डॉ. राम मनोहर लोहिया (1910–1967) भारत के सबसे मौलिक और निर्भीक समाजवादी चिंतकों में से एक थे। वे केवल स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं, बल्कि ऐसे विचारक थे जिन्होंने भारतीय समाज की संरचनात्मक असमानताओं जैसे जाति, वर्ग, लिंग और सत्ता के केंद्रीकरण पर गहन किया। उन्होंने पूँजीवाद और साम्यवाद दोनों के विकल्प के रूप में स्वदेशी समाजवाद की संकल्पना प्रस्तुत की, जो भारतीय और एशियाई सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं पर आधारित थी ।
लोहिया के जीवन की प्रमुख घटनाओं की समयरेखा
- डॉ. लोहिया का जन्म 23 मार्च 1910 को अकबरपुर (संयुक्त प्रांत, वर्तमान उत्तर प्रदेश) में हुआ। 1930 के दशक में वे विदेशों में रहते हुए भी राष्ट्रवादी गतिविधियों में सक्रिय रहे और राष्ट्र संघ के सत्रों में ब्रिटिश उपनिवेशवाद की आलोचना की।
- 1934 में उन्होंने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (CSP) की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1936 में वे अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के विदेश मामलों के विभाग के सचिव बने।
- द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार के साथ सहयोग का विरोध करने के कारण 1940–41 में उन्हें जेल जाना पड़ा। भारत छोड़ो आंदोलन (1942–46) में उनकी भूमिका ऐतिहासिक रही। उन्होंने भूमिगत संचार तंत्र और गुप्त रेडियो स्टेशन स्थापित किए, जिसके कारण उन्हें लाहौर किले में कैद किया गया।
- स्वतंत्रता के बाद समाजवादियों ने कांग्रेस से अलग राह चुनी। 1955 में लोहिया ने अपनी स्वतंत्र सोशलिस्ट पार्टी बनाई और सत्ता परिवर्तन हेतु “सात–वर्षीय योजना” की घोषणा की।
- 1967 में नई दिल्ली में उनका निधन हुआ, परंतु उनके विचारों ने गैर-कांग्रेसी राजनीति को नई दिशा दी।
राजनीतिक विचार
- लोहिया किसी एक विचारधारा के अंधानुकरण के पक्षधर नहीं थे। वे पूँजीवाद, साम्यवाद और रूढ़ मार्क्सवाद तीनों के आलोचक थे। अहिंसा को वे कमजोरी नहीं बल्कि नैतिक और राजनीतिक शक्ति मानते थे।
- उन्होंने नागरिक स्वतंत्रताओं के दमन, औपनिवेशिक और उत्तर-औपनिवेशिक सत्ता संरचनाओं तथा युद्धोन्माद का लगातार विरोध किया। उनका चिंतन स्वतंत्रता आंदोलन तक सीमित नहीं था, बल्कि स्वतंत्र भारत की विदेश नीति और लोकतांत्रिक संस्कृति को भी दिशा देता है ।
सप्त क्रांति (Seven Revolutions)
लोहिया की सप्त क्रांति आधुनिक समाजवाद का व्यापक कार्यक्रम है। इसके अंतर्गत वे सात मूलभूत परिवर्तनों की बात करते हैं:-
- हिंसक क्रांतियों के विरुद्ध सविनय अवज्ञा
- आर्थिक समानता की स्थापना
- जाति व्यवस्था का उन्मूलन
- महिलाओं का सशक्तिकरण
- राष्ट्रीय स्वतंत्रता की रक्षा
- नस्लीय भेदभाव का अंत
- विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी
यह दृष्टिकोण मार्क्सवादी वर्ग-केन्द्रित क्रांति से आगे बढ़कर जाति, वर्ग और लिंग तीनों को समान महत्व देता है ।
