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प्रारम्भिक समाजवादी विचार (Early Socialist Thought)

आर्थिक समाजवाद एक लोकतांत्रिक आंदोलन था। इसके अलग-अलग विचारक थे। इनमें सेंट साइमन (1760–1825), रॉबर्ट ओवेन (1771–1858), चार्ल्स फूरियर (1772–1837), प्रूधों (1809–1865) आदि प्रमुख थे। ये सभी विचारक समाजवाद के समर्थक थे, लेकिन इन विचारको के विचारो का विवरण भिन्न प्रकार देखा जा सकता है। इसके साथ ही, इन सभी विचारकों में कुछ सामान्य विचारधारो को भी देखा जा सकता है

समाजवादी विचारकों का मानना था कि समाज में बहुत अधिक असमानता है, जिससे समाज में अमीर और गरीब के बीच बड़ा अंतर होता है। वे मानते थे कि समाज को समानता पर आधारित होना चाहिए। इन विचारकों का यह भी कहना था कि समाज में निजी संपत्ति और खुली प्रतिस्पर्धा के कारण समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। उनके अनुसार, केवल निजी लाभ के लिए काम करने से समाज का भला नहीं हो सकता। सामाजिक प्रगति तभी संभव है, जब समाज में सहयोग, समानता हो और सभी लोगों की जरूरतों का ध्यान रखा जाए। समाज ऐसा होना चाहिए जिसमें मनुष्य को मनुष्य के रूप में समझा जाए, न कि केवल लाभ कमाने का साधन।

सेंट साइमन

सेंट साइमन विज्ञान, उद्योग और बड़े स्तर पर प्रशासन के समर्थक थे। इस दृष्टि से वे कुछ हद तक रूसो के विचारों से प्रभावित थे। उनका मानना था कि काम करने वाला सामान्य व्यक्ति अच्छा, ईमानदार और नैतिक होता है। वे कुलीन वर्ग को भ्रष्ट और कई बार विद्वानों को शाही मानसिकता वाला कहते थे। इसका एक कारण यह भी था कि वे स्वयं कुलीन परिवार की एक निम्न शाखा से जुड़े थे।

सेंट साइमन साधारण लोगों के हितों के समर्थक थे। उन्होंने अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था और वे फ्रांसीसी क्रांति के पक्के समर्थक थे। ओवेन की तरह, वे भी विज्ञान, तकनीक और उद्योग के बड़े समर्थक थे। उन्होंने यह भविष्यवाणी की थी कि 19वीं शताब्दी मानव जाति के लिए एकता, सुख और समृद्धि लेकर आएगी, जिसमें पुरुष और स्त्री दोनों को लाभ होगा।

हालाँकि वे विद्वानों को घमंडी कहते थे, फिर भी उनका मानना था कि समाज के पुनर्निर्माण के लिए बड़े विद्वानों की सलाह ज़रूरी है। यही विद्वानों का वर्ग समाज की संस्थाओं को नया रूप देगा, ताकि गरीबों का नैतिक, बौद्धिक और शारीरिक सुधार हो सके। इन सभी कार्यों में राज्य की केन्द्रीय भूमिका होगी। राज्य को सबके लिए काम की व्यवस्था करनी चाहिए, क्योंकि सभी लोग काम करने की क्षमता रखते हैं और रोज़गार चाहते हैं।

सेंट साइमन का विश्वास था कि समाज में असल में एक ही वर्ग होना चाहिए मज़दूर वर्ग। उनका मानना था कि मज़दूरी व्यक्ति की काम करने की क्षमता और समाज के लिए किए गए योगदान के अनुसार मिलनी चाहिए। जो लोग काम नहीं करते, वे समाज के लिए बोझ हैं और उन्हें अलग कर देना चाहिए।

अंत में, उनका विचार था कि राज्य को शिक्षा और प्रचार पर नियंत्रण रखकर समाज में तालमेल और एकता लानी चाहिए।

राबर्ट ओवेन

रॉबर्ट ओवेन ने 1827 में अपनी को-ऑपरेटिव मैगज़ीन में पहली बार “सोशलिस्ट” शब्द का प्रयोग किया।उसका मानना था कि उद्योग और फैक्ट्रियाँ, यदि सही तरीके से चलाई जाएं, तो गरीबी और असमानता से मानव जाति को मुक्त किया जा सकता है।ओवेन ने समझाने की कोशिश की कि यह तभी संभव है, जब उत्पादन प्रतिस्पर्धा के बजाय सहयोग के नियमों पर किया जाए। उन्होंने खुद भी सहकारी आधार पर उत्पादन के कई प्रयोग किए थे।

