चीन और ताइवान के बीच टकराव आज विश्व के सबसे संवेदनशील और जटिल राजनीतिक-सैन्य विवाद के रूप में सामने आ रहा है। 2025 में इस विवाद ने पूर्वी एशिया और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के नक्शे को गहरे रूप से प्रभावित किया है। चीन ताइवान को अपना अभिन्न हिस्सा मानता है जबकि ताइवान स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक पहचान कायम रखना चाहता है। पूर्वी एशिया में बढ़ती सैन्य गतिविधियों, अमेरिका के समर्थन और ताइवान की सुरक्षा तैयारियों ने तनाव और तीव्रता बढ़ाई है। हालिया कूटनीतिक घटनाओं में जापान का ताइवान के प्रति समर्थन और चीन की कड़ी प्रतिक्रिया भी इस विवाद को और व्यापक रूप दे रही है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
चीन और ताइवान का विवाद 1949 में शुरू हुआ जब चीनी गृहयुद्ध के बाद चीनी राष्ट्रवादी सरकार ताइवान चली गई। चीन ने तब से ताइवान को अपने क्षेत्र का हिस्सा माना है और उसे मुख्य भूमि के साथ फिर से एकीकृत करना चाहता है। चीन की “एक चीन” नीति यह सुनिश्चित करती है कि किसी भी विदेशी शक्ति द्वारा ताइवान के स्वतंत्रता की स्वीकार्यता या उसकी ओर सैन्य हस्तक्षेप को वह अपने आंतरिक मामलों में दखल मानता है। वहीं ताइवान ने स्वतंत्र लोकतंत्र के रूप में अपनी पहचान मजबूत की है और अमेरिका के समर्थन से चीन की दादागिरी के खिलाफ खड़ा हुआ है। ताइवान के सेमीकंडक्टर उद्योग की वैश्विक महत्ता ने इस विवाद को आर्थिक कोण भी दिया है, जिससे यह समस्या और जटिल हो गई है।

अमेरिका, ताइवान और चीन का त्रिकोण
अमेरिका ताइवान को सैन्य और कूटनीतिक समर्थन प्रदान करता है जिसके कारण चीन की आक्रामकता और बढ़ गई है। अमेरिकी सैन्य सामग्री और संयुक्त अभ्यास ताइवान की रक्षा क्षमता को मजबूत करते हैं, जिससे क्षेत्रीय तनाव बढ़ता है। अमेरिका की Indo-Pacific रणनीति में ताइवान को चीन के प्रभाव को रोकने के लिए एक प्रमुख रणनीतिक बिंदु माना जाता है। अमेरिकी “स्ट्रैटेजिक अस्पष्टता” नीति चीन को इसका अनुचित हस्तक्षेप न मानने और ताइवान को अप्रत्यक्ष समर्थन देने के बीच संतुलन बनाने की कोशिश है, लेकिन यह तनाव को नियंत्रित करने में पारदर्शिता की कमी लाती है।
चीन-जापान तनाव और ताइवान मुद्दा
2025 में ताइवान को लेकर चीन और जापान के बीच कूटनीतिक तनाव काफी बढ़ गया है। जापान के प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने कहा कि ताइवान पर चीन की सैन्य कार्रवाई जापान के अस्तित्व के लिए खतरा होगी और ऐसी स्थिति में जापान को सैनिक भेजने पर विचार करना पड़ेगा। इस बयान पर चीन ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप माना और जापान के राजनयिकों को तलब किया। चीन ने जापानी नागरिकों को जापान की यात्रा न करने की सलाह दी और कहा कि किसी भी दखल के मामले में जापान को भारी कीमत चुकानी होगी। यह विवाद क्षेत्रीय अस्थिरता को बढ़ा रहा है और पूर्वी एशिया में नई राजनीतिक चुनौतियां खड़ी कर रहा है।
वैश्विक और क्षेत्रीय प्रभाव
चीन-ताइवान टकराव का प्रभाव केवल इन दो देशों तक सीमित नहीं है। इसका प्रभाव पूरे पूर्वी एशिया क्षेत्र, दक्षिण चीन सागर, और दक्षिण पूर्व एशिया देशों पर गहरा पड़ा है। चीन की बढ़ती सैन्य शक्ति और क्षेत्रीय विस्तारवादी नीतियां इनके समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा के लिए खतरा बनती हैं। दक्षिण चीन सागर में चीन का दबदबा क्षेत्रीय देशों के लिए चिंता का विषय है। दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के लिए यह टकराव आर्थिक और सुरक्षा दृष्यों से चुनौती प्रस्तुत करता है। इसके अलावा यह विवाद हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सामरिक स्थिरता पर भी गंभीर प्रभाव डालता है।
भारत का रुख और संभावित प्रभाव
भारत इस विवाद पर सतर्कता से काम लेता है और एक संतुलित रुख अपनाता है। भारत “एक चीन” नीति का सम्मान करता है परंतु क्षेत्रीय स्थिरता और समुद्री सुरक्षा के लिए निरंतर प्रयासरत है। भारत के लिए यह टकराव भू-राजनीतिक और आर्थिक दायरे में चुनौती है क्योंकि भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाता है। भारत क्वाड जैसी क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था के माध्यम से चीन के तेजी से बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करता है और आर्थिक रूप से भी सुरक्षित समुद्री मार्गों की महत्ता को समझता है। चीन-ताइवान संकट के चलते भारत को अपनी रणनीति और कूटनीति को पुनर्परिभाषित करना पड़ सकता है।
भविष्य की राह
चीन-ताइवान संघर्ष का स्थायी समाधान फिलहाल दूर नजर आता है। सैन्य टकराव की संभावनाएं बनी हुई हैं, पर कूटनीतिक संवाद और अंतरराष्ट्रीय दबाव इस विवाद को नियंत्रण में रखने की कोशिश कर रहे हैं। कोई भी सैन्य संघर्ष वैश्विक अर्थव्यवस्था, विशेषकर सेमीकंडक्टर आपूर्ति और समुद्री व्यापार पर गंभीर असर डालेगा। क्षेत्रीय देशों और वैश्विक शक्तियों के बीच संतुलन कायम करना जरूरत है ताकि विवाद का शांतिपूर्ण समाधान निकले। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को निष्पक्ष मध्यस्थता करनी होगी और चीन तथा ताइवान दोनों को संयम के साथ वार्ता करनी होगी। भारत सहित क्षेत्रीय देशों को सामरिक तैयारियों के साथ-साथ कूटनीतिक संवाद का भी सहारा लेना होगा।
निष्कर्ष
आर्थिक, सैन्य और राजनीतिक हितों के कारण चीन-ताइवान टकराव अब एक क्षेत्रीय समस्या से बढ़कर वैश्विक रणनीतिक संकट बन चुका है। इस संघर्ष के परिणामस्वरूप पूर्वी एशिया और हिंद-प्रशांत क्षेत्र की जीडीपी, सुरक्षा तंत्र, और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति प्रभावित होगी। चीन की आक्रामकता, अमेरिका का समर्थन, और जापान का सामरिक रुख इस विवाद को और जटिल रखते हैं। इसलिए स्थिरता के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग, कूटनीतिक सहयोग और क्षेत्रीय समझौते आवश्यक हैं। भारत को भी इस विवाद की राजनीतिक व सैन्य जटिलताओं को समझते हुए अपनी नीति सतर्कता और विवेक के साथ बनानी होगी।
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