वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (NATO) एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है, जहाँ इसकी प्रासंगिकता, प्रभावकारिता और भविष्य तीनों ही गंभीर विमर्श के विषय बन गए हैं। विशेष रूप से ग्रीनलैंड मुद्दे को लेकर अमेरिका और डेनमार्क (तथा व्यापक रूप से संपूर्ण यूरोप) के बीच उपजा हालिया तनाव इस गठबंधन की आधारभूत नींव को हिलाने की क्षमता रखता है। शीत युद्ध की समाप्ति के बाद से ही नाटो के अस्तित्व पर समय-समय पर प्रश्नचिह्न लगते रहे हैं, लेकिन वर्तमान भू-राजनीतिक परिस्थितियाँ इसे एक ऐसे ‘अस्तित्वगत संकट’ (Existential Crisis) की ओर धकेलती प्रतीत हो रही हैं, जिसे नजरअंदाज करना अब संभव नहीं है। यह लेख नाटो के ऐतिहासिक सफर, इसके मूल सिद्धांतों और वर्तमान चुनौतियों के आलोक में इसके भविष्य का एक व्यापक और गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
नाटो का गठन: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और वैचारिक आधार
नाटो के भविष्य का आकलन करने के लिए इसके गठन की पृष्ठभूमि को समझना अपरिहार्य है। द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका के पश्चात, यूरोप आर्थिक और सैन्य रूप से पूरी तरह जर्जर हो चुका था। उस समय सोवियत संघ के विस्तारवादी साम्यवाद का खतरा पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों पर प्रबल था। इसी सुरक्षा शून्यता को भरने और सोवियत विस्तार को रोकने के लिए 4 अप्रैल, 1949 को वाशिंगटन संधि के माध्यम से नाटो की स्थापना की गई। इसका प्राथमिक उद्देश्य एक ऐसी सामूहिक सुरक्षा प्रणाली विकसित करना था जो सोवियत संघ के किसी भी संभावित आक्रमण के विरुद्ध पश्चिमी यूरोप को एक अभेद्य सुरक्षा कवच प्रदान कर सके।
लॉर्ड इस्मे, जो नाटो के प्रथम महासचिव थे, ने इसके रणनीतिक उद्देश्य को अत्यंत संक्षिप्त किंतु प्रभावी ढंग से परिभाषित किया था: “रूसियों को बाहर रखना, अमेरिकियों को भीतर रखना और जर्मनों को नीचे रखना।” यह केवल एक सैन्य गठबंधन नहीं था, बल्कि यह यूरोप में अमेरिकी उपस्थिति को वैधानिकता प्रदान करने और पश्चिमी लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का एक संगठित प्रयास था। दशकों तक इसने न केवल युद्ध को रोका, बल्कि पश्चिमी यूरोप के पुनर्निर्माण के लिए एक सुरक्षित वातावरण भी सुनिश्चित किया।
विकास की यात्रा और वैचारिक विस्तार
शीत युद्ध के दौरान नाटो का ध्यान पूरी तरह से सोवियत संघ के ‘रोकथाम’ की नीति पर केंद्रित रहा। हालांकि, 1991 में सोवियत संघ के विघटन ने नाटो के समक्ष पहली बड़ी पहचान की चुनौती प्रस्तुत की। कई विचारकों का मानना था कि जिस शत्रु के विरुद्ध इस संगठन का जन्म हुआ था, उसके अंत के साथ ही नाटो की प्रासंगिकता भी समाप्त हो जानी चाहिए। परंतु, नाटो ने स्वयं को परिस्थितियों के अनुरूप ढालते हुए अपना विस्तार पूर्व की ओर किया।
