वर्तमान चर्चा का कारण:
इस विषय पर वर्तमान में गहन चर्चा का मुख्य कारण 5 फरवरी, 2026 की वह समय-सीमा है, जब रूस और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच परमाणु हथियारों को नियंत्रित करने वाली अंतिम जीवित संधि, ‘न्यू स्टार्ट’ (New START), तकनीकी रूप से अपने अंत के मुहाने पर खड़ी है। फरवरी 2021 में इस संधि को पांच वर्षों के लिए विस्तारित किया गया था, जिसकी अवधि आज समाप्त हो रही है। यूक्रेन युद्ध के कारण रूस द्वारा इस संधि में अपनी भागीदारी को पहले ही ‘निलंबित’ किए जाने और अमेरिका के साथ निरीक्षण प्रक्रियाओं को रोक देने के कारण, आज यह संधि केवल कागजों तक सीमित रह गई है। शीत युद्ध के बाद यह पहला अवसर है जब दुनिया की दो सबसे बड़ी परमाणु शक्तियां किसी भी प्रकार के निगरानी तंत्र या हथियार नियंत्रण समझौते के दायरे से बाहर हैं। यह शून्य की स्थिति वैश्विक सुरक्षा के लिए एक ‘खतरनाक मोड़’ मानी जा रही है।
विगत संधियों का संक्षिप्त इतिहास:
आज हम जिस परमाणु अनिश्चितता के दौर में खड़े हैं, उसे समझने के लिए उन संधियों के इतिहास को देखना आवश्यक है जिन्होंने दशकों तक दुनिया को सुरक्षित रखा। परमाणु नियंत्रण की यात्रा शीत युद्ध के तनाव को कम करने के प्रयासों से शुरू हुई थी।
1. साल्ट-I और साल्ट-II (Strategic Arms Limitation Talks): 1960 के दशक के अंत में, अमेरिका और सोवियत संघ ने महसूस किया कि हथियारों की अंधी दौड़ दोनों को आर्थिक रूप से तबाह कर देगी। इसके परिणामस्वरूप 1972 में ‘साल्ट-I’ पर हस्ताक्षर हुए, जिसने एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल (ABM) प्रणालियों और रणनीतिक मिसाइल लॉन्चर्स की संख्या को सीमित किया। इसके बाद 1979 में ‘साल्ट-II’ आया, जिसने और अधिक कड़े प्रतिबंध लगाने की कोशिश की। हालांकि, सोवियत संघ के अफगानिस्तान पर आक्रमण के बाद अमेरिकी सीनेट ने इसे कभी मंजूरी नहीं दी, फिर भी दोनों पक्षों ने अनौपचारिक रूप से इसकी सीमाओं का पालन किया।
2. आईएनएफ संधि (Intermediate-Range Nuclear Forces Treaty): 1987 में हस्ताक्षरित यह संधि इतिहास की सबसे सफल संधियों में से एक मानी जाती है। रोनाल्ड रीगन और मिखाइल गोर्बाचेव के बीच हुए इस समझौते ने पहली बार परमाणु हथियारों की एक पूरी श्रेणी (500 से 5,500 किमी रेंज की मिसाइलें) को नष्ट करने का निर्णय लिया। इसने यूरोप से परमाणु युद्ध के तात्कालिक खतरे को टाल दिया था।

3. पतन की शुरुआत: परमाणु नियंत्रण की यह इमारत 2019 में ढहनी शुरू हुई जब अमेरिका ने रूस पर उल्लंघन का आरोप लगाते हुए आईएनएफ संधि से हाथ खींच लिए। इसके बाद ‘ओपन स्काइज संधि’ का भी अंत हो गया। अब ‘न्यू स्टार्ट’ का समाप्त होना उस अंतिम धागे का टूटना है जिसने परमाणु महाशक्तियों को पारदर्शिता की मेज पर बांध रखा था।
न्यू स्टार्ट संधि का रणनीतिक ढांचा और वर्तमान गतिरोध
‘न्यू स्टार्ट’ संधि 2011 में लागू हुई थी। इसका मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच तैनात परमाणु वारहेड्स की संख्या को 1,550 तक सीमित करना था। यह संधि केवल संख्या तय करने के बारे में नहीं थी, बल्कि यह ‘पारदर्शिता’ का एक सशक्त माध्यम थी। इसके तहत दोनों देशों को साल में 18 बार एक-दूसरे के परमाणु ठिकानों का भौतिक निरीक्षण करने की अनुमति थी।
वर्तमान गतिरोध का कारण भू-राजनीतिक है। यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में रूस का तर्क है कि अमेरिका, यूक्रेन को आधुनिक हथियारों की आपूर्ति करके रूस को ‘रणनीतिक हार’ देने की कोशिश कर रहा है। ऐसी स्थिति में, मॉस्को का मानना है कि वह अमेरिकी निरीक्षकों को अपने सबसे संवेदनशील परमाणु ठिकानों के पास फटकने की अनुमति नहीं दे सकता। अमेरिका ने इसे परमाणु ब्लैकमेलिंग करार दिया है, जिससे एक ऐसा ‘डेडलॉक’ पैदा हो गया है जिसका समाधान कूटनीतिक मेज पर नजर नहीं आ रहा।
