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दल-बदल विरोधी कानून एवं स्पीकर की भूमिका

भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची, जिसे दल-बदल विरोधी कानून भी कहा जाता है, को वर्ष 1985 में 52वें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से जोड़ा गया था। इसका उद्देश्य 1967 के बाद के काल में सरकारों को अस्थिर करने वाली राजनीतिक दल-बदल की बढ़ती प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना था। हालांकि, हाल के वर्षों में यह मुद्दा एक बार फिर केंद्र में आ गया है, क्योंकि विधानसभाओं के अध्यक्षों द्वारा किए गए पक्षपातपूर्ण निर्णयों के कारण लोकतांत्रिक मूल्यों और विधिक संरक्षणों का क्षरण हो रहा है।

हाल ही में, तेलंगाना विधान सभा के अध्यक्ष ने 2023 के विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद कथित रूप से दल-बदल करने वाले 10 विधायकों को अयोग्य ठहराने संबंधी याचिका को खारिज कर दिया। उनके इस कदम की राज्य के विपक्षी दलों के सदस्यों द्वारा एकतरफा और पक्षपातपूर्ण बताते हुए आलोचना की गई है।

दसवीं अनुसूची क्या है?

संविधान की दसवीं अनुसूची, जिसे दल-बदल विरोधी कानून भी कहा जाता है, सांसदों (mp) और विधायकों (mla/mlc) के दल-बदल के आधार पर अयोग्यता से संबंधित है। यह कानून 1960 के दशक के उत्तरार्ध में उत्पन्न राजनीतिक अस्थिरता की पृष्ठभूमि में लाया गया था, जब “पार्टी बदलने वाले विधायकों” के कारण कई राज्य सरकारें गिर गई थीं।

दसवीं अनुसूची के अंतर्गत, संसद (mp) या राज्य विधानमंडल (mla/mlc) का कोई सदस्य निम्न स्थितियों में अयोग्य ठहराया जा सकता है:

  1. स्वैच्छिक त्यागपत्र: यदि वह उस राजनीतिक दल की सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ देता है, जिसके टिकट पर वह निर्वाचित हुआ था।
  2. व्हिप की अवहेलना: यदि वह सदन में अपने राजनीतिक दल द्वारा जारी निर्देश (व्हिप) के विरुद्ध मतदान करता है या मतदान से अनुपस्थित रहता है, और इसके लिए पूर्व अनुमति नहीं ली गई हो।
  3. स्वतंत्र सदस्य: यदि कोई स्वतंत्र उम्मीदवार निर्वाचित होने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है।
  4. नामांकित सदस्य: यदि कोई नामांकित सदस्य अपनी सीट ग्रहण करने की तिथि से छह माह के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है।

अपवाद:

  • विलय (merger): यदि किसी विधायी दल के कम-से-कम दो-तिहाई सदस्य किसी अन्य दल में विलय के लिए सहमत हों, तो उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा।
  • पीठासीन अधिकारी: यदि कोई व्यक्ति अध्यक्ष (speaker) या सभापति (chairman) के रूप में चुना जाता है, तो निष्पक्षता बनाए रखने के लिए वह अपने दल की सदस्यता छोड़ सकता है और पद छोड़ने के बाद बिना अयोग्यता का सामना किए पुनः उसी दल में शामिल हो सकता है।

निर्णायक प्राधिकारी:

अयोग्यता से संबंधित निर्णय का अधिकार सदन के पीठासीन अधिकारी के पास होता है—लोकसभा/विधानसभाओं में अध्यक्ष (speaker) तथा राज्यसभा/विधान परिषदों में सभापति (chairman)।

न्यायिक समीक्षा:

प्रारंभ में इस कानून में यह प्रावधान था कि पीठासीन अधिकारी का निर्णय अंतिम होगा और उसे न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकेगी। किंतु किहोटो होलोहन मामला (1992) में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि अध्यक्ष एक न्यायाधिकरण (tribunal) की तरह कार्य करता है, अतः उसके निर्णय की उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।

91वां संविधान संशोधन (2003):

  • “विभाजन” प्रावधान की समाप्ति: पहले किसी राजनीतिक दल के एक-तिहाई सदस्यों द्वारा किया गया “विभाजन” वैध माना जाता था और उस पर दल-बदल कानून लागू नहीं होता था। इस प्रावधान को बड़े पैमाने पर होने वाले दल-बदल को रोकने के लिए समाप्त कर दिया गया।
  • मंत्रिपरिषद की सीमा: मंत्रियों की कुल संख्या (प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्री सहित) को लोकसभा या संबंधित राज्य विधानसभा की कुल सदस्य संख्या के अधिकतम 15% तक सीमित कर दिया गया।
  • पद धारण पर प्रतिबंध: दसवीं अनुसूची के अंतर्गत अयोग्य ठहराया गया कोई भी सदस्य पुनः निर्वाचित होने तक किसी भी प्रकार का लाभ का राजनीतिक पद या मंत्री पद धारण नहीं कर सकता।

एक स्वतंत्र और निष्पक्ष अध्यक्ष (स्पीकर) का महत्व और प्रासंगिकता क्या है?

