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पाकिस्तान-अफ़गानिस्तान संघर्ष

27 फरवरी 2026 की सुबह जब दक्षिण एशिया अभी जाग ही रहा था, पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के एक सोशल मीडिया पोस्ट ने पूरी दुनिया को सन्न कर दिया। उन्होंने उर्दू में लिखा— “अब हमारे और तुम्हारे बीच खुली जंग है।” यह सिर्फ एक नेता का गुस्सा नहीं था, बल्कि उस आग की लपट थी जो पिछले पाँच सालों से इस्लामाबाद और काबुल के बीच सुलग रही थी। परमाणु शक्ति संपन्न पाकिस्तान और तालिबान के शासन वाले अफ़गानिस्तान के बीच इस ‘युद्ध के ऐलान’ ने न केवल दोनों देशों को डरा दिया है, बल्कि पूरे इलाके के समीकरण बदल दिए हैं।

इस तनाव की शुरुआत 23 फरवरी की रात को हुई, जब पाकिस्तानी वायुसेना ने अफ़गानिस्तान के पक्तिका और खोस्त प्रांतों में बमबारी की। पाकिस्तान का कहना था कि उसने ‘तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान’ (TTP) के ठिकानों को तबाह किया है, लेकिन काबुल ने इसे मासूम नागरिकों का कत्लेआम करार दिया। जवाब में तालिबान ने पाकिस्तानी सीमा चौकियों पर गोले बरसाए। देखते ही देखते आरोप-प्रत्यारोप और हमलों का एक ऐसा सिलसिला शुरू हुआ जिसने दशकों पुराने विवाद को फिर से हवा दे दी।

रक्षा मंत्री आसिफ ने अफ़गानिस्तान पर सीधा आरोप लगाया कि उसने खुद को “भारत का उपनिवेश (Colony)” बना लिया है और वह आतंकियों को पनाह दे रहा है। यह बयान पाकिस्तान की उस हताशा को दिखाता है कि जिस तालिबान को उसने कभी अपना सबसे बड़ा साथी माना था, वही आज उसका सबसे बड़ा दुश्मन बन गया है।

इतिहास की विडंबना: पालने वाला ही बना निशाना

यह इतिहास का सबसे अजीब मोड़ है। 1990 के दशक में पाकिस्तान ने ही तालिबान को पाला-पोसा था ताकि अफ़गानिस्तान में उसका प्रभाव रहे और वह भारत को घेर सके। 2001 में जब अमेरिका ने तालिबान को सत्ता से हटाया, तब भी पाकिस्तान ने उन्हें अपने यहाँ सुरक्षित ठिकाने दिए।

लेकिन अगस्त 2021 में जब तालिबान दोबारा काबुल की सत्ता पर काबिज हुआ, तो पाकिस्तान की खुशियाँ ज्यादा दिन नहीं टिकीं। जिस तालिबान से पाकिस्तान को वफादारी की उम्मीद थी, उसने सबसे पहले ‘डूरंड रेखा’ (दोनों देशों के बीच की सीमा) को मानने से इनकार कर दिया।

TTP: वह घाव जो नासूर बन गया

दोनों देशों के बीच झगड़े की सबसे बड़ी जड़ TTP (पाकिस्तानी तालिबान) है। ये लड़ाके अफ़गानिस्तान की ज़मीन का इस्तेमाल कर पाकिस्तान के भीतर बड़े हमले कर रहे हैं। 2021 के बाद से पाकिस्तान में पुलिस और फौज पर हमलों में भारी बढ़ोतरी हुई है। पाकिस्तान का कहना है कि काबुल इन आतंकियों को रोक नहीं रहा, जबकि तालिबान इसे पाकिस्तान की “अंदरूनी समस्या” बताकर पल्ला झाड़ लेता है।

डूरंड रेखा: विवाद की असली जड़

2,600 किलोमीटर लंबी यह सीमा रेखा ब्रिटिश राज की देन है। यह रेखा पश्तून समुदाय के लोगों को दो हिस्सों में बांटती है। पाकिस्तान इसे अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर मानता है, लेकिन अफ़गानिस्तान इसे कभी स्वीकार नहीं करता।

जब भी पाकिस्तान इस बॉर्डर पर बाड़ (Fencing) लगाने की कोशिश करता है, तालिबान लड़ाके उसे उखाड़ फेंकते हैं। यह सिर्फ ज़मीन का नहीं, बल्कि पहचान और सम्मान का भी मुद्दा बन चुका है।

भारत का ‘खौफ’ और पाकिस्तान की बेचैनी

ख्वाजा आसिफ के बयान में भारत का जिक्र करना पाकिस्तान के पुराने डर को दिखाता है। पाकिस्तान इस बात से परेशान है कि तालिबान अब भारत के साथ हाथ मिला रहा है। भारत ने काबुल में अपना दूतावास फिर से खोल दिया है और मानवीय मदद के जरिए अफ़गानों का दिल जीत रहा है। पाकिस्तान को डर है कि उसका ‘रणनीतिक प्रभाव’ अब खत्म हो रहा है।

ताकत का संतुलन और युद्ध का अंजाम

अगर सच में युद्ध होता है, तो कागजों पर पाकिस्तान बहुत शक्तिशाली है।

  • पाकिस्तान: 6 लाख सैनिक, आधुनिक लड़ाकू विमान और परमाणु हथियार।
  • अफ़गानिस्तान: 2 लाख से कम सैनिक, नाममात्र की वायुसेना और खस्ताहाल अर्थव्यवस्था।

लेकिन इतिहास गवाह है कि अफ़गानिस्तान को हराना नामुमकिन है। तालिबान ने अमेरिका जैसी महाशक्ति को छापामार युद्ध (Guerrilla Warfare) से हरा दिया। अफ़गानिस्तान के ऊबड़-खाबड़ पहाड़ और लड़ाकों का जज्बा किसी भी आधुनिक फौज को घुटने टेकने पर मजबूर कर सकता है।

निष्कर्ष:

इस पूरे संकट की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि यह खुद का पैदा किया हुआ संकट है। पाकिस्तान ने जिस कट्टरपंथी विचारधारा के बीज बोए थे, आज वही फसल उसे काटनी पड़ रही है। आज पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान एक ऐसे जाल में फँसे हैं जिसे उन्होंने खुद ही बुना था।

दक्षिण एशिया के लिए यह एक गंभीर चेतावनी है। अगर कूटनीति काम नहीं आई और ये ‘खुली जंग’ बड़े स्तर पर शुरू हुई, तो इसकी आग पूरे क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लेगी। सवाल अब यह नहीं है कि कौन जीतेगा, सवाल यह है कि इस तबाही को रोकेगा कौन?

स्रोत: Indian Express


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