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ब्रिक्स भारत शिखर सम्मेलन 2026

BRICS India summit needs a green and resilient agenda- TH

इस वर्ष अगला ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (BRICS Summit) भारत में आयोजित किया जाएगा। भारत पहले ही G-20 (2023) की मेजबानी कर चुका है, जिससे यह सुनिश्चित हुआ कि बुनियादी ढाँचा और संगठनात्मक प्रक्रियाएँ मजबूत हैं। अब भारत को आवश्यक है कि वह शिखर सम्मेलन के एजेंडे पर शीघ्रता से ध्यान केंद्रित करे। यह स्वाभाविक रूप से भारत और ब्रिक्स के लिए महत्वपूर्ण होगा, लेकिन इससे भी बढ़कर, यह वैश्विक दक्षिण (Global South) के लिए अत्यंत अहम मुद्दा है।

ब्रिक्स क्या है?

ब्रिक्स एक अंतर-सरकारी सहयोगी संगठन है, जिसमें विश्व की प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाएँ शामिल हैं। इसका मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों के बीच आर्थिक सहयोग को प्रोत्साहित करना और वैश्विक स्तर पर उनके राजनीतिक तथा आर्थिक प्रभाव को सशक्त बनाना है।

संरचना और उत्पत्ति
ब्रिक्स (BRICS) शब्द इसके पाँच संस्थापक देशों ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के नामों के प्रथम अक्षरों से बना है।
मूल रूप से ‘ब्रिक (BRIC)’ शब्द का प्रयोग वर्ष 2001 में जिम नील ने इन चार तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं का उल्लेख करने के लिए किया था।
इन देशों का पहला औपचारिक शिखर सम्मेलन 2009 में रूस में आयोजित हुआ, जहाँ उन्होंने एक राजनयिक मंच के रूप में अपनी औपचारिक पहचान स्थापित की।
इसके बाद 2010 में दक्षिण अफ्रीका को इसमें शामिल किया गया और संगठन का नाम बदलकर ‘ब्रिक्स (BRICS)’ रख दिया गया।

मुख्य उद्देश्य:

  1. आर्थिक सहयोग को सुदृढ़ करना: सदस्य देशों के बीच व्यापार, निवेश और वित्तीय संबंधों को बढ़ावा देना।
  2. पश्चिमी प्रभुत्व का संतुलन: संयुक्त राष्ट्र, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं में सुधार के माध्यम से अधिक न्यायसंगत और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की स्थापना करना।
  3. वैकल्पिक वित्तीय तंत्र विकसित करना: अमेरिकी डॉलर और पश्चिम-प्रधान संस्थाओं पर निर्भरता कम करने के लिए ब्रिक्स देशों ने न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) और कॉन्टिंजेंट रिज़र्व अरेंजमेंट (CRA) की स्थापना की।

विस्तार और ब्रिक्स+ पहल
हाल के वर्षों में ब्रिक्स ने अपनी सदस्यता का दायरा बढ़ाते हुए मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात को भी शामिल किया है।
इस विस्तार को आम तौर पर ब्रिक्स+ (BRICS Plus) कहा जाता है, जो संगठन को वैश्विक दक्षिण (Global South) की एक और अधिक प्रभावशाली आवाज़ के रूप में स्थापित करता है।

BRICS Plus में स्थिरता और सहयोग की आवश्यकता

ट्रम्प युग के बाद की वैश्विक राजनीति में सहयोगात्मक बहुपक्षीयता (Collaborative Multilateralism) पर गंभीर दबाव है। जलवायु परिवर्तन (Climate Change) विशेष रूप से निशाने पर है, जहाँ अमेरिका ने इसे एक छलावा बताया है और जीवाश्म ईंधनों के उपयोग को बढ़ावा दिया है। अमेरिका ने यह भी संकेत दिया है कि वह 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से हट सकता है, जिनमें भारत द्वारा संचालित International Solar Alliance भी शामिल है।
इसके अतिरिक्त, अमेरिका COP30 (Belem, Brazil, 2025) से भी दूर रहा, जिससे यह आशंका बढ़ी कि COP प्रक्रिया जारी नहीं रह पाएगी।
यूरोपीय देशों के लिए भी स्थिति जटिल है, वे जलवायु के ‘चैंपियन’ के रूप में खुद को प्रस्तुत करते हैं, परंतु घरेलू राजनीतिक और ऊर्जा सुरक्षा कारणों से उनके कदम सीमित हैं। ऐसे में, ब्रिक्स एक स्थिरता लाने वाला मंच बन सकता है जो सहयोगात्मक कार्रवाई पर जोर दे।

