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बांग्लादेश निर्वाचन 2026: दक्षिण एशिया की उभरती नई कूटनीतिक बिसात

12 फरवरी 2026 को बांग्लादेश में संपन्न हुए आम चुनाव केवल एक सरकार बदलने की प्रक्रिया नहीं थे, बल्कि यह उस देश के राजनीतिक चरित्र और भविष्य की दिशा तय करने वाला एक ऐतिहासिक जनमत संग्रह था। अगस्त 2024 में शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग सरकार के पतन के बाद, बांग्लादेश ने अस्थिरता और एक लंबी अंतरिम व्यवस्था का दौर देखा। इन चुनावों के माध्यम से बांग्लादेश ने एक बार फिर पूर्णकालिक लोकतांत्रिक ढांचे की ओर कदम बढ़ाया है। हालांकि, इन चुनावों के परिणाम केवल ढाका की सत्ता तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इन्होंने समूचे दक्षिण एशिया और विशेष रूप से भारत की विदेश नीति के सामने एक जटिल चुनौती पेश कर दी है। इन परिणामों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले दशक में बंगाल की खाड़ी का यह क्षेत्र वैश्विक शक्तियों के बीच रस्साकशी का एक प्रमुख केंद्र बना रहेगा।

चुनावी जनादेश:

निर्वाचन आयोग द्वारा घोषित परिणामों के अनुसार, तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने संसद की 300 सीटों में से 212 पर जीत दर्ज कर स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया है। यह जीत बीएनपी के लिए एक दशक से अधिक समय के निर्वासन और राजनीतिक दमन के बाद एक बड़ी वापसी है। चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण और चर्चा का विषय जमात-ए-इस्लामी का प्रदर्शन रहा है, जिसने 77 सीटें जीतकर स्वयं को एक अनिवार्य राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित किया है।

अवामी लीग की अनुपस्थिति में यह चुनाव काफी हद तक एकतरफा रहा, जिससे सत्ता का संतुलन अब पूरी तरह से दक्षिणपंथी और राष्ट्रवादी ताकतों के पक्ष में झुक गया है। इस जनादेश के साथ ही बांग्लादेश में धर्मनिरपेक्ष राजनीति के स्थान पर एक नई धार्मिक-राष्ट्रवादी पहचान का उदय होता दिख रहा है, जो आंतरिक और बाह्य दोनों नीतियों को प्रभावित करेगा।

भारत-बांग्लादेश संबंधों का नया आयाम:

भारत के लिए बांग्लादेश का यह चुनाव परिणाम एक रणनीतिक झटका माना जा रहा है। पिछले 15 वर्षों में शेख हसीना के कार्यकाल के दौरान भारत और बांग्लादेश के संबंध ‘स्वर्ण युग’ में थे, जहाँ सुरक्षा, कनेक्टिविटी और व्यापार के मोर्चे पर अभूतपूर्व समन्वय देखा गया था। बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी का सत्ता में आना भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति के लिए एक कठिन परीक्षा है। भारत की सबसे प्राथमिक चिंता सुरक्षा को लेकर है; अतीत में बीएनपी के शासनकाल के दौरान भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों के विद्रोही समूहों को बांग्लादेश में शरण और समर्थन मिलता रहा है। यदि नई सरकार अपनी पुरानी नीतियों पर लौटती है, तो भारत को अपनी पूर्वी सीमा पर उग्रवाद और घुसपैठ की गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

कनेक्टिविटी और आर्थिक परियोजनाओं पर अनिश्चितता के बादल

भारत ने बांग्लादेश के माध्यम से अपने पूर्वोत्तर राज्यों को जोड़ने के लिए कई महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में निवेश किया है। इनमें अखौरा-अगरतला रेल लिंक, मैत्री सुपर थर्मल पावर प्रोजेक्ट और चटगांव व मोंगला बंदरगाहों के माध्यम से भारत को मिलने वाले ट्रांजिट अधिकार शामिल हैं। बीएनपी के नेतृत्व वाली नई सरकार इन समझौतों की समीक्षा करने या इनमें बदलाव करने की मांग कर सकती है, जिसे वे ‘संप्रभुता के साथ समझौता’ करार देते रहे हैं। यदि इन कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स में कोई बाधा आती है, तो भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति की गति धीमी पड़ सकती है। इसके अलावा, तीस्ता जल बंटवारे का मुद्दा, जो लंबे समय से लंबित है, अब नई सरकार के लिए भारत विरोधी भावनाएं भड़काने का एक प्रमुख राजनीतिक हथियार बन सकता है।

एशियाई भू-राजनीति: चीन और पाकिस्तान की बढ़ती सक्रियता

दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में बांग्लादेश का नया सत्ता ढांचा चीन और पाकिस्तान के लिए एक बड़े अवसर के रूप में देखा जा रहा है। चीन, जो पहले से ही बांग्लादेश के बुनियादी ढांचे में भारी निवेश कर रहा है, अब बीएनपी सरकार के माध्यम से अपनी ‘बेल्ट एंड रोड’ पहल (BRI) को और अधिक गति देने की कोशिश करेगा। चीन की नजर बंगाल की खाड़ी में अपनी नौसैनिक पहुंच बढ़ाने पर है, जो भारत की समुद्री सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा हो सकता है। दूसरी ओर, पाकिस्तान के साथ बांग्लादेश के संबंधों का पुनरुद्धार होने की प्रबल संभावना है। वैचारिक समानता और ऐतिहासिक जुड़ाव के कारण ढाका और इस्लामाबाद के बीच रक्षा और कूटनीतिक सहयोग बढ़ सकता है, जो भारत को दो तरफ से घेरने की पाकिस्तान की पुरानी रणनीति को बल दे सकता है।

आंतरिक चुनौतियां: कट्टरपंथ और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा

नई सरकार के सामने सबसे बड़ी आंतरिक चुनौती समाज में बढ़ते कट्टरपंथ को नियंत्रित करना और अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। चुनाव के दौरान और उसके बाद हुई छिटपुट हिंसा ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान खींचा है। जमात-ए-इस्लामी की सरकार में मजबूत हिस्सेदारी कट्टरपंथी तत्वों को बढ़ावा दे सकती है, जिससे न केवल बांग्लादेश का आंतरिक सामाजिक ताना-बनाना प्रभावित होगा, बल्कि भारत के साथ सीमावर्ती राज्यों में सांप्रदायिक तनाव बढ़ने की आशंका भी रहेगी। भारत के लिए यह एक संवेदनशील मुद्दा है, क्योंकि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के साथ होने वाला व्यवहार भारत की घरेलू राजनीति पर भी गहरा प्रभाव डालता है।

निष्कर्ष: भविष्य की कूटनीतिक राह

बांग्लादेश के 2026 के चुनाव परिणाम दक्षिण एशिया में एक नए भू-राजनीतिक युग की आहट हैं। भारत के लिए अब ‘वेट एंड वॉच’ की नीति के साथ-साथ एक ‘सक्रिय और बहुआयामी कूटनीति’ की आवश्यकता है। दिल्ली को केवल एक राजनीतिक दल के साथ संबंधों पर निर्भर रहने के बजाय बांग्लादेश की नई सत्ता के सभी केंद्रों के साथ संवाद स्थापित करना होगा। वहीं, बांग्लादेश की नई सरकार को भी यह समझना होगा कि आर्थिक विकास और वैश्विक मंच पर स्थिरता के लिए भारत के साथ सहयोग अपरिहार्य है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या ढाका अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रख पाता है या वह चीन और अन्य शक्तियों के प्रभाव में आकर क्षेत्रीय संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ देता है।


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