गृह मंत्रालय ने भारत की पहली आतंकवाद-रोधी नीति ‘प्रहार (राष्ट्रीय आतंकवाद-रोधी नीति एवं रणनीति)’ का अनावरण किया है। यह एक व्यापक ढांचा है जो शून्य सहिष्णुता, खुफिया-आधारित रोकथाम तथा समन्वित प्रतिक्रिया पर आधारित है। इस नीति का उद्देश्य आतंकवादियों, उनके वित्तपोषकों और समर्थकों को देश के भीतर एवं विदेशों में उनकी पहुँच, हथियारों और सुरक्षित ठिकानों से वंचित करना है।
प्रहार क्या है?
प्रहार भारत की पहली व्यापक राष्ट्रीय आतंकवाद-रोधी नीति है। यह प्रतिक्रियात्मक सुरक्षा व्यवस्था से सक्रिय, सिद्धांत-आधारित संरचना की ओर परिवर्तन को दर्शाती है।
प्रहार नीति के सात स्तंभ कौन से हैं?

नीति में उल्लिखित प्रमुख खतरे क्या हैं?
प्रहार नीति भारत के समक्ष उपस्थित प्रमुख आतंकवादी खतरों को स्पष्ट रूप से रेखांकित करती है, जो इसकी रणनीति का आधार बनते हैं। इसमें कहा गया है कि भारत को स्थल, जल और वायु—तीनों माध्यमों से खतरे का सामना करना पड़ता है। प्रमुख खतरे निम्नलिखित हैं:
- सीमा-पार एवं राज्य-प्रायोजित आतंकवाद:नीति में उल्लेख है कि भारत लंबे समय से “सीमा पार से प्रायोजित आतंकवाद” से प्रभावित रहा है, तथा “जिहादी आतंकवादी संगठन” लगातार हमलों की योजना बनाते और उन्हें अंजाम देते रहे हैं। यह भी कहा गया है कि क्षेत्र के कुछ देशों ने कभी-कभी आतंकवाद को राज्य नीति के एक साधन के रूप में उपयोग किया है।
- उभरते एवं तकनीकी खतरे:आतंकवादियों द्वारा सीबीआरएनईडी (रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल, परमाणु, विस्फोटक एवं डिजिटल) सामग्रियों की पहुँच और उपयोग एक बड़ी चुनौती के रूप में रेखांकित किया गया है।
- ड्रोन एवं रोबोटिक्स:मानवरहित हवाई वाहनों का हथियार, गोला-बारूद और विस्फोटक तस्करी के लिए दुरुपयोग, विशेषकर पंजाब तथा जम्मू-कश्मीर जैसे सीमावर्ती क्षेत्रों में।
- गोपनीयता उपकरण:डार्क वेब, एन्क्रिप्टेड संदेश अनुप्रयोगों और क्रिप्टो-वॉलेट का उपयोग बिना पकड़े गए धन जुटाने, भर्ती करने और हमलों के समन्वय हेतु किया जाना।
- अपराध-आतंक गठजोड़ एवं कट्टरपंथीकरण:आतंकवादी संगठन रसद और भर्ती के लिए संगठित आपराधिक नेटवर्क से जुड़ रहे हैं। वे प्रचार, संचार और वित्तपोषण के लिए इंटरनेट, सोशल मीडिया, डार्क वेब और क्रिप्टो वॉलेट का दुरुपयोग कर रहे हैं।
- वैश्विक आतंकवादी संगठन:अल-कायदा और आईएसआईएस को स्थायी खतरे के रूप में चिन्हित किया गया है, जो स्थानीय स्लीपर सेल के माध्यम से हिंसा भड़काने का प्रयास करते रहते हैं।
महत्वपूर्ण अवसंरचना की संवेदनशीलता:
नीति भारतीय अर्थव्यवस्था के “महत्वपूर्ण क्षेत्रों” की सुरक्षा हेतु एक संरक्षित ढांचे को अनिवार्य बनाती है, जिन्हें अब उच्च-प्राथमिकता वाले लक्ष्य के रूप में देखा जाता है:
- ऊर्जा एवं विद्युत: विद्युत ग्रिड और परमाणु ऊर्जा प्रतिष्ठान
- परिवहन: रेलवे, विमानन और प्रमुख बंदरगाह
- उन्नत क्षेत्र: अंतरिक्ष परिसंपत्तियाँ और रक्षा प्रतिष्ठान
यह नीति भारत की आंतरिक सुरक्षा को सुदृढ़ करने और आतंकवाद के बदलते स्वरूप से प्रभावी ढंग से निपटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
नीति के प्रमुख उद्देश्य क्या हैं?
