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नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था: शक्ति संतुलन का नया युग

The powerful have their power. We have something: Capacity to stop pretending – Mark Carney

आज की वैश्विक व्यवस्था एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहाँ ‘नियमों पर आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था’ (Rules-based International Order) कमजोर पड़ती दिख रही है। महान शक्तियों के बीच शक्ति की होड़ और प्रभाव की राजनीति ने उस संतुलन को चुनौती दी है जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनाया गया था। इस परिप्रेक्ष्य में, कनाडा के पूर्व प्रधानमंत्री मार्क कार्नी का विचार उल्लेखनीय है, कि भले ही शक्तिशाली देशों के पास उनकी शक्ति है, परंतु मध्यम और छोटे देशों के पास भी कुछ महत्वपूर्ण है: सत्य को स्वीकारने की क्षमता (Capacity to stop pretending).

नियमआधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था क्या है?

द्वितीय विश्व युद्ध की विनाशलीला के बाद ‘उदार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था’ (Liberal International Order) के रूप में इस अवधारणा का जन्म हुआ।
यह उदार लोकतांत्रिक मूल्यों, बाजार आधारित पूँजीवाद और बहुपक्षीय सहयोग पर आधारित है।

इस परियोजना के केंद्र में संयुक्त राज्य अमेरिका था, जिसने स्वयं को इस नई व्यवस्था का नेतृत्वकर्ता माना।
जिसका लक्ष्य  ‘महाशक्तियों की राजनीति और बदलते गठबंधनों की अराजकता’ को समाप्त कर एक ऐसा विश्व बनाना था, जहाँ साझा नियम और संस्थाएँ स्थायित्व सुनिश्चित करें।

संयुक्त राष्ट्र (UN), अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक जैसी संस्थाएँ इसी दृष्टि का हिस्सा थीं।
इनका उद्देश्य था राजनीतिक सहयोग, शांतिपूर्ण विवाद समाधान, और युद्धग्रस्त देशों का आर्थिक पुनर्निर्माण।

परंतु शीघ्र ही यह ‘सार्वभौमिक उदार व्यवस्था’ टूटने लगी।
शीत युद्ध (Cold War) के दौरान विश्व दो प्रतिस्पर्धी खेमों में बँट गया;

  • पश्चिमी खेमे का नेतृत्व अमेरिका ने किया, जो उदार लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित था।
  • जबकि सोवियत संघ ने एक समानांतर प्रणाली बनाई वारसा संधि (Warsaw Pact) और आर्थिक पारस्परिक सहायता परिषद (COMECON) जैसी संस्थाओं के माध्यम से।

सोवियत व्यवस्था ने राज्य-नियंत्रित अर्थव्यवस्था और एकदलीय शासन को अपनाया, जिससे उदार विश्व व्यवस्था की लोकतांत्रिक और पूँजीवादी नींव को चुनौती मिली।

1990 के दशक की शुरुआत में सोवियत संघ के पतन के बाद ऐसा प्रतीत हुआ कि ‘उदार विश्व व्यवस्था’ ने विजय प्राप्त कर ली है।
अमेरिका विश्व की एकमात्र महाशक्ति बन गया और पूर्व सोवियत राष्ट्र पश्चिमी संस्थानों से जुड़ने लगे।

परंतु 1990 के दशक के अंत और 2000 के दशक की शुरुआत में नई दरारें उभरने लगीं;

  • NATO का विस्तार,
  • विश्व व्यापार संगठन (WTO) का गठन,
  • और अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय (ICC) जैसी संस्थाओं के माध्यम से मानवाधिकारों पर बल देना  इन सबने पश्चिमी विचारधारा को ‘सार्वभौमिक नियमों’ के रूप में प्रस्तुत किया।

उभरती दरारें और पश्चिमी प्रभुत्व

  • कई गैर-पश्चिमी देशों को यह एक प्रकार का ‘पश्चिमी प्रभुत्व का वैचारिक आवरण’ लगा।
    इसी आलोचना से बचने के लिए पश्चिमी देशों ने ‘उदार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था’ की जगह ‘नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था’ (Rules-Based Order) शब्द का प्रयोग शुरू किया।
    यह विचारधारा से अधिक प्रक्रियागत निष्पक्षता पर बल देने के बदलाव प्रतीक था।
  • समर्थकों का तर्क है कि यह नियम-आधारित व्यवस्था अब भी आवश्यक है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन, महामारी नियंत्रण, और परमाणु प्रसार जैसी वैश्विक चुनौतियाँ केवल सामूहिक नियमों के माध्यम से ही हल की जा सकती हैं।परंतु सवाल यह है कि;
    • ये ‘नियम’ वास्तव में क्या हैं?
    • कौन इन्हें बनाता और लागू करता है?
    • क्या ये सच में सार्वभौमिक हैं, या किसी एक भू-राजनीतिक गुट के हितों को दर्शाते हैं?

