भारत–इज़राइल संबंध 1992 में पूर्ण राजनयिक संबंधों की स्थापना के बाद से निरंतर विकसित होते हुए 2026 में ‘विशेष रणनीतिक साझेदारी (Special Strategic Partnership for Peace, Innovation & Prosperity)’ के स्तर तक पहुँच चुके हैं।
यह संबंध अब केवल रक्षा खरीद या सीमित व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा, कृषि नवाचार, जल प्रबंधन, श्रम गतिशीलता, वित्तीय एकीकरण तथा बहुपक्षीय संपर्क परियोजनाओं (जैसे I2U2 और IMEC) तक विस्तृत हो चुका है।
भारत–इज़राइल राजकीय यात्रा (2026) के प्रमुख समझौते एवं परिणाम
| क्षेत्र | पहल / समझौता | उद्देश्य | प्रमुख लाभ |
| प्रौद्योगिकी | इंडो-इज़राइल साइबर उत्कृष्टता केंद्र (CoE) | डिजिटल सुरक्षा एवं उभरती तकनीकों का विकास | साइबर क्षमता निर्माण, सरकार–शिक्षा–उद्योग सहयोग |
| नैतिक AI पर MoU | नागरिक उपयोग हेतु जिम्मेदार AI विकास | AI नवाचार, सार्वजनिक-निजी भागीदारी | |
| AI-सक्षम शिक्षा MoU | शिक्षा में AI और डेटा साक्षरता का समावेश | मानव-केंद्रित शिक्षण, तकनीकी दक्षता | |
| होराइजन स्कैनिंग DoI | रणनीतिक पूर्वानुमान एवं जोखिम विश्लेषण | दीर्घकालिक तकनीकी योजना | |
| भू-भौतिकीय अन्वेषण MoU | AI आधारित खनिज अन्वेषण | सतत संसाधन प्रबंधन | |
| JCM को मंत्रिस्तरीय स्तर पर उन्नयन | महत्वपूर्ण एवं उभरती तकनीकों में सहयोग | उच्च स्तरीय रणनीतिक समन्वय | |
| आर्थिक एकीकरण | UPI एकीकरण MoU | सीमा-पार डिजिटल भुगतान | सस्ता व तेज़ प्रेषण |
| IFSCA–ISA MoU | फिनटेक एवं नियामक सहयोग | वित्तीय नवाचार | |
| ICA–IICA समझौता | वाणिज्यिक मध्यस्थता सुदृढ़ करना | व्यापारिक विवाद समाधान | |
| श्रम गतिशीलता प्रोटोकॉल | भारतीय श्रमिकों के लिए वैध चैनल | रोजगार अवसर, जनसांख्यिकीय लाभ | |
| श्रम क्षेत्र | वाणिज्य एवं सेवा | खुदरा, लॉजिस्टिक्स आदि | सेवा क्षेत्र में रोजगार |
| विनिर्माण | वस्त्र, इलेक्ट्रॉनिक्स आदि | औद्योगिक सहयोग | |
| रेस्तरां क्षेत्र | कैफे व खाद्य व्यवसाय | आतिथ्य क्षेत्र में अवसर | |
| कृषि | IINCA (ICAR–MASHAV) | सटीक कृषि एवं सिंचाई तकनीक | उत्पादकता वृद्धि |
| Villages of Excellence | कृषि मॉडल विकास | ग्रामीण नवाचार | |
| मत्स्य एवं जलीय कृषि CoE | समुद्री कृषि एवं रोग प्रबंधन | सतत मत्स्य विकास | |
| संस्कृति एवं विरासत | NMHC, लोथल सहयोग | साझा समुद्री इतिहास का संरक्षण | सांस्कृतिक संबंध सुदृढ़ |
| नालंदा–HUJI MoU | शैक्षणिक आदान-प्रदान | शोध एवं ज्ञान सहयोग |
भारत–इज़राइल संबंधो का विकास
भारत ने 1950 में इज़राइल को मान्यता दी, परंतु शीतयुद्ध राजनीति और फिलिस्तीनी मुद्दे के कारण 1992 तक पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित नहीं हुए। 2017 में भारत के प्रधानमंत्री की ऐतिहासिक इज़राइल यात्रा ने ‘डी–हाइफ़नेशन नीति’ को औपचारिक रूप दिया। अर्थात भारत अब इज़राइल और फिलिस्तीन को अलग-अलग कूटनीतिक दृष्टिकोण से देखता है।
भारत गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) का हिस्सा था और सोवियत गुट के साथ उसके घनिष्ठ संबंध थे तथा भौगोलिक निकटता के कारण उसका झुकाव अरब विश्व की ओर भी था, जबकि इज़राइल संयुक्त राज्य अमेरिका और NATO का सहयोगी था।
