बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में वैश्विक आर्थिक संरचना में गहरी असमानताएँ देखने को मिलीं। विश्व की संपत्ति और आर्थिक शक्ति का अधिकांश भाग औद्योगिक विकसित देशों विशेष रूप से पश्चिमी यूरोप और उत्तरी अमेरिका के पास केंद्रित था, जबकि एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के अधिकांश राष्ट्र गरीबी, ऋण संकट और औपनिवेशिक शोषण की विरासत से जूझ रहे थे। इसी असमानता के प्रतिकारस्वरूप 1970 के दशक में विकासशील देशों ने “नया अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था” (New International Economic Order – NIEO) की अवधारणा प्रस्तुत की।
NIEO एक ऐसा प्रयास था, जो वैश्विक आर्थिक शक्ति के पुनर्वितरण, संसाधनों पर विकासशील देशों के नियंत्रण, और न्यायपूर्ण व्यापार प्रणाली की स्थापना के लिए किया गया। यह आंदोलन गुटनिरपेक्ष देशों के सम्मेलन (Non-Aligned Movement) और संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास सम्मेलन (UNCTAD) जैसे मंचों से उभरा।
1974 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने घोषणा (Declaration on the Establishment of a New International Economic Order) और कार्यक्रम (Programme of Action) को अपनाया। यद्यपि यह कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं था, परंतु इसने वैश्विक आर्थिक विमर्श में एक नई दिशा दी।
NIEO की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
NIEO की पृष्ठभूमि को समझने के लिए हमें द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था पर ध्यान देना होगा। ब्रेटन वुड्स संस्थाओं जैसे विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और बाद में विश्व व्यापार संगठन (WTO) का निर्माण पश्चिमी पूंजीवादी देशों के नेतृत्व में हुआ था।
ये संस्थाएँ मूलतः आर्थिक स्थिरता और व्यापारिक उदारीकरण को प्रोत्साहित करने के लिए बनाई गई थीं, परन्तु उनके निर्णयों और नीतियों पर विकसित देशों का वर्चस्व बना रहा।
1950–70 के दशकों में अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के नए स्वतंत्र देशों ने यह महसूस किया कि मौजूदा वैश्विक आर्थिक व्यवस्था उनके विकास के लिए प्रतिकूल है। इसलिए, उन्होंने एक नई आर्थिक व्यवस्था की माँग उठाई। जहाँ न्याय, समानता, और आत्मनिर्णय के सिद्धांतों पर आधारित अंतरराष्ट्रीय संबंध हों।
NIEO के प्रमुख सिद्धांत (Major Principles)
NIEO के सिद्धांतों को 1974 के संयुक्त राष्ट्र महासभा प्रस्ताव 3201 (S-VI) और चार्टर ऑफ इकोनॉमिक राइट्स एंड ड्यूटीज़ ऑफ स्टेट्स (1974) में स्पष्ट किया गया था। इसके पाँच मुख्य स्तंभ थे:
(i) सार्वभौमिक समानता और आत्मनिर्णय का अधिकार: प्रत्येक राष्ट्र को समान संप्रभुता और आत्मनिर्णय का अधिकार प्राप्त होना चाहिए। किसी भी राज्य के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप अस्वीकार्य है। यह सिद्धांत औपनिवेशिक व्यवस्था और नव-औपनिवेशिक नियंत्रण के खिलाफ विकासशील देशों की आवाज़ था।
(ii) प्राकृतिक संसाधनों पर स्थायी संप्रभुता: विकासशील देशों ने माँग की कि उन्हें अपने प्राकृतिक संसाधनों जैसे तेल, खनिज, कृषि उत्पाद पर पूर्ण नियंत्रण हो। वे विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के शोषण से मुक्त होकर अपने आर्थिक हितों के अनुसार नीति बना सकें।
(iii) न्यायसंगत व्यापार व्यवस्था: कच्चे माल के मूल्य और औद्योगिक उत्पादों के मूल्य के बीच असमानता समाप्त की जाए। अंतरराष्ट्रीय वस्तु समझौतों के माध्यम से मूल्य स्थिरीकरण और व्यापारिक न्याय स्थापित किया जाए।
(iv) वैश्विक धन और प्रौद्योगिकी का पुनर्वितरण: विकासशील देशों को तकनीकी सहायता, ऋण राहत और वित्तीय सहयोग मिले ताकि वे आत्मनिर्भर विकास की दिशा में बढ़ सकें।
(v) वैश्विक आर्थिक संस्थाओं में सुधार: विश्व बैंक, IMF, और WTO जैसी संस्थाओं में सुधार कर उन्हें अधिक प्रतिनिधिक बनाया जाए ताकि वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज़ को समुचित स्थान मिले।