गठबंधन ने उन देशों को अपनी सदस्यता दी जो कभी सोवियत प्रभाव वाले ‘वारसॉ पैक्ट’ का हिस्सा थे। बोस्निया, कोसोवो और कालांतर में अफगानिस्तान में इसके सैन्य हस्तक्षेप ने यह प्रतिपादित किया कि नाटो अब केवल एक क्षेत्रीय रक्षा गठबंधन नहीं रह गया है, बल्कि यह ‘आउट ऑफ एरिया’ (Out of Area) अभियानों के माध्यम से एक वैश्विक सुरक्षा प्रहरी के रूप में कार्य कर रहा है। विकास के इस दौर ने इसे एक ऐसे राजनीतिक संगठन के रूप में भी स्थापित किया जो लोकतंत्र, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कानून के शासन की रक्षा का दावा करता है।
सामूहिक सुरक्षा की भावना और अनुच्छेद 5 की केंद्रीयता
नाटो की पूरी संरचना ‘सामूहिक सुरक्षा’ के दार्शनिक विचार पर टिकी है, जिसका प्राण इसके ‘अनुच्छेद 5’ (Article 5) में निहित है। यह उपबंध स्पष्ट रूप से घोषित करता है कि “किसी भी एक सदस्य देश पर किया गया सशस्त्र हमला सभी सदस्यों पर हमला माना जाएगा।” ऐसी स्थिति में सभी सदस्य देश सामूहिक रूप से पीड़ित देश की सहायता के लिए सैन्य कार्रवाई सहित आवश्यक कदम उठाएंगे।
इतिहास में अब तक केवल एक बार, 11 सितंबर 2001 को अमेरिका पर हुए आतंकी हमलों के बाद, इस अनुच्छेद को लागू किया गया था। यह भावना यूरोप के छोटे देशों को एक ऐसी सुरक्षा गारंटी प्रदान करती है कि दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति उनके पीछे चट्टान की तरह खड़ी है। यदि ग्रीनलैंड जैसे क्षेत्रीय विवादों के कारण इस विश्वास की डोर कमजोर होती है, तो अनुच्छेद 5 का मनोवैज्ञानिक और रणनीतिक महत्व समाप्त हो जाएगा, जो अंततः नाटो के विघटन का मार्ग प्रशस्त करेगा।
अतीत के संकट और नेतृत्व का द्वंद्व
नाटो के इतिहास में आंतरिक कलह और मतभेद कोई नवीन घटना नहीं है। 1966 में, फ्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति चार्ल्स डी गॉल ने अमेरिकी प्रभुत्व का मुखर विरोध करते हुए फ्रांस को नाटो की एकीकृत सैन्य कमान से बाहर कर लिया था। इसी प्रकार, 2003 में इराक युद्ध के समय भी अमेरिका और जर्मनी-फ्रांस के बीच गहरा वैचारिक मतभेद उभरा था, जिसे ‘पुराने यूरोप’ और ‘नए यूरोप’ के बीच के संघर्ष के रूप में देखा गया।
हाल के वर्षों में नेतृत्व का संकट और अधिक गहराया है। पूर्व में पहले कार्यकाल में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा नाटो को ‘अप्रासंगिक’ (Obsolete) कहना और सदस्य देशों द्वारा अपने रक्षा बजट का 2 प्रतिशत व्यय न करने पर गठबंधन से हटने की धमकी देना, इसके भविष्य पर सबसे बड़ा आघात था। वर्तमान में ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका की आक्रामक सामरिक दिलचस्पी ने डेनमार्क जैसी शक्तियों के भीतर असुरक्षा का भाव पैदा किया है। यह नेतृत्व का द्वंद्व ही है जिसने नाटो को एक ‘ब्रेन डेड’ (मैक्रों के अनुसार) स्थिति की ओर धकेला है।
ग्रीनलैंड विवाद: नाटो की दरार का नया केंद्र
ग्रीनलैंड का मुद्दा केवल भू-राजनीतिक हित का मामला नहीं है, बल्कि यह संप्रभुता और गठबंधन के भीतर ‘समानता’ के प्रश्न को जन्म देता है। अमेरिका ग्रीनलैंड को अपनी आर्कटिक रणनीति और चीन-रूस के बढ़ते प्रभाव को प्रतिसंतुलित करने के लिए अपरिहार्य मानता है। इसके विपरीत, डेनमार्क और यूरोपीय संघ इसे अपनी क्षेत्रीय अखंडता पर एक मित्र राष्ट्र द्वारा किए गए प्रहार के रूप में देखते हैं।
