21वीं सदी की वैश्विक राजनीति में ‘शांति’ और ‘स्थिरता’ जैसे शब्द अक्सर बहुपक्षीय संस्थाओं की फाइलों में दबे रह जाते हैं। लेकिन जनवरी 2026 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ‘बोर्ड ऑफ पीस’ (Board of Peace – BoP) की घोषणा कर दुनिया को एक नए भू-राजनीतिक प्रयोग के मुहाने पर खड़ा कर दिया है। यह पहल न केवल गाजा के पुनर्निर्माण के लिए चर्चा में है, बल्कि इसने संयुक्त राष्ट्र (UN) जैसी पारंपरिक संस्थाओं के अस्तित्व पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
वर्तमान में चर्चा का केंद्र क्यों?
बोर्ड ऑफ पीस के चर्चा में होने का तात्कालिक कारण गाजा संघर्ष का दूसरा चरण है। ट्रंप के 20-सूत्रीय शांति प्लान के तहत गाजा के प्रशासनिक और आर्थिक पुनर्निर्माण के लिए एक ऐसी संस्था की आवश्यकता महसूस की गई जो ‘अक्षम’ हो चुकी पुरानी संस्थाओं से अलग हो। मामला तब और गंभीर हो गया जब इस बोर्ड के प्रस्तावित चार्टर के लीक हुए अंशों में ‘पे-टू-प्ले’ (Pay-to-Play) मॉडल और ‘आजीवन अध्यक्षता’ जैसे प्रावधान सामने आए। इसके साथ ही, भारत, सऊदी अरब और वियतनाम जैसे देशों को मिले निमंत्रणों ने इसे वैश्विक बहस का विषय बना दिया है कि क्या यह बोर्ड वास्तव में शांति के लिए है या अमेरिकी प्रभुत्व को ‘कॉर्पोरेट’ तरीके से चलाने का एक साधन।
अवधारणा, प्रदुर्भाव और प्रस्तावित संरचना
‘बोर्ड ऑफ पीस’ की अवधारणा ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति और बहुपक्षीय संस्थाओं के प्रति उनके स्थायी अविश्वास का परिणाम है। इसका प्रदुर्भाव गाजा युद्ध के बाद उपजी मानवीय और सुरक्षा चुनौतियों के समाधान के रूप में हुआ। ट्रंप का तर्क है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में ‘वीटो’ की राजनीति के कारण महत्वपूर्ण निर्णय वर्षों तक लटके रहते हैं।
इसकी संरचना को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह किसी भी पारंपरिक कूटनीतिक संगठन से भिन्न है। शीर्ष पर ‘बोर्ड ऑफ पीस’ होगा जो रणनीतिक निर्णय लेगा, जिसकी अध्यक्षता स्वयं डोनाल्ड ट्रंप करेंगे। चार्टर के अनुसार, उन्हें “Chair for Life” (आजीवन अध्यक्ष) रहने का अधिकार होगा। इसके नीचे एक ‘एग्जीक्यूटिव बोर्ड’ होगा जिसमें मार्को रुबियो और जैरेड कुशनर जैसे नाम शामिल हैं। सबसे महत्वपूर्ण इसका वित्तीय ढांचा है; इसमें स्थायी सदस्यता के लिए 1 बिलियन डॉलर के योगदान की शर्त रखी गई है। यह वैश्विक कूटनीति में पहली बार है कि किसी शांति बोर्ड की सीट को इस तरह ‘मुद्रीकृत’ किया गया है।
संयुक्त राष्ट्र संघ को चुनौती और अस्तित्व का संकट
यह पहल सीधे तौर पर संयुक्त राष्ट्र (UN) के समानांतर एक वैश्विक शासन व्यवस्था खड़ी करती है। आलोचकों का मानना है कि ‘बोर्ड ऑफ पीस’ संयुक्त राष्ट्र चार्टर के बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन करता है। जहाँ UN में हर देश की अपनी आवाज है, वहीं ट्रंप का बोर्ड केवल उन लोगों का क्लब है जिन्हें अमेरिका ‘आमंत्रित’ करता है।

यदि यह बोर्ड गाजा में अपनी आर्थिक शक्ति के दम पर सफल होता है, तो यह भविष्य में UN सुरक्षा परिषद की प्रासंगिकता को पूरी तरह समाप्त कर सकता है। यह बोर्ड फंड, वैधता और वैश्विक ध्यान को UN से अपनी ओर खींचने का एक सुव्यवस्थित प्रयास है। इससे अंतरराष्ट्रीय कानून की व्याख्या वाशिंगटन के व्यावसायिक और राजनीतिक हितों के अनुसार होने लगेगी, जो ‘नियम-आधारित विश्व व्यवस्था’ के लिए एक बड़ा खतरा हो सकता है।
बोर्ड ऑफ पीस का सकारात्मक पक्ष: क्या यह समाधान है?
