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भारत की विदेश नीति में ‘मोदी सिद्धांत’

‘Is a ‘Modi Doctrine’ emerging in Indian foreign policy?’ – इयान हॉल (2015)

भारत की विदेश नीति सदैव उसके राष्ट्रीय हितों, आर्थिक प्राथमिकताओं और सांस्कृतिक मूल्यों के संगम का परिणाम रही है। 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से भारत ने विश्व राजनीति में अपनी भूमिका को परिभाषित करने की निरंतर प्रक्रिया जारी रखी है। जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में गुटनिरपेक्षता (Non-alignment) की नीति से लेकर इंदिरा गांधी के दौर में क्षेत्रीय प्रभुत्व और सामरिक स्वायत्तता तक, हर काल में भारतीय विदेश नीति ने अपने समय की चुनौतियों के अनुरूप रूपांतर लिया है।

इसी परंपरा में नरेंद्र मोदी युग में यह प्रश्न उभर कर सामने आया कि क्या एक नया ‘मोदी सिद्धांत’ (Modi Doctrine) भारतीय विदेश नीति में आकार ले रहा है? क्या मोदी युग भारतीय कूटनीति के वैचारिक पुनर्गठन का प्रतीक है या यह केवल नीति क्रियान्वयन (delivery) पर केंद्रित एक व्यवहारिक दृष्टिकोण है?

इयान हॉल (2015) ने अपने लेख ‘Is a ‘Modi Doctrine’ emerging in Indian foreign policy?’ में इस प्रश्न की गहराई से पड़ताल करते हुए निष्कर्ष निकाला कि मोदी की विदेश नीति मूलतः व्यावहारिक (pragmatic) है, न कि वैचारिक (doctrinal)। उन्होंने इसे ‘डॉक्ट्रिन नहीं, डिलीवरी’ (Doctrine or Delivery) की नीति बताया।

फिर भी, यह स्पष्ट है कि मोदी युग ने भारत की विदेश नीति को नई ऊर्जा, नए प्रतीकों और नए माध्यमों से वैश्विक मंच पर पुनर्स्थापित किया है। इसी संदर्भ में यह लेख मोदी सिद्धांत की वैचारिक और व्यवहारिक रूपरेखा का विश्लेषण करता है।

भारतीय विदेश नीति का विकास

कालखंडप्रमुख नेतानीति का स्वरूपमुख्य विशेषताएँ
1947–1966जवाहरलाल नेहरूआदर्शवादी व गुटनिरपेक्ष नीतिपंचशील सिद्धांत, विश्व शांति, गुटनिरपेक्ष आंदोलन
1967–1990इंदिरा गांधी, मोरारजी देसाईयथार्थवादी व क्षेत्रीय शक्ति पर बल1971 युद्ध, परमाणु परीक्षण, सोवियत निकटता
1991–2014अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंहउदारीकरण व वैश्वीकरणआर्थिक सुधार, Look East नीति, वैश्विक साझेदारी

नरेंद्र मोदी का उदय और नई कूटनीतिक भाषा

2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद भारत की विदेश नीति ने एक नया रूप ग्रहण किया। मोदी की राजनीतिक पृष्ठभूमि (गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में प्रशासनिक अनुभव) ने उनकी विदेश नीति को विकास केंद्रित और प्रदर्शन उन्मुख बनाया।

उन्होंने सत्ता संभालते ही पड़ोसी देशों के नेताओं को अपने शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित कर एक प्रतीकात्मक संदेश दिया कि भारत अब अपने पड़ोस को प्राथमिकता देगा (‘Neighbourhood First’)।

इसके अलावा, मोदी ने विदेश नीति में तीन प्रमुख रुझानों को स्थापित किया:

  1. आर्थिक कूटनीति (Economic Diplomacy): ‘मेक इन इंडिया’, ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘स्टार्टअप इंडिया’ जैसे अभियानों के माध्यम से उन्होंने विदेशी निवेश और तकनीकी सहयोग को प्राथमिकता दी।
  2. प्रवासी भारतीयों की भूमिका (Diaspora Engagement): मोदी ने प्रवासी भारतीय समुदाय को भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ के रूप में पहचाना और न्यूयॉर्क, सिडनी, लंदन आदि में भव्य आयोजनों के माध्यम से वैश्विक मंच पर भारत की छवि को सशक्त बनाया।
  3. वैश्विक मंच पर भारत की पुनर्स्थापना (Global Repositioning): मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा से लेकर BRICS, ASEAN, G20 जैसे मंचों पर भारत की भूमिका को नई परिभाषा देने का प्रयास किया।

क्या मोदी सिद्धांत वास्तव में कोई नया सिद्धांत है?

