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भारतीय धर्मनिरपेक्षता: राजीव भार्गव की विश्लेषणात्मक दृष्टि

टी.एन. मदन, आशीष नंदी, पार्थ चटर्जी एवं राजीव भार्गव का धर्मनिरपेक्षता पर विचार

भारतीय राजनीति और समाज में धर्मनिरपेक्षता (Secularism) हमेशा से एक बहस का विषय रही है। इसके अर्थ, स्वरूप और व्यवहारिक रूप पर विद्वानों के मतभेद रहे हैं। इस संदर्भ में राजीव भार्गव का निबंध “The Distinctiveness of Indian Secularism” (2006) भारतीय धर्मनिरपेक्षता की समझ में एक गहन दार्शनिक आयाम जोड़ता है। भार्गव यह बताते हैं कि भारत में धर्मनिरपेक्षता न तो पश्चिमी मॉडल की प्रतिकृति है और न ही केवल पारंपरिक धार्मिक सहिष्णुता का आधुनिक रूप है। बल्कि यह एक संदर्भआधारित आधुनिकता (contextually modern form) है, जिसने भारतीय समाज की बहुधार्मिकता और विविधता को ध्यान में रखते हुए स्वयं को ढाला है।

भारतीय संदर्भ में धर्मनिरपेक्षता

  • भार्गव अपने लेख की शुरुआत इस कथन से करते हैं कि भारत में धर्मनिरपेक्षता एक गहरे संकट से गुजर रही है। उनका कहना है कि यह संकट केवल बाहरी कारणों जैसे कि हिंदू राष्ट्रवाद या राजनीतिक दुरुपयोग का परिणाम नहीं है, बल्कि धर्मनिरपेक्षता की अपनी अवधारणा के भीतर निहित आंतरिक संकट भी इसका कारण है (Bhargava, 2006)।
  • वे इस बात की ओर ध्यान दिलाते हैं कि भारतीय बौद्धिक परंपरा में कई विद्वान जैसे टी.एन. मदन, आशीष नंदी और पार्थ चटर्जी यह मानते हैं कि धर्मनिरपेक्षता एक पश्चिमी आदर्श है जो भारतीय समाज में लागू नहीं हो सकता। परंतु भार्गव का मत इससे भिन्न है। वे कहते हैं कि भारत ने इस आदर्श को “रचनात्मक रूप से परिवर्तित” किया है और एक ऐसा मॉडल गढ़ा है जो भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप है।

भारतीय धर्मनिरपेक्षता की मूल अवधारणा

भार्गव के अनुसार धर्मनिरपेक्षता का सामान्य अर्थ है धर्म और राज्य के बीच दूरी बनाए रखना।

  • परंतु वे इस बात पर जोर देते हैं कि यह दूरी कठोर और पूर्ण अलगाव (strict separation) के रूप में नहीं, बल्कि सिद्धांत आधारित दूरी (principled distance) के रूप में समझी जानी चाहिए।
    वे लिखते हैं कि पश्चिमी समाजों (विशेषकर अमेरिका और फ्रांस) में “दीवार की तरह अलगाव” का मॉडल (wall of separation) सफल रहा क्योंकि वहाँ समाज अपेक्षाकृत एकधर्मी था। किंतु भारत जैसे बहुधर्मी और बहु-सांस्कृतिक समाज में यह मॉडल काम नहीं कर सकता।
  • यहाँ आवश्यक है एक ऐसा दृष्टिकोण जो धर्म की विविधता को स्वीकारे, परंतु साथ ही समानता और न्याय को भी सुरक्षित रखे।

“Principled Distance” की अवधारणा

भार्गव का यह विचार भारतीय धर्मनिरपेक्षता की रीढ़ है। वे कहते हैं कि भारतीय राज्य धर्म से सिद्धांत आधारित दूरी रखता है।

