भारत के न्यायिक इतिहास में न्यायमूर्ति हंस राज खन्ना (Justice H. R. Khanna) का नाम न केवल उनके साहसपूर्ण न्यायिक निर्णयों के लिए अमर है, बल्कि उनके अकादमिक योगदान के लिए भी उनका सम्मान किया जाता है। उनकी कालजयी कृति ‘मेकिंग ऑफ इंडियाज कॉन्स्टिट्यूशन’ संविधान के निर्माण की प्रक्रिया का एक ऐसा दुर्लभ और गहन दस्तावेज़ है, जिसे किसी न्यायाधीश के अद्वितीय बौद्धिक और नैतिक दृष्टिकोण से देखा गया है। यह पुस्तक केवल ऐतिहासिक तथ्यों का संकलन नहीं है, बल्कि यह उस महान दार्शनिक और राजनीतिक मंथन का जीवंत चित्रण है जिसने 20वीं शताब्दी के मध्य में आधुनिक भारत की नींव रखी। जस्टिस खन्ना अपनी बेदाग़ लेखन शैली और स्पष्ट विश्लेषण क्षमता के साथ, संविधान को एक जीवंत दस्तावेज के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जो आज भी राष्ट्र की नियति को आकार दे रहा है।

यह पुस्तक हमें उस ऐतिहासिक मोड़ पर वापस ले जाती है जब विभाजन की त्रासदी, रियासतों के एकीकरण की चुनौती और गरीबी तथा निरक्षरता के व्यापक अंधेरे के बीच, भारत के भविष्य को सुनिश्चित करने का दायित्व संविधान सभा के कंधों पर था। जस्टिस खन्ना ने अत्यंत सरल और सुलभ भाषा का प्रयोग किया है, जिससे यह कृति एक आम नागरिक, कानूनी छात्र, और अनुभवी विद्वान, तीनों के लिए समान रूप से महत्त्वपूर्ण बन जाती है। वे जटिल संवैधानिक सिद्धांतों और प्रावधानों की जटिलताओं को इस तरह से खोलते हैं कि पाठक ‘क्यों’ और ‘कैसे’ जैसे मूल प्रश्नों के उत्तर पा सकता है। वे हमें याद दिलाते हैं कि हमारा संविधान किसी एक दिन का उत्पाद नहीं था, बल्कि यह सदियों के संघर्ष, राजनीतिक अनुभवों और विश्व के सर्वश्रेष्ठ लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अध्ययन का परिणाम था।
संवैधानिक दर्शन और बहसों का गहन चित्रण
पुस्तक का केंद्रीय आकर्षण संविधान सभा की विस्तृत और कभी-कभी तीखी बहसों का उनका विश्लेषण है। जस्टिस खन्ना केवल प्रमुख समितियों और उनके अध्यक्षों का विवरण नहीं देते, बल्कि उन अंतर्धाराओं और वैचारिक संघर्षों को उजागर करते हैं जो डॉ. बी. आर. अम्बेडकर, पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, और अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर जैसे दिग्गजों के विचारों से उत्पन्न हुए थे। वे दर्शाते हैं कि ‘मूलभूत अधिकार’ को कैसे स्थापित किया गया, जहाँ नागरिकों की स्वतंत्रता और राज्य की सामाजिक सुधार की शक्ति के बीच लगातार संतुलन बनाने का प्रयास किया गया।
उदाहरण के लिए, ‘संपत्ति के अधिकार’ पर हुए मतभेद और अंततः इसके संशोधन की लंबी प्रक्रिया, या ‘राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों (DPSP)’ को संविधान में शामिल करने का तर्क—कि ये सिद्धांत भले ही अदालतों में प्रवर्तनीय (enforceable) न हों, लेकिन वे भारत के शासन के लिए एक नैतिक और सामाजिक मार्गदर्शक का काम करेंगे—का वर्णन लेखक ने गहन दार्शनिक अंतर्दृष्टि के साथ किया है। वे स्पष्ट करते हैं कि DPSP को शामिल करना संविधान निर्माताओं की उस दूरदर्शिता को दर्शाता है, जिसमें उन्होंने माना कि राजनीतिक लोकतंत्र तब तक अधूरा है जब तक कि यह सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की नींव पर खड़ा न हो। खन्ना बताते हैं कि कैसे संविधान निर्माताओं ने आयरलैंड और अन्य देशों के अनुभवों से सीखते हुए DPSP को भारतीय सामाजिक न्याय की आवश्यकता के अनुरूप ढाला।

