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निर्वाचन प्रणाली : बहुलमत प्रणाली, बहुमत प्रणाली, आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली

मतदाता जब चुनाव में भाग लेते हैं, तो वे कई उम्मीदवारों या राजनीतिक दलों में से अपने पसंद के व्यक्ति को चुनते हैं। इन वोटों की गिनती के बाद यह तय किया जाता है कि किस उम्मीदवार या पार्टी को कौन-सा पद मिलेगा। यह सब कुछ उस क्षेत्र में लागूनिर्वाचन प्रणाली पर निर्भर करता है। अगर किसी क्षेत्र में जितने पद हैं, उतने ही उम्मीदवार हैं, तो चुनाव की ज़रूरत नहीं होती।
ऐसे उम्मीदवारों को निविरोध या सर्वसम्मति से निर्वाचित कहा जाता है। लेकिन अगर उम्मीदवारों की संख्या पदों से ज़्यादा है, तो मतदान (voting) कराया जाता है और परिणाम उस क्षेत्र की निर्वाचन प्रणाली के अनुसार तय किए जाते हैं।

लोकतांत्रिक देशों में आम तौर पर तीन मुख्य प्रकार की निर्वाचन प्रणालियाँ होती हैं

1. बहुलमत प्रणाली (Plurality System)
2. बहुमत प्रणाली (Majority System)
3. आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली (Proportional Representation System)

बहुलमत प्रणाली (Plurality System)

इस प्रणाली में मतदाता कई उम्मीदवारों में से किसी एक को वोट देता है। जिस उम्मीदवार को सबसे ज़्यादा वोट मिलते हैं, वहीविजेता माना जाता है। उसे कुल वोटों का 50% से ज़्यादा पाना जरूरी नहीं होता। इसका मुख्य सिद्धांत है“जो सबसे आगे, जीत उसी की” (First Past the Post)।
यह प्रणाली निम्न चुनावों में अपनाई जाती है: ब्रिटेन की संसद, अमेरिका की प्रतिनिधि, सभा (House of Representatives), भारत की लोकसभा और राज्य विधानसभाएँ

  गुण

1. यह प्रणाली सरल और समझने में आसान है।
2. यह दो-दलीय प्रणाली (Two-Party System) को बढ़ावा देती है।
3. इससे स्थिर सरकार बनने में मदद मिलती है।
4. यह अल्पसंख्यक समुदायों को राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ने में सहायक होती है।
5. सरकार और विपक्ष के बीच संतुलन बनाए रखती है।

 दोष

1. यह प्रणाली अल्पसंख्यक वर्गों के साथ अन्याय कर सकती है।
2. अगर कोई उम्मीदवार थोड़े-थोड़े वोटों से हार जाए, तो उस वर्ग का प्रतिनिधित्व नहीं हो पाता।
3. कभी-कभी विजेता को कुल मतों का आधे से भी कम हिस्सामिलने पर भी जीत मिल जाती है।

बहुमत प्रणाली (Majoritarian System)

इस प्रणाली में कोई उम्मीदवार तभी जीतता है जब उसे कुल मान्य मतों का 50% से अधिक वोट मिलें। अगर किसी को इतनी संख्या में वोट नहीं मिलते, तो दूसरे तरीकों से बहुमत पता किया जाता है।

बहुमत प्रणाली के दो प्रमुख रूप हैं

वैकल्पिक मत प्रणाली (Alternative Vote System)

मतदाता उम्मीदवारों को 1, 2, 3… क्रम में वरीयता (Preference) देते हैं। यदि किसी उम्मीदवार को प्रथम वरीयता के आधार पर बहुमत नहीं मिलता, तो सबसे कम वोट पाने वाले उम्मीदवार को बाहर कर दिया जाता है, और उसके वोटों की दूसरी वरीयताएँ बाकी उम्मीदवारों में जोड़ दी जाती हैं। यह प्रक्रिया तब तक चलती है जब तक किसी उम्मीदवार को 50% से अधिक वोट न मिल जाएँ।
उदाहरण:ऑस्ट्रेलिया के निचले सदन के चुनाव, भारत और अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव

दुबारा मतदान प्रणाली (Second Ballot System)

पहले मतदान में अगर किसी को पूर्ण बहुमत नहीं मिलता, तो दूसरी बार वोटिंग (Run-off Voting) कराई जाती है।
दूसरी बार केवल सर्वाधिक वोट पाने वाले दो उम्मीदवारों के बीच मुकाबला होता है।
उदाहरण: फ्रांस के राष्ट्रपति और संसद (National Assembly) के चुनाव

