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न्यायपालिका में विविधता की आवश्यकता

हाल ही में, न्यायिक नियुक्तियों में विविधता लाने और सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) की क्षेत्रीय पीठों (regional benches) की स्थापना के उद्देश्य से संविधान में संशोधन करने के लिए राज्यसभा में एक गैर-सरकारी विधेयक (Private Member Bill) पेश किया गया है।

नए पेश किए गए गैर-सरकारी विधेयक के बारे में मुख्य बातें:

नियुक्तियों में सामाजिक विविधता: यह विधेयक अनिवार्य करता है कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति करते समय उनकी जनसंख्या के अनुपात में SC, ST, OBC, धार्मिक अल्पसंख्यकों और महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए।उदाहरण के लिए, 2018 से 2024 के बीच उच्च न्यायपालिका में नियुक्त न्यायाधीशों में से केवल 20% अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) से थे।महिलाओं और धार्मिक अल्पसंख्यकों का अनुपात क्रमशः 15% और 5% से भी कम है।

कॉलेजियम की सिफारिशों के लिए समय सीमा: नियुक्तियों में देरी और अनिश्चितता को कम करने के उद्देश्य से, यह विधेयक केंद्र सरकार के लिए कॉलेजियम की सिफारिशों को अधिसूचित करने हेतु 90 दिनों की अधिकतम समय सीमा भी निर्धारित करता है।

सर्वोच्च न्यायालय (SC) की क्षेत्रीय पीठें

  • इसका उद्देश्य नई दिल्ली, कोलकाता, मुंबई और चेन्नई में सर्वोच्च न्यायालय की क्षेत्रीय पीठों की स्थापना करना है, ताकि नागरिकों के लिए न्याय तक पहुँच में सुधार हो सके और लंबित मामलों के बोझ को कम किया जा सके।
  • ये क्षेत्रीय पीठें सर्वोच्च न्यायालय के पूर्ण क्षेत्राधिकार का प्रयोग करेंगी, सिवाय उन मामलों के जो संवैधानिक महत्व के हैं। संवैधानिक महत्व के मामलों की सुनवाई दिल्ली स्थित मुख्य संविधान पीठ द्वारा की जाएगी।

वर्तमान चुनौतियाँ:

  • पहुँच की समस्या: इस तथ्य को देखते हुए कि सर्वोच्च न्यायालय केवल दिल्ली में स्थित है, आम नागरिकों के लिए देश की सबसे बड़ी अदालत तक पहुँच आज भी एक चुनौती बनी हुई है।
  • मामलों का अंबार (Backlog): जनवरी 2026 तक सर्वोच्च न्यायालय में 90,000 से अधिक मामले लंबित हैं।

संविधान क्या प्रावधान करता है?

  • अनुच्छेद 124: यह प्रावधान करता है कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के परामर्श के बाद की जाएगी।
  • अनुच्छेद 217: इसके अनुसार, उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा मुख्य न्यायाधीश (CJI), संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और राज्य के राज्यपाल के परामर्श के बाद की जाएगी।
  • अनुच्छेद 130: यह व्यवस्था देता है कि सर्वोच्च न्यायालय का स्थान दिल्ली या ऐसा अन्य स्थान (या स्थान) होगा जिसे मुख्य न्यायाधीश (CJI) केंद्र सरकार के अनुमोदन से नियुक्त करें।

निजी सदस्य विधेयक (Private Member Bill) क्या है?