राममनोहर लोहिया की “सप्त क्रांति” की अवधारणा बहुत विशिष्ट है क्योंकि वह शोषण और असमानता को एक-आयामी (केवल वर्ग) समस्या नहीं मानती। लोहिया ने भारतीय समाज की वास्तविकताओं जाति, लिंग, नस्ल, राष्ट्रवाद और लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं को एक साथ जोड़कर देखा। विद्वानों के अनुसार, लोहिया का समाजवाद मार्क्सवादी वर्ग-केन्द्रित क्रांति से आगे बढ़कर बहु-आयामी और अंतर्संबद्ध (intersectional) दृष्टि अपनाता है, जहाँ आर्थिक समानता तभी टिकाऊ है जब सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक असमानताएँ भी साथ-साथ समाप्त हों।
- लोहिया का मानना था कि भारत में शोषण केवल पूँजीपति बनाम मजदूर का प्रश्न नहीं है। यहाँ जाति व्यवस्था, लैंगिक असमानता, नस्लीय भेद और औपनिवेशिक/नव-औपनिवेशिक दबाव समान रूप से निर्णायक हैं।
- केवल उत्पादन के साधनों के समाजीकरण से जाति-आधारित अपमान, महिलाओं का दमन या अभिव्यक्ति की सेंसरशिप समाप्त नहीं होती।
- हिंसक क्रांति के बजाय सविनय अवज्ञा पर जोर देकर लोहिया लोकतंत्र, नैतिकता और जन-भागीदारी को केंद्रीय बनाते हैं।
सप्त क्रांति के सात आयाम
- हिंसक क्रांतियों के विरुद्ध सविनय अवज्ञा: सत्ता परिवर्तन नैतिक साधनों से; जनता की सक्रिय, अहिंसक भागीदारी।
- आर्थिक समानता की स्थापना: संपत्ति का विकेंद्रीकरण, अवसरों की समानता; पर इसे सामाजिक सुधारों से जोड़ना।
- जाति व्यवस्था का उन्मूलन
– जाति को शोषण की स्वतंत्र धुरी मानना; आरक्षण, सामाजिक सम्मान और अंतर्जातीय समानता। - महिलाओं का सशक्तिकरण: लिंग-आधारित असमानता को स्वतंत्र क्रांतिकारी एजेंडा; परिवार, श्रम और राजनीति में बराबरी।
- राष्ट्रीय स्वतंत्रता की रक्षा: औपनिवेशिक वर्चस्व और नव-साम्राज्यवाद का विरोध; सांस्कृतिक-आर्थिक स्वायत्तता।
- नस्लीय भेदभाव का अंत: वैश्विक स्तर पर समानता; रंग, नस्ल और उपनिवेशवाद-विरोध।
- विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: लोकतंत्र की आत्मा; असहमति और बहुलता की सुरक्षा।
लोहिया की सप्त क्रांति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह वर्ग, जाति और लिंग तीनों को समान महत्व देती है। यह दृष्टि समाजवाद को मानवीय, लोकतांत्रिक और भारतीय संदर्भ-संगत बनाती है, जहाँ मुक्ति एक साथ आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्तरों पर घटित होती है।
समाजवाद का सिद्धांत
लोहिया मार्क्सवाद से प्रेरित थे, लेकिन उन्होंने उसे भारतीय संदर्भ में अपर्याप्त माना। उनका तर्क था कि पूँजीवाद, समाजवाद, स्वतंत्रता और समानता जैसी अवधारणाएँ यूरोपीय ऐतिहासिक अनुभवों की उपज हैं और विकासशील समाजों के लिए सीधे लागू नहीं की जा सकतीं।
इसलिए उन्होंने एक नए, सार्वभौमिक लेकिन गैर-यूरोपीय समाजवाद की वकालत की, जो अंधविश्वास, पूर्वाग्रह और सामाजिक जड़ताओं से मुक्ति दिला सके।
समाजवादी लोकतंत्र
राममनोहर लोहिया का समाजवादी लोकतंत्र इस धारणा पर आधारित था कि समाजवाद और लोकतंत्र एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं। लोहिया ने यूरोपीय समाजवाद की उस प्रवृत्ति की आलोचना की जो लोकतंत्र को “बुर्जुआ छल” मानती थी। उनके अनुसार, यदि समाजवाद जनभागीदारी, नैतिकता और विकेंद्रीकरण से कट जाए, तो वह तानाशाही में बदल सकता है। इसलिए उन्होंने गांधीवादी साधनों को समाजवादी लक्ष्यों से जोड़ते हुए एक लोकतांत्रिक समाजवाद की रूपरेखा प्रस्तुत की।
