भारत में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक विरोधाभास को उजागर करती है। चुनावों में उनकी भागीदारी में वृद्धि हुई है, लेकिन यह वृद्धि राजनीतिक प्रतिनिधित्व और निर्णय-निर्माण की शक्ति में समान रूप से परिवर्तित नहीं हो पाई है। यह अंतर लगातार संरचनात्मक बाधाओं और सार्थक सुधारों की आवश्यकता की ओर ध्यान आकर्षित करता है।
- भारत ने मतदाता भागीदारी में लगभग लैंगिक समानता प्राप्त कर ली है, लेकिन महिलाएँ अभी भी विधायिकाओं में कम प्रतिनिधित्व रखती हैं क्योंकि उन्हें संरचनात्मक, संस्थागत और सामाजिक-सांस्कृतिक बाधाओं का सामना करना पड़ता है।
- इस अंतर को दूर करने के लिए आवश्यक है कि आरक्षण नीतियों का प्रभावी क्रियान्वयन किया जाए, राजनीतिक दलों में सुधार किए जाएँ, और ऐसी बाधाओं को हटाया जाए जो महिलाओं की निर्णय-निर्माण में सार्थक भागीदारी को सीमित करती हैं।
भारतीय राजनीति में महिलाओं की वर्तमान स्थिति क्या है? :
मतदाताओं के रूप में
- पिछले छह दशकों में भारत में मतदाता भागीदारी के संदर्भ में लैंगिक अंतर लगातार कम हुआ है, जो चुनावी परिदृश्य में एक गहरे परिवर्तन को दर्शाता है।
- 1967 के लोकसभा चुनाव में पुरुषों का मतदान प्रतिशत 7% था, जबकि महिलाओं का मतदान प्रतिशत 55.5% था, जिससे 11.2 प्रतिशत अंकों का अंतर उत्पन्न हुआ।
- 1971 के चुनाव में यह अंतर थोड़ा बढ़कर 8 प्रतिशत अंक हो गया, जिसका कारण कम साक्षरता और महिलाओं की सीमित गतिशीलता जैसी संरचनात्मक बाधाएँ थीं।
- समय के साथ शिक्षा, जागरूकता, राजनीतिक पहुँच और गतिशीलता में सुधार होने से यह अंतर धीरे-धीरे कम होता गया और 2014 तक लगभग 5 प्रतिशत अंक रह गया।
- 2019 और 2024 के आम चुनावों में महिलाओं ने लगभग पुरुषों के बराबर, यानी लगभग 66 प्रतिशत मतदान किया। 1980 के दशक के बाद कई राज्य विधानसभा चुनावों में महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से अधिक भी रहा है।
राजनीतिक अभियान
- हालाँकि मतदान में पुरुषों और महिलाओं के बीच लगभग समानता आ चुकी है, फिर भी चुनावी अभियानों में भागीदारी के स्तर पर लैंगिक अंतर बना हुआ है।
- 2009 से 2024 के बीच चुनावी सभाओं और रैलियों में महिलाओं की उपस्थिति 9 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 16 प्रतिशत हो गई है।
- इसी अवधि में जुलूसों और घर-घर जाकर प्रचार करने में महिलाओं की भागीदारी 5–6 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 11 प्रतिशत हो गई है।
इसके बावजूद पुरुषों की भागीदारी अभी भी महिलाओं की तुलना में लगभग दोगुनी बनी हुई है।
प्रतिनिधियों के रूप में
- यद्यपि महिलाएँ रिकॉर्ड संख्या में मतदान कर रही हैं, फिर भी वे सत्ता के केंद्रों से काफी हद तक बाहर हैं। 18वीं लोकसभा में कुल 543 सीटों में से केवल 74 महिला सांसद हैं, जो कुल का 6 प्रतिशत है। यह संख्या 17वीं लोकसभा की तुलना में कम है, जिसमें 78 महिला सांसद थीं, जो 14.4 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करती थीं।
- वैश्विक औसत, जो लगभग 26 प्रतिशत है, की तुलना में भारत अभी भी पीछे है। राज्य विधानसभाओं में महिलाओं का औसत प्रतिनिधित्व लगभग 9 से 10 प्रतिशत के बीच बना हुआ है। हालांकि, स्थानीय स्वशासन के स्तर पर स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है, जहाँ पंचायती राज संस्थाओं में आरक्षण के कारण महिलाओं का प्रतिनिधित्व 44 प्रतिशत से अधिक हो गया है।
महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को कौन–सी बाधाएँ सीमित करती हैं?