NIEO के उद्देश्य और दृष्टि
NIEO का मूल उद्देश्य वैश्विक आर्थिक न्याय (Global Economic Justice) की स्थापना था।
इसके अंतर्गत चार प्रमुख लक्ष्य थे:
- अंतरराष्ट्रीय व्यापार में न्यायपूर्ण सहभागिता
- विकासशील देशों की आर्थिक स्वायत्तता और आत्मनिर्भरता
- विश्व अर्थव्यवस्था में समान अवसरों की गारंटी
- औपनिवेशिक आर्थिक संरचना का अंत और समावेशी विकास
NIEO ने न केवल आर्थिक बल्कि राजनीतिक स्तर पर भी एक नई सोच प्रस्तुत की, कि वैश्विक आर्थिक प्रणाली केवल पूंजीवादी बाजार की शर्तों पर नहीं, बल्कि समानता और साझेदारी के सिद्धांतों पर आधारित होनी चाहिए।
NIEO की चुनौतियाँ और विफलताएँ
यद्यपि NIEO के विचार आदर्शवादी और न्यायोन्मुख थे, इसकी व्यावहारिक सफलता सीमित रही। इसकी विफलता के कई कारण रहे:
(i) राजनीतिक और आर्थिक निर्भरता: अधिकांश विकासशील देश सहायता, व्यापार और निवेश के लिए पश्चिमी देशों पर निर्भर थे। इस निर्भरता ने NIEO के लक्ष्यों को कमजोर किया।
(ii) एकता का अभाव: Global South के देशों में वैचारिक और आर्थिक मतभेद थे। तेल निर्यातक देशों (OPEC) और गरीब अफ्रीकी देशों के हित समान नहीं थे।
(iii) विकसित देशों का विरोध: अमेरिका और यूरोपीय देशों ने NIEO के प्रस्तावों को अपने आर्थिक हितों के विपरीत माना। उन्होंने इसे “संसाधन राष्ट्रवाद” की संज्ञा दी।
(iv) नवउदारवादी नीति का उदय: 1980 के दशक में नवउदारवादी आर्थिक नीतियाँ (liberalization, privatization, deregulation) वैश्विक स्तर पर प्रबल हुईं, जिसने NIEO की राज्य-नियंत्रित विकास दृष्टि को हाशिए पर डाल दिया।
(v) अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में शक्ति–संतुलन का अभाव: विश्व बैंक, IMF और WTO में मतदान शक्ति अब भी विकसित देशों के पक्ष में रही। NIEO के प्रस्तावों को कोई बाध्यकारी समर्थन नहीं मिला।
NIEO और वैश्विक व्यापार शासन (Global Trade Governance): वैश्विक व्यापार शासन, अर्थात् वह प्रणाली जिसके अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय व्यापार के नियम और मानक तय होते हैं, NIEO के एजेंडे का केंद्रीय मुद्दा था।
NIEO ने यह तर्क दिया कि मौजूदा व्यापार व्यवस्था “असमान लाभ” देती है। विकसित देश उच्च मूल्य वाले औद्योगिक उत्पाद निर्यात करते हैं, जबकि विकासशील देश कम मूल्य वाले कच्चे माल। परिणामस्वरूप Terms of Trade उनके विरुद्ध रहती है।
NIEO के प्रस्ताव वैश्विक व्यापार शासन के संदर्भ में
- कच्चे माल की कीमतों की स्थिरता के लिए अंतरराष्ट्रीय समझौते
- विकासशील देशों के लिए विशेष व्यापारिक रियायतें (Preferential Treatment)
- तकनीकी हस्तांतरण और औद्योगिक सहयोग के लिए उत्तर–दक्षिण साझेदारी
- वैश्विक व्यापार संस्थाओं में समान प्रतिनिधित्व
हालाँकि, इन प्रस्तावों को व्यावहारिक रूप देने में कठिनाई आई। विकसित देशों ने कहा कि व्यापार को राजनीतिक मांगों से जोड़ना मुक्त बाजार सिद्धांतों के विपरीत है। परिणामस्वरूप, WTO जैसी संस्थाओं ने NIEO के कई प्रस्तावों को शामिल नहीं किया।
विकासशील देशों पर NIEO का प्रभाव
भले ही NIEO अपने लक्ष्यों को पूर्ण रूप से हासिल नहीं कर सका, परंतु इसका प्रभाव बहुआयामी था:
(i) दक्षिण–दक्षिण सहयोग (South-South Cooperation) का उदय: NIEO के विचारों से प्रेरित होकर विकासशील देशों ने आपसी सहयोग की दिशा में कदम बढ़ाए, जैसे G-77 समूह का गठन, दक्षिण आयोग (South Commission) की स्थापना, और UNCTAD मंचों पर सामूहिक आवाज़।
(ii) अंतरराष्ट्रीय विमर्श में ‘समानता’ की अवधारणा: पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक न्याय को मानवाधिकारों और वैश्विक शांति से जोड़ा गया।
(iii) वस्तु समझौते और मूल्य नीति: कॉफ़ी, कोको, टिन, और चीनी के लिए कुछ अंतरराष्ट्रीय समझौते बने, जिन्होंने अल्पकालिक रूप से निर्यात आय में वृद्धि की।
