वर्तमान वैश्विक युग में, ऊर्जा सुरक्षा केवल आर्थिक विकास का पैमाना नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय संप्रभुता और भू-राजनीतिक स्थिरता का एक अपरिहार्य स्तंभ बन चुका है। जैसे-जैसे विश्व जीवाश्म ईंधन से स्वच्छ ऊर्जा की ओर संक्रमण (Energy Transition) कर रहा है, भारत जैसे विशाल और तेजी से बढ़ते ऊर्जा उपभोक्ता की भूमिका अपरिहार्य हो गई है। इसी पृष्ठभूमि में, पेरिस स्थित ‘अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी’ (IEA) की पूर्णकालिक सदस्यता के लिए भारत की औपचारिक बातचीत का शुरू होना एक ऐतिहासिक मोड़ है। यह न केवल भारत की ‘ऊर्जा शक्ति’ (Energy Power) के रूप में वैश्विक मान्यता है, बल्कि यह उस पुराने पश्चिमी ढांचे को बदलने का भी संकेत है जो दशकों से वैश्विक ऊर्जा प्रशासन पर हावी रहा है।
IEA का उद्भव और ऐतिहासिक प्रासंगिकता
IEA की स्थापना 1974 के ‘तेल संकट’ (Oil Crisis) के जवाब में की गई थी। उस समय ओपेक (OPEC) देशों द्वारा तेल निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंधों ने विकसित देशों की अर्थव्यवस्थाओं को हिलाकर रख दिया था। जवाब में, विकसित देशों ने ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक सामूहिक तंत्र विकसित किया। दशकों तक यह संस्था केवल आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) के अमीर देशों का एक क्लब मानी जाती रही।
हालाँकि, 21वीं सदी में ऊर्जा की मांग का केंद्र पश्चिम से पूर्व (एशिया) की ओर खिसक गया है। भारत आज दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता और तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है। IEA यह भली-भांति जानता है कि भारत की भागीदारी के बिना वैश्विक ऊर्जा भविष्य पर कोई भी चर्चा या निर्णय अधूरा है। 2017 में भारत का ‘एसोसिएट सदस्य’ बनना और अब 2024 में पूर्ण सदस्यता की प्रक्रिया शुरू करना इसी बदली हुई वास्तविकता का प्रमाण है।

पूर्ण सदस्यता की राह में प्रमुख तकनीकी और रणनीतिक बाधाएं
यद्यपि भारत और IEA दोनों इस साझेदारी के लिए उत्सुक हैं, लेकिन सदस्यता की शर्तें काफी कठोर हैं। इनमें सबसे प्रमुख ’90-दिवसीय रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार’ (SPR) की अनिवार्यता है।
- रणनीतिक तेल भंडार की चुनौती: IEA का नियम है कि प्रत्येक सदस्य देश के पास पिछले वर्ष के अपने शुद्ध दैनिक तेल आयात के कम से कम 90 दिनों के बराबर आपातकालीन भंडार होना चाहिए। वर्तमान में भारत का समर्पित रणनीतिक भंडार (SPR) जो विशाखापत्तनम, मंगलुरु और पादुर में स्थित है, केवल लगभग 9.5 दिनों की ही सुरक्षा प्रदान करता है। यदि हम भारतीय तेल कंपनियों (रिफाइनरियों) के स्टॉक को जोड़ दें, तो भी यह 65-70 दिनों के आसपास पहुंचता है। 90 दिनों के लक्ष्य को पाने के लिए भारत को न केवल नई भूमि और भूमिगत गुफाओं (Underground Caverns) की आवश्यकता है, बल्कि इसमें अरबों डॉलर के पूंजीगत निवेश की भी आवश्यकता होगी।
- OECD सदस्यता का मुद्दा: पारंपरिक रूप से IEA का सदस्य होने के लिए OECD का सदस्य होना अनिवार्य रहा है। भारत वर्तमान में OECD का हिस्सा नहीं है और वह अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (trategic Autonomy) बनाए रखने के लिए इस समूह में शामिल होने में फिलहाल रुचि नहीं रखता है। अतः, भारत के लिए IEA को अपने नियमों में संशोधन करना होगा, जो एक जटिल कूटनीतिक प्रक्रिया है।
