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जवाबदेही की संस्था के रूप में भारतीय संसद

भारत में संसद की भूमिका

भारतीय लोकतंत्र विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक प्रयोगों में से एक है। स्वतंत्रता के बाद भारत ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को अपनाया और 1952 में पहली संसद का गठन हुआ। यह निर्णय उस समय के लिए ऐतिहासिक था जब करोड़ों अशिक्षित और निर्धन नागरिकों को समान मतदान अधिकार मिले। भारतीय संविधान ने नागरिकों को अधिकार और अवसर देने का वादा किया था, परंतु दशकों बाद भी शासन-प्रदर्शन और मानव विकास के कई संकेतक औसत दर्जे के बने हुए हैं।

भारतीय संसद को लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व की सर्वोच्च संस्था माना जाता है। परंतु यह प्रश्न उठता है कि क्या संसद ने अपनी भूमिका प्रभावी ढंग से निभाई है? इस अध्ययन में संसद की संस्थागत कार्यक्षमता और उसकी जवाबदेही के तंत्रों का विश्लेषण किया गया है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

  • भारतीय संसद की जड़ें ब्रिटिश काल के Indian Councils Act (1861) में मिलती हैं। धीरे-धीरे सीमित प्रतिनिधिक निकाय बने और Government of India Act, 1935 ने पहली बार निर्वाचित भारतीय प्रतिनिधियों को महत्व दिया। 1950-51 के Representation of the People Acts के तहत 1952 में स्वतंत्र भारत की पहली संसद बनी।
  • शुरुआत में संसद अंग्रेजी शिक्षित अभिजात वर्ग तक सीमित थी, पर अब यह विविध सामाजिक पृष्ठभूमियों का प्रतिनिधित्व करती है। अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए आरक्षण और महिलाओं की सीमित लेकिन बढ़ती भागीदारी ने इसे अधिक समावेशी बनाया है।
  • फिर भी संसद की प्रभावशीलता पर प्रश्न बने रहे। 1975 की आपातकाल घोषणा ने कार्यपालिका के निरंकुश प्रयोग को उजागर किया, जब संसद कार्यपालिका की कठपुतली बन गई।
  • इसके बाद से संसदीय मानकों में गिरावट, दलों की विखंडन प्रवृत्ति और बढ़ती दलीय राजनीति ने संसद की साख पर असर डाला।

भारतीय संसद की संरचना

संसद द्विसदनीय है- लोकसभा और राज्यसभा।

  • लोकसभा (निचला सदन) में 543 निर्वाचित सदस्य होते हैं। यह वास्तविक विधायी शक्ति का केंद्र है।
  • राज्यसभा (उच्च सदन) में 250 सदस्य हैं, जिनमें से 12 राष्ट्रपति द्वारा नामांकित होते हैं।

लोकसभा प्रत्यक्ष मतदान से चुनी जाती है, जबकि राज्यसभा राज्यों की विधानसभाओं द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से। दोनों सदनों की संयुक्त बैठकों में लोकसभा का प्रभाव अधिक होता है।

राज्यसभा को ‘संघीय हितों के रक्षक’ के रूप में स्थापित किया गया था, परंतु व्यवहार में उसकी भूमिका सीमित है। राज्यसभा न तो Money Bill पेश कर सकती है और न ही उसे रोक सकती है।

संसद और बदलती मतदाता प्राथमिकताएँ

संसद का स्वरूप भारतीय मतदाताओं के बदलते सामाजिक-राजनीतिक रुझानों को दर्शाता है। 1952 से अब तक संसद की संरचना में कई बार आमूल परिवर्तन हुए हैं।

1950–1980 के दशकों तक कांग्रेस का दबदबा था, परंतु 1989 के बाद गठबंधन युग की शुरुआत हुई। 1990 के दशक में छह प्रधानमंत्रियों और कई अल्पकालिक सरकारों ने अस्थिरता को बढ़ाया।

सांसदों का पुनर्निर्वाचन अनुपात कम है लगभग आधे सांसद हर चुनाव में बदल जाते हैं। इससे अनुभवहीनता बढ़ती है और दीर्घकालिक नीति-निर्माण कमजोर पड़ता है।

संसद सदस्यों की शिक्षास्तर बढ़ा है, लेकिन प्रभावशीलता नहीं। उच्च शिक्षा प्राप्त सांसदों की संख्या 1950 में 20% से बढ़कर 1998 तक 33% हो गई, फिर भी संसदीय कार्यकुशलता घटती दिखी है।

जवाबदेही के तंत्र

भारतीय संसद के पास जवाबदेही सुनिश्चित करने के कई औपचारिक उपकरण हैं, जैसे;

  1. अविश्वास प्रस्ताव,
  2. विपक्ष की भूमिका,
  3. संसदीय समितियाँ, और
  4. निजी विधेयक (Private Member Bills)
  1. अविश्वास प्रस्ताव
  • यह सबसे शक्तिशाली संवैधानिक औजार है। सरकार के खिलाफ प्रस्ताव पारित होने पर मंत्रिपरिषद को इस्तीफा देना पड़ता है। परंतु भारतीय संदर्भ में यह केवल तब कारगर होता है जब गठबंधन सरकार कमजोर हो।
  • 1975 के आपातकाल में जबरन समर्थन लेकर संसद ने नागरिक अधिकारों को निलंबित कर दिया। यह संसद की विफलता का प्रतीक था। 1989 से 1999 के बीच चार बार अविश्वास प्रस्तावों ने सरकारें गिराईं (वी.पी. सिंह, चंद्रशेखर, आई.के. गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी)।
  1. विपक्ष की भूमिका