“Green and Resilient Agenda” का मतलब

Green  का अर्थ है पर्यावरण स्थिरता, इसका उद्देश्य विकास की ऐसी दिशा अपनाना है जिससे प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, नवीकरणीय ऊर्जा का प्रसार, और कार्बन उत्सर्जन में कमी सुनिश्चित हो।

“लचीला” शब्द यहाँ resilience यानी संवेदनशील परिस्थितियों से उबरने की क्षमता के लिए प्रयोग किया जाता है। अर्किथात सी देश या समाज की ऐसी नीति हो जो जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदाओं, आर्थिक संकटों या महामारी जैसी परिस्थितियों से जल्दी उभर सके।

ब्रिक्स देशों (जैसे भारत, चीन, ब्राजील, रूस, दक्षिण अफ्रीका) के लिए इसका अर्थ है;

  • स्वच्छ ऊर्जा, हरित निवेश और सतत अवसंरचना में सहयोग

  • जलवायु वित्त (climate finance) और तकनीकी साझेदारी

  • आपदा प्रबंधन, खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा को लचीला बनाना

साझा चिंता: जलवायु परिवर्तन और आर्थिक संतुलन

ब्रिक्स देशों (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) ने हमेशा जलवायु परिवर्तन पर एक साझा दृष्टिकोण रखा है। संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा सम्मेलन (UNFCCC) के तहत, इन देशों ने विकासशील देशों की प्राथमिकताओं को सामने रखा है।
रियो डी जनेरियो (जुलाई 2025) में होने वाला आगामी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ‘BRICS Leaders’ Framework Declaration on Climate Finance’ को अपनाने का अवसर प्रदान करेगा।
भारत, जो लंबे समय से वैश्विक दक्षिण की आवाज़ बना हुआ है, इस विषय पर नेतृत्वकारी भूमिका निभा सकता है।

हरित वित्त (Green Finance) और वैश्विक सहयोग

जलवायु कार्रवाई के लिए वित्त (Climate Finance) एक केंद्रीय मुद्दा है। अतः आवश्यकता है कि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में विश्व बैंक (World Bank) और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के प्रमुखों को शामिल किया जाए।
यह समय है कि ब्रिक्स खुद को केवल ‘G-7 या G-20’ के विकल्प के रूप में सीमित न रखे, बल्कि नव विकास बैंक (New Development Bank) से आगे बढ़कर वैश्विक हरित वित्त (Green Finance) पर ठोस रुख अपनाए।

हालांकि, यह चुनौतीपूर्ण है क्योंकि अमेरिका की जलवायु वित्त पर उदासीनता और कॉर्पोरेट निवेश में गिरावट (विशेष रूप से ESG यानी Environmental, Social, Governance मापदंडों पर) के कारण वैश्विक पूंजी प्रवाह प्रभावित हुआ है।

ब्रिक्स के समक्ष भारत की चुनौतियाँ

भारत इस संगठन में एक संतुलनकारी भूमिका निभाता है, परंतु इसके साथ उसे कई आंतरिक बाह्य चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
सदस्य देशों की अलगअलग प्राथमिकताएँ है, हर सदस्य देश की अपनी आर्थिक और राजनीतिक सोच है जैसे

  • चीन वैश्विक आर्थिक नेतृत्व चाहता है,
  • रूस पश्चिम के विरोध पर ज़ोर देता है,
  • भारत संतुलन और बहुध्रुवीयता चाहता है।

