक विशुद्ध पश्चिमी अवधारणा है, लेकिन भारत का इतिहास इस दावे का खंडन करता है। ईसा पूर्व छठी शताब्दी में जब यूरोप के अधिकांश हिस्से कबीलाई दौर में थे, भारत के गंगा के मैदानों में ‘वैशाली’ जैसे शक्तिशाली गणराज्य (लिच्छवी गणराज्य) फल-फूल रहे थे। उन प्राचीन गणों में निर्णय सामूहिक विमर्श और सभाओं के माध्यम से लिए जाते थे। ‘शाक्य’ और ‘मल्ल’ जैसे गणराज्यों की व्यवस्था इतनी सुदृढ़ थी कि स्वयं गौतम बुद्ध ने संघ की कार्यप्रणाली को गणों के आधार पर ही ढाला था।

आधुनिक भारतीय गणतंत्र की स्थापना 26 जनवरी 1950 को हुई, लेकिन इसकी वैचारिक नीव स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ही रख दी गई थी। 1929 के लाहौर अधिवेशन में जब ‘पूर्ण स्वराज’ की शपथ ली गई, तो वह वास्तव में एक गणतंत्र की ही मांग थी। भारतीय संविधान सभा ने ढाई साल से अधिक समय तक बहस की ताकि एक ऐसा गणतंत्र बनाया जा सके जो न केवल राजनीतिक हो, बल्कि सामाजिक और आर्थिक भी हो। भारत ने धर्मनिरपेक्षता को अपने गणतंत्र का अभिन्न अंग बनाया, जो इसे विश्व के कई अन्य गणतंत्रों से अलग और अधिक समावेशी बनाता है।

विश्व के अन्य आरंभिक गणतंत्र के उदाहरण:

विश्व इतिहास में गणतंत्र की अवधारणा केवल आधुनिक काल की देन नहीं है, बल्कि प्राचीन काल से ही विभिन्न सभ्यताओं ने वंशानुगत शासन को त्यागकर सामूहिक निर्णय प्रक्रिया को अपनाया था। भारत के बाहर आरंभिक गणतंत्र के प्रमुख उदाहरणों का विवरण निम्नलिखित है:

  1. प्राचीन यूनान (एथेंस): विश्व इतिहास में गणतंत्र और लोकतंत्र के आरंभिक प्रयोगों के लिए एथेंस (Athens) को सबसे प्रमुख माना जाता है। लगभग 508 ईसा पूर्व में क्लिस्थनीज (Cleisthenes) के सुधारों के बाद यहाँ एक ऐसी व्यवस्था विकसित हुई जहाँ नागरिकों की सभा (Ecclesia) कानून बनाने और नीतिगत निर्णय लेने के लिए जिम्मेदार थी। हालांकि, यह पूर्णतः आधुनिक गणतंत्र जैसा नहीं था क्योंकि इसमें केवल स्वतंत्र पुरुषों को नागरिक माना जाता था, लेकिन यह इस मायने में गणतांत्रिक था कि सत्ता किसी एक राजा के बजाय नागरिकों के समूह में निहित थी।
  2. कार्थेज (Carthage): उत्तरी अफ्रीका में स्थित कार्थेज में भी एक उन्नत गणतांत्रिक प्रणाली मौजूद थी। अरस्तू जैसे महान दार्शनिक ने भी कार्थेज के संविधान की प्रशंसा की थी। यहाँ सत्ता ‘सफेेट्स’ (Suffetes) नामक निर्वाचित अधिकारियों और एक ‘सीनेट’ के पास थी। यहाँ के शासन में व्यापारियों और कुलीन वर्ग की महत्वपूर्ण भूमिका थी, जो इसे एक ‘अल्पतंत्रीय गणतंत्र’ (Oligarchic Republic) का स्वरूप प्रदान करता था।
  3. मध्यकालीन इतालवी शहर-राज्य: रोमन साम्राज्य के पतन के बाद, मध्यकाल में वेनिस (Venice), फ्लोरेंस और जेनोआ जैसे इतालवी शहरों ने गणतांत्रिक परंपरा को पुनर्जीवित किया। वेनिस का गणतंत्र (Republic of Venice) विशेष रूप से प्रसिद्ध था, जहाँ ‘डोगे’ (Doge) नामक प्रमुख का चुनाव एक जटिल प्रक्रिया के माध्यम से किया जाता था। इन राज्यों ने आधुनिक काल की गणतांत्रिक व्यवस्थाओं के लिए एक सेतु का कार्य किया।

