भारत और अफ्रीका के रिश्तों में पिछले कुछ वर्षों में बड़ा बदलाव आया है। पहले भारत का रवैया कुछ हद तक मार्गदर्शक या Paternalistic था, जिसमें भारत अफ्रीका को सहायता देने वाला और अफ्रीका को केवल लाभ लेने वाला माना जाता था। लेकिन अब यह सोच बदल रही है और दोनों के रिश्ते समान साझेदारी (Partnership) और आपसी विश्वास पर आधारित हो रहे हैं।
हाल ही में नामीबिया की संसद में भारतीय प्रधानमंत्री का भाषण इस बदलाव का प्रतीक है। उन्होंने अफ्रीका से जुड़ने के लिए केवल आर्थिक हितों की बात नहीं की, बल्कि साझा विरासत, सांस्कृतिक संबंध और भविष्य की तकनीकी साझेदारी पर भी ज़ोर दिया। यह तरीका पश्चिमी देशों से अलग है, क्योंकि पश्चिमी देश अक्सर मदद को शर्तों और दबाव के साथ जोड़ते हैं, जबकि भारत अफ्रीका की प्राथमिकताओं को ध्यान में रखकर सहयोग कर रहा है।
भारत–अफ्रीका संबंधों में बदलाव के मुख्य कारण
- साझा विरासत और भावनात्मक जुड़ाव
भारत ने अफ्रीकी देशों की स्वतंत्रता और आज़ादी की लड़ाई में समर्थन किया था। यह ऐतिहासिक रिश्ता आज भी दोनों को जोड़ता है। ‘वसुधैव कुटुंबकम’ (संपूर्ण विश्व एक परिवार है) का भारतीय दर्शन अफ्रीका के साथ रिश्तों को भावनात्मक आधार देता है। इसके अलावा, 2023 में G20 में अफ्रीकी संघ को स्थायी सदस्य बनाने में भारत की भूमिका ने अफ्रीका की वैश्विक स्थिति को मज़बूत किया।
- शिक्षा और क्षमता निर्माण
शिक्षा भारत-अफ्रीका संबंधों का प्रमुख स्तंभ है। ITEC प्रोग्राम के माध्यम से पिछले दस सालों में लगभग 40,000 अफ्रीकी युवाओं को प्रशिक्षण दिया गया। भारत ने अफ्रीका में उच्च शिक्षा संस्थान खोले हैं, जैसे जांज़ीबार में IIT कैंपस। वर्तमान में 23,000 से अधिक अफ्रीकी छात्र भारत में पढ़ रहे हैं। यह सहयोग अफ्रीका की नई पीढ़ी को आत्मनिर्भर बनाने में मदद करता है।
- डिजिटल और तकनीकी सहयोग
भारत की डिजिटल क्रांति अब अफ्रीका तक पहुँच रही है। नामीबिया में UPI (यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस) की शुरुआत हुई है, जिससे डिजिटल भुगतान आसान होंगे। कई अफ्रीकी देशों में भारत टेलीमेडिसिन और डिजिटल पहचान प्रणाली (Digital ID System) स्थापित करने में मदद कर रहा है। यह सहयोग अफ्रीका को वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
- व्यापार और आर्थिक सहयोग