1992 में भारत–इज़राइल संबंधों के उन्नयन के बाद से, रक्षा और कृषि द्विपक्षीय सहयोग के दो प्रमुख स्तंभ रहे हैं।
हाल के वर्षों में, विभिन्न क्षेत्रों में संबंध तेजी से विकसित हुए हैं, और भविष्य में दो ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्थाओं के बीच मजबूत उच्च-प्रौद्योगिकी साझेदारी पर विशेष ध्यान केंद्रित किया जा रहा है।
2026 की यात्रा के दौरान संबंधों को विशेष रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक उन्नत करना इस बात का संकेत है कि दोनों देश दीर्घकालिक संस्थागत सहयोग की दिशा में अग्रसर हैं।
Timeline of India-Israel Relations

1992 तक भारत–इज़राइल संबंध
भारत ने 1992 तक इज़राइल के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित नहीं किए। इसके पीछे कई कारण थे, जिनमें शामिल हैं:
- गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) के प्रति भारत की प्रतिबद्धता के कारण इज़राइल के साथ संबंधों में अप्रत्यक्ष रूप से ठहराव रहा, क्योंकि इज़राइल को पश्चिमी गुट की ओर झुकाव रखने वाला देश माना जाता था।
- तेल आयात के लिए भारत की अरब देशों पर निर्भरता के कारण उसकी पश्चिम एशिया नीति में प्र-अरब झुकाव रहा।
- कश्मीर प्रश्न पर अरब देशों का समर्थन प्राप्त करने की आवश्यकता ने नई दिल्ली को स्पष्ट रूप से प्र-अरब नीति अपनाने के लिए प्रेरित किया।
- जवाहरलाल नेहरू और महात्मा गांधी दोनों ने फिलिस्तीनी मुद्दे का समर्थन किया और धर्म के आधार पर दो राष्ट्रों की अवधारणा को अस्वीकार किया।
- एक अंतरराष्ट्रीय नियमों की अवहेलना करने वाली और कब्जा करने वाली शक्ति के रूप में देखे जाने के कारण, इज़राइल को वैश्विक दक्षिण के देशों, जिनमें भारत भी शामिल है, के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित करने में कठिनाई का सामना करना पड़ा।
1998 के बाद भारत–इज़राइल संबंध
- 1998 के बाद भारत और इज़राइल के संबंधों में तेजी से विस्तार हुआ और दोनों देशों ने अनेक क्षेत्रों में सहयोग को सुदृढ़ किया।
- दोनों देशों के बीच राजनीतिक संबंध मैत्रीपूर्ण रहे हैं तथा उच्च-स्तरीय यात्राओं और मंत्रिस्तरीय बैठकों ने द्विपक्षीय सहयोग को नई दिशा दी है।
- भारत एशिया में इज़राइल का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार और वैश्विक स्तर पर सातवाँ सबसे बड़ा भागीदार बन चुका है।
- इज़राइल भारत को मोती, कीमती पत्थर, रसायन, मशीनरी, विद्युत उपकरण, पेट्रोलियम उत्पाद, रक्षा सामग्री और परिवहन उपकरण निर्यात करता है।
- 2021 में भारत, इज़राइल, संयुक्त अरब अमीरात और संयुक्त राज्य अमेरिका ने I2U2 नामक एक नई रणनीतिक साझेदारी स्थापित की, जिसका उद्देश्य आर्थिक विकास, वैज्ञानिक नवाचार और क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा देना है।
- दोनों देशों ने आतंकवाद-रोधी सहयोग के लिए संयुक्त कार्य समूह का गठन किया है।
- ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत इज़राइली रक्षा कंपनियों ने भारतीय कंपनियों के साथ साझेदारी कर रक्षा उप-प्रणालियों के निर्माण में सहयोग किया है।