इयान हॉल (2015) का तर्क है कि ‘मोदी सिद्धांत’ शब्द का प्रयोग भले ही मीडिया और विश्लेषकों द्वारा किया गया हो, परंतु इसके पीछे कोई ठोस नीति दस्तावेज़ या सुसंगत वैचारिक ढाँचा नहीं है।

हालाँकि, मोदी की विदेश नीति में कुछ ऐसे पहलू हैं जिन्हें ‘सिद्धांत’ के रूप में देखा जा सकता है जैसे:

  • पड़ोसी देशों के साथ व्यवहारिक सहयोग की नीति,
  • वैश्विक दक्षिण (Global South) में भारत की नेतृत्वकारी भूमिका का दावा,
  • भारत की सॉफ्ट पावर (Soft Power) के प्रतीकों का पुनर्परिचय (जैसे योग, आयुर्वेद, संस्कृति),
  • और राष्ट्रहित सर्वोपरि (Nation First) का दृष्टिकोण।

इन सबके बावजूद, हॉल यह मानते हैं कि मोदी की विदेश नीति अपने मूल में ‘delivery-focused pragmatism’ पर आधारित है अर्थात्, आदर्शवादी घोषणाओं के बजाय परिणामों पर केंद्रित दृष्टिकोण।

मोदी से पूर्व और पश्चात: निरंतरता और परिवर्तन

भारत की विदेश नीति में मोदी काल को एकदम से ‘विच्छेद’ (rupture) के रूप में नहीं देखा जा सकता।
बल्कि यह पूर्ववर्ती नीतियों की एक सक्रिय निरंतरता’ (active continuity) है, जिसमें पिछले लक्ष्यों को अधिक तीव्रता, दक्षता और प्रतीकात्मकता के साथ आगे बढ़ाया गया।

उदाहरण के लिए:

पहलूमनमोहन सिंह सरकारनरेंद्र मोदी सरकार
आर्थिक कूटनीतिवैश्वीकरण और निवेश सुधार‘मेक इन इंडिया’, निवेश आकर्षण
सुरक्षा नीतिअमेरिका के साथ सहयोग (परमाणु समझौता)रक्षा साझेदारी में विविधीकरण (जापान, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस)
सॉफ्ट पावरसांस्कृतिक कूटनीति, ‘इनक्रेडिबल इंडिया’योग दिवस, प्रवासी भारतीय महोत्सव
क्षेत्रीय नीतिSAARC में सहयोगBIMSTEC और इंडो-पैसिफिक सहयोग पर जोर

इससे स्पष्ट है कि मोदी की विदेश नीति परिवर्तन से अधिक तीव्रता और क्रियान्वयन की गति पर आधारित है।

मोदी सिद्धांत के मूलभूत तत्व

नरेंद्र मोदी की विदेश नीति पारंपरिक भारतीय कूटनीति से कई मायनों में भिन्न दिखाई देती है। यह केवल ‘राजनयिक सहभागिता’ तक सीमित नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक, रणनीतिक और सांस्कृतिक पुनर्स्थापना का प्रयास भी है। यदि इसे किसी ‘सिद्धांत’ के रूप में परिभाषित किया जाए, तो इसके पाँच प्रमुख स्तंभ उभरते हैं:

() पड़ोसी पहले (Neighbourhood First Policy)

मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में SAARC देशों के सभी प्रमुख नेताओं का आमंत्रण एक प्रतीकात्मक लेकिन निर्णायक संकेत था कि भारत अपने पड़ोस के प्रति अधिक सक्रिय भूमिका निभाएगा।

  • नेपाल, भूटान, श्रीलंका और बांग्लादेश के साथ व्यापार और संपर्क (connectivity) बढ़ाने पर बल दिया गया।
  • पाकिस्तान के संदर्भ में, बातचीत और सख्ती दोनों का मिश्रण अपनाया गया।
  • BIMSTEC (Bay of Bengal Initiative for Multi-Sectoral Technical and Economic Cooperation) को SAARC के विकल्प के रूप में आगे बढ़ाया गया।

() आर्थिक कूटनीति (Economic Diplomacy)

मोदी की विदेश नीति की सबसे बड़ी विशेषता है आर्थिक उन्मुखता।

  • उन्होंने ‘मेक इन इंडिया’ के माध्यम से वैश्विक कंपनियों को भारत में निवेश के लिए आमंत्रित किया।
  • जापान, अमेरिका, फ्रांस और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों से बड़े निवेश सौदे किए गए।
  • एशियाई बुनियादी ढांचा निवेश बैंक (AIIB) और न्यू डेवलपमेंट बैंक (BRICS Bank) में भारत की सक्रिय भागीदारी को सुनिश्चित किया गया।