भारतीय गणतंत्र की सफलताएँ: सात दशकों का गौरवपूर्ण मूल्यांकन

भारतीय गणतंत्र की यात्रा को विश्व इतिहास के सबसे साहसी राजनीतिक प्रयोगों में से एक माना जाता है। 1950 में जब भारत ने स्वयं को गणराज्य घोषित किया, तब पश्चिमी विश्लेषकों का मानना था कि इतनी गरीबी, अशिक्षा और विविधता वाला देश अधिक समय तक एकजुट नहीं रह पाएगा। लेकिन भारतीय गणतंत्र ने उन सभी आशंकाओं को निराधार सिद्ध कर दिया।

(a) विविधता में एकता का सफल क्रियान्वयन:भारतीय गणतंत्र की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इसने ‘एक राष्ट्र’ और ‘अनेक संस्कृतियों’ के बीच एक अद्भुत संतुलन बनाया है। जहाँ दुनिया के कई देश भाषाई या धार्मिक आधार पर टूट गए, वहीं भारत ने अपनी सैकड़ों भाषाओं, दर्जनों धर्मों और हज़ारों जातियों को एक गणतांत्रिक छत्रछाया में सुरक्षित रखा है। यह गणतंत्र की ही शक्ति है कि दक्षिण भारत का व्यक्ति उत्तर भारत के नेता को अपना प्रतिनिधि मान सकता है और एक अल्पसंख्यक समुदाय का व्यक्ति बहुसंख्यक समाज की न्यायप्रणाली पर पूर्ण विश्वास रखता है।

(b) शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण और संस्थागत सुदृढ़ता:गणतंत्र की सफलता का एक बड़ा पैमाना यह है कि यहाँ सत्ता का परिवर्तन कभी भी रक्तपात या सैन्य तख्तापलट के माध्यम से नहीं हुआ। 1950 से लेकर अब तक, दर्जनों बार केंद्र और राज्यों में सरकारें बदलीं, विचारधाराएँ बदलीं, लेकिन गणतंत्र का मूल ढांचा स्थिर रहा। भारतीय चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं ने यह सुनिश्चित किया कि दुनिया के सबसे बड़े गणतंत्र में एक गरीब से गरीब व्यक्ति का वोट भी उतनी ही कीमत रखे जितना एक उद्योगपति का। यह ‘राजनीतिक समानता’ भारतीय गणतंत्र की रीढ़ है।

(c) सामाजिक न्याय और समावेशी विकास:भारतीय गणतंत्र केवल एक राजनीतिक ढांचा नहीं रहा, बल्कि यह सामाजिक परिवर्तन का औजार भी बना। अस्पृश्यता का अंत, जमींदारी प्रथा का उन्मूलन और महिलाओं को समान मताधिकार (जो कई पश्चिमी देशों ने बहुत बाद में दिया) जैसी उपलब्धियाँ गणतंत्र की ही देन हैं। आरक्षण और सकारात्मक भेदभाव की नीतियों के माध्यम से उन समुदायों को मुख्यधारा में लाया गया जिन्हें सदियों से हाशिए पर रखा गया था। पंचायती राज व्यवस्था ने ‘गणतंत्र’ को दिल्ली के गलियारों से निकालकर गाँवों की चौपालों तक पहुँचाया है।

गणतंत्र के नकारात्मक पक्ष और दोष

सफलताओं के भव्य स्तंभों के बीच कुछ ऐसी दरारें भी हैं जो गणतंत्र की आत्मा को चोट पहुँचाती हैं। इन विसंगतियों का विश्लेषण करना अनिवार्य है ताकि सुधार की प्रक्रिया जारी रह सके।

(a) राजनीति का अपराधीकरण और धनबल का प्रभाव:भारतीय गणतंत्र के सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि चुनाव प्रक्रिया अब आम नागरिक की पहुँच से बाहर होती जा रही है। राजनीतिक दलों में बढ़ता धनबल का प्रभाव ‘समान अवसर’ के सिद्धांत को नष्ट कर रहा है। जब दागी छवि वाले व्यक्ति कानून बनाने वाली संस्थाओं में पहुँचते हैं, तो गणतंत्र की शुचिता समाप्त हो जाती है। यह एक गंभीर विरोधाभास है कि एक गणराज्य में जहाँ सत्ता ‘जनता की सेवा’ के लिए होनी चाहिए, वह ‘निजी लाभ’ का जरिया बनती जा रही है।