- कृषि क्षेत्र में दोनों देशों के बीच तीन-वर्षीय संयुक्त कार्य योजनाओं के माध्यम से सहयोग को औपचारिक रूप दिया गया है।
- 2021 में पाँचवाँ संयुक्त तीन-वर्षीय कृषि कार्यक्रम हस्ताक्षरित किया गया, जिसका उद्देश्य नए उत्कृष्टता केंद्र स्थापित करना और मौजूदा केंद्रों का विस्तार करना है।
- 2016 में जल संसाधन प्रबंधन और विकास सहयोग पर समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए।
- सांस्कृतिक स्तर पर लगभग 85,000 भारतीय मूल के यहूदी इज़राइल में निवास करते हैं, जो दोनों देशों के ऐतिहासिक संबंधों को दर्शाते हैं।
- भारतीय और इज़राइली विश्वविद्यालयों के बीच शैक्षणिक सहयोग और संयुक्त अनुसंधान कार्यक्रमों को भी बढ़ावा दिया गया है।
इज़राइल–फिलिस्तीन संघर्ष और भारत
अक्टूबर 2023 की शुरुआत में इज़राइल और गाज़ा स्थित उग्रवादी समूह हमास के बीच संघर्ष भड़क उठा। हमास ने इज़राइल पर रॉकेट हमले किए और दक्षिणी इज़राइल के क्षेत्रों में घुसपैठ की, जिससे जनहानि हुई और बंधक बनाए गए। इसके जवाब में इज़राइल ने तुरंत प्रतिउत्तर कार्रवाई शुरू की।
- इज़राइल–फिलिस्तीन संघर्ष की जड़ें 19वीं सदी के उत्तरार्ध में मिलती हैं।
- 1947 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रस्ताव 181 को स्वीकृति दी, जिसका उद्देश्य ब्रिटिश शासनाधीन फिलिस्तीन को अरब और यहूदी राज्यों में विभाजित करना था।
- फिलिस्तीन पहले उस्मानी (ओटोमन) साम्राज्य का हिस्सा था और बाद में ब्रिटिश शासन के अधीन आ गया।
14 मई 1948 को इज़राइल राज्य की स्थापना हुई, जिसके परिणामस्वरूप पहला अरब–इज़राइल युद्ध हुआ। - यह युद्ध 1949 में समाप्त हुआ, जिसमें इज़राइल विजयी रहा। हालांकि, इसके कारण बड़ी संख्या में फिलिस्तीनियों का विस्थापन हुआ और क्षेत्र तीन भागों इज़राइल, वेस्ट बैंक और गाज़ा पट्टी में विभाजित हो गया।
- 1967 में हुए युद्ध में इज़राइल ने पूर्वी यरूशलेम, वेस्ट बैंक, सीरियाई गोलान हाइट्स, गाज़ा और मिस्र के सिनाई प्रायद्वीप पर कब्जा कर लिया।
भारत का रुख
- पिछले सात दशकों में इज़राइल और फिलिस्तीन के साथ भारत के संबंध उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं। नेहरू युग में स्थापित तीसरी दुनिया की एकजुटता (Third World Solidarity) और अहिंसा के सिद्धांतों का अनुसरण करते हुए भारत ने ऐतिहासिक रूप से फिलिस्तीनी उद्देश्य का निरंतर समर्थन किया है।
- फिलिस्तीन के संबंध में भारत की स्थिति अरब जगत, गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) और संयुक्त राष्ट्र की सामान्य सहमति से प्रभावित रही।
- भारत उन अंतिम गैर-मुस्लिम देशों में से एक था जिसने इज़राइल को मान्यता दी, जबकि वह पहला गैर-अरब देश था जिसने फिलिस्तीन मुक्ति संगठन (PLO) को मान्यता प्रदान की।
- भारत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि इज़राइल और फिलिस्तीन के बीच शांति सुनिश्चित करने के लिए दो-राष्ट्र समाधान (Two-State Solution) के अलावा कोई विकल्प नहीं है, और प्रत्यक्ष वार्ता ही शांति का एकमात्र मार्ग है।
भारत की ‘डी–हाइफ़नेशन नीति’?