भू-राजनीतिक विशेषज्ञों का तर्क है कि यदि अमेरिका अपने नाटो सहयोगियों की संप्रभुता की कीमत पर अपने हितों को साधने की कोशिश करता है, तो नाटो का ‘एक के लिए सब और सबके लिए एक’ का सिद्धांत अर्थहीन हो जाएगा। यह विवाद यूरोप के भीतर उस धारणा को निरंतर खाद-पानी दे रहा है कि यूरोप को अब अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर पूर्ण निर्भरता त्यागकर अपनी स्वयं की रक्षा प्रणाली या ‘यूरोपीय रणनीतिक स्वायत्तता’ (European Strategic Autonomy) विकसित करनी चाहिए।
आर्कटिक कूटनीति और रूस-चीन की भूमिका
ग्रीनलैंड विवाद को केवल अमेरिका और यूरोप के बीच का मनमुटाव मानना एक बड़ी रणनीतिक भूल होगी। इस विवाद की पृष्ठभूमि में रूस और चीन की सक्रियता एक प्रमुख उत्प्रेरक का कार्य कर रही है। रूस ने हाल के वर्षों में आर्कटिक क्षेत्र में अपने सैन्य बुनियादी ढांचे को तेजी से पुनर्जीवित किया है। वहीं, चीन ने स्वयं को ‘निकट-आर्कटिक राज्य’ घोषित करते हुए ‘पोलर सिल्क रोड’ की परिकल्पना पेश की है।
यदि नाटो के सदस्य देश ग्रीनलैंड जैसे मुद्दों पर परस्पर संघर्षरत रहते हैं, तो यह मास्को और बीजिंग को आर्कटिक के विशाल संसाधनों और नए खुलते व्यापारिक मार्गों पर प्रभुत्व जमाने का स्वर्ण अवसर प्रदान करेगा। अमेरिका की आशंका यह है कि यदि उसने ग्रीनलैंड पर अपना नियंत्रण या प्रभाव नहीं बढ़ाया, तो चीनी निवेश वहां के बुनियादी ढांचे पर कब्जा कर सकता है, जो सीधे तौर पर नाटो की उत्तरी सुरक्षा लाइन में सेंध लगाने जैसा होगा।
नाटो का आर्थिक पक्ष: 2 प्रतिशत का वित्तीय बोझ
नाटो के भविष्य पर मंडराते संकटों में एक महत्वपूर्ण आयाम वित्तीय असंतुलन का भी है। अमेरिका लंबे समय से यह शिकायत करता रहा है कि वह गठबंधन की कुल सुरक्षा लागत का एक बड़ा हिस्सा वहन करता है, जबकि यूरोपीय देश अपने वादे के अनुरूप रक्षा पर खर्च नहीं कर रहे हैं। 2014 के वेल्स शिखर सम्मेलन में तय किया गया था कि सभी सदस्य देश अपनी जीडीपी का कम से कम 2 प्रतिशत रक्षा पर खर्च करेंगे, किंतु कई प्रमुख देश अब भी इस लक्ष्य से दूर हैं।

ग्रीनलैंड विवाद इस आर्थिक तनाव को एक नए स्तर पर ले जाता है। अमेरिका इसे संसाधन नियंत्रण के माध्यम से अपनी सुरक्षा लागत की वसूली के रूप में देखता है। वहीं, यूरोपीय देश इसे एक ‘ट्रांजेक्शनल’ (लेनदेन आधारित) कूटनीति मानते हैं जो सुरक्षा की भावना को व्यापार में बदल देती है। यदि आर्थिक हितों का यह टकराव बना रहा, तो अमेरिका के भीतर ‘आइसोलेशनिस्ट’ (पृथकतावादी) ताकतें मजबूत होंगी जो नाटो से पूर्ण अलगाव की मांग करेंगी।
यूरोपीय रणनीतिक स्वायत्तता का उदय
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों द्वारा नाटो को ‘ब्रेन डेड’ कहने के पीछे की मूल चिंता यही थी कि यूरोप अपनी सुरक्षा के लिए वाशिंगटन के अनिश्चित मिजाज पर निर्भर नहीं रह सकता। यूरोप अब अपनी स्वयं की सैन्य क्षमताओं जैसे PESCO (Permanent Structured Cooperation) और ‘यूरोपीय रक्षा कोष’ को सुदृढ़ करने पर बल दे रहा है।