परिभाषा – संसद के किसी भी ऐसे सदस्य (सांसद) द्वारा पेश किया गया विधेयक जो मंत्री नहीं है (चाहे वह निर्वाचित हो या मनोनीत), उसे ‘निजी सदस्य विधेयक’ कहा जाता है।

उद्देश्य – विशिष्ट मुद्दों की ओर ध्यान आकर्षित करना, सुधारों का सुझाव देना, या उन मामलों को उजागर करना जो सरकार के तात्कालिक एजेंडे का हिस्सा नहीं हो सकते हैं।

मसौदा (Drafting) की जिम्मेदारी – इसकी पूरी जिम्मेदारी उस सांसद की होती है जिसने विधेयक पेश किया है।

नोटिस की अवधि – विधेयक पेश करने से पहले 1 महीने का नोटिस देना अनिवार्य है, जिसके लिए अध्यक्ष (लोकसभा) या सभापति (राज्यसभा) की अनुमति आवश्यक होती है।

संसद में प्रक्रिया

  • लोकसभा – प्रत्येक शुक्रवार के कार्यसमय के अंतिम ढाई घंटे ‘निजी सदस्य विधेयकों’ (PMBs) पर चर्चा के लिए आरक्षित होते हैं।
  • राज्यसभा – हर दूसरे शुक्रवार (alternate Friday) को ढाई घंटे (दोपहर 2:30 बजे से शाम 5:00 बजे तक) का समय आवंटित किया जाता है।

चरण – यह सरकारी विधेयकों के समान चरणों का पालन करता है—प्रथम वाचन, चर्चा, मतदान, और यदि दोनों सदनों द्वारा पारित हो जाता है, तो कानून बनने के लिए राष्ट्रपति की सहमति की आवश्यकता होती है।

कॉलेजियम प्रणाली (Collegium System) क्या है?

1980 के दशक से पूर्व की संवैधानिक प्रक्रिया: संविधान में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार, 1980 के दशक तक न्यायपालिका के परामर्श से सरकार द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति की जाती थी। उस समय कार्यपालिका (Executive) को प्राथमिकता प्राप्त थी क्योंकि वह जनता के प्रति जवाबदेह थी।

प्रथम न्यायाधीश मामला (1981): सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायिक नियुक्तियों में कार्यपालिका की प्रधानता को बरकरार रखा, क्योंकि कार्यपालिका जनता के प्रति उत्तरदायी होती है।

द्वितीय न्यायाधीश मामला (1993): न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने और इसे राजनीतिक पक्षपात से बचाने की आवश्यकता को देखते हुए कॉलेजियम प्रणाली का गठन किया गया।

आगे की राह क्या हो सकती है?

  • वर्तमान उत्तरदायित्व: न्यायाधीशों की नियुक्ति में सामाजिक विविधता सुनिश्चित करने का प्राथमिक उत्तरदायित्व कॉलेजियम प्रक्रिया के माध्यम से न्यायपालिका पर आता है।
  • नया गैर-सरकारी विधेयक : तत्काल सुधार के रूप में यह SC, ST, OBC, अल्पसंख्यकों और महिलाओं के लिए उपयुक्त प्रतिनिधित्व को अनिवार्य करेगा और वांछित उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए एक संवैधानिक निर्देश तैयार करेगा।
  • क्षेत्रीय पीठों की स्थापना: न्यायालय प्रारंभ में एक क्षेत्र में पीठ स्थापित करने पर विचार कर सकता है और समयबद्ध तरीके से अन्य क्षेत्रों में इसका विस्तार कर सकता है।
  • जैसा कि पूर्व में संसदीय समितियों और विधि आयोग द्वारा अनुशंसित किया गया है, संविधान के मौजूदा प्रावधानों के तहत ही सर्वोच्च न्यायालय की क्षेत्रीय पीठें स्थापित की जा सकती हैं।
  • NJAC को पुनर्जीवित करने के लिए सुधार: न्यायपालिका और कार्यपालिका से परे इसकी संरचना का विस्तार करके, इसमें दक्षिण अफ्रीका और यू.के. की तरह विधायिका, बार काउंसिल और शिक्षा जगत के प्रतिनिधियों को शामिल किया जा सकता है।
  • इससे परामर्श प्रक्रिया व्यापक और समावेशी बनेगी।

स्रोत: The Hindu 


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