(b) वंशवाद: गणतंत्र का मूल विचार यह था कि नेतृत्व का आधार ‘योग्यता’ होगा, न कि ‘वंश’। परंतु, भारतीय राजनीति के निचले स्तर से लेकर शीर्ष तक कई राजनीतिक दल एक परिवार की जागीर बनकर रह गए हैं। यद्यपि इन नेताओं को जनता द्वारा चुना जाता है, लेकिन दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र का न होना गणतंत्र के मूल चरित्र के खिलाफ है। यह स्थिति एक प्रकार के ‘छद्म-राजतंत्र’ को जन्म देती है, जहाँ विकल्प सीमित हो जाते हैं।

(c) आर्थिक विषमता और न्याय की सुस्त रफ्तार: राजनीतिक समानता (एक व्यक्ति-एक वोट) तो प्राप्त कर ली गई, लेकिन आर्थिक और सामाजिक समानता अभी भी एक स्वप्न है। जब तक देश का एक बड़ा हिस्सा बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहा है, तब तक उसके लिए ‘गणतंत्र’ केवल एक सैद्धांतिक शब्द है। इसके साथ ही, न्यायपालिका में लंबित करोड़ों मामले इस बात का प्रमाण हैं कि न्याय तक पहुँच आज भी बहुत कठिन और महंगी है। ‘न्याय में देरी, न्याय की हत्या है’—यह उक्ति भारतीय गणतंत्र के संदर्भ में अक्सर सच साबित होती है।

गणतंत्र की सैद्धांतिक और व्यावहारिक आलोचना:

विश्व के कई विचारकों ने गणतंत्र को एक ‘खर्चीली और जटिल’ प्रणाली के रूप में रेखांकित किया है। आलोचकों का मानना है कि गणतंत्र में निर्णय लेने की प्रक्रिया अत्यंत धीमी होती है, क्योंकि इसमें हर स्तर पर विमर्श और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करना पड़ता है। तुलनात्मक रूप से, अधिनायकवादी व्यवस्थाएँ त्वरित निर्णय ले सकती हैं।

एक अन्य आलोचना यह है कि गणतंत्र में ‘योग्यता’ के स्थान पर ‘संख्याबल’ को प्राथमिकता दी जाती है। यदि बहुसंख्यक आबादी किसी गलत निर्णय या कट्टर विचारधारा का समर्थन करती है, तो गणतंत्र उसे रोकने में अक्षम हो सकता है। इसे प्रसिद्ध दार्शनिकों ने ‘बहुसंख्यकवाद की निरंकुशता’ कहा है। इसके अलावा, गणतंत्र में नौकरशाही (Bureaucracy) का इतना प्रभुत्व बढ़ जाता है कि आम आदमी सरकारी फाइलों के जाल में उलझकर रह जाता है, जिससे उस ‘सार्वजनिक सेवा’ का लोप हो जाता है जिसके लिए गणतंत्र की स्थापना हुई थी।

आगे की राह: एक सशक्त और आधुनिक गणतंत्र की ओर

गणतंत्र को केवल बचाने की नहीं, बल्कि उसे 21वीं सदी की चुनौतियों के अनुरूप ढालने की आवश्यकता है।

  • संवैधानिक नैतिकता का प्रसार: गणतंत्र तभी सफल होता है जब उसके नागरिक केवल अपने अधिकारों के लिए नहीं, बल्कि दूसरों के अधिकारों के लिए भी खड़े हों। शिक्षा व्यवस्था में संवैधानिक मूल्यों को रटने के बजाय जीने की पद्धति के रूप में सिखाया जाना चाहिए।
  • चुनावी और संस्थागत सुधार: राजनीति में धनबल को कम करने के लिए कड़े कानून और चुनाव आयोग को और अधिक स्वायत्तता देने की आवश्यकता है। साथ ही, न्यायपालिका में तकनीक का उपयोग कर मामलों का त्वरित निपटारा करना होगा।
  • विकेंद्रीकरण की मजबूती: सत्ता का केंद्र केवल राजधानी नहीं होनी चाहिए। स्थानीय निकायों (नगर निगमों और पंचायतों) को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना होगा ताकि गणतंत्र की जड़ें जमीन पर मजबूत हों।
  • डिजिटल लोकतंत्र: आधुनिक तकनीक और इंटरनेट के दौर में जनता की सीधी भागीदारी सुनिश्चित की जा सकती है। नीति-निर्माण में जनता की राय लेना और पारदर्शिता बढ़ाना गणतंत्र को नया जीवन दे सकता है।

