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भारत-ईरान संबंधों का नया अध्याय

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:

भारत और ईरान के बीच के संबंध केवल दो आधुनिक राष्ट्रों के बीच की कूटनीति का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि यह दो ऐसी महान सभ्यताओं का मिलन है जिन्होंने सहस्राब्दियों से मानवता के इतिहास, संस्कृति और दर्शन को आकार दिया है। जब हम ‘सभ्यतागत जुड़ाव’ की बात करते हैं, तो भारत और फारस (ईरान) का उदाहरण सबसे सटीक बैठता है। सिंधु घाटी सभ्यता और मेसोपोटामिया के समय से लेकर आधुनिक युग तक, इन दोनों भू-भागों ने एक-दूसरे के साथ न केवल व्यापार किया है, बल्कि विचारों, भाषाओं और परंपराओं का भी आदान-प्रदान किया है।

भारत और ईरान के संबंधों की गहराई को समझने के लिए हमें इतिहास के उन पन्नों को पलटना होगा जहाँ संस्कृत और पारसी भाषाएं एक-दूसरे की पूरक लगती हैं। भाषाई समानताएं इस बात का प्रमाण हैं कि दोनों देशों के पूर्वज एक ही सांस्कृतिक मूल से निकले थे।

मध्यकाल में फारसी भारत की आधिकारिक और साहित्यिक भाषा बनी, जिसने भारतीय कला, वास्तुकला और प्रशासनिक तंत्र पर अमिट छाप छोड़ी। सूफीवाद का उदय और उसका भारत में प्रसार ईरान और भारत के आध्यात्मिक मिलन का सबसे सुंदर उदाहरण है।

आज जब दोनों देश रणनीतिक साझेदारी की बात करते हैं, तो उनके पास विश्वास का एक ऐसा प्राचीन आधार है जो दुनिया के बहुत कम देशों के पास उपलब्ध है। यही कारण है कि तमाम अंतरराष्ट्रीय दबावों और बदलते वैश्विक समीकरणों के बावजूद, भारत और ईरान ने अपने संबंधों में एक निरंतरता बनाए रखी है।

चाबहार बंदरगाह: भारत का ‘गेम चेंजर’ प्रोजेक्ट

आधुनिक संदर्भ में, भारत और ईरान की साझेदारी का सबसे महत्वपूर्ण और ठोस स्तंभ ‘चाबहार बंदरगाह’ है। यह परियोजना केवल एक बुनियादी ढांचा परियोजना नहीं है, बल्कि यह भारत की भू-राजनीतिक आकांक्षाओं और मध्य एशिया तक उसकी पहुंच का ‘गेटवे’ है।

लंबे समय से भारत को अपनी पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान द्वारा पहुंच की बाधाओं का सामना करना पड़ रहा था, जिसने भारत को अफगानिस्तान और उससे आगे के देशों के साथ सड़क मार्ग से जुड़ने से रोक रखा था। चाबहार ने इस भौगोलिक बाधा को सदा के लिए समाप्त कर दिया है।

मई 2024 में भारत और ईरान के बीच चाबहार के शहीद बेहश्ती टर्मिनल के संचालन के लिए हुआ 10 वर्षीय दीर्घकालिक समझौता एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है। यह समझौता भारत को वह स्थिरता और सुरक्षा प्रदान करता है जिसकी आवश्यकता बड़े स्तर पर निवेश और व्यापार के लिए होती है। यह निवेश न केवल बंदरगाह के विकास के लिए है, बल्कि यह पूरे क्षेत्र की आर्थिक तस्वीर बदलने की क्षमता रखता है।

INSTC: उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे की धुरी

चाबहार की महत्ता केवल द्विपक्षीय व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ‘अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे’ (INSTC) का एक अभिन्न हिस्सा है। INSTC एक ऐसा महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है जो हिंद महासागर को फारस की खाड़ी के माध्यम से रूस और यूरोप से जोड़ने का लक्ष्य रखता है।

यह मार्ग पारंपरिक स्वेज नहर मार्ग की तुलना में लगभग 40 प्रतिशत कम समय और 30 प्रतिशत कम लागत वाला है। भारत के लिए ईरान इस गलियारे की धुरी है। यदि ईरान के माध्यम से यह कनेक्टिविटी सुचारू रूप से चलती है, तो भारतीय सामान बहुत ही कम समय में मध्य एशिया के बाजारों और पूर्वी यूरोप तक पहुंच सकेगा। यह भारत को एक वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनाने के सपने को साकार करने में मदद करेगा, क्योंकि उत्पादों की लागत और समय में कमी अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाएगी।

भारत और ईरान संबंध: खिंचाव और दूरियां

(a) अमेरिका फैक्टर:

  • हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में भारत और ईरान के बीच के प्रगाढ़ संबंधों में एक स्पष्ट खिंचाव और दूरियां भी देखी गई हैं।
  • इस कूटनीतिक दूरी के पीछे सबसे बड़ा कारक संयुक्त राज्य अमेरिका का प्रभाव रहा है। डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन द्वारा 2018 में ‘संयुक्त व्यापक कार्य योजना’ (JCPOA) यानी ईरान परमाणु समझौते से हटने और ईरान पर फिर से कड़े प्रतिबंध लगाने के बाद भारत के लिए स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण हो गई।
  • अमेरिका के दबाव में भारत को ईरान से अपना तेल आयात लगभग शून्य करना पड़ा, जो कभी भारत की ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा था।
  • इस कदम ने तेहरान को यह संदेश दिया कि नई दिल्ली अपनी ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता से समझौता कर रही है।
  • हालांकि भारत ने चाबहार परियोजना के लिए अमेरिकी प्रतिबंधों से छूट प्राप्त कर ली थी, लेकिन निवेश की धीमी गति और बैंकिंग चैनलों के बंद होने से ईरान के भीतर भारत की विश्वसनीयता पर सवाल उठे।
  • अमेरिका की ‘इंडो-पैसिफिक’ रणनीति और भारत का अमेरिका के साथ बढ़ता सैन्य सहयोग ईरान को अक्सर संदेह की दृष्टि से देखने पर मजबूर करता है, क्योंकि ईरान अमेरिका को अपना सबसे बड़ा शत्रु मानता है।

(b) चीन फैक्टर:

  • इस दूरी का एक और महत्वपूर्ण आयाम ‘चीन कारक’ है। जैसे-जैसे भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक निकटता बढ़ी, ईरान ने पूर्व की ओर देखना शुरू किया और चीन के करीब चला गया।
  • चीन और ईरान के बीच 2021 में हस्ताक्षरित 25 वर्षीय व्यापक सहयोग समझौता, जिसमें 400 अरब डॉलर के निवेश का वादा किया गया है, भारत के लिए एक बड़ी रणनीतिक चुनौती है।
  • चीन न केवल ईरान का सबसे बड़ा तेल खरीदार बना हुआ है, बल्कि वह चाबहार के ठीक बगल में पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट का विकास भी कर रहा है। ईरान के लिए चीन एक ऐसा साझेदार बन गया है जो अमेरिकी प्रतिबंधों की परवाह किए बिना उसे आर्थिक जीवनदान दे रहा है।
  • ऐसे में ईरान की प्राथमिकताएं भारत से हटकर चीन की ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) की ओर झुकती हुई दिखाई दीं। भारत को डर है कि यदि वह ईरान में अपनी पकड़ कमजोर करता है, तो चीन इस खाली स्थान को भर देगा, जिससे भारत की मध्य एशिया तक पहुंच का सपना बाधित हो सकता है।

(c) इजरायल फैक्टर:

  • इजरायल के साथ भारत के बढ़ते रक्षा और तकनीकी संबंधों ने भी ईरान के साथ संबंधों को प्रभावित किया है। भारत और इजरायल आज एक ‘रणनीतिक साझेदारी’ साझा करते हैं, और इजरायल भारत के लिए शीर्ष रक्षा आपूर्तिकर्ताओं में से एक है।
  • दूसरी ओर, ईरान और इजरायल के बीच का शत्रुतापूर्ण संबंध किसी से छिपा नहीं है। ईरान इजरायल को एक अवैध इकाई मानता है और क्षेत्र में इजरायल के प्रभाव को कम करने के लिए हमास और हिजबुल्लाह जैसे समूहों का समर्थन करता है।
  • जब भारत ने इजरायल के साथ अपने संबंधों को ‘डिस-हाइफनेट’ किया और प्रधानमंत्री स्तर की यात्राएं शुरू कीं, तो तेहरान में इसे लेकर संशय पैदा हुआ।
  • विशेष रूप से ‘I2U2’ (भारत, इजरायल, यूएई, अमेरिका) जैसे समूहों का गठन, जिसे अक्सर ‘मध्य पूर्व का क्वाड’ कहा जाता है, ईरान की नजर में उसे घेरने की एक पश्चिमी चाल है।
  • भारत के लिए चुनौती यह है कि वह एक तरफ इजरायल के साथ अपनी सुरक्षा जरूरतों को पूरा करे और दूसरी तरफ ईरान के साथ अपने ऐतिहासिक और कनेक्टिविटी हितों को बचाए रखे।

