मार्क्सवादी राज्य सिद्धांत में 20वीं शताब्दी की सबसे महत्वपूर्ण बहसों में से एक नाइकोस पुलांट्ज़ास (Nicos Poulantzas) और राल्फ मिलिबैंड (Ralph Miliband) के बीच हुई बहस है। यह बहस केवल दो विद्वानों के बीच मतभेद नहीं थी, बल्कि यह इस प्रश्न से जुड़ी थी कि पूँजीवादी समाज में राज्य की प्रकृति क्या है, वह किसके हितों की रक्षा करता है और वर्ग संघर्ष में उसकी भूमिका क्या है। अक्सर इस बहस को ‘Instrumentalism बनाम Structuralism’ के रूप में प्रस्तुत किया गया, किंतु स्वयं पुलांट्ज़ास ने इसे एक भ्रामक द्वंद्व बताया।
यह लेख पुलांट्ज़ास के प्रसिद्ध लेख “The Capitalist State: A Reply to Miliband and Laclau” के आधार पर पूँजीवादी राज्य की अवधारणा, सापेक्ष स्वायत्तता, वर्ग संघर्ष, राज्य-सत्ता और औपचारिकता (formalism) जैसे प्रश्नों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
ऐतिहासिक बौद्धिक पृष्ठभूमि
1960 के दशक का उत्तरार्ध विश्व राजनीति और बौद्धिक जगत में उथल पुथल का समय था। नागरिक अधिकार आंदोलन, वियतनाम युद्ध-विरोधी आंदोलन और फ्रांस की मई 1968 की घटनाओं ने मुख्यधारा के सामाजिक विज्ञान की स्थिर मान्यताओं को चुनौती दी। एंग्लो अमेरिकी राजनीति विज्ञान में बहुलवाद और प्रणाली सिद्धांत का प्रभुत्व था, जहाँ राज्य को तटस्थ मध्यस्थ या स्व-विनियमन तंत्र के रूप में देखा जाता था। किंतु सामाजिक संघर्षों की तीव्रता ने इन सिद्धांतों की व्याख्यात्मक सीमाओं को उजागर कर दिया।
इसी संदर्भ में मार्क्सवाद का पुनरुत्थान हुआ। राज्य के प्रश्न पर मार्क्सवादी साहित्य अपेक्षाकृत सीमित था, विशेषकर लेनिन के बाद। इस कमी को भरने का प्रयास राल्फ मिलिबैंड की The State in Capitalist Society (1969) और निकोस पौलांत्ज़ास की Political Power and Social Classes (1968) ने किया। दोनों का लक्ष्य राज्य का एक सुसंगत मार्क्सवादी सिद्धांत विकसित करना था, किंतु उनकी पद्धतियाँ और प्राथमिकताएँ भिन्न थीं।
पहला आदान–प्रदान (1969–1970): बहस की शुरुआत पौलांत्ज़ास की 1969 में प्रकाशित समीक्षा से हुई, जिसमें उन्होंने मिलिबैंड पर ‘अनुभववाद’ का आरोप लगाया। उनके अनुसार, मिलिबैंड व्यक्तियों और अभिजात वर्ग की प्रेरणाओं पर अत्यधिक ध्यान देते हैं और उन वस्तुनिष्ठ संरचनाओं की उपेक्षा करते हैं जो राज्य की भूमिका को निर्धारित करती हैं।
मिलिबैंड ने 1970 में उत्तर देते हुए अनुभवजन्य विश्लेषण का बचाव किया और पौलांत्ज़ास पर ‘संरचनात्मक अति-निर्धारणवाद’ का आरोप लगाया। उनका तर्क था कि यदि संरचनाएँ सब कुछ निर्धारित करती हैं, तो सामाजिक कर्ताओं की भूमिका नगण्य हो जाती है। इस प्रकार, बहस अनुभववाद बनाम सिद्धांत, और एजेंसी बनाम संरचना के रूप में उभरी।
दूसरा आदान–प्रदान (1973): 1973 में मिलिबैंड ने पौलांत्ज़ास के कार्य को अत्यधिक अमूर्त और ऐतिहासिक वास्तविकता से कटा हुआ बताया। उनके अनुसार, इतना सैद्धांतिक अमूर्तवाद ठोस राजनीतिक विश्लेषण में बाधक बनता है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि सापेक्ष स्वायत्तता की अवधारणा शास्त्रीय मार्क्सवाद में पहले से निहित है और इसके लिए जटिल सैद्धांतिक ढाँचे की आवश्यकता नहीं।