भारत और अफ्रीका का आपसी व्यापार 100 अरब डॉलर से अधिक हो चुका है। भारत अफ्रीका का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। भारत मशीनरी, दवाइयाँ, वस्त्र, ऑटोमोबाइल, तेल और लकड़ी जैसे उत्पाद निर्यात करता है। कई अफ्रीकी देशों को भारत की ड्यूटी–फ्री टैरिफ प्रेफरेंस (DFTP) योजना का लाभ मिलता है, जिससे उनके निर्यात को बढ़ावा मिला है।
- सुरक्षा और रणनीतिक हित
भारत अफ्रीका की सुरक्षा में भी सहयोग कर रहा है। लगभग 5,000 भारतीय सैनिक संयुक्त राष्ट्र के शांति मिशनों में अफ्रीका में तैनात हैं। भारत ने समुद्री सुरक्षा को मज़बूत करने के लिए अफ्रीकी देशों के साथ काम किया है, जैसे Djibouti Code of Conduct और Jeddah Amendment। यह भारतीय हितों के लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हिंद महासागर वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद अहम है।
- स्वास्थ्य और मानवीय सहयोग
भारत ने अफ्रीका को स्वास्थ्य क्षेत्र में भी मदद दी है। कोविड-19 महामारी के समय Vaccine Maitri पहल के तहत भारत ने अफ्रीकी देशों को वैक्सीन पहुँचाई। इसके अलावा भारत ने एंबुलेंस, मेडिकल उपकरण और कैंसर के इलाज के लिए ‘भाभाट्रॉन’ जैसी मशीनें भी दान कीं। इससे भारत की छवि एक मानवीय और भरोसेमंद साझेदार की बनी।

भारत–अफ्रीका संबंधों में चुनौतियाँ
- चीन से प्रतिस्पर्धा: चीन अफ्रीका में भारी निवेश कर रहा है और बड़े-बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स चला रहा है। कई देश चीन के कर्ज़ जाल में फँस गए हैं, जिससे भारत की पारदर्शी नीतियाँ कमजोर पड़ जाती हैं।
- कमज़ोर बुनियादी ढांचा और निवेश बाधाएँ: अफ्रीका में सड़कें, बंदरगाह और बिजली जैसी सुविधाओं की कमी है। साथ ही भ्रष्टाचार और राजनीतिक अस्थिरता भारतीय कंपनियों के लिए समस्या पैदा करती है।
- राजनीतिक अस्थिरता और तख्तापलट: 2020 से 2023 के बीच अफ्रीका में 9 सैन्य तख्तापलट हुए। इससे भारत के निवेश और रणनीति पर बुरा असर पड़ा।
- जलवायु परिवर्तन पर मतभेद: अफ्रीका को जलवायु संकट से निपटने के लिए तुरंत तकनीक और धन चाहिए, जबकि भारत का योगदान अभी सीमित है।
- डिजिटल और तकनीकी प्रतिस्पर्धा: भारत UPI और आधार जैसे डिजिटल मॉडल ला रहा है, लेकिन चीनी कंपनियाँ (जैसे Huawei) पहले से अफ्रीका में मज़बूत हैं।
- भारतीय प्रवासी और स्थानीय असंतोष: अफ्रीका में लगभग 30 लाख भारतीय रहते हैं। वे व्यापार और रोजगार में सक्रिय हैं, लेकिन कई जगह स्थानीय लोग उन्हें प्रतिस्पर्धी मानकर असंतोष व्यक्त करते हैं।
भारत को अफ्रीका की आवश्यकता क्यों है?