संस्थागत और संरचनात्मक बाधाएँ: राजनीतिक दल उम्मीदवार चयन के प्रमुख द्वारपाल के रूप में कार्य करते हैं और वे अक्सर “जीतने की क्षमता” का हवाला देकर महिलाओं को टिकट देने से इंकार कर देते हैं, जबकि कई प्रमाण यह दर्शाते हैं कि महिला उम्मीदवारों की सफलता दर समान या अधिक हो सकती है।
- उम्मीदवार चयन और पार्टी से जुड़े निर्णय अक्सर पुरुष-प्रधान अनौपचारिक नेटवर्क के भीतर लिए जाते हैं, जिससे महिलाओं की नेतृत्व भूमिकाओं तक पहुँच सीमित हो जाती है।
- यहाँ तक कि जब महिलाएँ निर्वाचित हो जाती हैं, तब भी उन्हें अक्सर महिला एवं बाल विकास या संस्कृति जैसे “soft ministries” सौंपे जाते हैं, जबकि गृह या रक्षा जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय पुरुषों के पास रहते हैं।
आर्थिक बाधाएँ: चुनावी राजनीति अत्यधिक पूंजी-आधारित होती है, जिसके कारण महिलाओं के लिए इसमें प्रवेश करना कठिन हो जाता है, क्योंकि उनके पास सामान्यतः संपत्ति, धन और चुनावी वित्तपोषण तक कम पहुँच होती है।
- महिलाओं को अक्सर उन दाता नेटवर्क और व्यावसायिक वित्तीय स्रोतों से बाहर रखा जाता है, जो चुनावी अभियानों को समर्थन प्रदान करते हैं।
सामाजिक–सांस्कृतिक और पितृसत्तात्मक बाधाएँ: पितृसत्तात्मक सामाजिक मानदंड समाज को सार्वजनिक (पुरुष) और निजी (महिला) क्षेत्रों में विभाजित करते हैं, जिससे महिलाओं को राजनीति में प्रवेश करने से हतोत्साहित किया जाता है।
- घरेलू कार्यों और बिना वेतन के देखभाल कार्यों का भार महिलाओं के पास अधिक होता है, जिससे उनके पास राजनीतिक गतिविधियों के लिए समय कम बचता है।
- कुछ मामलों में “सरपंच पति” जैसी स्थिति देखने को मिलती है, जहाँ निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के स्थान पर उनके पुरुष रिश्तेदार वास्तविक शक्ति का प्रयोग करते हैं।
प्रतिकूल राजनीतिक वातावरण: राजनीति में हिंसा, डराने-धमकाने और अपराधीकरण की उपस्थिति महिलाओं की भागीदारी को हतोत्साहित करती है। महिला नेताओं को अक्सर लैंगिक आधार पर हमलों, चरित्र हनन और ऑनलाइन उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है, जिसमें धमकियाँ और डिजिटल दुर्व्यवहार शामिल होते हैं, जो उनके राजनीतिक भागीदारी के लिए मनोवैज्ञानिक बाधाएँ उत्पन्न करते हैं।
क्षमता और पाइपलाइन की कमी: महिलाओं को अक्सर छात्र संगठनों और सक्रियतावादी नेटवर्क जैसे पारंपरिक राजनीतिक प्रशिक्षण मार्गों से बाहर रखा जाता है, जिसके कारण उनके पास नेतृत्व कौशल विकसित करने के अवसर कम होते हैं।
- मार्गदर्शन और प्रशिक्षण की कमी के कारण उनकी राजनीतिक क्षमता सीमित रह जाती है और कई बार वे शासन में पुरुष रिश्तेदारों पर निर्भर हो जाती हैं।
चुनावी प्रणाली और मौजूदा पदधारियों के लिए बाधाएँ: First-Past-The-Post (FPTP) चुनावी प्रणाली राजनीतिक दलों को “सुरक्षित उम्मीदवारों” को प्राथमिकता देने के लिए प्रेरित करती है, जो सामान्यतः मजबूत स्थानीय नेटवर्क वाले पुरुष होते हैं।
- चूँकि अधिकांश सीटों पर पहले से ही पुरुष प्रतिनिधि हैं, इसलिए incumbency advantage नए उम्मीदवारों के लिए अवसर सीमित कर देता है, जिसका सबसे अधिक प्रभाव महिलाओं पर पड़ता है।
महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए भारत की क्या पहलें हैं?