तीसरा आदान–प्रदान और गतिरोध (1976): 1976 में पौलांत्ज़ास ने मिलिबैंड और लाक्लाउ दोनों को उत्तर देते हुए ‘उपकरणवाद’ और ‘संरचनावाद’ के लेबलों को खारिज किया। उन्होंने तर्क दिया कि वास्तविक मतभेद पद्धति का नहीं, बल्कि भौतिकवाद और आदर्शवाद के बीच वैचारिक विभाजन का है। यह बहस किसी स्पष्ट समाधान के बिना गतिरोध पर समाप्त हुई।
मार्क्सवादी परंपरा में राज्य का प्रश्न
- मार्क्स और एंगेल्स के अनुसार राज्य वर्ग-विभाजित समाज का उत्पाद है। कम्युनिस्ट घोषणापत्र में राज्य को ‘पूरे बुर्जुआ वर्ग की सामान्य समिति’ कहा गया। किंतु मार्क्स ने कभी भी राज्य को केवल एक यांत्रिक उपकरण नहीं माना। उनके लेखन में राज्य को सामाजिक संबंधों, वर्ग संघर्ष और उत्पादन संबंधों से जुड़ा हुआ देखा गया है।
- लेनिन ने State and Revolution में राज्य को वर्ग दमन का उपकरण बताया, किंतु साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि राज्य की प्रकृति ऐतिहासिक और संरचनात्मक होती है। ग्राम्शी ने ‘हेजेमनी’ की अवधारणा के माध्यम से यह दिखाया कि राज्य केवल बल प्रयोग से नहीं, बल्कि सहमति (consent) के माध्यम से भी शासन करता है।
इसी परंपरा में 20वीं शताब्दी में पुलांट्ज़ास और मिलिबैंड ने राज्य को समझने के दो अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत किए।
राल्फ मिलिबैंड का दृष्टिकोण: Instrumentalist State Theory
मिलिबैंड की पुस्तक The State in Capitalist Society (1969) में यह तर्क दिया गया कि पूँजीवादी राज्य मुख्यतः शासक वर्ग का उपकरण है। उनके अनुसार:
- राज्य के प्रमुख पदों पर पूँजीपति वर्ग से जुड़े लोग होते हैं
- राजनीतिक अभिजात वर्ग और आर्थिक अभिजात वर्ग के बीच घनिष्ठ संबंध होते हैं
- नीति निर्माण पर पूँजीपति वर्ग का प्रत्यक्ष प्रभाव होता है
मिलिबैंड का विश्लेषण अनुभवजन्य (empirical) तथ्यों पर आधारित था। उन्होंने मंत्रियों, नौकरशाहों, सैन्य अधिकारियों और पूँजीपतियों की सामाजिक पृष्ठभूमि का अध्ययन किया। उनके अनुसार राज्य की नीतियाँ इस वर्गीय संरचना का परिणाम होती हैं।
किंतु पुलांट्ज़ास के अनुसार यह दृष्टिकोण राज्य को केवल एक औज़ार (instrument) के रूप में देखता है और उसकी संरचनात्मक भूमिका को समझने में असफल रहता है।
नाइकोस पुलांट्ज़ास का दृष्टिकोण: Structural-Relational Theory of the State
पुलांट्ज़ास ने अपनी पुस्तक Political Power and Social Classes (1968) और बाद के लेखन में राज्य को एक संरचनात्मक संबंध (structural relation) के रूप में देखा।
उनके अनुसार: “राज्य वर्गों के बीच शक्ति-संबंधों का संघनन (condensation) है।”
(क) राज्य एक संबंध है, वस्तु नहीं: पुलांट्ज़ास राज्य को न तो एक ‘वस्तु’ (Thing) मानते हैं और न ही एक ‘विषय’ (Subject)। राज्य कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है, बल्कि वह वर्ग संघर्षों से निर्मित होता है।