गणतंत्र को समझने हेतु विश्व की प्रतिष्ठित और प्रमाणिक पुस्तकें:

  • ‘द रिपब्लिक’ (The Republic) – प्लेटो: यह राजनीति विज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसमें न्याय और एक आदर्श गणराज्य की दार्शनिक व्याख्या की गई है।
  • ‘द फेडरलिस्ट पेपर्स’ (The Federalist Papers) – जेम्स मैडिसन व अन्य: अमेरिकी गणतंत्र की स्थापना के समय लिखे गए ये लेख आधुनिक गणराज्य की संरचना और शक्तियों के संतुलन को समझने के लिए विश्व के सबसे प्रामाणिक दस्तावेज हैं।
  • ‘द स्पिरिट ऑफ लॉज़’ (The Spirit of Laws) – मोंटेस्क्यू: इस पुस्तक ने दुनिया को ‘शक्तियों के पृथक्करण’ का विचार दिया, जिसके बिना कोई भी गणतंत्र तानाशाही में बदल सकता है।
  • ‘रिपब्लिकलिज्म: ए थ्योरी ऑफ फ्रीडम एंड गवर्नमेंट’ (Republicanism) – फिलिप पेटिट: यह पुस्तक आधुनिक संदर्भ में गणतंत्र और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संबंधों की व्याख्या करती है।
  • ‘ऑन रिवोल्यूशन’ (On Revolution) – हन्ना एरेंड्ट: यह पुस्तक फ्रांसीसी और अमेरिकी क्रांतियों के माध्यम से गणतंत्र की स्थापना के संघर्ष और उसकी आत्मा का विश्लेषण करती है।
  • ‘द डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ (The Discovery of India) – जवाहरलाल नेहरू: भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह पुस्तक प्राचीन भारतीय गणराज्यों से लेकर आधुनिक भारत के गणतांत्रिक स्वप्न तक की यात्रा को विस्तार देती है।

गणतंत्र से जुड़े प्रसिद्ध व्यक्तित्वों के उत्कृष्ट विचार:

  • जेम्स मैडिसन: “एक गणतंत्र में, जनता की राय का परिमार्जन और विस्तार एक ऐसी संस्था के माध्यम से होना चाहिए, जो समाज के वास्तविक हितों को समझती हो।”
  • मोंटेस्क्यू: “गणतंत्र की प्रकृति यह है कि सत्ता का स्रोत पूरी जनता या उसका एक हिस्सा होना चाहिए; इसकी आत्मा सद्गुण (Virtue) है।”
  • जॉन एडम्स: “स्वतंत्रता के बिना गणतंत्र संभव नहीं है, और सद्गुण के बिना स्वतंत्रता संभव नहीं है।”
  • बेंजामिन फ्रैंकलिन: “हमने आपको एक गणतंत्र दिया है, यदि आप इसे सुरक्षित रख सकें (A republic, if you can keep it)।”
  • थॉमस जैफरसन: “एक शिक्षित और जागरूक नागरिकता ही गणतंत्र की रक्षा की एकमात्र सच्ची ढाल है।”
  • डॉ. बी.आर. अंबेडकर: “संवैधानिक स्वतंत्रता का अर्थ तब तक कुछ नहीं है, जब तक कि वह समाज में सामाजिक और आर्थिक गणतंत्र की स्थापना न करे।”
  • अब्राहम लिंकन: “एक गणराज्य की शक्ति उसके कानूनों के सम्मान में निहित है, न कि उसकी सेनाओं की ताकत में।”