  1. विधायी गरिमा का संरक्षण:अध्यक्ष से अपेक्षा की जाती है कि वह संस्थागत तटस्थता, विधि के शासन को बढ़ावा दे तथा दसवीं अनुसूची के अंतर्गत एक अर्ध-न्यायिक प्राधिकारी के रूप में कार्य करे। किंतु जब पक्षपात प्रधान हो जाता है, तो यह संवैधानिक नैतिकता को खतरे में डाल देता है। उदाहरणस्वरूप, वर्ष 2020 के अरुणाचल प्रदेश दलबदल मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने दोहराया कि “अध्यक्ष की तटस्थता लोकतांत्रिक स्थिरता के लिए अत्यंत आवश्यक है।”
  2. समयबद्ध निर्णय और संस्थानों में विश्वास:वर्ष 2023 में ‘केइशम मेघचंद्र सिंह बनाम मणिपुर विधानसभा अध्यक्ष’ मामले में संविधान पीठ ने पुनः स्पष्ट किया कि अयोग्यता से संबंधित कार्यवाहियों में देरी लोकतंत्र की भावना का उल्लंघन करती है।
  3. राजनीतिक खरीद-फरोख्त पर अंकुश:निष्पक्ष अध्यक्ष के अभाव में चुनावोत्तर दलबदल सत्तारूढ़ दल के पक्ष में होने लगते हैं, जैसा कि कर्नाटक (2019) और गोवा (2017) में देखा गया।
  4. संवैधानिक अपेक्षा:मई 2023 में पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह रेखांकित किया कि अध्यक्ष से “मर्यादा और निष्पक्षता” की अपेक्षा की जाती है, ताकि दसवीं अनुसूची का उद्देश्य—सरकारों की स्थिरता—सुनिश्चित किया जा सके।
  5. न्यायिक दृष्टिकोण:पूर्व सर्वोच्च न्यायालय न्यायाधीश न्यायमूर्ति गवई का यह अवलोकन कि अध्यक्ष की “अनिर्णयता” दलबदल विरोधी कानून के उद्देश्य को निष्फल नहीं कर सकती, तटस्थता की आवश्यकता को रेखांकित करता है। अनुपालन न होने की स्थिति में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 142 की शक्तियों का प्रयोग भी इसी बात को सुदृढ़ करता है।

सरकारी पहलें और संस्थागत विकास क्या हैं?

  1. अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन (2021–2023):दलबदल विरोधी कानून के अंतर्गत अध्यक्ष की शक्तियों में सुधार पर चर्चा हुई। अनेक अधिकारियों ने यह मत व्यक्त किया कि “अध्यक्ष की भूमिका की समीक्षा आवश्यक है।”
  2. 91वां संविधान संशोधन अधिनियम, 2003:दलों के विलय से संबंधित प्रावधानों को अधिक कठोर बनाया गया, जिसके तहत विलय के लिए सदस्यों की संख्या की शर्त दो-तिहाई कर दी गई।
  3. संवैधानिक संरक्षक के रूप में सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका:अनुच्छेद 142 का प्रयोग यह सुनिश्चित करने के लिए किया गया है कि “तकनीकी आधारों या पक्षपातपूर्ण मौन के कारण न्याय विफल न हो।” इसके तहत सर्वोच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र, कर्नाटक और तेलंगाना के मामलों में अध्यक्षों को “उचित समय-सीमा” के भीतर कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।

स्पीकर की भूमिका की स्वायत्तता और निष्पक्षता के समक्ष चुनौतियाँ क्या हैं?

