परमाणु हथियारों का नियंत्रण अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था का एक केंद्रीय स्तंभ रहा है। शीत युद्ध के दौर में अमेरिका और सोवियत संघ के बीच शुरू हुई हथियारों की होड़ ने मानव अस्तित्व के लिए अभूतपूर्व खतरे पैदा किए। इसी पृष्ठभूमि में Strategic Arms Control Treaties का विकास हुआ, जिनकी अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण कड़ी न्यू START (2010) मानी जाती है। 2026 में इसके समाप्ति ने वैश्विक रणनीतिक स्थिरता को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
न्यू स्ट्रैटेजिक आर्म्स रिडक्शन ट्रीटी (New START) 5 फ़रवरी 2026 को समाप्त हो गई। इसके साथ ही अमेरिका और रूस के बीच अंतिम कानूनी रूप से बाध्यकारी परमाणु हथियार नियंत्रण समझौते का अंत हो गया है। इसकी समाप्ति के बाद 1972 के बाद पहली बार अमेरिका-रूस के रणनीतिक परमाणु हथियारों पर कोई कानूनी सीमा नहीं रह गई है। इससे हथियारों की दौड़, गलत आकलन और सैन्य तनाव के बढ़ने का खतरा बढ़ गया है तथा भविष्य के हथियार नियंत्रण प्रयास कमजोर पड़ गए हैं। इस लेख में न्यू START संधि का विस्तृत रूप से विश्लेषण किया गया है।
न्यू START संधि क्या है?
START का अर्थ है Strategic Arms Reduction Treaty (रणनीतिक हथियार कटौती संधि)।
- START-I पर 1991 में अमेरिका और सोवियत संघ के बीच हस्ताक्षर हुए, जो 1994 में लागू हुई।
- इसके बाद SORT (Strategic Offensive Reductions Treaty) आई।
- फिर New START संधि पर 2010 में हस्ताक्षर हुए और यह 2011 में लागू हुई।
- 2021 में इसे 2026 तक बढ़ाया गया था। लेकिन यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में रूस ने 2023 में अपनी भागीदारी निलंबित कर दी, जिसके कारण निरीक्षण और डेटा साझा करने की प्रक्रिया रुक गई।
मुख्य प्रावधान
- यह संधि उन लंबी दूरी के हथियारों को सीमित करती है जो युद्ध के परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं, जैसे-
- शक्ति केंद्र
- कमांड एवं नियंत्रण सुविधाएँ
- महत्वपूर्ण अवसंरचना
- साथ ही यह रणनीतिक हथियारों में सत्यापन योग्य कटौती सुनिश्चित करती है।
हथियार नियंत्रण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: न्यू START से पहले की संधियाँ
- परमाणु अप्रसार संधि (NPT), 1968
NPT ने पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर परमाणु हथियारों के प्रसार को सीमित करने का प्रयास किया। इसका उद्देश्य था:
- नए देशों को परमाणु हथियार विकसित करने से रोकना
- परमाणु ऊर्जा का शांतिपूर्ण उपयोग
- दीर्घकालीन निरस्त्रीकरण
हालाँकि, यह संधि अमेरिका–सोवियत हथियार प्रतिस्पर्धा को सीधे नियंत्रित नहीं कर सकी।

- SALT–I (1972) और SALT–II (1979)
Strategic Arms Limitation Talks (SALT) ने पहली बार अमेरिका और सोवियत संघ के रणनीतिक हथियारों पर सीमा लगाने का प्रयास किया।
- SALT–I ने ICBM और SLBM की संख्या सीमित की
- SALT–II अधिक व्यापक थी, लेकिन अमेरिकी सीनेट द्वारा अनुमोदन न मिलने से प्रभावी नहीं हो सकी
इन संधियों की मूल कमजोरी यह थी कि ये कटौती नहीं बल्कि केवल सीमांकन तक सीमित थीं।
- INF Treaty, 1987
INF संधि ऐतिहासिक इसलिए थी क्योंकि इसने:
- 500–5500 किमी रेंज की मिसाइलों की पूरी श्रेणी को समाप्त किया
- प्रभावी सत्यापन प्रणाली लागू की
यह शीत युद्ध के अंत की दिशा में एक निर्णायक कदम था, किंतु 2019 में यह संधि भी समाप्त हो गई।
- START–I और START–II (1991–1993)
SALT से आगे बढ़ते हुए START (Strategic Arms Reduction Treaty) ने वास्तविक हथियार कटौती पर जोर दिया।
- START–I सफल रही और बड़े पैमाने पर हथियार घटाए गए
- START–II तकनीकी और राजनीतिक कारणों से लागू नहीं हो सकी
परमाणु शक्ति का संतुलन (Nuclear Balance of Power)
अमेरिका और रूस आज भी वैश्विक परमाणु व्यवस्था के केंद्र में हैं।
दुनिया में मौजूद कुल परमाणु हथियारों का लगभग 87% इन्हीं दो देशों के पास है। इसका अर्थ यह है कि
- दोनों देशों के पास इतनी परमाणु क्षमता है कि वे
- एक-दूसरे को पूर्णतः नष्ट कर सकते हैं, और
- पृथ्वी पर कई बार वैश्विक विनाश (Global Annihilation) ला सकते हैं।
इसी स्थिति को अंतरराष्ट्रीय राजनीति में “Mutually Assured Destruction (MAD)” कहा जाता है, अर्थात यदि कोई एक देश परमाणु हमला करेगा, तो दूसरा भी प्रत्युत्तर देगा, जिससे दोनों का विनाश निश्चित है।