दक्षिण–दक्षिण सहयोग: पुनरुत्थानशील अफ्रीका दक्षिण-दक्षिण सहयोग को मजबूत प्रोत्साहन दे सकता है, विशेष रूप से जब स्वच्छ प्रौद्योगिकी, जलवायु-लचीलापन, समुद्री सुरक्षा, कनेक्टिविटी और नीली अर्थव्यवस्था जैसे क्षेत्रों में चुनौतियों का समाधान करने की बात आती है।
अगला विकास ध्रुव: 2030 तक, अफ्रीका दुनिया के लगभग एक-चौथाई कार्यबल और उपभोक्ताओं का प्रतिनिधित्व करेगा। 54 देशों, एक अरब लोगों और प्रचुर संसाधनों के साथ, अफ्रीका भारत के लिए एक बाज़ार प्रदान करता है ।
संसाधन क्षमता: अफ्रीका, विशेषकर पश्चिमी भाग, यूरेनियम, हीरे, तांबा, फॉस्फेट और अन्य खनिजों जैसे संसाधनों से समृद्ध है। यह भारत को संसाधन अन्वेषण में सहयोग की अपार संभावनाएँ प्रदान करता है।
चीन के साथ प्रतिस्पर्धा: चीन मुख्य रूप से अफ्रीका में विनिर्माण क्षमता और बुनियादी ढाँचे के विकास पर ध्यान केंद्रित करता है। लेकिन भारत अफ्रीका के साथ सार्थक रूप से जुड़ना चाहता है, और मानव संसाधन विकास , कौशल विकास, आईटीईएस, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं जैसी उसकी प्रमुख क्षमताओं पर ध्यान केंद्रित करना चाहता है।
क्षेत्रीय सुरक्षा: भारत के लिए हिंद महासागर क्षेत्र में अपने हितों की रक्षा करने तथा समुद्री डकैती, आतंकवाद, मादक पदार्थों की तस्करी, तेल रिसाव और चीन की मोतियों की माला रणनीति जैसे खतरों का मुकाबला करने के लिए अफ्रीका के साथ सहयोग महत्वपूर्ण है। सागर (क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास) और सागरमाला पहलों से पूरित, एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर (एएजीसी) , जिसमें अफ्रीका एक समान भागीदार है, हिंद महासागर क्षेत्र में संभावित रूप से एक बड़ा परिवर्तनकारी कदम साबित हो सकता है।
जलवायु परिवर्तन: भारत और अफ्रीका सतत विकास और जलवायु कार्रवाई से निपटने के लिए प्रतिबद्ध हैं, जो भारत की सतत विकास लक्ष्य प्रतिबद्धताओं और अफ्रीका के एजेंडा 2063 से स्पष्ट है ।
प्रवासी: अफ्रीका में प्रवासी भारतीय कुल भारतीय प्रवासियों का 12.37 प्रतिशत हैं। इनमें से कई महत्वपूर्ण पदों पर पहुँच चुके हैं। वे भारत-अफ्रीका संबंधों को मज़बूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
कंपाला सिद्धांत
अफ्रीका के साथ विकास साझेदारी के लिए भारत का दृष्टिकोण 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रतिपादित कंपाला सिद्धांतों द्वारा निर्देशित है:
- अफ्रीका हमारी प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर रहेगा । हम अफ्रीका के साथ अपने संबंधों को और प्रगाढ़ और गहरा करते रहेंगे। जैसा कि हमने दिखाया है, यह निरंतर और नियमित रहेगा ।
- हमारी विकास साझेदारी आपकी प्राथमिकताओं से निर्देशित होगी । हम यथासंभव स्थानीय क्षमता का निर्माण करेंगे और स्थानीय अवसर पैदा करेंगे। यह उन शर्तों पर होगा जो आपके लिए सुविधाजनक हों, जो आपकी क्षमताओं को उन्मुक्त करें और आपके भविष्य को बाधित न करें।
- अपने बाज़ारों को खुला रखेंगे और भारत के साथ व्यापार को और भी आसान व आकर्षक बनाएंगे। हम अपने उद्योग जगत को अफ्रीका में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करेंगे।