यदि नाटो के भीतर अमेरिका का व्यवहार एक सहयोगी के बजाय एक ‘अधिनायक’ जैसा बना रहता है, तो भविष्य में यूरोपीय देश नाटो के समानांतर या उसके विकल्प के रूप में एक अलग सुरक्षा ढांचा खड़ा कर सकते हैं। यह नाटो के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा होगा, क्योंकि यह गठबंधन की उस पार-अटलांटिक (Trans-Atlantic) एकता को समाप्त कर देगा जो पिछले सात दशकों से वैश्विक स्थिरता का आधार रही है।
यदि नाटो खत्म होता है: अमेरिका और यूरोप पर प्रभाव
नाटो का संभावित विघटन वैश्विक शक्ति संतुलन में एक ऐसा भूकंप लाएगा जिसकी क्षतिपूर्ति दशकों तक संभव नहीं होगी।
- अमेरिका पर प्रभाव: अमेरिका के लिए इसका अर्थ होगा यूरोप में उसके राजनीतिक और सैन्य प्रभाव का पूर्ण अवसान। बिना नाटो के, अमेरिका के लिए अपनी वैश्विक पहुंच (Global Reach) और रसद नेटवर्क को बनाए रखना न केवल कठिन बल्कि अत्यधिक खर्चीला होगा। यह अमेरिका के ‘नेटवर्क ऑफ अलायंस’ की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करेगा।
- यूरोप पर प्रभाव: यूरोप के लिए स्थिति अधिक अस्थिर हो सकती है। बिना एकीकृत सुरक्षा ढांचे के, महाद्वीप पुनः 20वीं सदी की शुरुआत वाली राष्ट्रीय प्रतिद्वंद्विता और क्षेत्रीय असुरक्षा का शिकार हो सकता है। रूस के लिए यह एक बड़ी रणनीतिक जीत होगी, क्योंकि वह पूर्वी यूरोप में अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने के लिए स्वतंत्र होगा।
- वैश्विक प्रभाव: नाटो के अंत से सामूहिक सुरक्षा का वैश्विक मॉडल कमजोर होगा, जिससे चीन और रूस जैसी शक्तियां अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के नियमों को अपनी सुविधानुसार पुनर्निर्धारित करने के लिए प्रोत्साहित होंगी।
निष्कर्ष
निष्कर्षतः, नाटो का भविष्य वर्तमान में इसके बाहरी शत्रुओं से अधिक इसकी आंतरिक एकजुटता और विश्वास की बहाली पर निर्भर है। ग्रीनलैंड विवाद केवल एक क्षेत्रीय विवाद नहीं, बल्कि एक ‘लिटमस टेस्ट’ है कि क्या यह गठबंधन 21वीं सदी की जटिलताओं को झेलने के लिए तैयार है। यदि नाटो को जीवित रहना है, तो इसे केवल एक सैन्य कवच होने से आगे बढ़कर एक ‘रणनीतिक साझेदारी’ (Strategic Partnership) के रूप में खुद को पुनर्गठित करना होगा।
आगे की राह
‘नाटो 2030’ के उस दृष्टिकोण में निहित है जिसमें सामूहिक रक्षा के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन, साइबर युद्ध, और चीन की उभरती चुनौतियों को शामिल किया गया है। अमेरिका को यह समझना होगा कि वह अपने सहयोगियों की संप्रभुता को चोट पहुँचाकर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकता। वहीं, यूरोप को अपनी सुरक्षा जिम्मेदारियों में अधिक आर्थिक योगदान देना होगा।
समय की मांग है कि वाशिंगटन और ब्रसेल्स के बीच एक नया ‘ग्रैंड बारगेन’ (Grand Bargain) हो, जो शीत युद्ध की स्मृतियों पर नहीं, बल्कि भविष्य की साझा चुनौतियों पर आधारित हो। यदि नाटो वर्तमान आंतरिक विरोधाभासों को सुलझाने में विफल रहता है, तो इतिहास इसे एक ऐसे महान गठबंधन के रूप में याद रखेगा जो अपराजित रहते हुए भी अपने ही विश्वासघात और स्वार्थों के बोझ तले दबकर समाप्त हो गया।
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