निष्कर्ष

26 जनवरी का दिन हमें केवल अतीत की याद नहीं दिलाता, बल्कि भविष्य के प्रति हमारे उत्तरदायित्वों को भी रेखांकित करता है। गणतंत्र कोई जड़ या मृत व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह एक जीवित और निरंतर विकसित होने वाली प्रक्रिया है। इसकी सफलता केवल सरकार की नीतियों पर नहीं, बल्कि ‘हम भारत के लोग’ के आचरण पर निर्भर करती है।

एक गणराज्य के रूप में भारत ने लंबी दूरी तय की है, लेकिन ‘अंतिम व्यक्ति’ की पूर्ण मुक्ति का लक्ष्य अभी भी शेष है। जब तक जाति, धर्म और लिंग के आधार पर भेदभाव मौजूद है, हमारा गणतंत्र अधूरा है। हमें एक ऐसा भारत बनाना है जहाँ कानून का शासन सर्वोच्च हो, जहाँ असहमति का सम्मान हो और जहाँ हर नागरिक राष्ट्र के निर्माण में बराबर का भागीदार महसूस करे। यही गणतंत्र की वास्तविक सिद्धि होगी।

परीक्षापयोगी वन लाइनर :

  1. गणतंत्र का मूल अर्थ ‘गण का शासन’ है, जिसमें सर्वोच्च सत्ता किसी व्यक्ति में नहीं बल्कि जनता में निहित होती है।
  2. ‘रिपब्लिक’ शब्द लैटिन के ‘रेस पब्लिका’ से निकला है, जिसका अर्थ है—राज्य एक सार्वजनिक ट्रस्ट है, निजी संपत्ति नहीं।
  3. सच्चे गणतंत्र की आत्मा चुनाव प्रक्रिया में नहीं, बल्कि संवैधानिक नैतिकता और कानून की सर्वोच्चता में निहित होती है।
  4. गणतंत्र में निर्वाचित सरकार भी नागरिकों के प्राकृतिक और संवैधानिक अधिकारों को मनमाने ढंग से समाप्त नहीं कर सकती।
  5. राजतंत्र जहाँ दैवीय अधिकार और वंशानुगत शासन पर आधारित है, वहीं गणतंत्र योग्यता और जनसमर्थन पर आधारित होता है।
  6. गणतंत्र की अनिवार्य शर्त शक्तियों का पृथक्करण है, जिससे विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका एक-दूसरे पर अंकुश रखती हैं।
  7. भारत में गणतांत्रिक परंपरा पश्चिमी प्रभाव से नहीं, बल्कि वैशाली जैसे प्राचीन गणराज्यों से विकसित हुई।
  8. स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ‘पूर्ण स्वराज’ की मांग वस्तुतः गणतंत्र की ही मांग थी।
  9. भारतीय संविधान ने राजनीतिक गणतंत्र के साथ सामाजिक और आर्थिक न्याय को भी लक्ष्य बनाया।
  10. धर्मनिरपेक्षता भारतीय गणतंत्र को अधिक समावेशी और बहुलतावादी बनाती है।
  11. लिखित संविधान गणतंत्र को मौखिक आदेशों के बजाय नियमों और संस्थाओं द्वारा संचालित करता है।
  12. स्वतंत्र न्यायपालिका गणतंत्र की रीढ़ है, क्योंकि वही राज्य के विरुद्ध भी नागरिक अधिकारों की रक्षा करती है।
  13. भारत में गणतांत्रिक परंपरा पश्चिम से पहले वैशाली जैसे प्राचीन गणराज्यों में विद्यमान थी।
  14. गौतम बुद्ध ने संघ की कार्यप्रणाली को शाक्य और लिच्छवी गणों की व्यवस्था से प्रेरित होकर विकसित किया।
  15. 26 जनवरी 1950 को स्थापित भारतीय गणतंत्र की वैचारिक नींव स्वतंत्रता आंदोलन और ‘पूर्ण स्वराज’ की मांग में निहित थी।
  16. भारतीय गणतंत्र की सबसे बड़ी सफलता विविधता में एकता और शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण है।
  17. एक व्यक्ति-एक वोट का सिद्धांत भारतीय गणतंत्र में राजनीतिक समानता की आधारशिला है।
  18. राजनीति का अपराधीकरण, धनबल और वंशवाद भारतीय गणतंत्र के समक्ष सबसे गंभीर चुनौतियाँ हैं।

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