विवादास्पद होने के बावजूद, विशेषज्ञों का एक वर्ग इसके कुछ व्यावहारिक सकारात्मक पहलुओं को रेखांकित करता है:
- निर्णय लेने की अभूतपूर्व गति: UN की लंबी नौकरशाही प्रक्रिया के विपरीत, यह बोर्ड एक “बिजनेस मॉडल” पर कार्य करता है। यहाँ परिणाम पर ध्यान अधिक है और राजनीतिक बयानबाजी पर कम।
- निजी निवेश का प्रवेश: बोर्ड में शामिल बड़े अरबपतियों और निजी निवेशकों के माध्यम से युद्धग्रस्त क्षेत्रों में ऐसी पूंजी और तकनीक आ सकती है, जो पारंपरिक सरकारी सहायता (International Aid) के मुकाबले अधिक टिकाऊ और रोजगारोन्मुखी हो सकती है।
- वीटो की बाधा से मुक्ति: चूंकि इसमें रूस और चीन का वीटो अधिकार उस तरह से कार्य नहीं करेगा जैसे UNSC में करता है, इसलिए जटिल वैश्विक मुद्दों पर त्वरित अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप संभव हो सकेगा।
नकारात्मक पक्ष:
- यह पहल वैश्विक कूटनीति के स्थापित लोकतांत्रिक ढांचे को एक ‘कॉर्पोरेट’ और ‘लेनदेन आधारित’ मॉडल में बदलने का प्रयास है। इसका सबसे विवादास्पद पहलू ‘पे-टू-प्ले’ कूटनीति है, जहाँ शांति की मेज पर स्थायी सीट के लिए एक बिलियन डॉलर की भारी-भरकम राशि की मांग की गई है। यह शर्त अंतरराष्ट्रीय संबंधों में ‘समानता’ के बुनियादी सिद्धांत को समाप्त कर देती है और शांति प्रक्रिया को एक ऐसे ‘एक्सक्लूसिव क्लब’ में बदल देती है, जहाँ केवल आर्थिक रूप से संपन्न राष्ट्र ही नीति-निर्माण का हिस्सा बन पाएंगे। इसके परिणामस्वरूप, ‘ग्लोबल साउथ’ के विकासशील और गरीब राष्ट्र, जो अक्सर युद्धों से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं, निर्णय लेने की प्रक्रिया से पूरी तरह बाहर हो जाएंगे, जिससे उनकी संप्रभुता और क्षेत्रीय चिंताओं को हाशिए पर धकेल दिया जाएगा।
- इस बोर्ड की संरचनात्मक बनावट भी अत्यंत अलोकतांत्रिक है, क्योंकि इसमें ‘आजीवन अध्यक्षता’ की अवधारणा पेश की गई है। अंतरराष्ट्रीय शासन के इतिहास में यह एक अभूतपूर्व और खतरनाक कदम है, क्योंकि सामान्यतः वैश्विक संस्थाओं में नेतृत्व का रोटेशन होता है ताकि शक्ति का केंद्रीकरण न हो। ट्रंप के पास वीटो पावर और फैसलों की अंतिम व्याख्या का अधिकार होने का अर्थ है कि बोर्ड की दिशा किसी अंतरराष्ट्रीय कानून या सामूहिक सहमति के बजाय एक व्यक्ति की व्यक्तिगत पसंद और सामरिक हितों पर निर्भर करेगी। चूंकि इस बोर्ड को किसी अंतरराष्ट्रीय संधि या संयुक्त राष्ट्र महासभा की आधिकारिक मान्यता प्राप्त नहीं है, इसलिए इसके फैसलों के गलत होने या उनके कारण मानवीय क्षति होने पर इसे किसी भी वैश्विक मंच या कानूनी निकाय के प्रति जवाबदेह नहीं ठहराया जा सकता।
