राजनीति विज्ञान में 20वीं शताब्दी के मध्य में उभरने वाला ‘Behaviouralism’ एक ऐसा बौद्धिक आंदोलन था जिसने इस विषय को पारंपरिक दार्शनिक एवं संस्थागत दृष्टिकोणों से आगे बढ़ाकर अधिक वैज्ञानिक, अनुभवजन्य और विश्लेषणात्मक अनुशासन के रूप में विकसित किया। 1940–1950 के दशक में विकसित यह दृष्टिकोण मुख्यत: अमेरिका में राजनीतिक अध्ययन की पद्धति को बदलने वाला माना जाता है। यह आंदोलन इस विश्वास पर आधारित था कि राजनीतिक घटनाओं का अध्ययन तभी प्रभावी हो सकता है जब उन्हें व्यक्तियों एवं समूहों के वास्तविक व्यवहार के आधार पर समझा जाए। इस प्रकार, Behaviouralism ने राजनीतिक विज्ञान को ‘What ought to be’ से हटाकर ‘What is’ की दिशा में अग्रसर किया।
G. A. Almond, David Easton, Robert Dahl, Karl Deutsch जैसे विद्वानों के प्रयासों से यह दृष्टिकोण ‘Behavioural Revolution’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसका मूल उद्देश्य राजनीति विज्ञान को एक ‘सकारात्मक विज्ञान’ (Positive Science) बनाना था, जो सिद्धांतों के निर्माण में वैज्ञानिक पद्धति और अनुभवजन्य डेटा का प्रयोग करे।
व्यवहारवाद की पृष्ठभूमि और उद्भव
पारंपरिक राजनीतिक अध्ययन लंबे समय तक संस्थाओं—जैसे विधानपालिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका— की संरचना, संविधान, अधिकारों और कर्तव्यों आदि के अध्ययन तक सीमित रहा। इसमें मानकात्मक (normative) और दार्शनिक विमर्श अधिक था, किंतु वास्तविक राजनीतिक व्यवहार, जनमानस, मतदाता आचरण, हित समूहों की भूमिका, एलीट व्यवहार आदि पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद समाज विज्ञानों में—विशेषकर मनोविज्ञान, समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र—का तीव्र विकास हुआ। इन विषयों के शोध में प्रयोग, मात्रात्मक विधियों और सांख्यिकीय उपकरणों का उपयोग बढ़ रहा था। राजनीतिक विज्ञान ने भी इस वैज्ञानिकता को अपनाया और ‘Behaviouralism’ एक प्रत्युत्तर के रूप में उभरा।
Behaviouralism की प्रमुख विशेषताएँ
1. Empirical Orientation (अनुभवजन्य दृष्टिकोण)
Behaviouralism का मुख्य आधार अनुभवजन्य वास्तविकताओं का अध्ययन है। राजनीतिक व्यवहार को समझने के लिए प्रेक्षण, सर्वेक्षण, साक्षात्कार, सैंपलिंग और सांख्यिकीय डेटा पर जोर दिया गया।
2. Scientific Method (वैज्ञानिक पद्धति)
वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग—परिकल्पना निर्माण, डेटा संग्रह, विश्लेषण और परिणामों की पुष्टि—Behaviouralism की प्रमुख विशेषता है।
3. Quantification (मात्रात्मकता)
राजनीतिक घटनाओं को मापने योग्य रूप में प्रस्तुत करना आवश्यक माना गया। मतदाता व्यवहार, जनमत, हित समूहों के प्रभाव आदि का सांख्यिकीय विश्लेषण किया जाने लगा।
4. Individual-Centric Analysis (व्यक्तिकेंद्रित अध्ययन)
व्यवहारवादी राजनीति विज्ञान का केंद्र बिंदु व्यक्ति है। उनका तर्क है कि राजनीतिक संस्थाएँ तभी समझी जा सकती हैं जब हम यह जानें कि व्यक्ति इनके भीतर कैसे व्यवहार करते हैं।
5. Value-neutrality (मूल्य-मुक्त अनुसंधान)
Behaviouralism का दावा है कि शोध वैल्यू-न्यूट्रल होना चाहिए; शोधकर्ता की मान्यताओं और विचारधाराओं को डेटा और विश्लेषण से अलग रखा जाए।
6. Interdisciplinary Approach (अंतरविषयी दृष्टिकोण)
Behaviouralism ने मनोविज्ञान, समाजशास्त्र, नृविज्ञान और अर्थशास्त्र जैसे विषयों से अवधारणाएँ लेकर राजनीतिक अध्ययन को समृद्ध किया।
7. Theory-building (सिद्धांत निर्माण)
