21वीं सदी के तीसरे दशक में आर्कटिक क्षेत्र वैश्विक कूटनीति की बिसात बन चुका है। ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और डेनमार्क के बीच उपजा वर्तमान विवाद तब सुर्खियों में आया जब पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से ग्रीनलैंड को खरीदने की इच्छा जताई। यद्यपि डेनमार्क ने इसे ‘बेतुका’ कहकर खारिज कर दिया, लेकिन यह विवाद केवल एक बयान तक सीमित नहीं है। अमेरिका अब ग्रीनलैंड में अपना वाणिज्य दूतावास फिर से खोल चुका है और वहां भारी निवेश की योजना बना रहा है। विवाद की जड़ यह है कि अमेरिका इसे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अपरिहार्य मानता है, जबकि डेनमार्क इसे अपनी संप्रभुता और अस्मिता का प्रश्न मानता है। यह तनाव केवल दो देशों के बीच नहीं है, बल्कि यह स्वायत्तता की मांग कर रहे ग्रीनलैंड के स्थानीय लोगों और वहां बढ़ते चीनी निवेश के बीच एक त्रिकोणीय संघर्ष का रूप ले चुका है।
ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति और प्राकृतिक संरचना:
भौगोलिक रूप से ग्रीनलैंड उत्तरी अटलांटिक और आर्कटिक महासागर के बीच स्थित दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है। भौतिक भूगोल की दृष्टि से यह उत्तर अमेरिकी महाद्वीप का हिस्सा है, लेकिन राजनीतिक रूप से यह यूरोप (डेनमार्क) से जुड़ा हुआ है। इसका लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा एक विशाल बर्फ की चादर से ढका हुआ है, जो कहीं-कहीं तीन किलोमीटर तक मोटी है। ग्रीनलैंड की तटरेखा उबड़-खाबड़ और गहरी खाड़ियों (Fjords) से भरी हुई है। जलवायु परिवर्तन के कारण यहाँ की बर्फ तेजी से पिघल रही है, जिससे न केवल समुद्र का जलस्तर बढ़ने का खतरा है, बल्कि सदियों से दबे हुए खनिज संसाधनों तक पहुँचने का मार्ग भी प्रशस्त हो रहा है। इसकी अवस्थिति इसे उत्तरी ध्रुव के अत्यंत निकट और रूस तथा अमेरिका के बीच एक ‘बफर जोन’ के रूप में स्थापित करती है।

ग्रीनलैंड का सामरिक और रणनीतिक महत्व:
ग्रीनलैंड का सामरिक महत्व इसके ‘लोकेशन’ में निहित है। सैन्य दृष्टि से यह ‘थ्यूल एयर बेस’ (Pituffik Space Base) का घर है, जो अमेरिका का सबसे उत्तरी सैन्य अड्डा है। यहाँ स्थित रडार प्रणालियाँ अमेरिका को रूस की ओर से आने वाली किसी भी इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) की पूर्व चेतावनी देने में सक्षम हैं। शीत युद्ध के दौरान यह ‘जीआईयूके गैप’ (Greenland-Iceland-UK gap) का हिस्सा था, जो सोवियत पनडुब्बियों को अटलांटिक में प्रवेश करने से रोकने के लिए महत्वपूर्ण था। आज, जब रूस आर्कटिक में अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ा रहा है और चीन खुद को ‘नियर-आर्कटिक स्टेट’ घोषित कर रहा है, ग्रीनलैंड की अहमियत कई गुना बढ़ गई है। जो शक्ति ग्रीनलैंड को नियंत्रित करेगी, वह उत्तरी अटलांटिक के व्यापारिक मार्गों और आर्कटिक के संसाधनों पर प्रभुत्व रखेगी।
