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भारत और अरब लीग संबंध

सांस्कृतिक सेतु से रणनीतिक साझेदारी तक

प्रस्तावना:

भारत और अरब जगत के बीच संबंध केवल आधुनिक कूटनीति की उपज नहीं हैं, बल्कि इनकी जड़ें इतिहास के उस दौर में हैं जब व्यापारिक काफिले और समुद्री जहाज संस्कृतियों का आदान-प्रदान करते थे। अरब लीग, जो 22 अरब देशों का एक प्रभावशाली क्षेत्रीय संगठन है, भारत के लिए हमेशा से एक महत्वपूर्ण प्राथमिकता रहा है। पश्चिम एशिया के साथ भारत के जुड़ाव का आधार ‘लिंक वेस्ट’ नीति रही है, जो अब केवल ऊर्जा सुरक्षा तक सीमित न रहकर एक व्यापक रणनीतिक साझेदारी में बदल चुकी है। वर्तमान में भारत और अरब लीग के विदेश मंत्रियों की बैठक ने इन संबंधों को एक नई ऊंचाई प्रदान की है। यह लेख उन विभिन्न आयामों का विश्लेषण करता है जो भारत-अरब संबंधों को परिभाषित करते हैं।

ऐतिहासिक और सांस्कृतिक ताना-बाना

भारत और अरब देशों के बीच सांस्कृतिक संबंधों का इतिहास सहस्राब्दियों पुराना है। प्राचीन काल में सिन्धु घाटी सभ्यता और मेसोपोटामिया के बीच व्यापारिक संबंध स्थापित थे। मध्य काल में, भारतीय गणित, खगोल विज्ञान और चिकित्सा के ज्ञान को अरब विद्वानों ने अपनाया और उसे दुनिया के अन्य हिस्सों तक पहुँचाया। ‘अरेबिक न्यूमेरल्स’ या अंक प्रणाली इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है। भाषा, वास्तुकला और खान-पान के स्तर पर भी दोनों क्षेत्रों ने एक-दूसरे को गहराई से प्रभावित किया है। भारत के केरल तट पर इस्लाम का आगमन और अरब व्यापारियों द्वारा लाए गए सूफी विचार आज भी भारतीय सांस्कृतिक विविधता का हिस्सा हैं। यह ऐतिहासिक विश्वास ही आज के आधुनिक कूटनीतिक संबंधों की सबसे मजबूत बुनियाद है।

अरब लीग के बारे में:

विदेश मंत्रियों की बैठक: एक नया मील का पत्थर

हाल ही में आयोजित भारत-अरब लीग विदेश मंत्रियों की बैठक ने दोनों पक्षों के बीच सहयोग के नए द्वार खोले हैं। इस बैठक का मुख्य केंद्र बिंदु न केवल द्विपक्षीय व्यापार था, बल्कि वैश्विक चुनौतियों पर एक साझा दृष्टिकोण विकसित करना भी था। बैठक के दौरान विदेश मंत्रियों ने आतंकवाद, समुद्री सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा स्थिरता जैसे ज्वलंत मुद्दों पर गहन चर्चा की। भारत ने इस मंच से स्पष्ट किया कि अरब जगत उसकी विदेश नीति का एक केंद्रीय स्तंभ है। इस बैठक की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यह रही कि दोनों पक्षों ने आपसी सहयोग के लिए एक ‘साझा कार्ययोजना’ तैयार करने पर सहमति जताई, जो आने वाले दशकों में व्यापार और निवेश को नई दिशा प्रदान करेगी।

रणनीतिक और सुरक्षा सहयोग के बढ़ते कदम

पिछले कुछ वर्षों में भारत और अरब देशों, विशेषकर सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बीच सुरक्षा और रक्षा संबंधों में अभूतपूर्व प्रगति देखी गई है। रक्षा क्षेत्र में हुए समझौतों के बाद अब भारत और अरब देशों के बीच नियमित रूप से सुरक्षा संवाद आयोजित किए जा रहे हैं। हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करना दोनों पक्षों का साझा लक्ष्य है। पायरेसी (समुद्री डकैती) को रोकने और समुद्री व्यापार मार्गों को सुरक्षित रखने के लिए भारत और अरब नौसेनाओं के बीच संयुक्त अभ्यास अब एक नियमित प्रक्रिया बन गए हैं। इसके अतिरिक्त, आतंकवाद के खिलाफ शून्य सहिष्णुता की नीति पर दोनों पक्ष एकमत हैं। सूचनाओं के आदान-प्रदान और कट्टरपंथ के खिलाफ साझा अभियान ने इन रणनीतिक संबंधों को और अधिक परिपक्व बनाया है।

आर्थिक कूटनीति और व्यापारिक संतुलन

आर्थिक दृष्टिकोण से अरब लीग भारत के लिए एक अनिवार्य भागीदार है। भारत और अरब देशों के बीच होने वाला कुल व्यापार अरबों डॉलर का है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों, विशेषकर कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का एक बड़ा हिस्सा सऊदी अरब, इराक और कुवैत जैसे देशों से आयात करता है। हालांकि, अब यह संबंध ‘खरीदार-विक्रेता’ के ढांचे से ऊपर उठकर संयुक्त निवेश की ओर बढ़ रहा है। अबू धाबी और सऊदी अरब की कंपनियां भारत के बुनियादी ढांचे, नवीकरणीय ऊर्जा और पेट्रोकेमिकल्स क्षेत्र में भारी निवेश कर रही हैं। वहीं दूसरी ओर, भारतीय कंपनियां अरब देशों के सूचना प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य सेवा और विनिर्माण क्षेत्रों में अपनी पैठ बना रही हैं। भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) जैसी परियोजनाएं इस व्यापारिक संबंध को एक वैश्विक आयाम देने की क्षमता रखती हैं।