- हम अफ्रीका के विकास में सहायता करने , सार्वजनिक सेवाओं की उपलब्धता में सुधार लाने, शिक्षा और स्वास्थ्य का विस्तार करने, डिजिटल साक्षरता फैलाने, वित्तीय समावेशन का विस्तार करने तथा हाशिए पर पड़े लोगों को मुख्यधारा में लाने के लिए डिजिटल क्रांति में भारत के अनुभव का उपयोग करेंगे।
- अफ्रीका में दुनिया की 60 प्रतिशत कृषि योग्य भूमि है, लेकिन वैश्विक उत्पादन का केवल 10 प्रतिशत ही पैदा होता है। हम अफ्रीका की कृषि को बेहतर बनाने के लिए आपके साथ मिलकर काम करेंगे ।
- हमारी साझेदारी जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का समाधान करेगी ।
- हम आतंकवाद और उग्रवाद का मुकाबला करने , अपने साइबरस्पेस को सुरक्षित रखने, तथा शांति को आगे बढ़ाने और बनाए रखने में संयुक्त राष्ट्र को सहयोग देने में अपने सहयोग और पारस्परिक क्षमताओं को मजबूत करेंगे ।
- हम सभी देशों के लाभ के लिए महासागरों को खुला और मुक्त रखने के लिए अफ्रीकी देशों के साथ मिलकर काम करेंगे । दुनिया को अफ्रीका के पूर्वी तटों और पूर्वी हिंद महासागर में सहयोग और प्रतिस्पर्धा की आवश्यकता है।
- जैसे-जैसे अफ्रीका में वैश्विक भागीदारी बढ़ रही है, हम सभी को यह सुनिश्चित करने के लिए मिलकर काम करना होगा कि अफ्रीका एक बार फिर प्रतिद्वंद्वी महत्वाकांक्षाओं का रंगमंच न बने, बल्कि अफ्रीका के युवाओं की आकांक्षाओं का केंद्र बने ।
- जिस प्रकार भारत और अफ्रीका ने मिलकर उपनिवेशवाद के विरुद्ध लड़ाई लड़ी, उसी प्रकार हम एक न्यायसंगत, प्रतिनिधित्वपूर्ण और लोकतांत्रिक वैश्विक व्यवस्था के लिए मिलकर काम करेंगे, जिसमें अफ्रीका और भारत में रहने वाली एक तिहाई मानवता की आवाज सुनी जाएगी।
भारत क्या कदम उठा सकता है?
- अफ्रीका को कर्ज़ संकट से बाहर निकालने के लिए कर्ज़ माफी और पुनर्गठन का समर्थन करना।
- ITEC प्रोग्राम का विस्तार करके ग्रीन एनर्जी, कृषि और टेक्नोलॉजी में नई ट्रेनिंग देना।
- अफ्रीका में सस्ती इंटरनेट सुविधा, डिजिटल भुगतान प्रणाली और स्टार्टअप हब विकसित करना।
- स्मार्ट खेती और एग्रो–टेक के जरिए अफ्रीका की कृषि क्षमता बढ़ाना।
- नवीकरणीय ऊर्जा प्रोजेक्ट्स जैसे सौर और पवन ऊर्जा में निवेश बढ़ाना।
- विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZs) और औद्योगिक पार्क स्थापित करके अफ्रीका के औद्योगिकीकरण में मदद करना।
- कूटनीति में लचीला और परामर्श–आधारित दृष्टिकोण अपनाना, ताकि हर अफ्रीकी देश की जरूरत के अनुसार नीति बनाई जा सके।
- अफ्रीका की आवाज़ को संयुक्त राष्ट्र और WTO जैसे वैश्विक मंचों पर मज़बूती से उठाना।
निष्कर्ष
भारत की नई नीति साफ़ है वह अफ्रीका को केवल मदद पाने वाला नहीं, बल्कि बराबरी का साझेदार मान रहा है। भारतीय विदेश मंत्री ने कहा था कि ‘हम अफ्रीका की ज़रूरतों पर नहीं, उसकी आकांक्षाओं पर ध्यान देते हैं।’ प्रधानमंत्री ने भी कहा है कि ‘भारत की प्राथमिकता सिर्फ अफ्रीका नहीं, बल्कि हर अफ्रीकी नागरिक है।’
इससे यह स्पष्ट है कि भारत अब पारस्परिक विश्वास, साझा विरासत और ज्ञान पर आधारित रिश्तों को बढ़ावा दे रहा है। यह बदलाव भारत को एक विश्वसनीय ग्लोबल साउथ पार्टनर बनाता है।
Discover more from Politics by RK: Ultimate Polity Guide for UPSC and Civil Services
Subscribe to get the latest posts sent to your email.