स्थानीय शासन के लिए संवैधानिक प्रावधान: 1992 के 73वें और 74वें संविधान संशोधनों ने पंचायती राज संस्थाओं और शहरी स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण अनिवार्य किया।
- इसके अतिरिक्त, बिहार, मध्य प्रदेश, केरल और गुजरात जैसे 20 से अधिक राज्यों ने इस आरक्षण को बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया है। इसके परिणामस्वरूप, भारत में स्थानीय स्तर पर 14 लाख से अधिक निर्वाचित महिला प्रतिनिधि हैं।
नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023: संविधान (106वाँ संशोधन) अधिनियम, 2023 लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण प्रदान करता है।
- इस प्रावधान का कार्यान्वयन 2027 की जनगणना और परिसीमन के बाद शुरू होगा और यह 15 वर्षों तक लागू रहेगा।
भारत निर्वाचन आयोग की पहलें: भारत का निर्वाचन आयोग SVEEP कार्यक्रम के माध्यम से महिलाओं में जागरूकता बढ़ाने और उनकी मतदाता भागीदारी को बढ़ावा देने का प्रयास करता है। इसके साथ ही “सखी” या पिंक पोलिंग बूथ की स्थापना की गई है, जिन्हें पूरी तरह महिलाओं द्वारा संचालित किया जाता है, ताकि मतदान का वातावरण सुरक्षित और सहज बनाया जा सके।
- इसके अतिरिक्त, विशेष मतदाता पंजीकरण अभियान चलाए जाते हैं, जिनका लक्ष्य पहली बार मतदान करने वाली महिलाओं और विवाह के बाद स्थानांतरित होने वाली महिलाओं को शामिल करना होता है।
क्षमता निर्माण और नेतृत्व प्रशिक्षण: पंचायती राज मंत्रालय और राष्ट्रीय महिला आयोग निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करते हैं, जिनके माध्यम से उन्हें शासन, वित्तीय प्रबंधन और विधायी प्रक्रियाओं से संबंधित कौशल सिखाए जाते हैं।
राजनीतिक दल–स्तरीय पहलें: कुछ राजनीतिक दलों ने स्वेच्छा से महिलाओं को अधिक प्रतिनिधित्व देने के लिए कदम उठाए हैं। उदाहरण के लिए, तृणमूल कांग्रेस (TMC) और बीजू जनता दल (BJD) ने चुनावों में 33 प्रतिशत या उससे अधिक टिकट महिलाओं को दिए हैं।
स्वयं सहायता समूहों (SHGs) की भूमिका: स्वयं सहायता समूह महिलाओं के नेतृत्व विकास के लिए महत्वपूर्ण मंच प्रदान करते हैं। इन समूहों में भागीदारी से महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता बढ़ती है, उनके सार्वजनिक बोलने के कौशल में सुधार होता है और सामूहिक निर्णय लेने की क्षमता विकसित होती है, जिससे वे स्थानीय राजनीति में प्रवेश करने के लिए प्रेरित होती हैं।
महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को कौन से उपाय मज़बूत कर सकते हैं?
कानूनी संशोधन: जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में संशोधन करके यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि राजनीतिक दलों के पंजीकरण और मान्यता को महिलाओं के लिए आंतरिक आरक्षण से जोड़ा जाए। राजनीतिक दलों को अपने संगठनात्मक पदों में कम से कम 33 प्रतिशत महिलाओं को स्थान देना चाहिए।
चुनावी सुधार: भारत में 1952 और 1957 के चुनावों में द्वि-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र प्रणाली का सफल उपयोग किया गया था। इस प्रणाली को पुनर्जीवित करके प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र से एक पुरुष और एक महिला प्रतिनिधि चुने जा सकते हैं, जिससे महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ेगा।
वित्तीय उपाय: निर्वाचन आयोग चुनावी खर्च की सीमा को लैंगिक आधार पर संशोधित कर सकता है। इसके अतिरिक्त, यदि दानदाता विशेष रूप से महिला उम्मीदवारों के लिए योगदान करते हैं, तो उन्हें कर में छूट दी जा सकती है।
प्रॉक्सी प्रतिनिधित्व से निपटना: “सरपंच पति” जैसी समस्याओं को रोकने के लिए ग्राम पंचायत के वित्तीय लेन-देन को आधार-आधारित बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण से जोड़ा जा सकता है, ताकि केवल निर्वाचित महिला प्रतिनिधि ही निर्णय ले सकें।
शैडो कैबिनेट को औपचारिक रूप देना: विपक्षी दलों को “Shadow Cabinet” प्रणाली को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, जिससे महिलाओं को वित्त और रक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में नीति निर्माण और बहस में भाग लेने का अवसर मिले।
निष्कर्ष
भारत में महिलाएँ अब केवल मतदाता नहीं रहीं, बल्कि वे सक्रिय राजनीतिक भागीदार बन चुकी हैं, जो मजबूत जमीनी लोकतंत्र का संकेत है। फिर भी वास्तविक प्रगति के लिए यह आवश्यक है कि महिलाओं की भागीदारी केवल मतदान तक सीमित न रहे, बल्कि उन्हें प्रतिनिधित्व और निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया में भी समान अवसर मिले। इसके लिए आरक्षण कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन, राजनीतिक दलों में सुधार और सामाजिक-पितृसत्तात्मक बाधाओं को समाप्त करना अनिवार्य है। महिलाओं का नेतृत्व समावेशी शासन और “विकसित भारत” के निर्माण के लिए अत्यंत आवश्यक है।
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