  • राज्य धर्म से न पूरी तरह जुड़ा है, न पूरी तरह अलग बल्कि उसका संबंध इस बात पर निर्भर करता है कि कौन-सा विकल्प समानता, स्वतंत्रता और न्याय को बेहतर रूप में आगे बढ़ाता है।।(Bhargava, 2006)
  • इस दृष्टिकोण के अनुसार, यदि किसी धर्म में ऐसी प्रथाएँ हैं जो अन्यायपूर्ण या असमानतापूर्ण हैं, जैसे अस्पृश्यता या स्त्री-विरोधी परंपराएँ तो राज्य का कर्तव्य है कि वह हस्तक्षेप करे। लेकिन जब किसी समुदाय की धार्मिक पहचान या सांस्कृतिक स्वतंत्रता खतरे में हो, तो राज्य को उनकी रक्षा करनी चाहिए।
    अर्थात् भारतीय धर्मनिरपेक्षता न राज्य की पूर्ण निष्क्रियता चाहती है, न अत्यधिक नियंत्रण बल्कि संदर्भानुसार न्यायपूर्ण हस्तक्षेप को उचित मानती है।

भारतीय संविधान में धर्मनिरपेक्षता का स्वरूप

भार्गव भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16, 25 से 30 तक की चर्चा करते हैं और यह दर्शाते हैं कि संविधान ने धर्मनिरपेक्षता को केवल “राजनीतिक सिद्धांत” नहीं, बल्कि “नैतिक और सामाजिक मूल्य” के रूप में देखा है।
उदाहरण:

  • अनुच्छेद 25 नागरिकों को धर्म की स्वतंत्रता देता है।
  • अनुच्छेद 27–28 राज्य को किसी धर्म के प्रचार के लिए सार्वजनिक धन के उपयोग से रोकते हैं।
  • अनुच्छेद 30(1) धार्मिक अल्पसंख्यकों को शैक्षणिक संस्थाएँ स्थापित करने का अधिकार देता है।
  • अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का उन्मूलन करता है।

भार्गव के अनुसार यह द्वैत (dualism) भारतीय संविधान की विशेषता है, यहाँ धर्मनिरपेक्षता केवल “अलगाव” नहीं, बल्कि सामाजिक सुधार और समान नागरिकता का साधन भी है।

भारतीय और पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता का अंतर

भार्गव के विश्लेषण में भारतीय और पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता के बीच निम्नलिखित मूलभूत अंतर उभरते हैं:

पहलूपश्चिमी धर्मनिरपेक्षताभारतीय धर्मनिरपेक्षता
मुख्य सिद्धांतधर्म और राज्य के बीच पूर्ण अलगावसिद्धांत आधारित दूरी
दृष्टिकोणव्यक्ति-केंद्रित (Individualistic)व्यक्ति और समुदाय दोनों-केंद्रित
उद्देश्यधार्मिक स्वतंत्रताधार्मिक स्वतंत्रता + सामाजिक समानता
धर्म के प्रति दृष्टितटस्थ या नकारात्मकआलोचनात्मक सम्मान (Critical Respect)
हस्तक्षेप नीतिहस्तक्षेप निषिद्धअन्याय या असमानता के विरुद्ध हस्तक्षेप उचित

भार्गव के अनुसार पश्चिमी मॉडल “धर्म से दूरी” पर आधारित है, जबकि भारतीय मॉडल “धर्म के साथ संवाद” पर। भारत की धार्मिक बहुलता और सांस्कृतिक जटिलता ने इसे आवश्यक बनाया कि धर्मनिरपेक्षता केवल धर्म से परहेज़ न करे, बल्कि न्यायसंगत रूप में उससे संवाद भी करे।

आलोचक और भार्गव की प्रतिक्रिया

भार्गव अपने लेख में धर्मनिरपेक्षता के प्रमुख आलोचकों टी.एन. मदन, आशीष नंदी और पार्थ चटर्जी के विचारों पर भी चर्चा करते हैं।