डाटा पर आधारित सामान्य सिद्धांत बनाने पर बल दिया गया, जिससे राजनीति विज्ञान एक व्यवस्थित वैज्ञानिक अनुशासन के रूप में विकसित हो।
David Easton के आठ Postulates (Behaviouralism के सिद्धांत)
David Easton ने Behaviouralism के आठ मूलभूत सिद्धांत बताए, जिन्हें राजनीतिक विज्ञान के लिए आधारशिला माना जाता है—
- Regularities – राजनीतिक व्यवहार में अनुमानित पैटर्न पाए जा सकते हैं।
- Verification – सिद्धांतों और निष्कर्षों की अनुभवजन्य पुष्टि आवश्यक है।
- Techniques – अनुसंधान में आधुनिक तकनीकी उपकरणों का प्रयोग।
- Quantification – मात्रात्मक विश्लेषण का महत्व।
- Values – मूल्य-मुक्त शोध का आग्रह।
- Systematization – व्यवस्थित सिद्धांत निर्माण।
- Pure Science – अनुसंधान का उद्देश्य ज्ञान वृद्धि।
- Integration – विभिन्न सामाजिक विज्ञानों का समेकन।
Behavioural Revolution और उसका प्रभाव
1950 के दशक में राजनीति विज्ञान में Behavioural Revolution ने अनेक परिवर्तन किए:
1. Political behaviour की ओर झुकाव
मतदान अध्ययन, जनमत सर्वे और राजनीतिक मनोविज्ञान का विकास हुआ।
2. Comparative Politics में परिवर्तन
प्राकृतिक तुलना की बजाय वैज्ञानिक तुलना पर बल—Almond और Verba का ‘Civic Culture’ अध्ययन इसका उदाहरण।
3. Area Studies का विकास
अलग-अलग क्षेत्रों के राजनीतिक व्यवहार का अध्ययन जैसे—अफ्रीका, एशिया, लैटिन अमेरिका।
4. Political System Analysis
Easton ने राजनीतिक प्रणाली (Political System) का मॉडल दिया, जिसमें Input–Output, Feedback, Environment की मान्यताएँ विकसित की गईं।
5. Public Opinion Research उन्नति
Gallup जैसे संस्थानों के सर्वे सार्वभौमिक रूप से अपनाए जाने लगे।
Behaviouralism की उपलब्धियाँ
1. राजनीति विज्ञान को वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान करना
Behaviouralism ने राजनीति विज्ञान को डेटा-आधारित अनुशासन बनाया।
2. नई पद्धतियों का विकास
सर्वेक्षण पद्धति, सैंपलिंग, सांख्यिकीय उपकरण आदि राजनीति विज्ञान में मुख्य प्रवाह बने।
3. नीतिगत अध्ययन को नया आयाम
जनमत, नागरिक संस्कृति, हित समूह विश्लेषण जैसे क्षेत्रों का विकास हुआ।
4. लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की बेहतर समझ
मतदान व्यवहार, चुनावी प्रवृत्तियाँ, पार्टी प्रणालियाँ आदि का वैज्ञानिक विश्लेषण संभव हुआ।
5. राजनीति विज्ञान और अन्य विषयों का एकीकरण
Interdisciplinary nature अधिक सशक्त हुई।
Behaviouralism की सीमाएँ और आलोचनाएँ
1. अत्यधिक वैज्ञानिकवाद (Excessive scienticism)
राजनीति विज्ञान केवल संख्याओं या मापन द्वारा समझा नहीं जा सकता। शक्ति, नैतिकता, विचारधारा आदि को विज्ञान के ढांचे में फिट करना कठिन है।
2. मूल्य-मुक्त अनुसंधान अवास्तविक
अनुसंधान पूरी तरह मूल्य-मुक्त नहीं हो सकता। शोधकर्ता की पृष्ठभूमि एवं सामाजिक संदर्भ उसके निष्कर्षों को प्रभावित करते हैं।
3. राजनीतिक दर्शन की उपेक्षा
Behaviouralism ने ‘What ought to be’ को लगभग नकार दिया, जिससे न्याय, समानता, स्वतंत्रता जैसे विचारों पर विमर्श कमजोर पड़ा।
4. अत्यधिक मात्रात्मकता की समस्या
मानव व्यवहार जटिल होता है, जिसे अक्सर सांख्यिकीय तकनीकों में नहीं समेटा जा सकता।
5. विकासशील देशों की उपेक्षा
Behaviouralism मुख्यतः अमेरिकी और पश्चिमी राजनीतिक अनुभवों पर आधारित था, जिसे विकासशील देशों के संदर्भ में लागू करना कठिन रहा।
6. Macro-level politics की अनदेखी
सत्ता संरचना, संस्थाओं, शासन, और नीति-निर्माण जैसे व्यापक स्तर के विषयों की अनदेखी हुई।
Post-Behaviouralism: Behaviouralism का उत्तर-चरण
