भारतीय लोकतंत्र की आत्मा संसद में निहित है, जहाँ जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि राष्ट्रीय नीतियों, कानूनों और शासन की दिशा पर विचार-विमर्श करते हैं।
संसद में प्रभावी बहस और आलोचनात्मक विमर्श तभी संभव है जब सांसदों को निर्भीक होकर अपनी बात रखने की स्वतंत्रता प्राप्त हो। इसी उद्देश्य से भारतीय संविधान के अनुच्छेद 105 में संसद सदस्यों (MPs) को विशेषाधिकार प्रदान किए गए हैं, जिनमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानूनी कार्यवाही से प्रतिरक्षा प्रमुख हैं।
हाल ही में संसद के बजट सत्र 2026 के दौरान भाषणों के विलोपन (expunction) को लेकर सांसदों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर चर्चा तेज हुई है।
इससे यह प्रश्न उठता है कि संसद में बोलने की स्वतंत्रता की सीमा क्या है, इसे कैसे संरक्षित किया जाता है, और इसके दुरुपयोग को कैसे रोका जाता है। यह लेख संसद में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संवैधानिक ढाँचे, नियमों, न्यायिक व्याख्याओं तथा समकालीन चुनौतियों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
संसद में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संवैधानिक आधार
- अनुच्छेद 105(1): संसद में बोलने की स्वतंत्रता
- अनुच्छेद 105(1) सांसदों को संसद तथा उसकी समितियों में स्वतंत्र रूप से बोलने का अधिकार देता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सांसद बिना किसी भय या दबाव के अपनी राय व्यक्त कर सकें, सरकार की आलोचना कर सकें और सार्वजनिक हित से जुड़े मुद्दों को उठा सकें।
- यह स्वतंत्रता सामान्य नागरिकों को प्राप्त अनुच्छेद 19(1)(a) की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से अलग है, क्योंकि यह एक विशेष संसदीय विशेषाधिकार है और संसद के कार्य संचालन के दौरान लागू होता है।
- अनुच्छेद 105(2): कानूनी कार्यवाही से प्रतिरक्षा
- अनुच्छेद 105(2) सांसदों को संसद में कही गई किसी भी बात या दिए गए वोट के लिए पूर्ण प्रतिरक्षा प्रदान करता है। इसका अर्थ है कि उनके खिलाफ कोई दीवानी या आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
- इस प्रावधान का उद्देश्य सांसदों को मुकदमों के भय से मुक्त रखना है, ताकि वे स्वतंत्र रूप से जनहित में बोल सकें।
- गैर–सदस्यों तक विस्तार
- यह प्रतिरक्षा उन व्यक्तियों पर भी लागू होती है जिन्हें संसदीय कार्यवाही में भाग लेने का संवैधानिक अधिकार है, जैसे भारत के अटॉर्नी जनरल। इससे संसदीय विमर्श की निरंतरता और खुलापन सुनिश्चित होता है।
- अनुच्छेद 121: न्यायपालिका पर चर्चा की सीमा
- अनुच्छेद 121 संसद में उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के आचरण पर चर्चा को प्रतिबंधित करता है, सिवाय महाभियोग की प्रक्रिया के दौरान। यह प्रावधान विधायिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन बनाए रखता है।
संसद की कार्यप्रणाली के नियमों द्वारा विनियमन
संसदीय स्वतंत्रता पूर्णतः निरंकुश नहीं है। इसे संसद के नियमों और परंपराओं द्वारा नियंत्रित किया जाता है।
- विलोपन (Expunction): लोकसभा के नियम 380 के अनुसार स्पीकर को यह अधिकार है कि वे किसी भी ऐसे शब्द या अभिव्यक्ति को कार्यवाही से हटा दें जो मानहानिकारक, अशोभनीय या असंसदीय हो। इसका उद्देश्य संसद की गरिमा बनाए रखना है।
- उप–न्यायाधीन (Sub Judice) मामले: सांसद ऐसे मामलों पर चर्चा नहीं कर सकते जो न्यायालय में लंबित हों, ताकि न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।
- व्यक्तिगत आरोपों पर प्रतिबंध: किसी व्यक्ति पर बिना पूर्व सूचना के आरोप लगाना निषिद्ध है। इससे निराधार आरोपों से बचाव होता है।
- उच्च संवैधानिक पदाधिकारियों पर टिप्पणी: उच्च पदों पर आसीन व्यक्तियों के आचरण पर नकारात्मक टिप्पणी सीमित है, जिससे संस्थागत सम्मान बना रहे।
- विशेषाधिकार समिति की भूमिका: विशेषाधिकार समिति विशेषाधिकार के उल्लंघन या दुरुपयोग की जाँच करती है और अनुशासन सुनिश्चित करती है।
संसद में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का महत्व
- कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करना: सांसद प्रश्न, बहस और समितियों के माध्यम से सरकार को जवाबदेह बनाते हैं।
- कानून निर्माण की गुणवत्ता बढ़ाना: विविध दृष्टिकोण बेहतर कानून बनाने में मदद करते हैं।
- जनता की आवाज़ को मंच देना: संसद जनमत का प्रतिनिधित्व करती है।
- लोकतांत्रिक विमर्श को प्रोत्साहन: खुली बहस लोकतंत्र को मजबूत करती है।
सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय
- Tej Kiran Jain v. N. Sanjiva Reddy में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 105(2) के तहत सांसदों को संसद में कही गई किसी भी बात के लिए पूर्ण प्रतिरक्षा प्राप्त है और “anything” शब्द का अर्थ अत्यंत व्यापक है।
- P.V. Narasimha Rao v. State में न्यायालय ने निर्णय दिया कि संसद में दिए गए वोट से सीधे जुड़े मामलों में सांसद प्रतिरक्षा का दावा कर सकते हैं, हालांकि बाद में इस दृष्टिकोण की आलोचना हुई और इसे सीमित किया गया।
- Raja Ram Pal v. Speaker, Lok Sabha में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि संसदीय विशेषाधिकार पूर्णतः निरंकुश नहीं हैं और यदि संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन होता है तो न्यायिक समीक्षा संभव है।
- Kaushal Kishor v. State of Uttar Pradesh में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी मंत्री का व्यक्तिगत बयान स्वतः सरकार की आधिकारिक नीति नहीं माना जाएगा जब तक कि सरकार उसे औपचारिक रूप से स्वीकार न करे।
- Sita Soren v. Union of India में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि रिश्वत लेना आपराधिक कृत्य है और सांसदों या विधायकों को इसके लिए संसदीय प्रतिरक्षा का संरक्षण प्राप्त नहीं होगा।
समकालीन चुनौतियाँ
- संसद में भाषणों के विलोपन (expunction) को लेकर हाल के वर्षों में राजनीतिक विवाद बढ़े हैं, जहाँ विभिन्न दलों द्वारा पक्षपात के आरोप लगाए जाते रहे हैं, जिससे संसदीय निष्पक्षता पर प्रश्न उठते हैं।
- बढ़ते राजनीतिक ध्रुवीकरण के कारण संसदीय बहस का स्तर प्रभावित हो सकता है, क्योंकि तीखी प्रतिस्पर्धा और टकरावपूर्ण राजनीति अक्सर रचनात्मक संवाद को सीमित कर देती है।
- संसदीय विशेषाधिकार और प्रतिरक्षा का संभावित दुरुपयोग भी एक चुनौती है, क्योंकि कभी-कभी इसका उपयोग व्यक्तिगत आरोप लगाने या राजनीतिक लाभ के लिए किया जा सकता है।
- पारंपरिक मीडिया और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के कारण संसद की कार्यवाही पर सार्वजनिक और राजनीतिक दबाव बढ़ जाता है, जिससे वक्तव्यों और बहसों का स्वरूप प्रभावित हो सकता है।
तुलनात्मक दृष्टिकोण
- ब्रिटेन में संसदीय विशेषाधिकार की अवधारणा ऐतिहासिक रूप से विकसित हुई है और वहाँ की संसद को अपने कार्यों में व्यापक स्वायत्तता प्राप्त है।
- ब्रिटिश संसद में “Parliamentary Privilege” का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सांसद बिना किसी बाहरी दबाव या न्यायिक हस्तक्षेप के स्वतंत्र रूप से विचार व्यक्त कर सकें।
- भारत ने इसी परंपरा से प्रेरणा लेते हुए संसदीय विशेषाधिकार को अपनाया, किंतु इसे स्पष्ट रूप से भारतीय संविधान में शामिल कर दिया, जिससे यह एक विधिक और संस्थागत रूप प्राप्त करता है।
- इस प्रकार भारत में संसदीय विशेषाधिकार परंपरा और लिखित संवैधानिक ढाँचे का मिश्रित रूप प्रस्तुत करते हैं, जहाँ संसद की स्वतंत्रता के साथ न्यायिक समीक्षा की संभावना भी बनी रहती है।
संसद में स्वतंत्रता और जिम्मेदारी का संतुलन
- संसद में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उद्देश्य निरंकुश आलोचना नहीं बल्कि सार्थक, तर्कपूर्ण और जिम्मेदार विमर्श को बढ़ावा देना है।
- सांसदों को यह ध्यान रखना होता है कि उनके वक्तव्य न केवल राजनीतिक बहस को दिशा देते हैं बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा और जनविश्वास को भी प्रभावित करते हैं।
- इसलिए संसदीय स्वतंत्रता और संस्थागत अनुशासन के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है, ताकि संसद विचारों के मुक्त आदान-प्रदान का मंच होने के साथ-साथ मर्यादित और उत्तरदायी संस्था भी बनी रहे।
सुधार के संभावित उपाय
- विलोपन के मानकों को अधिक पारदर्शी बनाना।
- सांसदों के लिए आचार संहिता को मजबूत करना।
- संसदीय प्रशिक्षण कार्यक्रमों को बढ़ावा देना।
- विशेषाधिकार समिति की कार्यवाही को अधिक प्रभावी बनाना।
निष्कर्ष
संसद में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला है। अनुच्छेद 105 सांसदों को निर्भीक होकर बोलने का अधिकार देता है, जबकि नियम और न्यायिक व्याख्याएँ इसके दुरुपयोग को रोकने का प्रयास करती हैं। हाल के विवाद यह दर्शाते हैं कि स्वतंत्रता और अनुशासन के बीच संतुलन बनाए रखना निरंतर चुनौती है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि संसद में विचारों का मुक्त प्रवाह बना रहे, परंतु साथ ही संवाद गरिमापूर्ण और जिम्मेदार भी हो। इसलिए आवश्यक है कि संवैधानिक मूल्यों, संसदीय परंपराओं और नैतिक उत्तरदायित्व के बीच संतुलन स्थापित किया जाए, जिससे संसद जनविश्वास को सुदृढ़ करते हुए लोकतंत्र को और मजबूत बना सके।
Discover more from Politics by RK: Ultimate Polity Guide for UPSC and Civil Services
Subscribe to get the latest posts sent to your email.