इसी विनाशकारी क्षमता को नियंत्रित और संतुलित रखने के लिए न्यू START जैसी संधियाँ आवश्यक थीं।
न्यू START संधि के अंतर्गत तय की गई सीमाएँ
न्यू START संधि का उद्देश्य परमाणु हथियारों की संख्या कम करना, पारदर्शिता बढ़ाना और गलत आकलन से बचना था। इसके तहत अमेरिका और रूस पर निम्न सीमाएँ लागू थीं:
(i) 700 तैनात ICBMs, SLBMs और बमवर्षक
- ICBM (Intercontinental Ballistic Missile): महाद्वीपों के बीच मार करने वाली मिसाइलें
- SLBM (Submarine-Launched Ballistic Missile): पनडुब्बियों से छोड़ी जाने वाली मिसाइलें
- Strategic Bombers: परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम विमान
इन तीनों को मिलाकर केवल 700 ही तैनात किए जा सकते थे, जिससे अचानक हमले की संभावना कम होती थी।
(ii) 1,550 परमाणु वारहेड
- एक मिसाइल पर कई वारहेड लगाए जा सकते हैं (MIRVs)।
- न्यू START ने यह सुनिश्चित किया कि कुल तैनात परमाणु वारहेड 1,550 से अधिक न हों।
इससे विनाश की तीव्रता को सीमित करने का प्रयास किया गया।
(iii) 800 तैनात और गैर–तैनात लॉन्चर एवं बमवर्षक
- इसमें सक्रिय (deployed) और भंडारण में रखे गए (non-deployed)
लॉन्चर और बमवर्षक शामिल थे।
उद्देश्य यह था कि कोई भी देश गुप्त रूप से बड़ी सैन्य क्षमता न जुटा सके।
संधि के कमजोर होने के प्रमुख कारण (लगातार तनाव)
हालाँकि न्यू START एक महत्वपूर्ण संधि थी, लेकिन समय के साथ कई रणनीतिक और तकनीकी कारणों से यह कमजोर होती चली गई।
(i) अमेरिकी मिसाइल रक्षा प्रणाली (US Missile Defence System)
- अमेरिका ने ऐसी प्रणालियाँ विकसित कीं जो दुश्मन की मिसाइलों को हवा में ही नष्ट कर सकती हैं। रूस को आशंका हुई कि: यदि अमेरिका उसकी मिसाइलों को रोकने में सक्षम हो गया, तो परमाणु संतुलन बिगड़ जाएगा, क्योंकि अमेरिका को पहले हमला करने का लाभ मिल सकता है। इससे रणनीतिक असंतुलन पैदा हुआ।
(ii) पारंपरिक स्ट्राइक क्षमताएँ (Conventional Strike Capabilities)
- अमेरिका ने अत्यंत सटीक और तीव्र गति वाले गैर–परमाणु हथियार विकसित किए
(जैसे: Prompt Global Strike)। रूस का तर्क था कि हथियार बिना परमाणु उपयोग के भी
उसके कमांड सेंटर और परमाणु प्रतिष्ठानों को नष्ट कर सकते हैं।
इससे परमाणु और गैर-परमाणु हथियारों के बीच की रेखा धुंधली हो गई।
(iii) रूस के उन्नत हथियार
रूस ने अमेरिकी क्षमताओं के जवाब में नई तकनीकें विकसित कीं:
किनझाल (Kinzhal) मिसाइल
- हाइपरसोनिक गति (Mach 10 तक)
- मौजूदा मिसाइल रक्षा प्रणालियों को चकमा देने में सक्षम
- परमाणु और पारंपरिक दोनों हथियार ले जा सकती है
अवांगार्ड (Avangard) हाइपरसोनिक ग्लाइड वाहन
- वातावरण के भीतर दिशा बदलते हुए उड़ान
- रडार और रक्षा प्रणालियों के लिए लगभग अप्रत्याशित
अमेरिका ने इन्हें अत्यंत अस्थिरकारी (Destabilising) माना।
रणनीतिक प्रासंगिकता और वैश्विक प्रभाव
- हथियारों की नई दौड़ (New Arms Race): न्यू START की समाप्ति से हथियारों की संख्या पर कोई कानूनी सीमा नहीं रहेगी और विश्वास-निर्माण तंत्र कमजोर होगा।
- परमाणु जोखिम में वृद्धि: गलत आकलन (miscalculation) और आकस्मिक टकराव की संभावना बढ़ेगी, विशेषकर संकट काल में।
- वैश्विक अप्रसार व्यवस्था पर प्रभाव: यदि अमेरिका और रूस जैसे देश संधियों से पीछे हटते हैं, तो NPT की नैतिक और राजनीतिक वैधता भी कमजोर होगी।
भारत जैसे देशों के लिए निहितार्थ
- रणनीतिक अनिश्चितता बढ़ेगी।
- परमाणु सिद्धांतों (Credible Minimum Deterrence) पर पुनर्विचार का दबाव बढेगा।
- वैश्विक निरस्त्रीकरण मंचों पर भारत की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण इसलिए इस सन्दर्भ में भारत की चुनौती भी बढ़ेगी।
निष्कर्ष
न्यू START की समाप्ति केवल एक संधि का अंत नहीं, बल्कि शीत युद्ध के बाद बनी हथियार नियंत्रण व्यवस्था के विघटन का संकेत है। इतिहास बताता है कि जब-जब हथियार नियंत्रण तंत्र कमजोर हुआ है, वैश्विक सुरक्षा अधिक अस्थिर बनी है। ऐसे में भविष्य की चुनौती केवल नई संधि बनाना नहीं, बल्कि बदलती तकनीक और बहुध्रुवीय विश्व को समाहित करने वाली नई रणनीतिक सोच विकसित करना है।
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