उनका विचार था कि देश के स्तर पर ऐसे काम केवल राज्य ही कर सकता है। उनका यह भी विश्वास था कि यदि परिस्थितियों को अच्छा बनाया जाए, तो मानव स्वभाव में भी बदलाव आ सकता है। परिस्थितियों को बदलने में शिक्षा की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ओवेन ने सहयोग को प्रतिस्पर्धा से बेहतर सिर्फ इसलिए नहीं माना कि उससे उत्पादन बढ़ता है, बल्कि इसलिए भी कि सहयोग से लोगों का नैतिक सुधार होता है।

ओवेन काम पाने के अधिकार का समर्थन करते थे। उन्होंने 1817 में यूरोप के शासकों से अपील की कि वे अपने-अपने देशों में उनके सुझाव लागू करें, ताकि मानव जाति “पर्याप्तता के युग” में प्रवेश कर सके। उनके विचारों का ब्रिटेन के मज़दूरों पर गहरा प्रभाव पड़ा। मज़दूरों ने उनके विचारों के आधार पर आंदोलन शुरू किए और श्रमिक संघ बनाने पर ज़ोर दिया, जबकि उस समय यह काम गैर-कानूनी माना जाता था।

चार्ल्स फ़ोरियर

चार्ल्स फोरियर के विचार फ्रांसीसी क्रान्ति से प्रभावित थे, जिसने उन्हें समाजवाद की ओर सोचने के लिए प्रेरित किया। वे काम में होने वाली फिजूलखर्ची, अकुशलता, नीरसता और असमानता को देखकर परेशान थे।

फोरियर की सबसे बड़ी रुचि यह थी कि काम को सुखद बनाया जाए और व्यक्ति के स्वभाव के अनुसार काम को व्यवस्थित किया जाए। इसी कारण वे श्रम विभाजन के सिद्धांत के विरोधी थे। उनका मानना था कि श्रम विभाजन किसी एक काम को बहुत छोटे-छोटे और बार-बार दोहराए जाने वाले हिस्सों में बाँट देता है, जिससे काम उबाऊ हो जाता है। रॉबर्ट ओवेन की सोच के विपरीत, फोरियर को बड़े-बड़े उद्योगों पर भरोसा नहीं था। उनका विचार था कि ग्रामीण क्षेत्रों में खेती और तरह-तरह के काम हों और शहरों में छोटे-छोटे दुकानदार काम करें। ऐसा इसलिए, क्योंकि समाज और पारिवारिक जीवन वहीं अच्छे से चलता है और लोग एक-दूसरे को पहचान सकते हैं।

फोरियर का मानना था कि काम तभी आनंददायक होता है, जब वहाँ प्रतिस्पर्धा न हो और छोटे-छोटे सहकारी समूह मिलकर उत्पादन करें। उन्होंने कहा कि वस्तुएँ सुंदर और कलात्मक ढंग से बनाई जानी चाहिए, और जो चीज़ देखने में अच्छी हो, वह ज़्यादा समय तक टिकनी भी चाहिए। इसी कारण फोरियर ने बड़े पैमाने के उद्योगों का विरोध किया। उनके अनुसार, बड़े उद्योगों में व्यक्तित्व खत्म हो जाता है और काम करने में आनंद नहीं रह जाता ।

प्रूधों

प्रारम्भिक समाजवादियों में प्रूधों का नाम लिया जाता है। वे ऐसे विचारक थे जिन्होंने संपत्ति को साफ़-साफ़ चोरी कहा था। उन्होंने मार्क्स के साथ संपत्ति और गरीबी के विषय पर बहस भी की थी। प्रूधों ने “फिलॉसफी ऑफ़ पावर्टी” नाम की एक पुस्तक लिखी थी। इसके जवाब में मार्क्स ने“पावर्टी ऑफ़ फिलॉसफी” लिखी। इस पुस्तक में मार्क्स ने प्रूधों के विचारों की दार्शनिक कमज़ोरियों को बताया।

प्रूधों के विचारों का एक मुख्य बिंदु सामान्य लोगों की स्वतंत्रता था। उनका मानना था कि असमानता, लोगों की स्वतंत्रता पाने के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट है। इसलिए प्रूधों के अनुसार समानता, स्वतंत्रता की पहली शर्त है। इस तरह उनके विचार आज के कई आधुनिक और मूलभूत विचारकों से मिलते-जुलते हैं।

प्रूधों का विश्वास था कि समानता पर आधारित सोच केवल वर्गविहीन समाज में ही संभव है। लेकिन वे वर्गविहीन समाज बनाने के लिए वर्ग-संघर्ष के विचार से सहमत नहीं थे। उनका मानना था कि मज़दूरों की आपसी सहमति और सहयोग से ही वर्गविहीन समाज बनाया जा सकता है। प्रूधों राष्ट्रीय स्तर पर विकेन्द्रित श्रमिक सहकारी व्यवस्था के समर्थक थे। वे मानते थे कि सत्ता और उत्पादन को केंद्र में इकट्ठा करने के बजाय, उन्हें छोटे-छोटे श्रमिक समूहों के हाथ में देना चाहिए।


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