इससे कई बार साझा नीतियाँ बनाना मुश्किल हो जाता है।

भारत को चाहिए कि वह

  • साझा हितों (जैसे जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक दक्षिण का विकास) पर ध्यान केंद्रित करे।
  • ब्रिक्स के भीतर कंसेंसस डिप्लोमेसी यानी सहमति-आधारित निर्णय प्रणाली को मज़बूत करे।

इससे संगठन की दिशा में एकरूपता आ सकती है।

  • ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका और नए सदस्य देशों (जैसे UAE, सऊदी अरब) के साथ
    मजबूत साझेदारी बनाए।
  • ब्रिक्स के अंदर ‘India-friendly coalition’ बनाए रखे।
  • तकनीकी, शिक्षा और डिजिटल नवाचार जैसे क्षेत्रों में अपनी नेतृत्व क्षमता बढ़ाए,
    ताकि वह चीन के प्रभाव का संतुलन बन सके।
  • न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) में अधिक निवेश और प्रभाव बनाकर
    वैकल्पिक आर्थिक शक्ति का निर्माण करे।

हालाँकि, ब्रिक्स के भीतर यह गतिशील सहभागिता भारत के अन्य गठबंधनों तक ही सीमित नहीं है। ब्रिक्स में भारत की भागीदारी पश्चिम के साथ उसके बढ़ते संबंधों, विशेष रूप से चतुर्भुज सुरक्षा संवाद (क्वाड) और संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) जैसे देशों के साथ मजबूत द्विपक्षीय संबंधों का पूरक है।

भारत ने पश्चिमी शक्तियों के साथ इन मजबूत द्विपक्षीय संबंधों को सफलतापूर्वक बनाए रखा है, साथ ही रूस और ईरान जैसे कुछ खुले तौर पर पश्चिम-विरोधी ब्रिक्स सदस्यों के साथ अपने संबंधों को गहरा करके अपनी स्वायत्तता का दावा किया है, जिससे उसकी रणनीतिक स्वायत्तता को बढ़ावा मिला है।

यह दृष्टिकोण भारत को पारंपरिक गठबंधनों से बंधे बिना अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने में मदद करता है। ब्रिक्स और क्वाड दोनों में भारत की भागीदारी बहु-संरेखण की एक सूक्ष्म रणनीति को दर्शाती है, जो भारत को पश्चिमी और गैर-पश्चिमी मंचों के बीच एक सेतु के रूप में स्थापित करती है।

यह संतुलन भारत को सस्ते तेल, व्यापार और लड़ाकू जेट इंजनों के माध्यम से रूस के साथ अपने सुरक्षा और आर्थिक संबंधों से लाभ उठाने की अनुमति देता है, जबकि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के नियंत्रण में केंद्रीय भूमिका निभाने वाली अपनी रणनीतिक स्थिति का भी लाभ उठाता है, जो अमेरिका के साथ बढ़ते सुरक्षा सहयोग को भी सुगम बनाता है।

भारत की भूमिका और अवसर

भारत के पास इस समय दोहरी जिम्मेदारी और अवसर दोनों हैं:

  1. एक ओर वह ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है,
  2. दूसरी ओर, वह वैश्विक दक्षिण की जलवायु न्याय और विकास की मांगों का प्रतिनिधि है।

भारत का यह नेतृत्व केवल राजनीतिक नहीं बल्कि हरित विकास और लचीली अर्थव्यवस्था के एजेंडे को आगे बढ़ाने का अवसर भी है।
पोस्टCOVID-19 युग में जब दुनिया स्थिरता और समान विकास के रास्ते खोज रही है, भारत का हरित एजेंडा (Green Agenda) विश्वसनीय विकल्प बन सकता है।

निष्कर्ष

भारत के लिए यह ब्रिक्स शिखर सम्मेलन केवल एक कूटनीतिक अवसर नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक जिम्मेदारी भी है, एक हरित, समावेशी और लचीले विकास मॉडल की दिशा में वैश्विक दक्षिण का नेतृत्व करने की।
यदि भारत जलवायु वित्त, तकनीकी नवाचार, और सतत विकास पर ठोस पहल करता है, तो 2025 का ब्रिक्स सम्मेलन न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया के लिए परिवर्तनकारी साबित हो सकता है।

 


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