- इसके अतिरिक्त, इस पहल को ‘नया उपनिवेशवाद’ के एक आधुनिक रूप के रूप में भी देखा जा रहा है। गाजा जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में एक बाहरी और निजी बोर्ड द्वारा प्रशासनिक एवं सुरक्षा नियंत्रण स्थापित करना वहां के लोगों के ‘आत्मनिर्णय के अधिकार’ का सीधा उल्लंघन है। बोर्ड की प्रारंभिक बैठकों और संरचना में स्थानीय प्रतिनिधियों की अनुपस्थिति इसकी वैधता पर गंभीर सवाल उठाती है। यह मॉडल इस डर को पुख्ता करता है कि भविष्य में शांति अभियानों का निजीकरण हो जाएगा, जहाँ सुरक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र की शांति सेना के बजाय बोर्ड द्वारा नियुक्त निजी सुरक्षा बलों का उपयोग किया जाएगा। इससे शांति रक्षा का मानवीय उद्देश्य पूरी तरह से व्यावसायिक हितों के अधीन हो जाएगा, जिससे केवल उन संघर्षों को सुलझाने को प्राथमिकता दी जाएगी जहाँ बोर्ड के प्रीमियम सदस्यों के आर्थिक लाभ छिपे हों, जबकि अन्य मानवीय संकट उपेक्षित रह जाएंगे।
भारत के लिए सामरिक परिदृश्य का विश्लेषण
भारत के लिए यह स्थिति “दोराहे” (Crossroads) पर खड़े होने जैसी है। अमेरिका ने भारत को एक ‘विशेष आमंत्रित सदस्य’ के रूप में देखा है, जो भारत की बढ़ती वैश्विक हैसियत को दर्शाता है।
शामिल होने के पक्ष में तर्क:
- क्षेत्रीय हित: पश्चिम एशिया भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा और प्रवासी भारतीयों के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस बोर्ड में होने से भारत गाजा के पुनर्निर्माण और क्षेत्रीय सुरक्षा निर्णयों में अपनी मजबूत भूमिका सुनिश्चित कर सकता है।
- चीन का मुकाबला: चूंकि चीन इस बोर्ड के प्रति शंकित है, भारत की उपस्थिति उसे रणनीतिक बढ़त दिला सकती है।
चुनौतियां और चिंताएं:
- नैतिक संकट: भारत हमेशा से ‘सुधारित बहुपक्षवाद’ (Reformed Multilateralism) का समर्थक रहा है। ऐसे किसी बोर्ड का हिस्सा बनना, जो संयुक्त राष्ट्र को कमजोर करता हो, भारत की एक निष्पक्ष ‘विश्व गुरु’ वाली छवि को ठेस पहुँचा सकता है।
- सैन्य जटिलताएं: यदि बोर्ड अपनी स्वयं की ‘शांति सेना’ (Peacekeeping Force) बनाने का निर्णय लेता है, तो भारत के लिए अपनी सेना भेजना मुश्किल होगा, क्योंकि भारतीय सेना केवल UN चार्टर के तहत ही विदेशी मिशनों पर जाती है।
निष्कर्ष और आगे की राह
ट्रंप का ‘बोर्ड ऑफ पीस’ वैश्विक कूटनीति के इतिहास में एक साहसिक लेकिन अत्यंत जोखिम भरा प्रयोग है। यह बहुपक्षीय संस्थानों की विफलता का एक कड़वा परिणाम है। यदि इसे केवल एक अस्थायी आर्थिक पुनर्निर्माण एजेंसी के रूप में उपयोग किया जाए, तो यह गाजा जैसे क्षेत्रों के लिए वरदान साबित हो सकता है। परंतु, यदि इसका उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र का स्थान लेना है, तो यह वैश्विक व्यवस्था को अस्थिरता और भेदभाव की ओर ले जाएगा।
आगे की राह यह है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को एक संतुलन बनाना होगा। संयुक्त राष्ट्र को अपनी प्रक्रिया में आमूल-चूल सुधार कर अधिक प्रभावी बनना होगा ताकि ‘बोर्ड ऑफ पीस’ जैसे विकल्पों की मांग ही न उठे। वहीं, इस बोर्ड को अपनी ‘पे-टू-प्ले’ छवि को त्यागकर इसे अधिक समावेशी और जवाबदेह बनाना होगा। अंततः, स्थायी शांति डॉलर की ताकत से नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग और साझा मानवीय मूल्यों से ही प्राप्त की जा सकती है।
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