लोहिया का समाजवाद लोकतंत्र-विरोधी नहीं था। वे “कुदाल, वोट और जेल” के सिद्धांत में विश्वास करते थे, अर्थात शारीरिक श्रम, लोकतांत्रिक भागीदारी और संघर्ष के लिए त्याग।
“कुदाल, वोट और जेल” का सिद्धांत
यह सिद्धांत लोहिया की लोकतांत्रिक सोच का सार है:
- कुदाल (शारीरिक श्रम): लोहिया का मानना था कि जो नेता श्रम से कटे हुए हैं, वे जनता का वास्तविक प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते। श्रम से जुड़ाव समानता और विनम्रता पैदा करता है।
- वोट (लोकतांत्रिक भागीदारी): सत्ता परिवर्तन का मुख्य साधन चुनाव होना चाहिए। समाजवाद जनता की सहमति से आए, न कि बलपूर्वक।
- जेल (संघर्ष और त्याग): अन्यायपूर्ण कानूनों के विरुद्ध सविनय अवज्ञा और त्याग लोकतंत्र को जीवंत रखते हैं।
इस प्रकार लोहिया का समाजवाद संसदीय लोकतंत्र + जनआंदोलन का संतुलन है।
गांधीवादी नैतिकता और समाजवादी अर्थशास्त्र का समन्वय
- गांधी से उन्होंने अहिंसा, सत्य और नैतिक साधनों को अपनाया।
- समाजवाद से उन्होंने आर्थिक समानता, शोषण–विरोध और सामाजिक न्याय लिया।
चार–स्तंभ राज्य (Four-Pillar State): सत्ता का विकेंद्रीकरण
लोहिया ने केंद्रीकृत राज्य को लोकतंत्र के लिए खतरा माना। इसलिए उन्होंने चार–स्तंभ राज्य का प्रस्ताव दिया:
- गाँव – स्थानीय स्वशासन, ग्राम-लोकतंत्र
- जिला (मंडल) – क्षेत्रीय नियोजन और समन्वय
- प्रांत – सांस्कृतिक और आर्थिक विविधता की रक्षा
- केंद्र – सीमित, समन्वयकारी भूमिका
सत्ता नीचे से ऊपर जाए, न कि ऊपर से नीचे। यही लोकतांत्रिक समाजवाद की आत्मा है।
लोहिया के समाजवाद के उद्देश्य
लोहिया के समाजवाद का लक्ष्य केवल आर्थिक समानता नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण और सभ्य जीवन था। इसके प्रमुख उद्देश्य थे;
- अधिकतम समानता के साथ न्याय
- भौतिक और नैतिक आवश्यकताओं में संतुलन
- मानव-केंद्रित औद्योगिक एवं कृषि तकनीक
- राजनीतिक और आर्थिक शक्ति का विकेंद्रीकरण
- नौकरशाही नियंत्रण को सीमित कर सहकारी संस्थाओं को बढ़ावा देना ।
समाजवाद और लोकतंत्र
लोहिया मानते थे कि समाजवाद और लोकतंत्र एक-दूसरे के पूरक हैं। उन्होंने व्यक्ति, पार्टी और राज्य तीनों के सीमित व्यक्तित्व की अवधारणा प्रस्तुत की ताकि सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण न हो।
साम्यवाद और रूढ़ मार्क्सवाद की उनकी अस्वीकृति व्यक्तिगत स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता से जुड़ी थी ।
लेखन और बौद्धिक विरासत
- The Wheel of History (1955)
- Marx, Gandhi and Socialism (1963)
- Fragments of a World Mind
- Economics after Marx
- Towards a New Socialism
निष्कर्ष
डॉ. राम मनोहर लोहिया ने भारतीय यथार्थ से जुड़ा एक स्वतंत्र, मौलिक और नैतिक समाजवाद विकसित किया। जाति-उन्मूलन, लैंगिक न्याय, विकेंद्रीकरण और लोकतांत्रिक स्वतंत्रता उनके चिंतन के केंद्र में थे। आधुनिक भारतीय राजनीतिक विचारधारा में वे एक ऐसे समाजवादी हैं जिनकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है ।
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