1- शून्य-सहनशीलता प्रवर्तन: आतंकवाद के सभी रूपों के प्रति “शून्य सहनशीलता” दृष्टिकोण को दृढ़ता से स्थापित और लागू करना, ताकि प्रत्येक आतंकी कृत्य—चाहे वह सफल हो या विफल—राज्य की पूर्ण शक्ति से उत्तरित हो।
2- सभी कृत्यों का अपराधीकरण: यह सुनिश्चित करना कि आतंकवाद से जुड़ा प्रत्येक कार्य, जिसमें वित्तपोषण और रसद सहायता भी शामिल है, एक समान कानूनी ढांचे के अंतर्गत अपराध घोषित किया जाए।
3- आतंकी पारिस्थितिकी तंत्र का विघटन: आतंकवाद को सक्षम बनाने वाले संपूर्ण तंत्र को व्यवस्थित रूप से ध्वस्त करना। इसमें केवल सक्रिय आतंकवादी ही नहीं, बल्कि:
- ओवर ग्राउंड वर्कर (ओजीडब्ल्यू) नेटवर्क और सहायक संरचनाएं।
- अवैध हथियार और मादक पदार्थ गिरोह जो आतंकवादी समूहों को धन और हथियार उपलब्ध कराते हैं।
- आतंक वित्तपोषण चैनल और धन शोधन (मनी लॉन्ड्रिंग) तंत्र।
4- एकीकृत आतंक-रोधी संरचना: सभी भारतीय राज्यों में आतंक-रोधी तंत्र का मानकीकरण, ताकि केरल के एक थाने से लेकर जम्मू-कश्मीर की एक इकाई तक, तथा एक छोटे जिले के स्थानीय थाने से लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (एनएसजी) तक, सभी समान मानक संचालन प्रक्रियाओं (एसओपी) का पालन करें।
5- खुफिया तंत्र की प्रधानता: बहु-एजेंसी केंद्र (एमएसी) को सशक्त बनाना, ताकि केंद्रीय एजेंसियों (जैसे एनआईए और आईबी) तथा राज्य पुलिस बलों के बीच वास्तविक समय में निर्बाध सूचना प्रवाह सुनिश्चित हो।
6- कानूनी एकीकरण: यह अनिवार्य करना कि प्रारंभिक सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) से ही कानूनी विशेषज्ञों को शामिल किया जाए, ताकि तकनीकी कारणों से दोषमुक्ति न हो और लगभग 100% दोषसिद्धि दर सुनिश्चित कर निवारक प्रभाव उत्पन्न किया जा सके।
7- आधुनिकीकरण: साइबर रक्षा, ड्रोन अवरोधन, तथा रासायनिक/जैविक/नाभिकीय (सीबीआरएनईडी) खतरों से निपटने हेतु अत्याधुनिक उपकरणों से कानून प्रवर्तन एजेंसियों को सुसज्जित कर राष्ट्रीय क्षमता का समेकन।
8- कट्टरपंथ के प्रति चरणबद्ध प्रतिक्रिया: एक समान नीति से हटकर “चरणबद्ध” प्रतिक्रिया अपनाना, जिसमें व्यक्ति की संलिप्तता के स्तर के आधार पर कानूनी कार्रवाई और पुनर्वास/विमुक्तिकरण प्रयासों के बीच संतुलन बनाया जाए।
9- पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण: आतंक पीड़ितों के लिए संस्थागत समर्थन सुनिश्चित करना और उन्हें राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में रखना।
10- अंतरराष्ट्रीय सहयोग:
- वैश्विक सहयोग: आतंकवाद से वैश्विक स्तर पर मुकाबला करने हेतु अंतरराष्ट्रीय साझेदारों और संगठनों के साथ सहयोग।
- प्रत्यर्पण एवं निर्वासन: उन्नत द्विपक्षीय संधियों के माध्यम से वांछित भगोड़ों की वापसी की प्रक्रिया को तीव्र करना।
- अंतरराष्ट्रीय मानक निर्धारण: संयुक्त राष्ट्र तथा अन्य वैश्विक निकायों के साथ मिलकर आतंकवाद की सार्वभौमिक परिभाषा निर्धारित करना तथा आतंक प्रायोजित करने वाले राज्यों को जवाबदेह ठहराना।
- श्रेष्ठ प्रथाओं का आदान-प्रदान: अन्य देशों के अनुभवों से सीखकर प्रभावी आतंक-रोधी रणनीतियों को अपनाना।
प्रहार (PRAHAAR) क्यों महत्वपूर्ण है?
1- दृष्टिकोण में परिवर्तन: प्रहार से पूर्व भारत के आतंक-रोधी प्रयास विभिन्न कानूनों (जैसे यूएपीए) और एजेंसियों (जैसे एनआईए) तक सीमित और खंडित माने जाते थे। प्रहार इस बिखरे हुए ढांचे को समाप्त कर एकीकृत राष्ट्रीय सिद्धांत प्रदान करता है।
2- आतंकी तंत्र का समूल विनाश: प्रहार केवल आतंकवादियों को ही नहीं, बल्कि उन्हें समर्थन देने वाली संपूर्ण संरचना को लक्ष्य बनाता है।
3- इक्कीसवीं सदी के खतरों का समाधान:
- यह नीति पहली बार ड्रोन, रोबोटिक्स, साइबर हमलों जैसे आधुनिक और गैर-पारंपरिक खतरों को औपचारिक रूप से मान्यता देकर उनके समाधान का रोडमैप प्रस्तुत करती है।
- पंजाब और जम्मू-कश्मीर जैसे सीमावर्ती राज्यों में मानव रहित हवाई यानों (यूएवी) के माध्यम से हथियार और मादक पदार्थों की तस्करी के विरुद्ध प्रतिक्रिया को संस्थागत बनाती है।
- “आपराधिक हैकरों” और राज्य-प्रायोजित साइबर आतंकवादियों को भौतिक आतंकवादियों के समान गंभीरता से लेते हुए विद्युत ग्रिड और परमाणु संयंत्रों जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा सुनिश्चित करती है।
4- समग्र सामाजिक दृष्टिकोण: प्रत्येक कट्टरपंथी युवक को कठोर अपराधी मानने के बजाय “चरणबद्ध पुलिस प्रतिक्रिया” का प्रावधान, जिससे निम्न-स्तरीय संलिप्तता वाले व्यक्तियों के लिए पुनर्वास और समाज में पुनर्समावेशन संभव हो सके। इसमें गैर-सरकारी संगठन, मनोवैज्ञानिक और धार्मिक नेताओं की भागीदारी भी शामिल है।
5- मानवाधिकार एक आधारस्तंभ: मानवाधिकार को सात मुख्य स्तंभों में से एक (प्रहार का “एच”) बनाकर यह स्वीकार किया गया है कि आतंक-रोधी प्रयास तब अधिक प्रभावी होते हैं जब वे विधि के शासन का पालन करते हुए जनविश्वास बनाए रखें और स्थानीय आबादी के अलगाव को रोकें।
प्रहार और इससे पूर्व की नीति में अंतर:

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