यह दृष्टिकोण, जैसा कि Ian Hall (2015) ने कहा, ‘आदर्शवादी सिद्धांतों के बजाय परिणामोन्मुख नीतियों’ की ओर इंगित करता है।

() सॉफ्ट पावर और सांस्कृतिक कूटनीति (Soft Power Diplomacy)

भारत की सभ्यता, संस्कृति और परंपराएँ सदैव उसकी वैश्विक पहचान रही हैं। मोदी ने इन्हें अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक नए कूटनीतिक औजार के रूप में उपयोग किया।

  • संयुक्त राष्ट्र महासभा में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस (International Yoga Day) की घोषणा भारत की सॉफ्ट पावर की बड़ी सफलता रही।
  • मोदी ने प्रवासी भारतीयों को ‘राष्ट्रीय शक्ति’ के रूप में पहचान दिलाई, जिससे विदेशों में भारत की छवि और निवेश प्रवाह दोनों में सुधार हुआ।
  • ‘भारत की कहानी’ (India Story) को उन्होंने नेतृत्व, नवाचार और विकास के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया।

() वैश्विक साझेदारी और सामरिक संतुलन (Strategic Balancing)

मोदी सरकार ने वैश्विक शक्तियों के साथ संतुलन बनाते हुए नई साझेदारियाँ कीं।

  • अमेरिका के साथस्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप 2.0’ की शुरुआत हुई, जिसमें रक्षा, अंतरिक्ष और प्रौद्योगिकी सहयोग शामिल हैं।
  • जापान के साथ स्पेशल स्ट्रेटेजिक ग्लोबल पार्टनरशिप की स्थापना की गई।
  • ऑस्ट्रेलिया के साथFramework for Security Cooperation (2014)’ के माध्यम से हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र में सहयोग को सुदृढ़ किया गया।

इन पहलों के कारण भारत को वैश्विक ‘Quad Group’ (अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, भारत) का प्रमुख सदस्य बनने का अवसर मिला।

() भारत का वैश्विक दक्षिण (Global South) नेतृत्व

मोदी ने वैश्विक मंचों पर विकासशील देशों की आवाज़ बनने की दिशा में भारत की भूमिका को परिभाषित किया।

  • Global South Summit (2023) में भारत ने विकासशील देशों के लिए सहयोग मॉडल प्रस्तुत किया।
  • अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों के साथ व्यापार और प्रौद्योगिकी संबंधों को मज़बूत किया गया।

इवेंटड्रिवननीति

मोदी की विदेश नीति को अक्सर ‘इवेंट-ड्रिवन’ (event-driven) कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की उपस्थिति को प्रभावशाली बनाने के लिए प्रतीकों और जनसंपर्क का उपयोग किया। लेकिन इन आयोजनों के पीछे ठोस नीति लक्ष्य भी छिपे थे।

  • BRICS: भारत ने इसे वैश्विक वित्तीय संतुलन के उपकरण के रूप में देखा।
  • G20: भारत ने अपने अध्यक्षीय कार्यकाल (2023) में ‘एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य’ (Vasudhaiva Kutumbakam) का नारा देकर वैश्विक नेतृत्व की भूमिका निभाई।
  • ASEAN और East Asia Summit में भारत ने ‘एक्ट ईस्ट नीति’ को मजबूत किया, जो वाजपेयी के ‘लुक ईस्ट’ नीति का विस्तार था।

पड़ोसी देशों के साथ संबंध

  1. नेपाल – 2014 की ऐतिहासिक यात्रा के दौरान मोदी ने नेपाल की संसद में संबोधन कर दोनों देशों के बीच विश्वास का नया अध्याय खोला।
  2. बांग्लादेश – भूमि सीमा समझौता (2015) भारत की बड़ी कूटनीतिक सफलता थी।
  3. भूटान और श्रीलंका – दोनों देशों में चीन के बढ़ते प्रभाव का संतुलन बनाते हुए भारत ने आर्थिक और सुरक्षा सहयोग को बढ़ाया।
  4. पाकिस्तान – मोदी सरकार ने शुरू में वार्ता का रुख अपनाया, लेकिन आतंकवादी घटनाओं के बाद सख्त नीति पर लौट आई।

चीन के साथ संबंध

चीन के साथ मोदी की नीति दोहरी रही है जिसमे प्रतिस्पर्धा और सहयोग दोनों का संतुलन है।

  • 2014–15 में कई उच्चस्तरीय वार्ताएँ हुईं, परंतु सीमा विवाद और डोकलाम जैसी घटनाओं ने संबंधों को प्रभावित किया।
  • इसके बावजूद, भारत ने एशियाई बहुपक्षीय ढाँचों (AIIB, SCO) में चीन के साथ सहयोग बनाए रखा।