न्यायमूर्ति खन्ना का कार्य संविधान के संघीय और एकात्मक तत्वों के बीच मौजूद अद्वितीय संतुलन को रेखांकित करता है। वे दिखाते हैं कि अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे “शुद्ध” संघीय ढाँचों के विपरीत, भारत ने “मज़बूत केंद्र” के साथ एक संघीय प्रणाली क्यों अपनाई। यह निर्णय किसी राजनीतिक सनक का परिणाम नहीं था, बल्कि विभाजन, रियासतों के एकीकरण और देश की एकता को किसी भी कीमत पर बनाए रखने की ऐतिहासिक आवश्यकता पर आधारित था। वे आपातकालीन प्रावधानों जैसे कठोर तत्वों के समावेश के पीछे के तर्कों को भी ईमानदारी से प्रस्तुत करते हैं, यह स्वीकार करते हुए कि इन प्रावधानों को केवल राष्ट्र की सुरक्षा और अखंडता को अक्षुण्ण रखने के लिए ‘अंतिम उपाय’ के रूप में देखा गया था।
न्यायिक दृष्टिकोण की विशिष्टता और मूल्य
जस्टिस खन्ना की पुस्तक का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू इसका न्यायिक दृष्टिकोण है। एक अनुभवी न्यायाधीश होने के नाते, वे संवैधानिक पाठ को केवल शब्दों के संग्रह के रूप में नहीं देखते, बल्कि ‘कानून की आत्मा’ और भविष्य की न्यायिक व्याख्याओं के आधार के रूप में देखते हैं।
वे उन प्रावधानों पर गहराई से विचार करते हैं जो बाद में न्यायिक इतिहास के सबसे बड़े मुकदमों का केंद्र बने—जैसे अनुच्छेद 368 (संविधान संशोधन की शक्ति) और अनुच्छेद 14, 19 और 21 (मौलिक अधिकार)। यह अंतर्दृष्टि इस पुस्तक को अन्य राजनीतिक इतिहास की पुस्तकों से अलग करती है। पाठक को यह समझने में मदद मिलती है कि संविधान निर्माता किसी प्रावधान को लिखते समय किन संभावित चुनौतियों की कल्पना कर रहे थे और उनका वास्तविक इरादा (Original Intent) क्या था। यह विश्लेषण न्यायिक समीक्षा, संसदीय संप्रभुता और मौलिक अधिकारों की रक्षा के बीच संतुलन को समझने के लिए आवश्यक है।
खन्ना इस बात पर बल देते हैं कि संविधान की सफलता केवल उसके शब्दों में नहीं है, बल्कि उन व्यक्तियों की संवैधानिक नैतिकता में है जो उसे लागू करते हैं। यह विचार जस्टिस खन्ना के स्वयं के जीवन से गहराई से जुड़ा हुआ है, विशेषकर उनके उस असाधारण निर्णय से जब उन्होंने आपातकाल के दौरान स्वतंत्रता के अधिकार का बचाव किया था। यद्यपि पुस्तक का मुख्य ध्यान निर्माण पर है, लेकिन उनका अंतर्निहित संदेश यह है कि संविधान को समझने का अर्थ है उन आदर्शों को समझना जिनके लिए इसे रचा गया था।
‘मेकिंग ऑफ इंडियाज कॉन्स्टिट्यूशन’ को उसकी शैक्षिक और प्रेरणादायक अपील के लिए उच्च दर्जा दिया जाता है। जस्टिस खन्ना की सहज और बेदाग़ लेखन शैली ने इसे उन जटिल अवधारणाओं से मुक्त कर दिया है जो अक्सर संवैधानिक ग्रंथों को नीरस बना देती हैं। वे अपनी बातों को दृढ़ता और तर्क के साथ प्रस्तुत करते हैं, जिससे पाठक उनके विश्लेषण की सत्यनिष्ठा पर विश्वास कर पाता है।
पुस्तक हमें यह भी याद दिलाती है कि संविधान का निर्माण एक जीवंत, विकासशील प्रक्रिया थी, जिसमें कई असहमति के बावजूद, अंतिम लक्ष्य एक मजबूत, लोकतांत्रिक और न्यायपूर्ण राष्ट्र की स्थापना करना था। यह कृति भारतीय संवैधानिक यात्रा के अडिग साहस और उच्च नैतिक संकल्प का प्रतीक है।
निष्कर्षतः, जस्टिस एच. आर. खन्ना की ‘मेकिंग ऑफ इंडियाज कॉन्स्टिट्यूशन’ भारतीय संवैधानिक साहित्य की एक आधारशिला है। यह सिर्फ एक कानूनी संदर्भ पुस्तक नहीं है; यह एक प्रेरणा है जो हमें हमारे लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों को समझने, उनका सम्मान करने और उनकी रक्षा करने के लिए आह्वान करती है। यह उन सभी के लिए अनिवार्य पठन है जो यह समझना चाहते हैं कि कैसे भारत एक गणराज्य बना और कैसे एक न्यायाधीश ने उस गणराज्य के सर्वोच्च मूल्यों को अपने लेखन और अपने जीवन के माध्यम से कायम रखा। यह पुस्तक हमें सिखाती है कि संविधान की भावना का संरक्षण करना ही हर भारतीय का अंतिम और सर्वोच्च कर्तव्य है।
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