1960 के दशक में Behaviouralism की सीमाएँ स्पष्ट होने लगीं और विद्वानों ने अधिक प्रासंगिक, जन-केंद्रित और मूल्य-संवेदनशील राजनीतिक अध्ययन की मांग की। David Easton, जो Behaviouralism के प्रमुख समर्थक थे, उन्होंने ही Post-Behaviouralism को आगे बढ़ाया।
इसके मुख्य सिद्धांत:
1. Relevance (सार्थकता)
शोध समाज की समस्याओं से जुड़ा होना चाहिए।
2. Action (कार्यवाही)
केवल सिद्धांत नहीं, बल्कि समाज सुधार हेतु प्रयोजनात्मक अध्ययन आवश्यक।
3. Value-loaded research (मूल्य-समृद्ध शोध)
मानवता, सामाजिक न्याय, समानता जैसे मूल्य उपेक्षित नहीं किए जा सकते।
4. Policy-oriented approach
नीतिगत निर्णयों में उपयोगी शोध पर बल।
5. Ethical Political Science
राजनीति विज्ञान को समाज में नैतिकता और जिम्मेदारी के साथ योगदान देना चाहिए।
इस प्रकार, Post-Behaviouralism ने Behaviouralism की खूबियों को स्वीकारते हुए उसकी सीमाओं को दूर किया।
भारत और विकासशील देशों के संदर्भ में Behaviouralism
भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में Behaviouralism का महत्व कई क्षेत्रों में दिखता है:
1. निर्वाचन व्यवहार का अध्ययन
भारतीय वोटिंग पैटर्न, जाति, वर्ग, धर्म, क्षेत्र, गरीबी आदि का वैज्ञानिक अध्ययन।
2. Public opinion research
भारतीय मीडिया, सोशल मीडिया और जनमत सर्वे से राजनीति को समझना।
3. Comparative politics
लोकतांत्रिक संक्रमण, शासन-व्यवस्था और राजनीतिक संस्कृति पर शोध।
4. नीति-निर्माण में योगदान
डेटा-आधारित नीतियाँ—जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबी— में Behavioural tools का उपयोग।
हालाँकि, भारतीय समाज की जटिलता सांख्यिकीय अध्ययन में कई बार चुनौतीपूर्ण साबित होती है।
Behaviouralism का समग्र मूल्यांकन
सकारात्मक योगदान:
- राजनीति विज्ञान की वैज्ञानिक पद्धति को मजबूत किया।
- अनुभवजन्य अनुसंधान को मुख्यधारा में लाया।
- राजनीतिक मनोविज्ञान, तुलनात्मक राजनीति, निर्वाचन अध्ययन जैसे नए क्षेत्रों को जन्म दिया।
- Interdisciplinary approach को बढ़ावा दिया।
नकारात्मक पहलू:
- अत्यधिक वैज्ञानिकता ने राजनीति के मानवीय और मूल्यात्मक पक्ष की उपेक्षा की।
- डेटा-केंद्रित दृष्टिकोण कई बार राजनीतिक यथार्थ की जटिलता को सरल कर देता है।
- पश्चिमी अनुभवों पर आधारित पद्धति वैश्विक विविधता के अनुरूप नहीं बैठती।
निष्कर्ष
Behaviouralism राजनीति विज्ञान के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था जिसने इस अनुशासन को दार्शनिक विमर्श से आगे बढ़ाकर अनुभवजन्य विश्लेषण की दिशा में अग्रसर किया। इसने राजनीतिक अध्ययन को अधिक वैज्ञानिक, प्रमाण-आधारित और व्यवस्थित बनाने में केंद्रीय भूमिका निभाई। यद्यपि इसकी कुछ सीमाएँ थीं—जैसे अत्यधिक वैज्ञानिकवाद, मूल्य-मुक्त अनुसंधान का आग्रह, और पश्चिमी संदर्भ की अतिनिर्भरता—फिर भी इसके योगदान ने आधुनिक राजनीतिक विज्ञान की बुनियाद को मजबूत किया है।
Post-Behaviouralism ने इसकी खामियों को दूर करते हुए राजनीतिक विज्ञान में प्रासंगिकता, नैतिकता और कार्यवाही को पुनः केंद्र में स्थापित किया। आज भी राजनीतिक विज्ञान में जनमत सर्वेक्षण, निर्वाचन अध्ययन, राजनीतिक मनोविज्ञान, नीतिगत विश्लेषण और तुलनात्मक राजनीति जैसे क्षेत्रों में Behaviouralism की छाप स्पष्ट दिखती है। इस प्रकार, Behaviouralism न केवल एक पद्धति-परिवर्तन था बल्कि आधुनिक राजनीतिक विज्ञान के व्यापक विकास का एक आधारस्तंभ भी है।
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