लोकतंत्र में विपक्ष संसद का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रहरी होता है। परंतु भारत में विपक्ष प्रायः मुद्दों पर रचनात्मक बहस करने की बजाय सरकार की छवि धूमिल करने पर केंद्रित रहता है।

विपक्ष के पास shadow cabinet जैसी कोई प्रणाली नहीं है। अधिकांश दल कमजोर संगठनात्मक संरचना के कारण न तो नए विचार प्रस्तुत करते हैं और न ही मंत्रालयों की नियमित निगरानी करते हैं।

  1. संसदीय समितियाँ

1993 में गठित Departmentally Related Standing Committees (DRSCs) को मंत्रालयों की कार्यप्रणाली पर निगरानी रखने का अधिकार दिया गया।

तीन प्रमुख वित्तीय समितियाँ हैं:

  • लोक लेखा समिति (PAC): सरकारी खर्चों का लेखा-जोखा देखती है।
  • अनुमान समिति (Estimates Committee): बजटीय आवंटन की युक्तिसंगतता की समीक्षा करती है।
  • सार्वजनिक उपक्रम समिति (Public Undertakings Committee): सार्वजनिक उपक्रमों की कार्यक्षमता की निगरानी करती है।

हालाँकि इन समितियों की रिपोर्टें अक्सर संसद में चर्चा के लिए नहीं लाई जातीं। इनके सुझाव सरकारें नजरअंदाज कर देती हैं।

कई समितियों ने भ्रष्टाचार मामलों की जांच भी की जैसे बोफोर्स, हर्षद मेहता स्कैम (1992), और UTI घोटाला (2001) लेकिन परिणाम नगण्य रहे।

इसमें समस्याएँ हैं:

  • मंत्रियों की अनुपस्थिति,
  • तकनीकी विशेषज्ञता का अभाव,
  • समितियों का बड़ा आकार और
  • रिपोर्टों की अनदेखी आदि।

विधायी प्रक्रिया और संसद की कमजोरियाँ

भारतीय संसद की कमजोरी ने कार्यपालिका (Executive) को मजबूत किया है।

  • अध्यादेशों का बढ़ता प्रयोग (1952–1999 के बीच कई बार) संसद की उपेक्षा को दर्शाता है।
  • Fiscal Responsibility and Budget Management Act (FRBM) जैसी वित्तीय अनुशासन की पहल के बावजूद, वित्तीय निगरानी कमज़ोर है।

कई नीतिगत निर्णय अंतरराष्ट्रीय संधियों के माध्यम से लिए जाते हैं जैसे WTO और TRIPS के प्रभाव में, जिन पर संसद की कोई वास्तविक नियंत्रण प्रणाली नहीं है।

संसद की प्रतिष्ठा में गिरावट

2002 में संसद के स्वर्ण जयंती समारोह पर टिप्पणी करते हुए कई विश्लेषकों ने पंडित नेहरू की कही “Parliament’s Majesty” की अवधारणा के क्षरण पर दुख जताया।

संसद में:

  • हंगामा और अव्यवस्था आम है।
  • बहस की जगह नारेबाजी और नाटकीयता ने ली है।
  • सत्रों की संख्या और विधेयकों की गुणवत्ता दोनों घटे हैं।

1952 में संसद साल में औसतन 120 दिन चलती थी, जो 2003 तक घटकर 70 दिन रह गई।

सांसद और मतदाताओं का संबंध

अधिकांश सांसदों का ध्यान अपने निर्वाचन क्षेत्रों में व्यक्तिगत योजनाओं पर केंद्रित रहता है। MPLADS (Members of Parliament Local Area Development Scheme) के माध्यम से। इसने संसद के सामूहिक विधायी चरित्र को कमजोर किया है।

अच्छा संसदीय काम करने का कोई राजनीतिक लाभ नहीं मिलता। पार्टियाँ टिकट वितरण और पदोन्नति में विधायी कार्यकुशलता को महत्व नहीं देतीं।

संसद की कमजोरी के प्रभाव

  1. आर्थिक सुधारों पर भूमिका कमजोर: संसद ने 1991 के आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया में सीमित भूमिका निभाई।
  2. वित्तीय जवाबदेही कमजोर: बजट पर चर्चा औपचारिक रह गई है; वास्तविक निर्णय कैबिनेट स्तर पर होते हैं।
  3. अध्यादेश संस्कृति: सरकारें संसद को दरकिनार कर त्वरित अध्यादेश जारी करती हैं।
  4. अंतरराष्ट्रीय संधियाँ: WTO, TRIPS, ASEAN जैसे समझौते संसद की अनुमति के बिना लागू किए जाते हैं।

निष्कर्ष

भारतीय संसद के सामने आज सबसे बड़ा प्रश्न हैक्या वह वास्तव में जवाबदेही की संस्था रह गई है या केवल प्रतीकात्मक निकाय? वास्तव में संसद की कमजोरी केवल बाहरी कारकों से नहीं, बल्कि स्वयं संसद के आत्म-त्याग से भी उत्पन्न हुई है।

  • समितियों की निष्क्रियता,
  • विधायी अनुशासन का अभाव,
  • दलीय राजनीति का प्रभुत्व, और
  • गुणवत्तापूर्ण नेतृत्व की कमी आदि इन सबने संसद को कमजोर बनाया है।

जब विधायिका स्वयं अपने अधिकारों से विमुख हो जाए, तो शासन में जवाबदेही का संकट उत्पन्न होता है। संसद को अपनी साख पारदर्शिता, गंभीर बहस, और संस्थागत सुधार के माध्यम से पुनः अर्जित करनी होगी।

 


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