(iv) संसाधनों पर राष्ट्रीय नियंत्रण: कई देशों विशेषतः लैटिन अमेरिका और मध्य पूर्व ने राष्ट्रीयकरण नीतियाँ अपनाईं और तेल राजस्व को विकास में लगाया।
(v) नीति विमर्श में नया नैरेटिव: NIEO ने वैश्विक आर्थिक शासन के नैरेटिव को पश्चिमी दृष्टिकोण से हटाकर ‘विकासोन्मुख न्याय’ के केंद्र में ला खड़ा किया।
NIEO और विश्व व्यापार संगठन (WTO) के बीच संबंध
WTO, जो 1995 में GATT के उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित हुआ, वैश्विक व्यापार व्यवस्था का प्रमुख नियामक संस्थान है। NIEO के कई सिद्धांत WTO के उदारीकरण के सिद्धांतों से टकराते रहे हैं।
मुख्य अंतर्विरोध
- संप्रभुता बनाम उदारीकरण: NIEO ने प्राकृतिक संसाधनों पर राज्यों की संप्रभुता पर बल दिया, जबकि WTO बाज़ार पहुँच (Market Access) और नॉन–डिस्क्रिमिनेशन पर आधारित है।
- विशेष और भेदभावपूर्ण प्रावधान (Special and Differential Treatment): WTO सीमित रियायतें देता है, जबकि NIEO व्यापक रियायतों की मांग करता था, विशेषकर तकनीक, ऋण और निवेश के क्षेत्र में।
- बहुराष्ट्रीय कंपनियों का नियमन: NIEO एक Code of Conduct for MNCs चाहता था, पर WTO ने उन्हें उदार व्यापार ढाँचे का हिस्सा माना।
- ऋण और वित्तीय स्थिरता: NIEO वैश्विक मौद्रिक प्रणाली में सुधार चाहता था, जबकि WTO केवल व्यापार तक सीमित रहा।
- नवउदारवाद का प्रभाव: WTO का गठन ही नवउदारवादी दौर में हुआ, जब NIEO की राज्य-नियंत्रित नीति अप्रचलित मानी जाने लगी।
NIEO की विफलता के कारणों का विश्लेषण
| क्रमांक | कारण | विवरण |
| 1 | राजनीतिक शक्ति की कमी | विकासशील देशों के पास वैश्विक मंचों पर पर्याप्त दबाव बनाने की क्षमता नहीं थी। |
| 2 | आर्थिक निर्भरता | विदेशी निवेश और सहायता पर निर्भरता ने आत्मनिर्णय की अवधारणा को कमजोर किया। |
| 3 | वैचारिक असंगति | समाजवादी, पूंजीवादी और मिश्रित अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों के बीच एकमतता का अभाव। |
| 4 | वैश्विक परिदृश्य | शीत युद्ध, तेल संकट, और ऋण संकट ने NIEO के मुद्दों को पीछे धकेल दिया। |
| 5 | संस्थागत विरोध | IMF, विश्व बैंक और WTO ने संरचनात्मक सुधारों का विरोध किया। |
NIEO का दीर्घकालिक प्रभाव और प्रासंगिकता
NIEO भले ही औपचारिक रूप से विफल रहा, परन्तु इसका बौद्धिक और नैतिक प्रभाव अत्यंत गहरा रहा है।
आज भी निम्न क्षेत्रों में NIEO की छाया स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है:
- संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य (SDGs): इनका दर्शन NIEO के समान ही है, जिसमें समानता, गरीबी उन्मूलन और पर्यावरणीय संतुलन प्रमुख हैं।
- वैश्विक दक्षिण की आवाज़: BRICS, G-77, और NAM जैसे मंच NIEO की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।
- आर्थिक न्याय और जलवायु न्याय का विमर्श: ‘Common but Differentiated Responsibilities’ का सिद्धांत NIEO के समान विचारधारा का आधुनिक रूप है।
- वैश्विक संस्थाओं में सुधार की मांग: IMF और विश्व बैंक में कोटा सुधार, WTO में विकासशील देशों के लिए छूट की मांग, NIEO के ही विस्तार हैं।
निष्कर्ष
नया अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO) केवल एक आर्थिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि वैश्विक न्याय की एक विचारधारा थी। जिसने यह चुनौती दी कि “वैश्विक समृद्धि तभी संभव है जब उसके लाभ समान रूप से बाँटे जाएँ।” यद्यपि NIEO अपने व्यावहारिक लक्ष्यों में सफल नहीं हुआ, पर इसने अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विमर्श में स्थायी परिवर्तन किया। इसने विकासशील देशों को एक साझा मंच और आत्मसम्मान की भावना दी।
आज, जब वैश्विक असमानता, जलवायु संकट और ऋण बोझ जैसी समस्याएँ फिर उभर रही हैं, NIEO के सिद्धांत समानता, संप्रभुता और साझेदारी पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हैं।
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