ऊर्जा सुरक्षा: संबंधों की रीढ़

भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था को ऊर्जा की निरंतर आपूर्ति की आवश्यकता है और अरब देश इस मांग को पूरा करने में सबसे विश्वसनीय भागीदार रहे हैं। भारत-अरब संबंधों में ऊर्जा सुरक्षा हमेशा से प्राथमिकता रही है। लेकिन बदलते वैश्विक परिदृश्य में, दोनों पक्ष अब जीवाश्म ईंधन से आगे बढ़कर हरित ऊर्जा (Green Energy) की ओर रुख कर रहे हैं। सौर ऊर्जा और हाइड्रोजन ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग के लिए नई रूपरेखा तैयार की जा रही है। भारत का ‘इंटरनेशनल सोलर अलायंस’ (ISA) इस दिशा में अरब देशों के साथ मिलकर काम कर रहा है। यह संक्रमण न केवल पर्यावरण के अनुकूल है बल्कि दोनों क्षेत्रों की अर्थव्यवस्थाओं को भविष्य के लिए सुरक्षित बनाने का एक प्रयास भी है।

प्रवासी भारतीयों की भूमिका और सॉफ्ट पावर

अरब लीग के देशों में रहने वाले लगभग 90 लाख भारतीय प्रवासी इन संबंधों की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं। यह प्रवासी समुदाय न केवल अरब देशों की अर्थव्यवस्था के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है, बल्कि भारत के लिए विदेशी मुद्रा (Remittances) का सबसे बड़ा स्रोत भी है। भारतीय पेशेवरों, डॉक्टरों, इंजीनियरों और श्रमिकों ने अपनी मेहनत और ईमानदारी से अरब जगत में भारत की एक सकारात्मक छवि बनाई है। भारतीय संस्कृति, बॉलीवुड फिल्में और योग अरब देशों में बेहद लोकप्रिय हैं। ‘सॉफ्ट पावर’ का यह प्रभाव राजनीतिक संबंधों को और अधिक सुगम बनाता है। संकट के समय में, चाहे वह महामारी हो या युद्ध की स्थिति, भारत और अरब देशों ने एक-दूसरे के नागरिकों की सुरक्षा और सहायता सुनिश्चित करने में जो समन्वय दिखाया है, वह प्रशंसनीय है।

साझा वैश्विक चुनौतियां और बहुपक्षीय मंच

भारत और अरब लीग संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कई मुद्दों पर समान विचार रखते हैं। जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से निपटना, वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज़ को बुलंद करना और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में सुधार की आवश्यकता पर दोनों पक्ष सहमत हैं। विशेष रूप से, खाद्य सुरक्षा के मुद्दे पर भारत और अरब देश मिलकर काम कर रहे हैं। भारत ने अपनी कृषि विशेषज्ञता और उत्पादन क्षमता के माध्यम से अरब जगत की खाद्य आवश्यकताओं को पूरा करने का आश्वासन दिया है। इसी तरह, डिजिटल क्रांति और साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में भी आपसी सहयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि भविष्य की चुनौतियों का सामना मजबूती से किया जा सके।

कनेक्टिविटी और भविष्य की संभावनाएं

भविष्य के संबंधों का आधार ‘कनेक्टिविटी’ होने वाला है। भौतिक कनेक्टिविटी के साथ-साथ डिजिटल कनेक्टिविटी पर भी जोर दिया जा रहा है। भारत के ‘यूपीआई’ (UPI) जैसे भुगतान तंत्र को अरब देशों में स्वीकार्यता मिलना डिजिटल सहयोग का एक बड़ा उदाहरण है। पर्यटन के क्षेत्र में भी अपार संभावनाएं हैं। अरब देशों के नागरिकों के लिए भारत एक पसंदीदा मेडिकल टूरिज्म गंतव्य बन रहा है, जबकि भारतीय पर्यटक दुबई, ओमान और सऊदी अरब के ऐतिहासिक स्थलों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। भविष्य में, शिक्षा के क्षेत्र में भी आदान-प्रदान बढ़ने की संभावना है, जहां भारतीय संस्थान अरब देशों में अपने परिसर खोल सकते हैं और अरब छात्र उच्च शिक्षा के लिए भारत आ सकते हैं।

निष्कर्ष:

निष्कर्षतः, भारत और अरब लीग के संबंध समय की कसौटी पर खरे उतरे हैं। वर्तमान में विदेश मंत्रियों की निरंतर मुलाकातें और सुरक्षा संवाद यह दर्शाते हैं कि दोनों पक्ष अपनी साझेदारी को केवल आर्थिक लाभ तक सीमित नहीं रखना चाहते, बल्कि एक न्यायसंगत और स्थिर वैश्विक व्यवस्था के निर्माण में साथ चलना चाहते हैं। यद्यपि भू-राजनीतिक चुनौतियां बनी रहेंगी, लेकिन आपसी सम्मान और ऐतिहासिक विश्वास इन बाधाओं को पार करने में सहायक सिद्ध होगा। भारत-अरब लीग संबंधों का भविष्य न केवल दोनों क्षेत्रों की समृद्धि के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह एशिया और अफ्रीका के बीच एक मजबूत सेतु का कार्य भी करेगा। “ब्रिजिंग कल्चर्स, क्रिएटिंग ऑपर्च्युनिटीज” का विचार अब वास्तविकता में बदल रहा है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए शांति और प्रगति का मार्ग प्रशस्त करेगा।


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