पश्चिम एशिया और खाड़ी नीति

मोदी ने खाड़ी देशों के साथ रिश्तों को ‘तेल व्यापार’ से आगे बढ़ाकर रणनीतिक साझेदारी में बदला।

  • यूएई, सऊदी अरब, कतर जैसे देशों के साथ रक्षा, प्रवासी सुरक्षा और निवेश समझौते किए गए।
  • इज़राइल के साथ संबंध खुले तौर पर सशक्त हुए, रक्षा और कृषि तकनीक सहयोग में भारत ने अग्रणी भूमिका निभाई।

आलोचनात्मक मूल्यांकन: उपलब्धियाँ और सीमाएँ

हर सिद्धांत की तरह ‘मोदी सिद्धांत’ के भी दो पहलू हैं उसकी उपलब्धियाँ और सीमाएँ।

प्रमुख उपलब्धियाँ

(1) भारत की वैश्विक छवि में सुधार: मोदी के दौर में भारत की अंतरराष्ट्रीय पहचान एक निर्णायक राष्ट्र’ (decisive nation) के रूप में उभरी। G20, BRICS और QUAD जैसे मंचों पर भारत की उपस्थिति अब सक्रिय और आत्मविश्वासपूर्ण है।

(2) प्रवासी भारतीयों और सॉफ्ट पावर का सशक्तीकरण: अंतरराष्ट्रीय योग दिवस, भारतीय सांस्कृतिक केंद्रों का विस्तार और प्रवासी भारतीयों की भागीदारी ने भारत की छवि को ‘आध्यात्मिक और आधुनिक शक्ति’ दोनों के रूप में प्रस्तुत किया।

(3) रक्षा और सुरक्षा क्षेत्र में सक्रियता: भारत ने रक्षा खरीद नीति में विविधता लाते हुए आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रगति की। सर्जिकल स्ट्राइक और आतंकवाद के विरुद्ध ठोस कार्रवाई ने भारत की रणनीतिक विश्वसनीयता बढ़ाई।

(4) वैश्विक दक्षिण का नेतृत्व: भारत ने विकासशील देशों की आवाज़ बनकर दक्षिण-दक्षिण सहयोग (South-South Cooperation) को नया जीवन दिया। ‘वैक्सीन मैत्री’ नीति इसके व्यावहारिक उदाहरण के रूप में उभरी।

सीमाएँ और चुनौतियाँ

(1) सिद्धांत की अस्पष्टता: इयान हॉल (2015) का तर्क उचित है कि मोदी की विदेश नीति में कोई स्पष्ट रूप से परिभाषित ‘सिद्धांत’ नहीं है। यह एक संगठित वैचारिक ढाँचा (coherent doctrine) के बजाय विभिन्न नीति प्रयोगों (policy experiments) का समूह प्रतीत होती है।

(2) पड़ोसी देशों में चीन का प्रभाव: नेपाल, श्रीलंका और मालदीव में चीन की आर्थिक घुसपैठ भारत की ‘Neighbourhood First’ नीति को चुनौती देती है। हालाँकि भारत ने इस पर प्रतिक्रिया दी है, परंतु क्षेत्रीय स्थायित्व अभी भी असंतुलित है।

(3) पाकिस्तान नीति की अनिश्चितता: मोदी सरकार ने पाकिस्तान के प्रति कभी संवाद, तो कभी सर्जिकल प्रतिक्रिया जैसी दोहरी नीति अपनाई। इस असंगति ने दीर्घकालीन शांति प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ने दिया।

(4) घरेलू राजनीति का प्रभाव: विदेश नीति में कभी-कभी आंतरिक राजनीतिक विमर्श (जैसे चुनावी राष्ट्रवाद) का प्रभाव दिखता है, जिससे दीर्घकालीन रणनीति कमजोर होती है।

निष्कर्ष

2014 के बाद भारत की विदेश नीति ने जिस दिशा में प्रगति की है, वह केवल नीतिगत बदलाव नहीं बल्कि राष्ट्र की आत्म-धारणा (national self-perception) का परिवर्तन भी है।
इयान हॉल (2015) का निष्कर्ष है, कि मोदी सिद्धांत ‘डिलीवरी’ पर अधिक केंद्रित है जिसने भारत की वैश्विक भूमिका, आत्मविश्वास और प्रभाव को अभूतपूर्व रूप से बढ़ाया है।

मोदी सिद्धांत ने भारतीय विदेश नीति को ‘निष्क्रिय आदर्शवाद’ से ‘सक्रिय व्यवहारवाद’ में रूपांतरित किया है।
इसने भारत को 21वीं सदी के वैश्विक विमर्श में एक निर्णायक स्वर दिया है, जो न केवल आर्थिक शक्ति है, बल्कि सांस्कृतिक और नैतिक नेतृत्व की भी आकांक्षा रखता है।

 

 


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