भारत के संवैधानिक इतिहास में न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लोकतंत्र के एक अपरिहार्य स्तंभ के रूप में देखा गया है। हाल ही में संसद के 107 सदस्यों द्वारा मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जी. आर. स्वामीनाथन के विरुद्ध महाभियोग प्रस्ताव प्रस्तुत किए जाने से न्यायिक पदच्युति की प्रक्रिया पर पुनः राष्ट्रीय बहस प्रारंभ हो गई है।
यह विवाद केवल एक व्यक्ति विशेष तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रश्न उठाता है कि क्या भारत का संवैधानिक ढाँचा न्यायिक उत्तरदायित्व और स्वतंत्रता के बीच उपयुक्त संतुलन स्थापित कर सका है।
संवैधानिक और विधिक ढाँचा (Constitutional and Legal Framework)
- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124, 217, और 218 में सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया का वर्णन है।
जहाँ महाभियोग (Impeachment) शब्द राष्ट्रपति के संदर्भ में प्रयुक्त हुआ है, वहीं न्यायाधीशों के लिए ‘पद से हटाने (Removal)’ की अवधारणा को अपनाया गया है। - अनुच्छेद 124(5) संसद को यह अधिकार देता है कि वह न्यायाधीशों के विरुद्ध दुराचार या अक्षमता की जाँच और प्रमाणन हेतु विधि बनाए।
इसी के अंतर्गत न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 (Judges Inquiry Act, 1968) पारित किया गया, जिसका उद्देश्य था कि न्यायिक पदच्युति को अत्यंत कठिन बनाया जाए ताकि राजनीतिक दखल से न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुरक्षित रह सके।
दुराचार (Misbehaviour) का अर्थ और न्यायिक मानदंड (Judicial Standards)
- संविधान ‘दुराचार’ की परिभाषा नहीं देता, किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक निर्णयों में इसे स्पष्ट किया है कि प्रत्येक न्यायिक भूल ‘दुराचार’ नहीं होती।
केवल जानबूझकर किया गया पद का दुरुपयोग, भ्रष्टाचार, ईमानदारी का अभाव, या नैतिक पतन (moral turpitude) जैसे आचरण ही संविधान की दृष्टि में दुराचार माने जा सकते हैं। - यह सिद्धांत इस बात पर बल देता है कि न्यायपालिका का विश्वास जनता के मन में न्यायिक निष्पक्षता (judicial impartiality) और नैतिक मानकों (ethical integrity) की उच्चतम धारणा से ही निर्मित होता है।
प्रक्रियात्मक सुरक्षा और संसदीय भूमिका (Procedural Safeguards and Role of Parliament)
- न्यायाधीश को पद से हटाने की प्रक्रिया अत्यंत कठोर है।
किसी भी प्रस्ताव को लोकसभा के कम से कम 100 सदस्य या राज्यसभा के कम से कम 50 सदस्य हस्ताक्षर कर सकते हैं। - प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद, विशेष बहुमत (special majority) से दोनों सदनों में इसे पारित किया जाता है।
- इसके पश्चात्, उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीशों की एक जांच समिति (Inquiry Committee) आरोपों की वस्तुपरक जाँच करती है।
यह संरचना सुनिश्चित करती है कि न्यायिक पदच्युति की प्रक्रिया केवल ठोस और गंभीर परिस्थितियों में ही आरंभ हो।
मुख्य शिथिलता: प्रारंभिक चरण में विवेकाधिकार (Critical Loophole: Discretion at Threshold)
- इस प्रक्रिया की सबसे बड़ी कमजोरी प्रारंभिक स्तर पर है। न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) या राज्यसभा के सभापति (Chairman) को यह अधिकार है कि वे प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं।
- किंतु अधिनियम में इस निर्णय के लिए कोई स्पष्ट मानदंड (defined criteria) नहीं दिए गए हैं।
यदि अध्यक्ष/सभापति प्रस्ताव को अस्वीकार कर दें, तो प्रक्रिया तुरंत समाप्त हो जाती है, भले ही आरोप गंभीर हों या प्रस्ताव का समर्थन पर्याप्त हो। - यह स्थिति एक संवैधानिक शून्य (constitutional vacuum) उत्पन्न करती है, क्योंकि अध्यक्ष का विवेकाधिकार पूर्णतः असीमित (unfettered) है।
इससे राजनीतिक प्रभाव की संभावना बढ़ जाती है, और यह प्रक्रिया की विश्वसनीयता तथा पारदर्शिता (credibility and transparency) को कमजोर करती है।
संवैधानिक असंगति और लोकतांत्रिक प्रभाव (Constitutional Inconsistency and Democratic Implications)
- संविधान के अनुच्छेद 124(5) में केवल ‘जाँच और प्रमाणन की प्रक्रिया’ निर्धारित करने का अधिकार दिया गया है, परंतु यह कहीं नहीं कहा गया कि अध्यक्ष या सभापति को प्रस्ताव अस्वीकार करने का अधिकार है।
- न्यायिक दुराचार का निर्धारण किसी निष्पक्ष जांच समिति द्वारा किया जाना चाहिए, न कि राजनीतिक निर्णय प्रक्रिया से। इस प्रकार, प्रारंभिक अस्वीकृति का विवेकाधिकार संवैधानिक संतुलन के विरुद्ध है और यह लोकतांत्रिक पारदर्शिता को प्रभावित करता है।
- यदि सत्तारूढ़ बहुमत अध्यक्ष पर प्रभाव डाल सके, तो न्यायिक उत्तरदायित्व की पूरी संवैधानिक व्यवस्था निष्प्रभावी हो सकती है। यह न्यायिक स्वतंत्रता को नहीं, बल्कि जन विश्वास को कमजोर करता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
भारत की न्यायिक पदच्युति प्रणाली इस बात का प्रमाण है कि संविधान निर्माताओं ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अत्यधिक कठोर और बहु–स्तरीय प्रक्रिया अपनाई। परंतु प्रारंभिक स्तर पर अध्यक्ष या सभापति के असीम विवेकाधिकार ने इस संतुलन को बाधित कर दिया है।
इसलिए यह आवश्यक है कि इस प्रावधान की पुनर्समीक्षा की जाए ताकि कोई भी गंभीर आरोप निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच से गुज़र सके।
यदि इस दिशा में सुधार किए जाएँ, तो यह कदम संवैधानिक शासन (constitutional governance) को सुदृढ़ करेगा और न्यायपालिका की स्वायत्तता (judicial autonomy) को बनाए रखेगा।
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