सीमाएँ

इस प्रणाली में भी निर्वाचन क्षेत्र भौगोलिक आधार पर बने रहते हैं।
इसलिए कुल वोटों और सीटों का अनुपात सही नहीं बैठता।
अल्पसंख्यकों को पूरी तरह न्याय नहीं मिल पाता।

आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली (Proportional Representation System)

इस प्रणाली का उपयोग बहु-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्रों (Multi-member Constituencies) में होता है। इसका उद्देश्य है कि हर दल या वर्ग को उनके वोटों के अनुपात में प्रतिनिधित्व मिले।
इससे बहुमत के साथ-साथ अल्पमत (Minorities) को भी उचित प्रतिनिधित्व प्राप्त होता है।

विशेषताएँ:

यह प्रणाली न्यायसंगत और समान प्रतिनिधित्व प्रदान करती है।
लेकिन यह अपेक्षाकृत जटिल होती है। आम तौर पर स्विट्ज़रलैंड, नीदरलैंड, इटली आदि देशों में यह प्रणाली अपनाई जाती है। इस प्रणाली का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि हर राजनीतिक दल या समूह को उतनी ही सीटें मिलें, जितने प्रतिशत वोट उन्हें प्राप्त हुए हैं।
इसका प्रयोग प्रायः बहु-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्रों (multi-member constituencies) में किया जाता है। मतलब एक क्षेत्र से कई प्रतिनिधि चुने जाते हैं।

इस प्रणाली के तहत दो प्रमुख तरीके सबसे ज़्यादा प्रचलित हैं

1. सूची प्रणाली (List System)

इस प्रणाली में प्रत्येक राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों कीसूची (List) बनाकर देता है।
मतदाताओं को सभी दलों की सूचियाँ दी जाती हैं, और मतदाता को उनमें से किसी एक दल की सूची को चुनना होता है।

मतदान की प्रक्रिया

मतदाता अपने मतपत्र पर किसी एक दल की सूची पर निशान लगाता है।
चुनाव के बाद यह देखा जाता है कि प्रत्येक दल को कुल कितने प्रतिशत वोट मिले।
उसी अनुपात में सीटें बाँटी जाती हैं। यह तय करना कि कौन-सा उम्मीदवार चुना जाएगा, दल द्वारा दी गई सूची के क्रम पर निर्भर करता है।

कुछ देशों में अंतर

स्विट्ज़रलैंड और लक्ज़मबर्ग: मतदाता सूचियों में बदलाव कर सकता है या अलग-अलग दलों के उम्मीदवारों को मिलाकर अपनी नई सूची बना सकता है।
जर्मनी और इस्राइल: मतदाता को केवल दी गई सूचियों में से एक ही सूची चुनने की अनुमति होती है।
इटली: यहाँ मतदाता वरीयता क्रम (Preference) के आधार पर वोट देता है।
फिनलैंड: यहाँ कोई तय सूची नहीं होती; मतदाता व्यक्तिगत रूप सेउम्मीदवारों को वोट देता है।

2. एकल हस्तांतरणीय मत प्रणाली (Single Transferable Vote – STV)

इसमें मतदाता उम्मीदवारों को 1, 2, 3, 4… के क्रम में अपनी वरीयता (Preference) देते हैं।
किसी उम्मीदवार के जीतने के लिए उसे एक निश्चित संख्या में वोट चाहिए होते हैं, जिसे चुनाव कोटा (Electoral Quota) कहते हैं।

मतदान की प्रक्रिया

यदि किसी उम्मीदवार को प्रथम वरीयता के आधार पर कोटा जितने वोट मिल जाते हैं,
तो उसे विजेता घोषित किया जाता है।
उसके अतिरिक्त वोट (Surplus Votes) मतदाताओं की अगली वरीयता के अनुसार
अन्य उम्मीदवारों को स्थानांतरित (Transfer) कर दिए जाते हैं। यह प्रक्रिया तब तक चलती रहती है जब तक सभी सीटें भर न जाएँ।
उदाहरण: आयरलैंड और माल्टा में यह प्रणाली अपनाई जाती है।

लाभ

हर वर्ग, समुदाय और विचारधारा को उचित प्रतिनिधित्व मिलता है।
इससे विविधता और न्यायसंगत प्रतिनिधित्व सुनिश्चित होता है।

हानियाँ

यह प्रणाली कठिन और जटिल है।
इससे बहुमत वाली स्थिर सरकारें बनना कठिन होता है।
अक्सर गठबंधन (Coalition) सरकारें बनती हैं जो अस्थिर हो सकती हैं।
दल छोटे-छोटे वर्गों पर आधारित हो जाते हैं, जिससे राष्ट्रीय एकताकमजोर पड़ सकती है।


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