आज की वैश्विक राजनीति में एक ऐसा मोड़ आया है जिसने दशकों पुरानी सैन्य संधियों और भरोसे की नींव को हिलाकर रख दिया है। उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (NATO), जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सोवियत संघ और बाद में किसी भी बाहरी खतरे के खिलाफ पश्चिमी देशों के ‘कवच’ के रूप में देखा जाता था, आज अपने सबसे बड़े सहयोगी अमेरिका से एक महत्वपूर्ण मोर्चे पर अलग खड़ा नजर आ रहा है। मुद्दा है—ईरान के साथ अमेरिका और इजरायल का युद्ध। यह पहली बार नहीं है जब नाटो के भीतर मतभेद उभरे हैं, लेकिन यह पहली बार है जब अमेरिका के एक राष्ट्रपति ने खुलेआम अपने सहयोगियों को ‘धमकी’ दी है और सहयोगियों ने उतनी ही स्पष्टता से ‘ना’ कह दिया है। इस लेख में हम उन गहरे रणनीतिक, कानूनी और आर्थिक कारणों का विश्लेषण करेंगे कि आखिर क्यों नाटो देश, अमेरिका के इस युद्ध का हिस्सा बनने से बच रहे हैं।
अनुच्छेद 5 और कानूनी पेचदगियां
नाटो की सबसे बड़ी शक्ति उसका ‘आर्टिकल 5’ (Article 5) है, जो कहता है कि किसी भी एक सदस्य देश पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा। लेकिन इस युद्ध में नाटो देशों का तर्क यह है कि यह अमेरिका पर हुआ कोई ‘बिना उकसावे का हमला’ नहीं है। इस युद्ध की शुरुआत अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर की गई सैन्य कार्रवाई से हुई है। नाटो के संविधान के अनुसार, यह संधि केवल ‘रक्षात्मक’ उद्देश्यों के लिए है।
यूरोपीय देशों, विशेषकर जर्मनी और फ्रांस का मानना है कि चूंकि अमेरिका ने इस युद्ध की शुरुआत अपनी मर्जी से और बिना सहयोगियों की सलाह के की है, इसलिए वे सामूहिक रक्षा के प्रावधान के तहत मदद करने के लिए बाध्य नहीं हैं। जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने हाल ही में स्पष्ट रूप से पूछा, “क्या अमेरिका और इजरायल ने हमसे पूछकर ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू किया था?” यह सवाल नाटो की उस बुनियादी कार्यप्रणाली पर चोट करता है जहाँ सामूहिक निर्णय लेने की परंपरा रही है। जब निर्णय सामूहिक नहीं था, तो जिम्मेदारी भी सामूहिक नहीं हो सकती।

एकतरफा सैन्य कार्रवाई और कूटनीतिक दरार
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की “अमेरिका फर्स्ट” नीति ने हमेशा से ही बहुपक्षीय संस्थानों के प्रति संदेह पैदा किया है। ईरान युद्ध के मामले में ट्रंप प्रशासन ने अपने नाटो सहयोगियों, यहाँ तक कि अमेरिकी कांग्रेस तक को विश्वास में नहीं लिया। यह शैली 1991 के खाड़ी युद्ध या 2001 के अफगानिस्तान युद्ध से बिल्कुल अलग है, जहाँ अमेरिका ने बकायदा एक अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बनाया था।
यूरोपीय नेताओं का मानना है कि ट्रंप ने युद्ध शुरू करने के बाद अब सहयोगियों को केवल ‘नुकसान की भरपाई’ के लिए बुलाया है। ब्रिटेन, जो पारंपरिक रूप से अमेरिका का सबसे करीबी सहयोगी रहा है, उसने भी इस बार सावधानी बरती है। यूरोपीय देशों को लगता है कि ट्रंप प्रशासन ने बिना किसी निकास योजना (Exit Plan) के एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध में छलांग लगा दी है, और अब वे इस दलदल में फंसना नहीं चाहते।
होर्मुज जलडमरूमध्य और आर्थिक हितों का टकराव
युद्ध की शुरुआत के बाद ईरान ने दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग, ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz) को ब्लॉक करने की धमकी दी है और वहां सैन्य गतिविधि बढ़ा दी है। दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल इसी रास्ते से गुजरता है। ट्रंप ने नाटो देशों से अपील की है कि वे इस समुद्री मार्ग को सुरक्षित करने के लिए अपने युद्धपोत भेजें।
लेकिन यहाँ भी नाटो देश बंटे हुए हैं। यूरोपीय संघ और नाटो के कई सदस्य देशों का मानना है कि सैन्य हस्तक्षेप से तनाव और बढ़ेगा, जिससे तेल की कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती हैं। वे सैन्य बल के बजाय कूटनीतिक समाधान और डी-एस्केलेशन (तनाव कम करना) पर जोर दे रहे हैं। स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज़ ने स्पष्ट किया है कि संघर्ष को और बढ़ाना यूरोप की अर्थव्यवस्था के लिए आत्मघाती होगा।
ईरान की सैन्य क्षमता और लंबी जंग का डर