ग्रीनलैंड का इतिहास और डेनमार्क के अधिकार की पृष्ठभूमि:
ग्रीनलैंड का इतिहास प्राचीन इनुइट जनजातियों से शुरू होता है, जो यहाँ हजारों वर्षों से निवास कर रहे हैं। यूरोपीय संपर्क की शुरुआत 10वीं शताब्दी में नॉर्स (Norse) खोजकर्ताओं द्वारा हुई। 18वीं शताब्दी के आरंभ में डेनमार्क-नॉर्वे गठबंधन ने यहाँ फिर से बस्तियां बसाईं और ईसाई धर्म का प्रचार किया। 1814 में कील की संधि (Treaty of Kiel) के बाद, जब नॉर्वे और डेनमार्क अलग हुए, ग्रीनलैंड पर डेनमार्क का पूर्ण नियंत्रण स्थापित हो गया। 1953 तक यह डेनमार्क का एक उपनिवेश था, लेकिन बाद में इसे डेनमार्क के साम्राज्य का एक अभिन्न अंग बना दिया गया। 1979 में इसे ‘होम रूल’ दिया गया और 2009 में ‘सेल्फ-रूल एक्ट’ के माध्यम से इसे व्यापक स्वायत्तता प्रदान की गई, हालांकि रक्षा और विदेश नीति अभी भी कोपेनहेगन (डेनमार्क) के नियंत्रण में है।l
अमेरिका द्वारा ग्रीनलैंड अधिग्रहण के ऐतिहासिक प्रयास:
यह पहली बार नहीं है जब अमेरिका ने ग्रीनलैंड को खरीदने या लेने का प्रयास किया है। 1867 में, जब अमेरिका ने रूस से अलास्का खरीदा था, तभी विदेश मंत्री विलियम सीवार्ड ने ग्रीनलैंड और आइसलैंड को खरीदने का प्रस्ताव दिया था। उनका मानना था कि इन द्वीपों पर नियंत्रण से अमेरिका उत्तरी अटलांटिक का स्वामी बन जाएगा। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, जब डेनमार्क पर नाजी जर्मनी का कब्जा हो गया, अमेरिका ने ग्रीनलैंड की सुरक्षा की जिम्मेदारी ली और वहां सैन्य ठिकाने बनाए। युद्ध समाप्त होने के बाद, 1946 में राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने डेनमार्क को ग्रीनलैंड के बदले 100 मिलियन डॉलर (स्वर्ण में) का प्रस्ताव दिया था, जिसे डेनमार्क ने ठुकरा दिया। 1951 के रक्षा समझौते ने अमेरिका को वहां सैन्य अड्डों के उपयोग का स्थायी अधिकार दे दिया, जिससे अधिग्रहण की तात्कालिक आवश्यकता कम हो गई थी।
अमेरिका आखिर ग्रीनलैंड को क्यों लेना चाहता है?
अमेरिका की ग्रीनलैंड में रुचि के पीछे तीन मुख्य कारण हैं: संसाधन, रूस और चीन। ग्रीनलैंड में ‘रेयर अर्थ एलिमेंट्स’ (Rare Earth Elements) का विशाल भंडार है, जो स्मार्टफोन से लेकर मिसाइल गाइडेंस सिस्टम तक के लिए अनिवार्य हैं। वर्तमान में इन पर चीन का एकाधिकार है, जिसे अमेरिका तोड़ना चाहता है। दूसरा कारण रूस की बढ़ती आक्रामकता है; रूस आर्कटिक में पुराने सैन्य अड्डों को पुनर्जीवित कर रहा है, जिसे काउंटर करने के लिए अमेरिका को ग्रीनलैंड पर पूर्ण प्रभुत्व चाहिए। तीसरा कारण चीन का ‘पोलर सिल्क रोड’ विजन है। चीन ग्रीनलैंड में हवाई अड्डों और खनन परियोजनाओं में निवेश करने की कोशिश कर रहा है। अमेरिका किसी भी कीमत पर अपने पिछवाड़े (Backyard) में चीनी उपस्थिति बर्दाश्त नहीं कर सकता। अमेरिका के लिए ग्रीनलैंड का अर्थ ‘आर्कटिक का पनामा नहर’ होना है।