नई शस्त्र स्पर्धा (Arms Race) और चीन का उदय
संधि के समाप्त होने का सबसे भयावह परिणाम एक अनियंत्रित शस्त्र स्पर्धा के रूप में सामने आ रहा है। 2026 का परिदृश्य शीत युद्ध से कहीं अधिक जटिल है क्योंकि अब यह केवल द्वि-ध्रुवीय नहीं रहा। चीन एक तीसरी बड़ी शक्ति के रूप में तेजी से अपने परमाणु शस्त्रागार का विस्तार कर रहा है। पेंटागन की रिपोर्टों के अनुसार, चीन अगले दशक तक 1,500 से अधिक वारहेड्स तैनात करने की दिशा में बढ़ रहा है।
जब अमेरिका और रूस के बीच की सीमाएं हटती हैं, तो यह न केवल वारहेड्स की संख्या बढ़ाएगा, बल्कि ‘हाइपरसोनिक हथियारों’ के विकास को भी गति देगा। ये हथियार इतनी तेज गति से चलते हैं कि वर्तमान मिसाइल डिफेंस सिस्टम इन्हें रोकने में सक्षम नहीं हैं। बिना किसी संधि के, दुनिया अब एक ऐसी ‘अंधेरी सुरंग’ में प्रवेश कर रही है जहाँ परमाणु शक्तियों को एक-दूसरे की गुप्त क्षमताओं का अंदाजा नहीं होगा, जिससे गलतफहमी के कारण युद्ध छिड़ने का खतरा बढ़ जाएगा।
परमाणु अप्रसार (NPT) और वैश्विक सुरक्षा पर संकट
‘न्यू स्टार्ट’ का अंत ‘परमाणु अप्रसार संधि’ (NPT) के मूल सिद्धांतों पर प्रहार है। NPT के तहत, परमाणु हथियार संपन्न देशों ने वादा किया था कि वे धीरे-धीरे निःशस्त्रीकरण की ओर बढ़ेंगे। यदि दुनिया की दो सबसे बड़ी शक्तियां ही संधि तोड़ती हैं, तो अन्य गैर-परमाणु देशों (जैसे ईरान या सऊदी अरब) के पास परमाणु हथियार हासिल करने का प्रलोभन बढ़ जाएगा।
यह स्थिति क्षेत्रीय संतुलन को बिगाड़ सकती है। दक्षिण एशिया से लेकर मध्य पूर्व तक, परमाणु होड़ का एक नया दौर शुरू हो सकता है। जब नियंत्रण की वैश्विक व्यवस्था ढहती है, तो अंतरराष्ट्रीय कानून की साख भी गिरती है, जिससे भविष्य में किसी भी नए शांति समझौते की संभावना क्षीण हो जाती है।
एआई और साइबर तकनीक: जोखिम का नया आयाम
2026 में परमाणु हथियारों की चर्चा बिना आधुनिक तकनीक के अधूरी है। आज परमाणु कमांड और कंट्रोल सिस्टम में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का उपयोग बढ़ रहा है। विशेषज्ञों को डर है कि संधि और निरीक्षण के अभाव में, देश अपनी मिसाइलों को ‘लॉन्च ऑन वार्निंग’ (चेतावनी मिलते ही हमला) मोड पर रख सकते हैं। यदि इसमें किसी साइबर हमले या एआई की तकनीकी गड़बड़ी के कारण गलत चेतावनी जारी होती है, तो मानवता के पास सुधार का कोई मौका नहीं बचेगा। पारदर्शी संधियाँ इस तरह के ‘तकनीकी एक्सीडेंट्स’ को रोकने में मदद करती थीं।
निष्कर्ष:
परमाणु हथियारों का नियंत्रण कोई विकल्प नहीं, बल्कि मानवता के अस्तित्व की अनिवार्य शर्त है। ‘न्यू स्टार्ट’ का अंत एक युग की समाप्ति जैसा महसूस हो रहा है, लेकिन यह एक नई और अधिक समावेशी व्यवस्था बनाने का अवसर भी हो सकता है। आज आवश्यकता एक ऐसी त्रिपक्षीय या बहुपक्षीय संधि की है जिसमें न केवल अमेरिका और रूस, बल्कि चीन को भी मेज पर लाया जाए।
वैश्विक समुदाय और भारत जैसे जिम्मेदार राष्ट्रों को परमाणु शक्तियों पर दबाव बनाना होगा कि वे कम से कम ‘डेटा साझाकरण’ और ‘हॉटलाइन’ जैसे संचार माध्यमों को जीवित रखें। महाशक्तियों को यह समझना होगा कि सुरक्षा हथियारों के ढेर में नहीं, बल्कि आपसी विश्वास और नियंत्रण के नियमों में निहित है। समय की मांग है कि राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर इस परमाणु प्रलय के पहिये को रोका जाए, अन्यथा हम एक ऐसी दुनिया की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ शांति केवल दो युद्धों के बीच का एक छोटा सा अंतराल बनकर रह जाएगी।
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