  • टी.एन. मदन के अनुसार भारत जैसे समाज में जहाँ धर्म सामाजिक जीवन का आधार है, धर्मनिरपेक्षता “असंभव आदर्श” है।
  • आशीष नंदी मानते हैं कि धर्मनिरपेक्षता पश्चिमी तर्कवाद की उपज है जिसने भारतीय सहिष्णुता की जीवंत परंपरा को कमजोर किया।
  • पार्थ चटर्जी का मत है कि धर्मनिरपेक्षता राष्ट्र-राज्य की आधुनिक परियोजना का हिस्सा है, जो औपनिवेशिक विरासत से जुड़ी है।

भार्गव इन मतों को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए भी असहमत रहते हैं। वे मानते हैं कि भारतीय धर्मनिरपेक्षता न तो पश्चिम की नकल है, न केवल परंपरा का पुनरुद्धार। यह एक रचनात्मक संश्लेषण (creative synthesis) है जिसमें पश्चिमी आधुनिकता और भारतीय परंपरा दोनों का मेल है।

भारतीय धर्मनिरपेक्षता की पाँच विशिष्ट विशेषताएँ

भार्गव भारतीय धर्मनिरपेक्षता की पाँच मुख्य विशिष्टताओं की पहचान करते हैं:

  1. बहुमूल्यात्मकता (Multi-value nature): यह केवल धार्मिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि समानता, न्याय और शांति जैसे मूल्यों से जुड़ी है।
  2. Principled Distance: राज्य और धर्म के बीच लचीला, नैतिक दूरी बनाए रखना।
  3. Contextual Reasoning: निर्णय संदर्भ और परिस्थिति के अनुसार लेना।
  4. Critical Respect: धर्म के प्रति आलोचनात्मक सम्मान यानी उसके अच्छे पक्षों को मान्यता, बुरे पक्षों पर सुधार।
  5. Dual Focus on Justice: धर्मों के बीच (inter-religious) और धर्मों के भीतर (intra-religious) दोनों प्रकार के अन्याय से मुक्ति का प्रयास।

  मूल्यांकन

भार्गव का सिद्धांत भारतीय संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है क्योंकि यह विविधता और न्याय दोनों को संतुलित करता है। परंतु इसके व्यावहारिक पहलुओं पर कुछ प्रश्न उठते हैं:

  1. “Principled Distance” की परिभाषा बहुत लचीली है यह तय करना कठिन है कि राज्य किस स्थिति में हस्तक्षेप करे और किसमें नहीं।
  2. जब राज्य धर्म में सुधार के नाम पर हस्तक्षेप करता है (जैसे हिंदू कोड बिल या शाहबानो प्रकरण), तब उसकी निष्पक्षता संदेह के घेरे में आ सकती है।
  3. अल्पसंख्यक अधिकारों की सुरक्षा और समान नागरिकता के आदर्श के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण है।

फिर भी, भार्गव की अवधारणा इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि वह धर्मनिरपेक्षता को केवल राजनीतिक व्यवस्था नहीं, बल्कि नैतिक परियोजना (moral project) के रूप में प्रस्तुत करती है जो समानता, सम्मान और सामाजिक सुधार पर आधारित है।

निष्कर्ष

भार्गव का लेख भारतीय धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा को नई वैचारिक ऊँचाई देता है। उनके अनुसार भारत की धर्मनिरपेक्षता का उद्देश्य केवल धर्म और राजनीति को अलग करना नहीं, बल्कि धर्म के भीतर न्याय और धर्मों के बीच समानता स्थापित करना है।
यह एक ऐसी आधुनिकता का उदाहरण है जो स्वदेशी भी है और सार्वभौमिक भी।
भार्गव का यह दृष्टिकोण भारतीय राजनीति में धर्मनिरपेक्षता की सैद्धांतिक प्रासंगिकता को पुनर्स्थापित करता है और यह दिखाता है कि धर्मनिरपेक्षता केवल पश्चिम का आयात नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की नैतिक परंपरा का विकासशील रूप है।


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