भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में एक गंभीर संस्थागत चिंता व्यक्त की है। यह चिंता उस समय उत्पन्न हुई जब एक ट्रायल कोर्ट ने अपने आदेश में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) द्वारा तैयार की गई झूठी और अस्तित्वहीन न्यायिक मिसालों का उपयोग किया। पिछले वर्ष विजयवाड़ा के एक ट्रायल कोर्ट के न्यायाधीश ने एक मामले को खारिज करते समय सर्वोच्च न्यायालय के चार निर्णयों का हवाला दिया था, लेकिन बाद में पता चला कि ऐसे कोई निर्णय वास्तव में मौजूद ही नहीं थे।
इससे पहले जुलाई 2025 में केरल उच्च न्यायालय ने जिला न्यायपालिका में एआई के उपयोग के लिए दिशानिर्देश जारी किए थे। यह देश की पहली ऐसी नीति थी जो न्यायिक प्रक्रियाओं में एआई के उपयोग को सीधे संबोधित करती है और इसके लिए कड़े सुरक्षा उपाय निर्धारित करती है।
नवंबर 2025 में सर्वोच्च न्यायालय ने “AI और न्यायपालिका पर श्वेत पत्र” भी जारी किया। इसमें बताया गया कि एआई के उपयोग से जुड़ा सबसे बड़ा खतरा “मामलों की गढ़ना (Fabrication) और एआई भ्रम (Hallucination)” है। इस दस्तावेज़ में कहा गया कि एआई उपकरण ऐसे निर्णय, उद्धरण या कानून का उल्लेख कर सकते हैं जो वास्तव में अस्तित्व में ही नहीं हैं।
हालाँकि दस्तावेज़ों के अनुवाद से लेकर मुकदमों में त्रुटियों की पहचान तक, एआई उपकरण न्यायिक व्यवस्था की गति और दक्षता को बढ़ाने की क्षमता रखते हैं, लेकिन इनके उपयोग में कई जोखिम भी शामिल हैं।
न्यायपालिका में एआई का महत्व
1. मामलों के लंबित रहने की समस्या कम करना: एआई उपकरण मामलों की प्राथमिकता तय करने, समय निर्धारण और निगरानी में सहायता कर सकते हैं। पुराने आंकड़ों और मामलों की समयरेखा का विश्लेषण करके एआई यह अनुमान लगा सकता है कि कौन से मामले देर से निपटेंगे, जिससे न्यायालय संसाधनों का बेहतर उपयोग कर सकते हैं।
2. पहुंच और समावेशन को बढ़ावा: एआई आधारित उपकरण जैसे SUVACE (Supreme Court Vidhik Anuvaad Software) कानूनी दस्तावेज़ों और निर्णयों का अंग्रेज़ी से भारतीय भाषाओं में अनुवाद कर सकते हैं। इससे भाषा की बाधा कम होती है और आम लोगों को न्यायिक जानकारी आसानी से उपलब्ध होती है।
3. कानूनी शोध में सहायता: एआई उपकरण पुराने निर्णयों, कानूनों और कानूनी दस्तावेज़ों का विश्लेषण करके संबंधित न्यायिक मिसालें बहुत कम समय में खोज सकते हैं। इससे वकीलों को मजबूत तर्क तैयार करने और न्यायाधीशों को बेहतर निर्णय लेने में मदद मिलती है।
4. पूर्वानुमान विश्लेषण: एआई पुराने निर्णयों के पैटर्न का अध्ययन करके संभावित फैसलों के बारे में अनुमान दे सकता है। इससे समान मामलों में कानून का अधिक समान रूप से लागू होना संभव हो सकता है। हालांकि यह केवल सूचना के लिए होता है और अंतिम निर्णय का निर्धारण नहीं करता।
5. पारदर्शिता और जनविश्वास: डिजिटल रिकॉर्ड और एआई आधारित डैशबोर्ड न्यायिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता बढ़ाते हैं। ई-कोर्ट परियोजना और एआई उपकरणों के माध्यम से अदालत की कार्यवाही और आदेश जनता के लिए अधिक स्पष्ट और सुलभ हो जाते हैं।
भारत की अदालतों में एआई का उपयोग
- ई-कोर्ट परियोजना और एआई: भारत की न्यायपालिका e-Courts Mission Mode Project के माध्यम से एआई का उपयोग कर रही है ताकि प्रशासनिक दक्षता बढ़ाई जा सके और लंबित मामलों को कम किया जा सके।