  1. संरचनात्मक पक्षपात और राजनीतिक अधिग्रहण:स्पीकर का चुनाव सत्तारूढ़ दल द्वारा किया जाता है, इसलिए वे प्रायः राजनीतिक रूप से प्रेरित होकर कार्य करते हैं। उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र दल-बदल मामला (2022) में निर्णय में देरी से उन विधायकों को लाभ हुआ जो दल बदलकर सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल हो गए।
  2. प्रक्रियात्मक शून्यता और विधिक अस्पष्टता:दसवीं अनुसूची में याचिकाओं के निपटारे के लिए कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं है। अपवाद के रूप में “विलय” का प्रावधान है, जिसमें किसी दल के कम-से-कम दो-तिहाई सदस्य सहमत हों—यह प्रावधान 91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा संशोधित किया गया (जो 1985 में एक-तिहाई था)।
  3. सीमित क्षेत्राधिकार और संवैधानिक सीमाएँ:न्यायालय स्पीकर के निर्णय को निर्देशित नहीं कर सकते; वे केवल समयबद्ध निपटारे को सुनिश्चित कर सकते हैं, जिससे न्यायिक उपचार की सीमा सीमित हो जाती है।
  4. कानूनी अस्पष्टताएँ:‘स्वेच्छा से सदस्यता त्याग’ की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है, तथा व्हिप के अधिकार और अंतरात्मा के अनुसार मतदान (conscience vote) के बीच टकराव बना रहता है। उदाहरणतः, अयोग्यता के निर्णयों में औसतन 2.3 वर्ष लगते हैं (एडीआर अध्ययन, 2022), और 68% मामलों में निर्णय विधायक के कार्यकाल समाप्त होने के बाद दिया गया (पीआरएस, 2023)।
  5. शासन को प्रभावित करने हेतु देरी का दुरुपयोग:अंततः अयोग्यता से पहले दल-बदल करने वाले विधायकों को मंत्री बनाया जाता है या वे प्रभाव का लाभ उठाते हैं। उदाहरणतः, 71% मामलों में दल-बदल करने वाले विधायकों को मंत्री पद मिला (सीएमएस अध्ययन, 2021), और केवल 12% दल-बदलियों ने बाद के चुनावों में हार का सामना किया (त्रिवेदी सेंटर, 2023)।
  6. लोकतांत्रिक थकान और चुनावी निंदकता:दंडहीनता के साथ बार-बार होने वाले दल-बदल से चुनावी प्रक्रिया में जनता का विश्वास कमजोर पड़ता है।
  7. संस्थागत अपारदर्शिता और भूमिका की अस्पष्टता:निर्णय में देरी करने वाले स्पीकरों के लिए कोई दंड या अनुशासनात्मक प्रक्रिया निर्धारित नहीं है।

आगे की राह क्या होनी चाहिए?

  1. स्वतंत्र न्यायाधिकरण तंत्र: विधि आयोग और एनसीआरडब्ल्यूसी की सिफारिशों के अनुसार, अयोग्यता से संबंधित याचिकाओं पर निर्णय लेने के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की अध्यक्षता में एक निष्पक्ष न्यायाधिकरण की स्थापना की जाए।
  2. निर्णय के लिए वैधानिक समय-सीमा: दलबदल के मामलों का निर्णय अधिकतम 60 दिनों के भीतर करने का प्रावधान कानून में संशोधन द्वारा किया जाए।
  3. पीठासीन अधिकारियों के लिए आचार संहिता: तटस्थता और जवाबदेही सुनिश्चित करने हेतु बाध्यकारी मानदंडों और आचार संहिता का निर्माण किया जाए।
  4. संवैधानिक उपचार एवं लोकतांत्रिक संरक्षण: यदि निर्णयों में अनुचित विलंब हो, तो समय-सीमा के प्रवर्तन हेतु अनुच्छेद 142 का उपयोग करते हुए न्यायालयों को हस्तक्षेप की अनुमति दी जाए।
  5. लोक-जवाबदेही एवं चुनावी दंड: नागरिक शिक्षा अभियानों की शुरुआत की जाए और दलबदल करने वालों के विरुद्ध चुनावी दंड को प्रोत्साहित किया जाए।
  6. दल के भीतर लोकतंत्र को सुदृढ़ करना: दलों को वैचारिक अखंडता बनाए रखने के लिए सशक्त किया जाए और चुनावोत्तर सौदों पर निर्भरता कम की जाए।

वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाएँ:

  • यूनाइटेड किंगडम और कनाडा में स्पीकर सख्ती से गैर-दलीय होते हैं और उनका चुनाव दलगत सीमाओं से परे गुप्त मतदान द्वारा किया जाता है।
  • दक्षिण अफ्रीका में दलबदल से जुड़े मामलों का निपटारा स्पीकर नहीं, बल्कि एक न्यायिक आयोग करता है।

समितियों की सिफारिशें:

  • दिनेश गोस्वामी समिति (1990) और विधि आयोग की 170वीं रिपोर्ट (1999) ने दसवीं अनुसूची के अंतर्गत निर्णायक अधिकार स्पीकर से हटाने की सिफारिश की।
  • नीति आयोग और संविधान के कार्यकरण की समीक्षा हेतु राष्ट्रीय आयोग (एनसीआरडब्ल्यूसी) ने सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में स्वतंत्र न्यायाधिकरण स्थापित करने का समर्थन किया है।

निष्कर्ष:

सर्वोच्च न्यायालय के शब्दों में, “अब समय आ गया है कि संसद इस अपेक्षा की समीक्षा करे कि विधानसभा के स्पीकर और सभापति अपने उच्च पद की गरिमा के अनुरूप आचरण करेंगे तथा विधायकों के विरुद्ध अयोग्यता की कार्यवाहियों का समय पर और निष्पक्ष रूप से निर्णय लेकर राजनीतिक दलबदल की बुराई को समाप्त करेंगे।”


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