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दिल्ली घोषणापत्र 2026: मध्य पूर्व के प्रति भारत की नई कूटनीतिक दिशा

वैश्विक राजनीति के मानचित्र पर मध्य पूर्व, जिसे पश्चिम एशिया भी कहा जाता है, हमेशा से ही शक्ति संतुलन का केंद्र रहा है। भारत के लिए यह क्षेत्र न केवल ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण है, बल्कि यहाँ रहने वाले लाखों भारतीय प्रवासी और रणनीतिक व्यापार मार्ग इसे भारत की विदेश नीति का एक अनिवार्य स्तंभ बनाते हैं। वर्ष 2026 में जारी ‘दिल्ली घोषणापत्र’ भारत की उस परिपक्व होती कूटनीति का दस्तावेज़ है, जो अब केवल तटस्थ रहने के बजाय सक्रिय भागीदारी और क्षेत्रीय स्थिरता के एक प्रवर्तक के रूप में उभर रही है। यह घोषणापत्र न केवल भारत के आर्थिक हितों को रेखांकित करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि भारत किस प्रकार संघर्ष-प्रधान मध्य पूर्व में एक ‘विश्वसनीय मध्यस्थ’ की भूमिका निभाने के लिए तैयार है।

बदलती वैश्विक व्यवस्था और भारत का उदय

बीते कुछ वर्षों में वैश्विक राजनीति का केंद्र पूर्व की ओर खिसका है, जहाँ भारत एक प्रमुख आर्थिक शक्ति के रूप में उभरा है। दिल्ली घोषणापत्र 2026 इसी शक्ति संतुलन का परिणाम है। ऐतिहासिक रूप से भारत की पश्चिम एशिया नीति अक्सर इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष के इर्द-गिर्द सिमटी रहती थी, लेकिन अब भारत ने ‘डी-हाइफनेशन’ (विभक्त कूटनीति) की नीति को अपनाते हुए प्रत्येक देश के साथ स्वतंत्र संबंध विकसित किए हैं। यह घोषणापत्र स्पष्ट करता है कि भारत अब इस क्षेत्र को केवल तेल और प्रवासियों के स्रोत के रूप में नहीं देखता, बल्कि एक ऐसी रणनीतिक साझेदारी के रूप में देखता है जो रक्षा, अंतरिक्ष, और डिजिटल प्रौद्योगिकी तक फैली हुई है। भारत का यह नया दृष्टिकोण ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ से आगे बढ़कर ‘रणनीतिक सक्रियता’ की ओर एक बड़ा कदम है।

ऊर्जा सुरक्षा से परे: आर्थिक एकीकरण का नया युग

दिल्ली घोषणापत्र का एक महत्वपूर्ण आयाम आर्थिक एकीकरण है। लंबे समय तक भारत की निर्भरता मध्य पूर्व के कच्चे तेल पर रही है, लेकिन 2026 का यह घोषणापत्र ऊर्जा संबंधों को ‘खरीदार-विक्रेता’ के दायरे से निकालकर ‘सह-निवेशक’ के धरातल पर ले आता है। संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब जैसे देशों द्वारा भारत के बुनियादी ढांचे और नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में किया गया निवेश इस बदलाव का प्रत्यक्ष प्रमाण है। भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) इस घोषणापत्र की आत्मा के रूप में उभरता है। यह गलियारा न केवल व्यापारिक समय को कम करेगा, बल्कि चीन की ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) के मुकाबले एक अधिक पारदर्शी और टिकाऊ विकल्प पेश करेगा। भारत का मानना है कि आर्थिक जुड़ाव ही वह सूत्र है जो मध्य पूर्व की जटिल राजनीतिक शत्रुता को कम कर सकता है।

क्षेत्रीय सुरक्षा और आतंकवाद पर कड़ा रुख

मध्य पूर्व में अस्थिरता का सीधा प्रभाव भारत की आंतरिक सुरक्षा और आर्थिक हितों पर पड़ता है। दिल्ली घोषणापत्र 2026 में आतंकवाद और कट्टरपंथ के खिलाफ एक ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति पर जोर दिया गया है। भारत ने स्पष्ट किया है कि वह समुद्री सुरक्षा, विशेष रूप से लाल सागर और अरब सागर के व्यापारिक मार्गों को सुरक्षित रखने के लिए प्रतिबद्ध है। हाल के वर्षों में समुद्री लुटेरों और ड्रोन हमलों ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को बाधित किया है। इस संदर्भ में भारत की नौसेना ने जो सक्रियता दिखाई है, उसे घोषणापत्र में क्षेत्रीय सुरक्षा प्रदाता (Net Security Provider) के रूप में मान्यता दी गई है। भारत अब केवल सुरक्षा की मांग करने वाला देश नहीं है, बल्कि वह मध्य पूर्व के देशों के साथ मिलकर रक्षा उत्पादन और खुफिया जानकारी साझा करने में अग्रणी भूमिका निभा रहा है।

इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष और भारत का संतुलन

दिल्ली घोषणापत्र का सबसे संवेदनशील हिस्सा वह है जो क्षेत्रीय संघर्षों, विशेषकर इजरायल और फिलिस्तीन के मुद्दे को संबोधित करता है। भारत ने अपनी पारंपरिक ‘टू-स्टेट सॉल्यूशन’ की नीति पर कायम रहते हुए भी यह स्पष्ट किया है कि आतंकवाद किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। भारत की कूटनीति की सफलता इस बात में निहित है कि उसके संबंध एक तरफ इजरायल के साथ अत्यधिक प्रगाढ़ हैं, तो दूसरी तरफ वह सऊदी अरब, ईरान और कतर जैसे देशों के साथ भी मजबूत संवाद बनाए हुए है। घोषणापत्र यह संदेश देता है कि भारत एक ऐसा मंच प्रदान कर सकता है जहाँ मतभेदों के बावजूद आर्थिक और मानवीय हितों पर चर्चा संभव है। यह ‘गुटनिरपेक्षता’ का आधुनिक स्वरूप है, जहाँ भारत किसी एक गुट का हिस्सा न बनकर न्याय और शांति के पक्ष में खड़ा होता है।

प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और मानवीय सरोकार

मध्य पूर्व में रहने वाले लगभग 90 लाख भारतीय प्रवासी भारत की सॉफ्ट पावर और अर्थव्यवस्था (रेमिटेंस) की रीढ़ हैं। दिल्ली घोषणापत्र 2026 में इन प्रवासियों के कल्याण और सुरक्षा के लिए एक विस्तृत कार्ययोजना प्रस्तुत की गई है। भारत ने इस क्षेत्र के देशों के साथ श्रम कानूनों में सुधार और कौशल विकास के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की है। संकट की स्थितियों में, जैसे कि गृहयुद्ध या महामारी, भारत ने हमेशा ‘ऑपरेशन गंगा’ या ‘ऑपरेशन कावेरी’ जैसे मिशनों के माध्यम से अपने नागरिकों को सुरक्षित निकाला है। यह घोषणापत्र सुनिश्चित करता है कि भविष्य में ऐसी किसी भी आपदा से निपटने के लिए एक स्थायी संस्थागत तंत्र विकसित किया जाए। यह मानवीय दृष्टिकोण भारत की विदेश नीति को केवल कागजी समझौतों से ऊपर उठाकर एक मानवीय स्पर्श प्रदान करता है।

भविष्य की राह: डिजिटल और हरित कूटनीति

घोषणापत्र का एक आधुनिक पक्ष डिजिटल सहयोग और हरित ऊर्जा है। भारत का ‘यूपीआई’ (UPI) मॉडल अब मध्य पूर्व के कई देशों में स्वीकृत हो रहा है, जो वित्तीय समावेश की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि है। इसके अलावा, भारत और मध्य पूर्व के देश ‘ग्रीन हाइड्रोजन’ के उत्पादन में अग्रणी बनने की महत्वाकांक्षा साझा करते हैं। दिल्ली घोषणापत्र इस बात पर जोर देता है कि जलवायु परिवर्तन एक साझा चुनौती है और इसके समाधान के लिए तकनीकी हस्तांतरण अनिवार्य है। भारत की सौर ऊर्जा पहल और खाड़ी देशों की निवेश क्षमता मिलकर एक नए ‘हरित भविष्य’ की नींव रख रहे हैं। यह साझेदारी न केवल दोनों क्षेत्रों के लिए फायदेमंद है, बल्कि ग्लोबल साउथ के लिए एक उदाहरण भी है।

निष्कर्ष

दिल्ली घोषणापत्र 2026 भारत की विदेश नीति के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ के रूप में दर्ज किया जाएगा। यह घोषणापत्र इस बात का प्रमाण है कि भारत अब मध्य पूर्व की राजनीति का केवल एक मूक दर्शक नहीं, बल्कि एक सक्रिय शिल्पकार है। भारत की रणनीति स्पष्ट है: संघर्षों को कम करना, आर्थिक विकास को बढ़ावा देना और सुरक्षा के साझा तंत्र को मजबूत करना। हालांकि राह में चुनौतियां कम नहीं हैं—चाहे वह ईरान-अमेरिका तनाव हो या क्षेत्रीय कट्टरपंथ—लेकिन भारत का संतुलित और स्पष्ट दृष्टिकोण उसे एक विश्वसनीय नेतृत्व प्रदान करता है। अंततः, दिल्ली घोषणापत्र 2026 यह विश्वास दिलाता है कि भारत और मध्य पूर्व के संबंध अब केवल जरूरतों पर नहीं, बल्कि साझा मूल्यों और साझा भविष्य की आकांक्षाओं पर टिके हैं।

Source: Indian Express Explained 


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