- SUPACE: SUPACE (Supreme Court Portal for Assistance in Court Efficiency) मशीन लर्निंग का उपयोग करके केस फाइलों का विश्लेषण करता है, तथ्यों को निकालता है और न्यायाधीशों को शोध तथा सार तैयार करने में सहायता करता है।

- SUVAS: SUVAS निर्णयों का अंग्रेज़ी से क्षेत्रीय भाषाओं में स्वचालित अनुवाद करता है, जिससे न्याय अधिक लोगों तक पहुँच सके।
- Adalat.AI: 2025 में केरल उच्च न्यायालय ने अधीनस्थ अदालतों में Adalat.AI के उपयोग को अनिवार्य किया। यह गवाहों के बयान को तुरंत भाषण से पाठ में बदल देता है, जिससे मैनुअल टाइपिंग की आवश्यकता कम होती है और मुकदमे की प्रक्रिया तेज होती है।
एआई से जुड़ी प्रमुख चुनौतियाँ
1. पक्षपात और नैतिक समस्याएँ: एआई पुराने कानूनी आंकड़ों में मौजूद पक्षपात को दोहरा सकता है। इससे जाति, लिंग या सामाजिक-आर्थिक स्थिति के आधार पर भेदभावपूर्ण परिणाम आने की संभावना रहती है।
2. सटीकता और विश्वसनीयता: एआई कभी-कभी गलत जानकारी दे सकता है, झूठे तथ्य या नकली न्यायिक उद्धरण बना सकता है। इससे न्यायिक निर्णयों में गंभीर जोखिम पैदा हो सकता है।उदाहरण के लिए OpenAI का Whisper सिस्टम कभी-कभी पूरे वाक्य या शब्द गढ़ लेता है, खासकर तब जब बोलने में लंबा विराम हो।
3. कानूनी तर्क की जटिलता: कानून में निर्णय केवल नियमों पर आधारित नहीं होते। उनमें संदर्भ, नैतिकता, सहानुभूति और मानवीय समझ शामिल होती है, जिसे एआई अभी पूरी तरह समझने में सक्षम नहीं है।
4. मानव अधिकार और न्यायिक प्रक्रिया: यदि निर्णय लेने में एआई पर अत्यधिक निर्भरता हो जाए तो निष्पक्ष सुनवाई और अपील जैसे मूल अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
5. नियमन की कमी: भारत में न्यायपालिका में एआई के उपयोग को नियंत्रित करने के लिए अभी व्यापक कानून या स्पष्ट नीति नहीं है। इसलिए विभिन्न अदालतों में इसके उपयोग के तरीके अलग-अलग हैं।
आगे की राह
1. क्षमता निर्माण: न्यायाधीशों, वकीलों और न्यायालय कर्मचारियों को एआई के उपयोग और उसकी सीमाओं के बारे में प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।
2. मानवीय निगरानी: एआई केवल सहायक उपकरण होना चाहिए। अंतिम निर्णय लेने का अधिकार हमेशा मानव न्यायाधीश के पास ही होना चाहिए।
3. नियामक और नैतिक ढांचा: ऐसे कानून और दिशानिर्देश बनाए जाने चाहिए जो एआई के उपयोग में मानव अधिकार, निष्पक्षता और जवाबदेही सुनिश्चित करें।
4. पक्षपात को कम करना: एआई को प्रशिक्षित करने के लिए विविध और अद्यतन आंकड़ों का उपयोग किया जाना चाहिए ताकि पूर्वाग्रह कम हो।
5. जानकारी का अधिकार: यदि न्यायिक प्रक्रिया में एआई का उपयोग किया जा रहा हो तो पक्षकारों को इसकी जानकारी होना चाहिए।
6. विशेषज्ञों की सहायता: अदालतों में एआई विशेषज्ञों की नियुक्ति की जा सकती है जो न्यायपालिका को तकनीकी निर्णयों में मार्गदर्शन दें।
निष्कर्ष
न्यायपालिका में एआई का उपयोग न्याय प्रणाली को अधिक तेज, पारदर्शी और सुलभ बना सकता है। लेकिन यह भी आवश्यक है कि एआई का प्रयोग इस तरह किया जाए कि मानवीय विवेक, नैतिकता और न्यायिक संवेदनशीलता को कमजोर न किया जाए, क्योंकि न्यायिक निर्णय प्रक्रिया का मूल आधार अभी भी मानव बुद्धि और विवेक ही है।
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