    इन सवालों के कारण यह व्यवस्था आज एक संक्रमण काल से गुजर रही है।
    ‘उदार’ से ‘नियम-आधारित’ की यह यात्रा दर्शाती है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थिरता, समानता और वैधता को बनाए रखना कितना कठिन कार्य है।

शक्ति की राजनीति और कमजोरों की चुनौती

  • कार्नी के अनुसार, वर्तमान विश्व व्यवस्था इस विचार पर टिकी है कि ‘मजबूत वही करते हैं जो चाहते हैं, और कमजोर वही सहते हैं जो उन्हें सहना पड़ता है।’ यह स्थिति अंतरराष्ट्रीय नैतिकता की बजाय शक्ति संतुलन के यथार्थवादी सिद्धांत को दर्शाती है।
  • अब यह स्वीकार करने का समय है कि वैश्विक शक्तियाँ अपने हितों के लिए बहुपक्षीय संस्थाओं (जैसे WTO, UN, COP) को दरकिनार कर रही हैं। नतीजतन, छोटे और मध्यम देश अपने निर्णय स्वयं लेने को मजबूर हैं।

नई विश्व व्यवस्था की आवश्यकता

  • ‘नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था’ (International Rules-Based Order) शब्द लंबे समय से वैश्विक राजनीति का हिस्सा रहा है। पश्चिमी नेता इसका उपयोग उस ढाँचे का वर्णन करने के लिए करते हैं जो राष्ट्रों के व्यवहार को दिशा देने वाले नियमों, मानदंडों और संस्थानों पर आधारित है।
    इसके समर्थक मानते हैं कि इस व्यवस्था ने दशकों तक वैश्विक स्थिरता और समृद्धि की नींव रखी, जबकि आलोचक इसके न्याय, समानता और आज की बहुध्रुवीय दुनिया में प्रासंगिकता पर सवाल उठाते हैं।
  • कार्नी तर्क देते हैं कि ‘नियमों पर आधारित व्यवस्था’ अब वास्तविकता नहीं रह गई है। यह उस दौर में बनी थी जब अंतरराष्ट्रीय कानून और संगठन संतुलन बनाए रखते थे। लेकिन आज, जब बड़ी शक्तियाँ अपने हितों के अनुरूप नीतियाँ थोपती हैं, तब इन नियमों का नैतिक आधार कमजोर हो गया है।
  • अब देशों को चाहिए कि वे इस भ्रम से बाहर निकलें और अपनी ऊर्जा, रक्षा, तकनीक, और वित्त जैसे क्षेत्रों में रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) विकसित करें।

सत्य में जीने का अर्थ

  • ‘सत्य में जीना’ (Living in Truth) का अर्थ है, अपने वास्तविक सामर्थ्य, सीमाओं और राष्ट्रीय हितों को स्वीकारना। इसका मतलब है कि देश अपने मूल्यों लोकतंत्र, मानवाधिकार, समानता और संप्रभुता के प्रति ईमानदार रहें, न कि केवल बड़े शक्तिशाली राष्ट्रों के प्रभाव में निर्णय लें।
  • कार्नी के शब्दों में, शक्ति केवल सैन्य या आर्थिक नहीं होती; नैतिक स्पष्टता और राजनीतिक ईमानदारी भी शक्ति का रूप हैं।

व्यावहारिक बहुपक्षीयता की ओर

  • अब बहुपक्षीयता (Multilateralism) का स्वरूप बदल रहा है। पहले विश्व संगठन वैश्विक निर्णयों का केंद्र थे, पर अब देश मुद्दों के आधार पर साझेदारी कर रहे हैं। कनाडा जैसे देश भारत, ASEAN, कतर और फिलीपींस के साथ स्वतंत्र व्यापार और रणनीतिक साझेदारी समझौते कर रहे हैं।
  • यह नया मॉडल ‘व्यावहारिक बहुपक्षीयता’ (Pragmatic Multilateralism) है जो समान हितों पर आधारित है, न कि केवल संस्थागत ढाँचों पर।

निष्कर्ष

विश्व व्यवस्था के इस संक्रमण काल में यह स्पष्ट है कि शक्ति अब केवल ‘मजबूतों’ की नहीं रह गई है। जो देश अपने हितों को स्पष्ट रूप से पहचानते हैं, अपने मूल्यों के प्रति सच्चे रहते हैं, और अंतरराष्ट्रीय दबाव में भी अपनी स्वायत्तता बनाए रखते हैं वही भविष्य की दिशा तय करेंगे।

 

 


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