नाटो देशों की दूरी का एक बड़ा कारण ईरान की भौगोलिक स्थिति और उसकी सैन्य ताकत भी है। ईरान कोई इराक या लीबिया नहीं है; यह एक विशाल देश है जिसकी भौगोलिक बनावट बेहद कठिन है। ईरान के पास लंबी दूरी की मिसाइलें और घातक ड्रोन तकनीक है, जिसका प्रदर्शन उसने हाल के हमलों में किया भी है।
नाटो के सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि अगर वे इस युद्ध में शामिल होते हैं, तो वे एक ऐसी अंतहीन जंग में फंस जाएंगे जो वर्षों तक खिंच सकती है। यूरोप पहले से ही यूक्रेन युद्ध के कारण सैन्य और आर्थिक रूप से दबाव में है। ऐसे में एक और मोर्चा खोलना, वह भी मिडिल ईस्ट में, उनके लिए रणनीतिक भूल साबित हो सकती है। नाटो देश नहीं चाहते कि ईरान की मिसाइलों का रुख उनके शहरों की तरफ हो, खासकर तब जब वे इस युद्ध की आवश्यकता पर ही सवाल उठा रहे हैं।
अंतर्राष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र की भूमिका
एक और महत्वपूर्ण बिंदु युद्ध की वैधता का है। नाटो के कई देश अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के चार्टर का पालन करने को प्राथमिकता देते हैं। ईरान पर हुए हालिया हमलों को लेकर संयुक्त राष्ट्र में कोई सर्वसम्मति नहीं थी। बिना संयुक्त राष्ट्र के अधिदेश (Mandate) के युद्ध में शामिल होना कई यूरोपीय देशों के लिए घरेलू राजनीतिक संकट पैदा कर सकता है।
कनाडा, फ्रांस और स्कैंडिनेवियाई देशों में जनमत इस युद्ध के खिलाफ है। वहां की जनता नहीं चाहती कि उनके सैनिक एक ऐसे युद्ध में शहीद हों जिसका उद्देश्य स्पष्ट नहीं है और जो अंतरराष्ट्रीय कानूनों की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। ट्रंप द्वारा यूएन और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों को दरकिनार करना भी यूरोपीय सहयोगियों को असहज कर रहा है।
ट्रंप की धमकियां और नाटो का भविष्य
अमेरिकी राष्ट्रपति ने ट्रुथ सोशल और अन्य मंचों पर नाटो देशों को जमकर खरी-खोटी सुनाई है। उन्होंने इसे “वन वे स्ट्रीट” (एकतरफा रास्ता) करार दिया है, जहाँ अमेरिका तो सबकी रक्षा करता है लेकिन जब अमेरिका को जरूरत होती है, तो कोई साथ नहीं आता। ट्रंप की इस नाराजगी ने नाटो के भविष्य पर ही सवालिया निशान लगा दिए हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अमेरिका और नाटो के बीच यह दरार और चौड़ी हुई, तो इसका सीधा फायदा रूस और चीन जैसे प्रतिद्वंद्वियों को होगा। नाटो की एकजुटता ही उसकी सबसे बड़ी ताकत रही है, और ईरान युद्ध ने इस एकजुटता के खोखलेपन को उजागर कर दिया है। ट्रंप का यह कहना कि “हमें अब किसी की मदद की जरूरत नहीं है”, केवल एक राजनीतिक बयानबाजी हो सकती है, क्योंकि वास्तविक युद्ध क्षेत्र में सहयोगियों की कमी अमेरिका की मारक क्षमता पूर्ति को प्रभावित करती है।
ब्रिक्स और कूटनीतिक विकल्प
दिलचस्प बात यह है कि जहाँ नाटो पीछे हट रहा है, वहीं दुनिया की नजरें ब्रिक्स (BRICS) देशों, विशेषकर भारत पर टिकी हैं। भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने स्पष्ट किया है कि युद्धपोतों के माध्यम से शांति नहीं लाई जा सकती, इसके लिए कूटनीतिक बातचीत ही एकमात्र रास्ता है। यूरोपीय देश भी अंदरूनी तौर पर भारत जैसे देशों की मध्यस्थता का समर्थन कर रहे हैं ताकि इस संकट को वैश्विक महायुद्ध में बदलने से रोका जा सके।
निष्कर्ष: एक नई विश्व व्यवस्था की आहट
“नाटो ईरान युद्ध में अमेरिका से दूर क्यों?” इस सवाल का जवाब केवल सैन्य रणनीतियों में नहीं, बल्कि बदलती हुई विश्व व्यवस्था में छिपा है। यूरोप अब अमेरिका का ‘जूनियर पार्टनर’ बनकर रहने को तैयार नहीं है, खासकर तब जब फैसले उसके हितों के खिलाफ हों। ईरान युद्ध ने यह साबित कर दिया है कि नाटो अब वह संगठन नहीं रहा जो शीत युद्ध के दौरान था।
आज के दौर में राष्ट्रीय हित, आर्थिक स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय कानून किसी भी सैन्य संधि से ऊपर हो गए हैं। अमेरिका का अकेले पड़ना यह संकेत देता है कि अब दुनिया बहुध्रुवीय (Multipolar) हो चुकी है, जहाँ सुपरपावर भी अपनी मर्जी से सहयोगियों को युद्ध की आग में नहीं झोंक सकता। नाटो की यह ‘दूरी’ भविष्य में इस गठबंधन के स्वरूप को हमेशा के लिए बदल सकती है। यदि यह गतिरोध बना रहा, तो हो सकता है कि आने वाले समय में हमें एक ऐसे नाटो को देखना पड़े जो केवल कागजों पर सिमटा हो या फिर पूरी तरह से पुनर्गठित हो। ईरान की आग ने नाटो के भीतर के मतभेदों को सतह पर लाकर खड़ा कर दिया है, और यह दूरी फिलहाल कम होती नजर नहीं आती।
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