रणनीतिक साझेदारी और साझा हित 

इन जटिलताओं के बावजूद, सुरक्षा और रणनीतिक मोर्चे पर भारत और ईरान के हित कई स्थानों पर साझा हैं। विशेषकर अफगानिस्तान के संदर्भ में, दोनों देश एक स्थिर और शांतिपूर्ण काबुल देखना चाहते हैं। तालिबान के सत्ता में आने के बाद पैदा हुई चुनौतियों ने भारत और ईरान को एक मंच पर ला दिया है। दोनों देश इस बात पर सहमत हैं कि अफगानिस्तान की धरती का उपयोग आतंकवाद, कट्टरपंथ और मादक पदार्थों की तस्करी के लिए नहीं होना चाहिए। ईरान के लिए अफगानिस्तान से आने वाले शरणार्थी और नशीले पदार्थों की तस्करी एक बड़ी आंतरिक सुरक्षा समस्या है, और भारत भी इन खतरों के प्रति उतना ही संवेदनशील है। इस साझा चिंता ने दोनों देशों के सुरक्षा तंत्र और खुफिया एजेंसियों के बीच सहयोग को और अधिक गहरा किया है।

इसके अतिरिक्त, हिंद महासागर और फारस की खाड़ी में समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करना दोनों देशों की प्राथमिकता है, क्योंकि भारत का एक बड़ा व्यापार इसी मार्ग से गुजरता है। भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए यह सुनिश्चित करना पड़ता है कि ईरान के साथ उसके संबंध अमेरिका या इजरायल के साथ उसके व्यापक हितों को नकारात्मक रूप से प्रभावित न करें।

भारत और ईरान संबंध:पीपल-टू-पीपल

  • ईरान के साथ भारत का सहयोग केवल सरकारी स्तर तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे ‘पीपल-टू-पीपल’ यानी जनता के स्तर पर ले जाने की आवश्यकता है।
  • पर्यटन, शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। भारत के पास विश्व स्तरीय उच्च शिक्षा संस्थान हैं, जो ईरानी छात्रों के लिए एक बड़ा गंतव्य बन सकते हैं।
  • वहीं, ईरान के ऐतिहासिक स्थल और प्राकृतिक सुंदरता भारतीय पर्यटकों को आकर्षित कर सकते हैं। पर्यटन और शैक्षणिक आदान-प्रदान के माध्यम से दोनों देशों की नई पीढ़ी एक-दूसरे के करीब आएगी, जिससे संबंधों में एक नया सामाजिक आधार तैयार होगा।
  • जब तक लोग एक-दूसरे से नहीं जुड़ेंगे, तब तक रणनीतिक साझेदारी की जड़ें पूरी तरह से गहरी नहीं हो सकतीं। इसके लिए वीजा प्रक्रियाओं को सरल बनाना और सीधी हवाई कनेक्टिविटी को बढ़ावा देना अनिवार्य है।
  • साथ ही, कनेक्टिविटी के डिजिटल आयाम पर भी विचार करना आवश्यक है। आज के दौर में केवल बंदरगाह और सड़कें काफी नहीं हैं, बल्कि ‘डिजिटल हब’ के रूप में भी सहयोग जरूरी है।

निष्कर्ष और आगे की राह:

निष्कर्षतः, भारत और ईरान के बीच की यह साझेदारी एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की ओर बढ़ता कदम है। यह साझेदारी पश्चिम की ‘कंटेनमेंट’ नीतियों और चीन की ‘विस्तारवादी’ नीतियों के बीच एक संतुलनकारी शक्ति के रूप में कार्य कर सकती है। भारत के लिए ईरान ‘पश्चिम की ओर खिड़की’ है, तो ईरान के लिए भारत एक उभरती हुई वैश्विक महाशक्ति और एक विश्वसनीय मित्र है। हाल के वर्षों में आई दूरियां कूटनीतिक उतार-चढ़ाव का हिस्सा हैं, लेकिन चाबहार के प्रति भारत की नई प्रतिबद्धता यह दर्शाती है कि नई दिल्ली इन संबंधों को खोना नहीं चाहती। भविष्य की राह चुनौतीपूर्ण हो सकती है, लेकिन यदि दोनों देश अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और पारस्परिक सम्मान के सिद्धांत पर अडिग रहते हैं, तो यह “लिंक्ड सिविलाइजेशन” न केवल एशिया बल्कि पूरी दुनिया के लिए स्थिरता और समृद्धि का एक नया अध्याय लिखेगी। यह समय आपसी संदेहों को पीछे छोड़ कर एक ऐसी साझा नियति की ओर बढ़ने का है, जो हमारे पूर्वजों के गौरवशाली अतीत के अनुरूप हो और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित और कनेक्टेड विश्व का निर्माण करे।

 

स्रोत: The hindu 


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