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पैक्स सिलिका: भारत के लिए महत्व और चुनौतियाँ

अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने जनवरी 2026 में भारत को पैक्स सिलिका पहल में शामिल होने का न्योता दिया है। यह अमेरिका-नेतृत्व वाली यह पहल सेमीकंडक्टर और एआई आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित करने का प्रयास है। यह वैश्विक तकनीकी भू-राजनीति में नया दौर ला रही है, जहां सिलिका तेल की तरह रणनीतिक महत्व रखती है। भारत के लिए यह अवसर और चुनौतियों से भरा है।

पैक्स सिलिका क्या है?

पैक्स सिलिका एक अमेरिका-नेतृत्व वाली भू-राजनीतिक और आर्थिक पहल है, जिसकी शुरुआत दिसंबर 2025 में हुई। ‘पैक्स’ लैटिन में शांति का अर्थ रखता है, जबकि ‘सिलिका’ चिप निर्माण में प्रयुक्त प्रमुख यौगिक है, जो नई तकनीकों की आपूर्ति श्रृंखला को शांति व समृद्धि का माध्यम बनाने का संकेत देता है। यह पेट्रोस्टेट्स से ‘सिलिका स्टेट्स’ की ओर सत्ता के हस्तांतरण का प्रतीक है, जहां उच्च शुद्धता वाले क्वार्टजाइट सैंड पर वैश्विक निर्भरता अंतरराष्ट्रीय संबंधों को आकार देगी।

प्रमुख भागीदार कौन हैं?

  • औपचारिक हस्ताक्षरकर्ता: अमेरिका (नेतृत्वकर्ता), जापान (सेमीकंडक्टर सामग्री), दक्षिण कोरिया (मेमोरी चिप), सिंगापुर (फैब्रिकेशन), इजरायल (एआई और आरएंडडी), यूनाइटेड किंगडम (एआई अनुसंधान), ऑस्ट्रेलिया (खनिज), कतर (ऊर्जा) तथा यूएई (पूंजी)।
  • पर्यवेक्षक: नीदरलैंड्स (एएसएमएल), ताइवान (टीएसएमसी), यूरोपीय संघ, कनाडा, ओईसीडी तथा भारत (फरवरी 2026 में निमंत्रण)। भारत को वैकल्पिक विनिर्माण आधार और कुशल मानव संसाधन के रूप में देखा जा रहा है।

पैक्स सिलिका के उद्देश्य:

यह पहल महत्वपूर्ण खनिजों से एआई अवसंरचना तक लचीली आपूर्ति श्रृंखला बनाती है। यह जबरन निर्भरताओं को कम करती है, आर्थिक सहयोग बढ़ाती है, गैर-बाजार प्रथाओं (जैसे डंपिंग) का मुकाबला करती है तथा प्रतिस्पर्धियों पर 18 माह की स्थायी बढ़त बनाए रखती है। पुरानी तकनीक बेचकर नवीन आरएंडडी को वित्तपोषित करने की नीति इसका मूल है।

यह चीन की दुर्लभ मृदा खनन (69%) और शोधन (90%) पर प्रभुत्व का मुकाबला करती है। कोविड ने एकल-देश निर्भरता के जोखिम दिखाए, इसलिए यह फ्रेंड-शोरिंग पर जोर देती है। चिप्स एंड साइंस एक्ट इसका हिस्सा है, जो कम्प्यूट पावर, पूर्ण स्टैक (खनिज से एआई) तथा विश्वसनीय पारिस्थितिकी पर आधारित ‘सिलिकॉन युग’ परिभाषित करता है। भारत के लिए: चीन का विकल्प विनिर्माण केंद्र तथा सेमीकंडक्टर मिशन को गति।

भारत के लिए चुनौतियाँ:

  • रणनीतिक स्वायत्तता का हनन: निर्यात नियंत्रणों पर संरेखण से रूस-चीन संबंध प्रभावित हो सकते हैं।
  • नीति संप्रभुता: विकासशील भारत को सब्सिडी-आधारित ‘भारत-प्रथम’ नीतियां सीमित हो सकती हैं।
  • आपूर्ति प्रतिशोध: चीन से legacy चिप्स पर निर्भरता, 2025 जैसी दुर्लभ मैग्नेट आपूर्ति रोक संभव।
  • क्षमता अंतर: भारत ‘उपयोगी’ लेकिन ‘महत्वपूर्ण’ नहीं माना जा रहा।
  • अपेक्षा अंतर: पहला विकासशील गैर-अमेरिकी सहयोगी। डीपीडीपी एक्ट डेटा प्रवाह से टकरा सकता है।

आगे की राह:

  • घरेलू क्षमता निर्माण: अपस्ट्रीम में राजस्थान-तमिलनाडु सिलिका संसाधन विकास, शुद्धिकरण तकनीक। मिडस्ट्रीम में पॉलीसिलिकॉन उत्पादन, सिलिकॉन पार्क। डाउनस्ट्रीम में सोलर असेंबली, कंपाउंड सेमीकंडक्टर (जीएएन, एसआईसी)।
  • चीन+1 रणनीति: फ्री ट्रेड समझौतों से तकनीक हस्तांतरण। रणनीतिक गठबंधन: एमएसपी, क्वाड में गहनता।
  • आरएंडडी-स्किलिंग: सिलिकॉन रिसाइक्लिंग, आईआईटी भागीदारी। रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए कूटनीतिक लाभ उठाएं। भारत उपभोक्ता से उत्पादक बने, औद्योगिक नीति-वैश्विक साझेदारी-तकनीकी छलांग से सिलिकॉन अर्थव्यवस्था में प्रमुख नोड बने।

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