नाटो (NATO) पर पड़ने वाले प्रभाव का विश्लेषण:
यदि अमेरिका किसी तरह ग्रीनलैंड पर नियंत्रण प्राप्त कर लेता है या डेनमार्क के साथ उसके संबंध और बिगड़ते हैं, तो उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (NATO) के ढांचे में भारी उथल-पुथल मच सकती है। डेनमार्क नाटो का एक संस्थापक और निष्ठावान सदस्य है। अमेरिका द्वारा एक मित्र राष्ट्र की संप्रभुता को चुनौती देना संगठन के भीतर ‘सामूहिक विश्वास’ को कमजोर करेगा। हालांकि, सामरिक रूप से ग्रीनलैंड का अमेरिकी नियंत्रण में होना नाटो की उत्तरी सीमा को अभेद्य बना सकता है। लेकिन यह यूरोपीय देशों के बीच इस डर को जन्म देगा कि अमेरिका अपनी सुरक्षा के लिए यूरोपीय सहयोगियों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण कर सकता है। इससे नाटो के भीतर ‘अमेरिकी प्रभुत्व’ बनाम ‘यूरोपीय स्वायत्तता’ की बहस तेज हो जाएगी, जिससे गठबंधन में दरार आ सकती है।
अमेरिका-यूरोप संबंधों पर दीर्घकालिक प्रभाव:
ग्रीनलैंड विवाद अमेरिका और यूरोपीय संघ (EU) के बीच बढ़ते अविश्वास का प्रतीक है। यूरोपीय देश इसे अमेरिका के ‘नव-साम्राज्यवाद’ के रूप में देखते हैं। यदि अमेरिका ग्रीनलैंड को लेकर दबाव बढ़ाता है, तो डेनमार्क के समर्थन में पूरा यूरोपीय संघ खड़ा हो सकता है। यह विवाद व्यापार, जलवायु परिवर्तन और रक्षा सहयोग जैसे अन्य क्षेत्रों में भी कड़वाहट पैदा करेगा। यूरोप पहले से ही अपनी रक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भरता कम करने की बात कर रहा है (Strategic Autonomy), और ग्रीनलैंड जैसा मुद्दा इस प्रक्रिया को तेज कर देगा। अमेरिका के लिए ग्रीनलैंड को हासिल करना एक सामरिक जीत हो सकती है, लेकिन इसकी कीमत उसे अपने सबसे पुराने और भरोसेमंद सहयोगियों के विश्वास को खोकर चुकानी पड़ सकती है।
निष्कर्ष: भविष्य की राह और चुनौतियाँ
ग्रीनलैंड अब केवल बर्फ का एक निर्जन द्वीप नहीं, बल्कि 21वीं सदी की भू-राजनीतिक शक्ति का मापदंड है। डेनमार्क के लिए यह उसकी ऐतिहासिक विरासत है, अमेरिका के लिए यह एक सुरक्षा कवच है, और ग्रीनलैंड के लोगों के लिए यह पूर्ण स्वतंत्रता का एक सपना है। आने वाले वर्षों में, जैसे-जैसे आर्कटिक की बर्फ पिघलेगी, संसाधनों की होड़ और तीव्र होगी। अमेरिका संभवतः इसे सीधे खरीदने के बजाय ‘आर्थिक कूटनीति’ के माध्यम से डेनमार्क के प्रभाव को कम करने की कोशिश करेगा। भारत जैसे देशों के लिए भी यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि आर्कटिक की बदलती स्थिति वैश्विक मानसून और व्यापारिक मार्गों को प्रभावित करेगी। अंततः, ग्रीनलैंड का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि महाशक्तियां अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सम्मान करती हैं या ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ की नीति पर चलती हैं।
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