(ख) राज्य और वर्ग संघर्ष: राज्य वर्ग संघर्ष से बाहर खड़ा नहीं होता। बल्कि वर्ग संघर्ष राज्य के भीतर भी परिलक्षित होता है। विभिन्न राज्य संस्थाएँ- संसद, कार्यपालिका, न्यायपालिका, नौकरशाही – अलग-अलग वर्गीय हितों की अभिव्यक्ति कर सकती हैं।
सापेक्ष स्वायत्तता (Relative Autonomy of the State)
पुलांट्ज़ास की सबसे महत्वपूर्ण अवधारणा है सापेक्ष स्वायत्तता। इसका अर्थ यह नहीं कि राज्य पूरी तरह स्वतंत्र है, बल्कि यह कि:
- राज्य किसी एक पूँजीपति या गुट के तात्कालिक हितों से स्वतंत्र हो सकता है
- किंतु दीर्घकाल में वह शासक वर्ग के सामूहिक हितों की रक्षा करता है
यह सापेक्ष स्वायत्तता पूँजीवादी व्यवस्था की संरचनात्मक आवश्यकता है, क्योंकि शासक वर्ग स्वयं विभाजित होता है (विभिन्न fractions of capital)।
राज्य–सत्ता बनाम वर्ग–सत्ता
पुलांट्ज़ास राज्य को ‘सत्ता का धारक’ नहीं मानते। उनके अनुसार:
- सत्ता वर्गों के बीच संबंधों में निहित होती है
- राज्य उन संबंधों को संगठित और स्थिर करता है
यदि राज्य को सत्ता का स्रोत मान लिया जाए, तो यह वेबरियन या एलीट थ्योरी की ओर ले जाता है, जो मार्क्सवादी दृष्टिकोण से भिन्न है।
फासीवाद, बोनापार्टिज़्म और संसदीय लोकतंत्र
मिलिबैंड ने आरोप लगाया कि पुलांट्ज़ास विभिन्न राज्य रूपों में भेद नहीं करते। पुलांट्ज़ास ने इसे खारिज करते हुए Fascism and Dictatorship में दिखाया कि:
- फासीवाद पूँजीवादी राज्य का एक अपवादात्मक रूप है
- यह तब उभरता है जब वर्ग संघर्ष तीव्र हो जाता है
- संसदीय लोकतंत्र और फासीवाद के बीच संरचनात्मक अंतर है
अर्नेस्टो लाक्लाउ और औपचारिकता की आलोचना
लाक्लाउ ने पुलांट्ज़ास पर ‘औपचारिकता’ (formalism) का आरोप लगाया। उनका तर्क था कि अल्थूसरियन परंपरा में ‘instances’ (आर्थिक, राजनीतिक, वैचारिक) को बहुत यांत्रिक ढंग से देखा गया।
पुलांट्ज़ास ने आंशिक रूप से इस आलोचना को स्वीकार किया और बाद की कृतियों में:
- सामाजिक संरचना और वर्ग संघर्ष के संबंध को अधिक स्पष्ट किया
- राज्य की आर्थिक भूमिका का गहन विश्लेषण किया
समकालीन पूँजीवाद और राज्य की भूमिका
Classes in Contemporary Capitalism में पुलांट्ज़ास ने दिखाया कि आधुनिक पूँजीवाद में राज्य की भूमिका बढ़ी है:
- कल्याणकारी नीतियाँ
- आर्थिक नियोजन
- संकट प्रबंधन
फिर भी यह भूमिका पूँजीवादी ढाँचे के भीतर ही रहती है और वर्ग विभाजन को समाप्त नहीं करती।
निष्कर्ष
पुलांट्ज़ास–मिलिबैंड बहस ने मार्क्सवादी राज्य सिद्धांत को गहराई और परिपक्वता प्रदान की। पुलांट्ज़ास ने यह स्पष्ट किया कि:
- राज्य न तो केवल पूँजीपति वर्ग का औज़ार है
- न ही एक स्वतंत्र, तटस्थ सत्ता
- बल्कि वह वर्ग संघर्षों का संरचनात्मक परिणाम है
यह दृष्टिकोण आज भी राज्य, सत्ता और लोकतंत्र को समझने के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।
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