- ‘डी-हाइफ़नेशन’ नीति का अर्थ है कि भारत ने इज़राइल और फिलिस्तीन के साथ अपने संबंधों को अलग-अलग रखने का प्रयास किया है।
- इस नीति से पहले, भारत का दृष्टिकोण अक्सर फिलिस्तीनी मुद्दे के समर्थन से अत्यधिक प्रभावित माना जाता था।
- हाल के वर्षों में, भारत ने इज़राइल और फिलिस्तीन दोनों के साथ अपने संबंधों का विस्तार करने का प्रयास किया है, जबकि फिलिस्तीनी उद्देश्य के प्रति अपना समर्थन बनाए रखा है।
- डी-हाइफ़नेशन नीति के तहत भारत दोनों देशों के साथ अलग-अलग मार्गों पर संवाद और सहयोग करता है तथा प्रत्येक देश के साथ अपने हितों का स्वतंत्र रूप से अनुसरण करता है।
- अब इज़राइल के साथ भारत के संबंध अपने स्वतंत्र आधार पर खड़े हैं और वे फिलिस्तीन के साथ संबंधों से अलग और स्वतंत्र हैं।
- शीतयुद्ध काल में ‘हाइफ़नेशन’ एक बाध्यता थी, परंतु बाद के समय में भी यह दृष्टिकोण जारी रहा, संभवतः अरब देशों को नाराज़ करने के भय के कारण।
भारत–इज़राइल संबंधों में चुनौतियाँ
- इज़राइल ईरान को अस्तित्वगत खतरा मानता है, जबकि भारत ऊर्जा आपूर्ति और अफगानिस्तान एवं मध्य एशिया तक पहुँच के लिए चाबहार बंदरगाह के माध्यम से ईरान के साथ सहयोग को महत्व देता है।
- इज़राइल के अरब देशों के साथ मतभेद हैं, जबकि यरूशलेम पर अमेरिका के निर्णय के विरुद्ध भारत का संयुक्त राष्ट्र में मतदान क्षेत्र में उसके व्यापक हितों को दर्शाता है।
- चीन एशिया में इज़राइल का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है (2022 में द्विपक्षीय व्यापार 1 अरब डॉलर), और दोनों के बीच प्रौद्योगिकी एवं निवेश संबंध मजबूत हैं।
- भारत की विदेश नीति में इज़राइल और फिलिस्तीन को पूरी तरह अलग करना कठिन है, जिससे मध्य पूर्व के अन्य देशों के साथ कूटनीतिक रणनीति बनाते समय संतुलन आवश्यक हो जाता है।
निष्कर्ष
भारत–इज़राइल संबंध 2026 में एक नए युग में प्रवेश कर चुके हैं। यह साझेदारी अब केवल रक्षा लेन-देन नहीं, बल्कि नवाचार-आधारित विकास, प्रौद्योगिकी सहयोग, बहुपक्षीय संपर्क और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का समेकित ढाँचा बन चुकी है। यदि दोनों देश ईरान, फिलिस्तीन और चीन जैसे संवेदनशील मुद्दों पर संतुलित रणनीति बनाए रखते हैं, तो यह संबंध 21वीं सदी के वैश्विक शक्ति-संतुलन में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
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