- कानूनी ढांचा और आपातकालीन तंत्र: सदस्यता के लिए भारत को एक ऐसा कानूनी ढांचा तैयार करना होगा जो संकट के समय सरकार को निजी और सार्वजनिक तेल कंपनियों के भंडार पर नियंत्रण करने और वैश्विक ‘सामूहिक रिलीज’ में योगदान देने का अधिकार दे। भारत के घरेलू बाजार की संवेदनशीलता को देखते हुए यह एक चुनौतीपूर्ण कार्य है।
भारत के लिए सदस्यता के बहुआयामी लाभ
यदि भारत इन बाधाओं को पार कर पूर्णकालिक सदस्य बनता है, तो इसके लाभ केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं रहेंगे:
- वैश्विक नीति निर्धारण में भागीदारी: अभी तक भारत IEA की रिपोर्ट और नीतियों का केवल एक ‘विषय’ रहा है। पूर्ण सदस्यता मिलने पर भारत ‘नीति निर्माता’ (Rule-maker) बन जाएगा। वह वैश्विक तेल बाजार के उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने वाली बैठकों में वोट देने का अधिकार रखेगा।
- ऊर्जा सुरक्षा का कवच: तेल आपूर्ति में किसी भी वैश्विक व्यवधान (जैसे युद्ध या प्राकृतिक आपदा) की स्थिति में, भारत को IEA के सामूहिक तेल रिलीज तंत्र तक पहुंच मिलेगी। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को तेल की कीमतों के झटके (Oil Price Shocks) से बचाया जा सकेगा।
- स्वच्छ ऊर्जा और तकनीक का हस्तांतरण: IEA केवल तेल तक सीमित नहीं है। यह सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और ग्रीन हाइड्रोजन जैसी भविष्य की तकनीकों का भी केंद्र है। भारत के ‘नेट-जीरो 2070’ के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उसे सर्वोत्तम वैश्विक विशेषज्ञता और कम लागत वाली तकनीक की आवश्यकता है, जो इस मंच से सुलभ होगी।
- ग्लोबल साउथ का नेतृत्व: IEA में भारत की मौजूदगी विकासशील देशों के हितों की रक्षा करेगी। भारत यह सुनिश्चित कर सकेगा कि ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) न्यायसंगत हो और गरीब देशों पर इसका अतिरिक्त बोझ न पड़े।
भारत सरकार के प्रयास और भविष्य की रणनीति
भारत पहले ही अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए ‘SPR Phase-II’ की योजना बना चुका है, जिसके तहत ओडिशा के चांदीखोल और कर्नाटक के पादुर में अतिरिक्त भंडारण क्षमता विकसित की जा रही है। इसके अलावा, भारत अपनी रिफाइनिंग क्षमता बढ़ा रहा है और रणनीतिक साझेदारी के तहत अमेरिका और खाड़ी देशों के साथ भी सहयोग कर रहा है।
भारत और IEA के बीच चल रही बातचीत इस बात पर केंद्रित है कि कैसे ’90-दिवसीय नियम’ को भारत की विशाल जनसंख्या और विशिष्ट परिस्थितियों के अनुकूल बनाया जाए। यह संभावना है कि IEA भारत के लिए एक विशेष ‘श्रेणी’ या ‘रियायती समय सीमा’ (Grace Period) का प्रावधान कर सकता है।
निष्कर्ष:
भारत का IEA में शामिल होना केवल एक संस्था की सदस्यता प्राप्त करना नहीं है, बल्कि यह वैश्विक ऊर्जा वास्तुकला (Global Energy Architecture) में भारत के बढ़ते प्रभुत्व का प्रतीक है। यह कदम भारत को ‘ऊर्जा अनिश्चितता’ के डर से मुक्त कर एक ‘ऊर्जा सुरक्षित’ राष्ट्र बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।
एक ऐसे समय में जब भू-राजनीतिक तनाव चरम पर हैं और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियां सामने हैं, भारत की यह कूटनीतिक सक्रियता न केवल उसके अपने नागरिकों के भविष्य को सुरक्षित करेगी, बल्कि पूरे विश्व के लिए ऊर्जा स्थिरता सुनिश्चित करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के अपने आदर्श के साथ, भारत IEA के मंच का उपयोग पूरी मानवता के लिए ‘सतत और किफायती ऊर्जा’ के लक्ष्य को पाने में करेगा।
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